मेरी पहली चुदाई मौसी की लड़की के साथ

गतांग से आगे …

गनेश ने कहा – क्या बात है आज तुम दोनों बड़े खामोश लग रहे हो? मैंने कहा – नहीं तो. ऐसी कोई बात नहीं है. गनेश – कल भी तुम दोनों यहाँ आये थे? अनन्या – हाँ. कल भी यहाँ आये थे हम दोनों. गनेश – तब तो बड़ी मस्ती की होगी तुम दोनों ने? इसलिए आज सोच रहे होगे कि गनेश ना ही आता तो अच्छा था…क्यों सच कहा ना मैंने? मैंने अकचका कर कहा – नहीं गनेश, ऎसी कोई बात नहीं. हम दोनों कल यहाँ आये जरुर थे. लेकिन सिर्फ सिगरेट पी कर जल्दी से घर वापस चले गए. लेकिन अनन्या ने कहा – हाँ गनेश, तुम सच कह रहे हो. कल मैंने इस से चुदवा लिया था. दोस्तों आप यह कहानी मस्ताराम.नेट पर पढ़ रहे है | मेरा तो मुंह खुला का खुला रहा गया.

अब तो गनेश हम सब की बात सब को बता देगा. मेरे तो आखों से आंसूं निकल आये. मैंने लगभग रोते हुए कहा – गनेश भैया माफ़ कर दो मुझे. कल पता नहीं क्या हो गया था. अब ऎसी गलती कभी नही होगी. गनेश – अरे पागल चुप हो जा. इसने मुझसे पहले ही पूछ लिया था. मैंने इसे परमिशन दे दिया था. अरे यही दिन तो हैं मस्ती करने के. फिर ये जवानी लौट कर थोड़े ही ना आने वाली है? जा जा कर फिर से कर ले जो कल किया था. मै यहाँ हूँ. जा जा कर लुट मेरी बहन की जवानी. मुझे काटो तो खून नहीं वाली स्थति थी. लेकिन मै खुशी के मारे पागल हो गया. अनन्या ने मेरा हाथ थामा और मुझे पकड़ कर वहीँ झाड़ियों के पीछे ले गयी. पुरे एक घंटे तक हम दोनों ने चुदाई कार्यक्रम किया. अनन्या भी पस्त हो कर नंगी ही लेटी हुई थी. दोस्तों आप यह कहानी मस्ताराम.नेट पर पढ़ रहे है | मैंने कपडे पहने. और अनन्या को भी तैयार होने को कहा .उसने भी अपने कपडे पहने और हम दोनों वापस पेड़ के नीचे आ गए. गनेश – क्यों , हो गयी मस्ती? हम दोनों ने कहा – हाँ. अब घर चल. रात को एक बजे मेरी नींद खुल गयी. कमरे में घुप्प अँधेरा था. अनन्या को चोदने का मन कर रहा था. मै, अनन्या और गनेश एक ही कमरे में सो रहे थे. मैंने कुछ आवाजें सुनी. ध्यान से सूना तो अनन्या की कराहने की आवाज थी. थोडा और ध्यान से सुना तो किसी मर्द के गर्म गर्म सासें की आवाजें भी थी. मैंने अपने पास सोये गनेश को टटोला तो वो वहां नही था. मै तुरंत ही समझ गया. वो अपनी बहन की चुदाई कर रहा है. मेरा मन बाग़ बाग़ हो गया. मैंने अँधेरे में अपने लंड को निकाला और मसलने लगा. तभी दोनों की हलकी हलकी चीख सुनाई पड़ी. समझ में आ गया कि गनेश झड चूका है.थोड़ी देर में वो मेरे बिस्तर पर आ कर लेट गया. मैंने धीरे से बोला – यार, मेरा लंड फिर से चूत खोज रहा है. वो भी अनन्या की. क्या करूँ? गनेश ने कहा – जा मार ले. मुझसे क्या पूछता है? मै उठ कर अनन्या के बिस्तर पर गया. उसे धीरे से जगाया. वो उठी. बोली – कौन है.? मैंने धीरे से कहा – मै हूँ राधेश्याम. अनन्या – अरे राधे…आ जा …तेरी ही बारे में सोच रही थी. दोस्तों आप यह कहानी मस्ताराम.नेट पर पढ़ रहे है |

मैंने उसकी चूची दबाते हुए कहा – क्यों अभी अभी तो गनेश ने तेरी ली ना? अनन्या – अरे , उसे तो पिछले डेढ़ साल से ले रही हूँ. तेरी तो बात ही कुछ और है.

मैंने – तो आ ना. फिर से दो राउंड हो जाये?

अनन्या – हाँ …आ जा मेरी जान. लेकिन मेरी ये चौकी काफी छोटी है. इस पर खेल ठीक से होगा नहीं. एक काम करो. गनेश को थोड़ी देर के लिए इस चौकी पर भेजो. हम दोनों उस कि चौकी पर चलते हैं.

मैंने कहा – ठीक है. हम दोनों गनेश के चौकी के पास गए. अनन्या ने धीरे से गनेश से कहा – गनेश, थोड़ी देर के लिए मेरी वाली चौकी पर चले जाओ ना. मुझे राधेश्याम के साथ थोड़ी मस्ती करनी है.

गनेश – ठीक है बाबा. लेकिन देख, ज्यादा शोर शराबा मत करना. जो करना है आराम से करना. फिर वो उठ कर छोटी वाली चौकी पर चला गया. और मैंने और अनन्या ने उस घुप्प अँधेरे में दो घंटे तक मस्ती की. फिर अगले दिन झाडी में मैंने और गनेश ने मिल कर अनन्या की चुदाई की. फिर ऐसा कार्यक्रम तब तक चलता रहा जब तक मामा की शादी के बाद हम सभी अपने अपने घर नहीं चले गए.फिर मै बाद में बहाना बना बना कर दिल्ली भी जाता था और अनन्या के साथ खूब मस्ती किया.
समाप्त