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भाई के वर्जिन लंड से मै तृप्त हो गई

मैं सिकंदराबाद से स्नेहालक्ष्मी, 32 साल, 36-32-40, पहली बार अपनी मजेदार कहानी के साथ !

यह बात तब की है जब मैं अपनी शादी के करीब छः महीने बाद अपनी छोटी मौसी के घर कुछ दिन रहने के लिए गई थी। मेरे पति को किसी ज़रूरी बिज़नस के सिलसिले में कत्तर जाना पड़ गया था और वो करीब एक-डेढ़ महीने बाद आने वाले थे। पीछे से मैं कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली गई और वहां से एक हफ्ते बाद ही मेरी छोटी मौसी मुझे लेने आ गई कि चल स्नेहा कुछ दिन हमारे साथ भी रह जा ! मैं भी फ्री थी सोचा चलो मौसी के घर ही चलते हैं।

जब हम मौसी के घर पहुंचे तो मेरा स्वागत मौसी के बेटे 20 वर्षीय शिवदास और उसकी छोटी बहन 16 साल की सुंदर सी दीक्षा ने किया। मैं भी सबको बड़ी गर्मजोशी से मिली, शाम को मौसा जी आये उन्होंने भी बड़ा प्यार दिया।
3 दिन बाद मौसी कपड़े धो रही थी तो उन्होंने कहा- अरे स्नेहा ज़रा यह कपड़े छत पर सुखा आ !

मैं भी खाली बैठी थी, सोचा कि चलो थोड़ा काम ही कर लूं ! मैंने कपड़ों वाली बाल्टी उठाई और सुखाने के लिये छत पर चली गई। छत पर शिवदास बैठा पढ़ रहा था। मैं बाल्टी से कपड़े निकाल निकाल कर लोहे की तार पर डाल रही थी। अचानक मुझे अहसास हुआ कि जैसे कोई मुझे बहुत घूर घूर के देख रहा हो।

मैंने देखा तो ये शिवदास ही था। जब भी मैं कपड़े उठाने के लिए झुकती तो शिवदास मेरे भरे भरे गुन्दाज स्तनों को बड़े धयान से देखता।

कपड़े सुखाते सुखाते मैंने शिवदास से इधर उधर की बातें शुरू की तो वो भी पढ़ाई छोड़ के मुझ से दिलचस्पी लेकर बातें करने लगा। जब कपड़े सूखने के लिए डाल दिए तो मैं जानबूझ कर शिवदास के पास जा कर बैठ गई। मैंने दुपट्टा नहीं ओढ़ रखा था इसलिए मेरी वक्ष-रेखा स्पष्ट रूप से दिख रही थी और शिवदास की आँखें मेरे स्तनों पे गड़ी हुई थी। मैं भी शर्म न करते हुए उसके सामने ही चटाई पर उलटी लेट गई और उससे बातें करने लगी।

अब मेरे स्तनों को वो बड़े आराम से देख सकता था और मैं भी देख रही थी कि उसकी आँखें मेरे बूब्स से नहीं हट रही थी। फिर मैंने एक और शरारत की और बोली,” शिवदास, तुम्हारा दिल १ मिनट में कितनी बार धड़कता है?”
वो बोला- 72 बार !
“पर मुझे लगता है जैसे मेरा दिल ज्यादा धड़कता है, कहीं मुझे हार्ट-अटैक तो नहीं आ जायेगा !” मैं बोली।
“अरे दीदी पागल हो गई हो क्या? इतनी छोटी सी उम्र में भी कहीं हार्ट-अटैक हो सकता है !” उसने जवाब दिया।
“अच्छा चलो, मुझे अपनी दिल की धड़कन सुनाओ !”
यह कह कर मैं अपना कान उसके सीने पर लगा कर उसके दिल की धड़कन सुनने का नाटक करने लगी।
एक मिनट बाद मैंने सर हटा कर कहा,” बिलकुल ठीक ! पूरे ७२ बार ! अब मेरी सुनो !”

जबकि मुझे उसके दिल की धड़कन बढ़ी हुई लगी थी। मैंने जानबूझ कर उसका सर पकड़ कर अपने सीने पर इस तरह से रखा कि उसके होंठ मेरे स्तन-रेखा को छूते रहें। दोस्तों आप ये कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है l
उसने कान मेरे सीने से लगा तो लिया पर मैं जानती थी कि उसकी हालत खराब हो रही थी।
उसके बाद सारा दिन कोई ख़ास बात नहीं हुई, पर शिवदास बात-बे-बात मेरे आस पास ही मंडराता रहा।

रात को खाना खाने के बाद सोने से पहले दूध लेकर जब मौसी ऊपर शिवदास के कमरे में जाने लगी तो मैंने उन्हें कहा,”मौसी ! लाइए, दूध मैं ले जाती हूँ और हाँ मेरा गिलास भी इसके साथ ही रख दीजिये, दूध पीकर मैं भी दीक्षा के साथ ही सो जाउंगी।” “ओ के बेटा ! ये लो, और गुड नाईट !”

“गुड नाईट !” कह कर तीन गिलास दूध लेकर मैं ऊपर चौबारे में शिवदास और दीक्षा के कमरे में चली गई। ऊपर कमरे में बैठे दोनों अपने अपने बिस्तर पर बैठे पढ़ रहे थे। मैंने जाकर ऊंची आवाज़ में कहा,”दूध पियो भाई दूध पियो !”

दोनों ने मुस्कुरा कर मेरी और देखा फिर हमने इकट्ठे बैठ कर दूध पिया और थोड़ी देर इधर उधर की बातें करके लाईट बंद कर दी और सोने लगे। पर मुझे तो नींद ही नहीं आ रही थी। अभी शादी को सिर्फ छः महीने ही हुए थे और पति महीने-डेढ़-महीने के लिए बाहर चले गए थे, अभी तो मेरा दिल भी नहीं भरा था।

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