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Mastram Ki Hindi Sex Stories | Mastaram Ki Antarvasna Stories | मस्ताराम की हिंदी सेक्स कहानियां

रुचिका चाची की धमाकेदार चुदाई – 1

गतांग से आगे ….

मेरा दिल हाई जम्प मार रहा था. पहले तो मैंने नाटक किया फिर धीरे से मान गया.

मैं : ठीक हैं तुम कल शाम को मेरे घर आ जाओ……..पांच बजे ठीक हैं ?
प्रिया : यार…वो क्या है की भाई को तुम जानते हो…….वो आने नहीं देगा…..क्या तुम मेरे घर पर आके नहीं पढ़ा सकते ?

अगर गांड फटने से आवाज़ आती होती तो बोफोर्स से तेज आवाज़ मेरी गांड फटने की आती. मैं उस सांड कपिल के सामने तो फटकता नहीं था…..उसके घर जाना तो मौत को गले लगाने जैसा था…..प्रिया मुझे मनाने लगी और मैं चूतिया उस की बातों में आ गया.
सन्डे था. इस लिए आराम से उठा. चाय पी कर टीवी देख रहा था की चाची आई और बोली

चाची : लल्ला वो क्रीम लाया क्या ?
मैं : कौन सी क्रीम ? अच्छा वो…..हाँ वो वाली. सामने ही रखी है……चाची वो दवाई वाले ने कहा है की इसको लगाने के बाद ….

और मैं झिझकने की एक्टिंग करने लगा……

चाची : लगाने के बाद क्या ? बोल ना…
मैं : व व वो….आप वो मत पहनना..

चाची : क्या ? साड़ी ? बोल ना लल्ला ?
मैं : व वो पैंटी….म म मत पहनना…..ऐसा बोला दवाई वाले ने.

चाची : ओफ़ फ़ो……..अरे लल्ला वो तो मैं दो दिन से उन्ही नहीं पहन रही…..इतनी खुजली चलती है. पैंटी पहनती तो अब तक
छील जाती मेरी……….

आप को तो पढ़ के मज़ा आ रहा हैं. मगर मेरी वहां पर हालत ख़राब हो गयी…….चाची मुझे मुस्कुरा कर देख रही थी और मैं कालिदास उनकी आधे ढलके आँचल में मचलते मम्म्मे और साड़ी की साइड से दिखती उनकी नाभि को देखे जा रहा था. मेरी सांसें तेज़ हो गयी थी……….तभी वो बोली

चाची : लल्ला….क्या बैठे बैठे सोफा तोड़ रहा है, चल मेरी मदद करवा दे. पानी की टंकी साफ़ करनी है. तेरी छुट्टी है और आज
नल भी नहीं आये टंकी पूरी खाली है.

अब चाची बोले और मैं मना कर दूँ ये संभव है क्या…….मैं चुप चाप चाची के साथ छत पर गया और सीधा टंकी में उतरने लगा.

चाची : अरे…ये कपडे गंदे नहीं हो जायेंगे क्या ? फिर मुझे ही धोना पड़ेंगे……ये पजामा और टी शर्त खोल और फिर अन्दर जा.

ये कह कर वो फिर वो ही मंद मंद मुस्कुराने लगी.

मैंने चाची से नज़ारे मिलते हुए अपना टी शर्ट खोला….अन्दर कुछ भी नहीं पहना था……मेरे सीने पर बाल ऊग चुके थे……
रोज़ दंड लगाने से कंधे और सीना भी मांसल और कसरती हो चला था. चाची बोली

चाची : हाय राम ……लल्ला तू तो पूरा गबरू जवान हो गया है रे……जब शादी हो कर आई थी तब तो लड़कियों जैसी आवाज़ थी
तेरी और वैसे ही दीखता था. एक दम चिकना…….मगर अब तो पहलवान दिखने लगा है.

मेरा सांप फुफकारी मारने लगा था. सुबह सुबह की ठंडी हवा…….मेरा नंगा सीना और चाची की गरमा गरम बातें.

मैंने उनको थोडा छेड़ा…

मैं : तो क्या चाची …..तब तो आप की लड़की जैसी दिखती थी….. अब तो आंटी हो गयी हो
चाची : राम…..राम……आंटी ? क्यों रे लल्ला ? मैं आंटी जैसी कहाँ से लगने लगी ?

मैंने हिम्मत जुटाई और उनकी उभरे हुए नितम्बो की तरफ इशारा कर दिया……

चाची ऑंखें तरेर कर बोली : हैं…….इतने भी मोटे नहीं हुए की आंटी बोलो…….

यह कहकर वो अपने ही नितम्ब दबा दबा कर देखने लगी…..जैसे जताना चाह रही हो की उनके नितम्ब आज भी सुडोल है. कौन कमबख्त कह सकता था की चाची के नितम्ब सुडोल नहीं…….कोई भी उनको देखता तो सबसे पहले उनके होटों के ऊपर का वो तिल ही देखता और फिर सीधी नज़र उनके गोल गोल उभरे हुए नितम्बो पर ही जाती……..चाची अच्छी खासी गदराई हुयी थी | आप यह हॉट हिंदी सेक्सी कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है |मम्मे भी ऐसे थे की ब्लाउस से बाहर ही झाँका करते……कमर का घुमाव इस कदर नकार्तिका था की नज़र उस पर रुक नहीं पाती और उन की नाभि पर ही जाके कर रूकती.

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मैं : चाची……आपको पीछे से दीखता नहीं…..मगर सच्ची बहुत बढ गए है ये ….
चाची : तू तो यूँही कहता है लल्ला…..मुझे चिड़ा रहा है ना ? मैं कोई मोती थोड़ी ना हुई हूँ ?

कहकर थोड़ी मायूस सी शकल बना ली.
मैंने हिम्मर जुटाई और आगे बढ कर उनके नितम्बो पर हाथ रक्खा और दबाते हुए बोला……

मैं : य य ये देखो….. य य ये जो है ना……यहाँ पर थोडा सा मोटापा दीखता है. इतना मांस होने से अ अ अ अप म म मोटी
दिखती हो.

मैं लगातार उनके नितम्बो को अपने हाथो से नाप रहा था. वो एकटक मेरी तरफ ही देख रही थी……उनकी ऑंखें थोड़ी से नकार्तिकी हो गयी थी…..मैं हाथ उनकी कमर पर लगाया और बोला

मैं : अ अ अब ज ज जैसे यहाँ पर…….क क कम मांस है……..पर आप के पिछवाड़े और (फिर हाथ उनकी मोटी मोटी जांघों पर फिरा कर बोला ) और आप के यहाँ पर थोडा मोटापा आ गया है………और…..ये जो है ना…..(कहकर उनकी गांड मसकाने लगा)
यहाँ पर ही आप को देख कर कोई ब ब ब बोल सकता है की …..

तभी……………..
माँ नीचे से आवाज़ लगा रही थी.

माँ : नीलू अरे ओ नीलू

मैंने तो माँ की आवाज़ सुनते ही घबरा कर हाथ चाची के नितम्बो से हटा दिया. मगर चाची के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. उन्होंने ऊपर खड़े खड़े ही माँ को बताया की वो टंकी धुलवा रही है और आधे घंटे मैं नीचे आएगी. यह बोल कर मेरी तरफ मुड़ी और बोली

चाची : चल लल्ला….मुझे तो तुने आंटी बना ही दिया….अब तो टंकी धो ले……
मैं टंकी में उतरने लगा और चाची फिर से मेरे पजामे की तरफ इशारा कर के बोली

चाची : अरे….इसको तो खोल लल्ला…..

मैंने सकपकाते हुए पजामा का नाडा खीचा और उसको नीचे उतार कर खड़ा हो गया. मैंने जौकी का अंडरवियर पहना था. चाची के बदन का मोटापा बताने के चक्कर में सांप खड़ा हो गया था….. चाची के माँ से बात करने के दौरान वो तो फिर से बैठ गया था मगर कुछ precum की बूंदें मेरे अंडरवियर के अगले हिस्से पर साफ़ दिख रही थी. एक गोल गोल गीला धब्बा आ गया था. चाची ने सीधा वही पर देखा.मैं उसे हाथों से छुपाने लगा मगर वो निर्लज्ज औरत तो ऐसे घुर घुर कर देख रही थी जैसे बिल्ली चूहे को घूरती है. उनके चेहरे पर वो ही टेडी मुस्कराहट थी. मैं चुप चाप टंकी में उतार गया. हमारी टंकी बहुत बड़ी है, उसे साफ़ तो करना ही था मगर कुछ दिन पहले टंकी में पानी देखने के चक्कर में माँ की एक सोने की चूड़ी भी उस में गिर गयी थी. टंकी में पानी तो ज़रा सा था मगर नीचे गंदगी होने से कुछ दिख नहीं रहा था, मैंने चाची से टार्च मांगी, वो तो सब सामान साथ लायी थी. मैंने टोर्च ली और उसे नीचे घुमा घुमा कर ढूँढना शुरू कर दिया, तभी चाची ने कुछ कहा और मैंने टंकी में से ऊपर देखा.

टंकी का मुंह ज़रा सा था, और चाची उसके दोनों और पैर कर के खड़ी थी. दोनों पैर खुल जाने से साड़ी झूल गयी थी. मैंने उनकी टांगो के बीच देखा, चिकनी चिकनी टंगे घुटनों तक दिख रही थी. मैंने टोर्च ऊपर की और उसका फोकस चाची की टांगो के बीच कर दिया और नज़ारे का मज़ा लेने लगा. मेरी नज़र एक कीड़े के तरह उनके पैरों पर चद्ती चली गयी. जैसे की मैंने बताया उनकी टांगे बहुत ही चिकनी थी……उनकी जांघें साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी…..चाची सांवली थी मगर उनकी टांगे चिकनी होने के वजह से गोरी गोरी लग रही थी. तभी मैंने ध्यान से देखा….उनकी दांई जांघ पर कुछ लिखा था…..मैंने ध्यान से देखने की कोशिश की तो दिखा की वो गोदना थे. चाची ने जांघ पर कुछ लिखवा रखा था. मैंने गाँव के लोगो को अक्सर हाथों पर अपना या भगवन का नाम गुदवाये हुए देखा था मगर जांघ पर …… ??? क्या लिखा है सोचते सोचते मेरी नज़र और ऊपर उठी और मेरी नस नस सनसनाने लगी.

चाची की वो चूत, जो मैं न ही दरवाजे की आड़ से जब वो चाचा से ठुकवा रही थी और न ही जब वो कपडे धो रही थी, नहीं देखा पाया था. वो चूत मेरी नज़र के सामने थी.
उन्होंने सही में पेंटी नहीं पहनी थी.

चाची मस्ती में अपनी दोनों टाँगें चौड़ी कर के टंकी के मुंह पर खड़ी थी और मैं टंकी के अंदर से टोर्च उनकी साड़ी के अंदर मार कर वो नज़ारा देख रहा था जो किसी सन्यासी को भी भोगी बना देता. भले चाची सांवली थी मगर उनकी चूत का सांवलापन मदहोश कर देने वाला था. चूत बालों से भरी हुयी थी ………चारो तरह झांटे इस तरह उगी हुयी थी जैसे खेत की सुरक्षा में बागड़ लगी हो. उनकी चूत के दोनों होंट थोड़े थोड़े से खुले और बाहर आये हुए थे. जैसे ही टोर्च की रौशनी उस पर पड़ी वो चमकने लगी पहले तो मैंने सोचा की ये क्या है ? फिर मुझे समझ में आया की चाची की मोटी मोटी गांड दबाने से उनकी चूत पनिया गयी है और कामरस निकलने लगी है. मेरे मन में आया की हाथ बड़ा कर चूत को छू लूँ……मगर मैं ठहरा गांडफट …..बड़ी मुश्किल से अपने आप को रोका, मगर लंड महाराज अपना सर उठा चुके थे.
मैं अंडरविअर में था. कहाँ छुपाता ? तभी चूड़ी मेरे पांव से टकराई और मैंने चाची की चूड़ी पकड़ा दी…….वो झुकी और मुझे उनके कसे हुए मम्मे मेरे चेहरे के ठीक ऊपर झूलते हुए दिखे. साली ने खुजली की वजह से पेंटी नहीं पहनी थी मगर ब्रा क्यों नहीं पहनी ये मेरी समझ से बाहर था….
चाची के झूलते मम्मे मेरे चेहरे से मुश्किल से २ फीट की दुरी पर थे. उनकी मीठी साँसें मेरे चेहरे से टकरा रही थी. उन्होंने चूड़ी ली और खुश होके बोली.

चाची : लल्ला……ये तो मानना पड़ेगा की नज़र तो तेरी तेज़ है. भाभी जी खुश हो जायेंगे. चल अब बहार आ जा.

मैं क्या बोलता और क्या बाहर आता. इतनी सी देर में इतना नज़ारा देख कर बाबुराव इतना कड़क हो गया था की अंडरविअर में तम्बू बन चूका था. एक बड़ा सा धब्बा सामने की तरफ आ गया था जो मेरे लार टपकाते लंड की कारस्तानी थी. मैंने चाची की टाला की आप जाओ मैं आ रहा हूँ. पर वो तो जिद्दी नंबर वन थी. मानी नहीं और मुझे ऊपर खिंच लिया. मैं बाहर आ के उनके सामने सर झुका के खड़ा हो गया. वो मुंह पर हाथ रख कर बोली :

चाची : हाय राम…..लल्ला टंकी साफ़ कर रहा था कि गन्दी ??
मैं : न न नहीं चाची…….व व वो …..मैं

मैं अपने खड़े लंड को हाथ से छुपा रहा था और वो ऑंखें सिकोड़ कर कभी मेरा चेहरा तो कभी मेरा लौड़ा देख रही थी. तभी फिर से माँ की आवाज़ आई. चाची ने मेरे लंड से बगैर नज़रे हटाये माँ से कहाँ कि वो आ रही है और मुझे मंद मंद मुस्कान देती हुयी गांड हिलाते हिलाते नीचे चली गयी. मुझे ऐसा लगा कि शायद आज उनकी गांड ज्यादा ही लचक खा रही है. मैं जानना चाहता था की उनकी जांघ पर क्या नाम गुदा हुआ है.
दिन में मस्ताराम डॉट नेट पर गरम गरम कहानिया पढ़ रहा था की मोबाईल की घंटी बजी. मैंने देखा तो दिल ने झटका खाया……प्रिया का फ़ोन था.

मैं : ह ह हेल्लो…
प्रिया : हाईइ ….क्या कर रहे हो ?

मैं एक दम हडबडा गया.

मैं : म म म कहानी …..पढ़ …..म म म मतलब की……कहानी मूवी देख रहा हूँ…
प्रिया : क्या…घर पर ? अरे मुविस तो मल्टीप्लेक्स में देखते है.

मैं : हुह ? मतलब ?
प्रिया : अरे क्या तुम भी….आई मीन की घर पर मूवी क्या मूवी देख रहे हो….फ्रेंडस के साथ देखना चाहिए समझे

मुझे लगा की वो शायद चाहती है की मैं उसे ही साथ में चलने के लिए पूछ लूँ. तभी मुझे उस सांड कपिल की शकल याद आ गयी और मेरे अरमानो की हवा निकल गयी. वो अब भी कुछ बोले जा रही थी

मैं : क्या ? क्या कह रही हो ?
प्रिया : अरे मैं पूछ रही हूँ की तुम आ रहे हो न घर पर ? कहाँ खोये रहते हो मिस्टर ? GF को मिस कर रहे हो क्या ?

मैं : न न नहीं ….म म मेरा मतलब है की ह ह हाँ मैं तुम्हारे घर आ रहा हूँ……व व वो तुम्हारे भैया को कोई ओब्जेक्शन तो नहीं है न ?
प्रिया : नहीं यार…..पहले तो उसने साफ़ मना कर दिया पर फिर मैंने पापा को बोला तो पापा ने उसको डांट दिया. मेरा साल ख़राब हो जायेगा तो ?

मुझे समझ नहीं आ रहा था की हँसु या रोऊ….उस सांड को मेरे उसकी बहन को पढ़ाने में दिक्कत थी, पर इस शाणी ने अपने बाप के थ्रू गेम जमा लिया था…….जितनी सीधी दिखती हैं उतनी सीधी तो नहीं हैं. मैंने उसको शाम 6 बजे आने का बोल दिया.

शाम को ६ बजे पता ढूंढता हुआ मैं सरदार प्रताप सिंह के घर पहुंचा. घर तो क्या था…..हवेली थी …..आगे जो लॉन बना था वो ही मेरे घर से बड़ा था. सरदार प्रताप सिंह, दारू और govt का बहुत बड़ा ठेकेदार था. येही समझो की सफ़ेद कपड़ो में डोन.
पुलिस हो या नेता…..सब उसकी जेब में रहते थे. इसीलिए तो कपिल इतनी माँ चुदाता था.

मैंने बेल बजाई…….दरवाजा खुला और उसके साथ मेरा मुंह ही खुल गया ….

जिसने दरवाजा खोला था……हाईट करीब 5 फुट 8 इंच. दूध में मिले गुलाब के जैसा रंग. काला सलवार सूट बदन पर ऐसा कसा हुआ था की एक एक उभार चीख चीख के बुला रहा था. मस्त गदराया हुआ बदन था यार……….
आँखों में गहरा काजल था…….और बिलकुल गुलाबी होंट……..और गले पर चिपके दुप्पट्टे के नीचे एक खाई…जी हाँ….खाई….
दो पहाड़ों के बीच की घाटी……उसके मम्मे इतने बड़े थे की उनको मम्मे नहीं थन कहना चाहिए था |

कहानी जारी है … आगे की कहानी पढ़ने के लिए निचे दिए पेज नंबर पर क्लिक करें ….

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