अन्तर्वासना की सच्ची कहानी

दोस्तो यह कहानी बहुत ही मजेदार और एक अन्तर्वासना की सच्ची कहानी है यह बस आप सभी लोगो का प्यार का ही प्रतीक है जो आपके लिए यह कहानी लेकर आया हूँ आशा करता हूँ आप लोग बड़े ही चाव से पढ़ेगे और भाई लोग पक्का मूठ मरेंगे और मेरी भाभी लोग अपना अपने से चाहे तो कर ले या तो भैया की मदत ले ले | तो चलिये सुरू करते है कहानी |

वासना के अतिरेक में प्रीतम ने शीला के हाथ अपने कांपते हाथों में ले लिये. जब उसने कोई विरोध नहीं किया तो उन्होंने रोमांचित हो कर उसे अपनी तरफ खींचा. झिझकते हुए शीला उनके इतने नजदीक आ गई कि उसकी गर्म सांसे उन्हें अपने गले पर महसूस होने लगी. प्रीतम ने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में ले कर उठाया और उसकी नशीली आंखों में झांकने लगे. शीला ने लजाते हुए पलकें झुका लीं पर उनसे छूटने की कोशिश नहीं की. उससे अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन पा कर प्रीतम ने अपने कंपकंपाते होंठ उसके नर्म गाल पर रख दिए. तब भी शीला ने कोई विरोध नहीं किया तो उन्होने एक झटके से उसे बिस्तर पर गिराया और उसे अपनी आगोश में ले लिया. शीला के मुंह से एक सीत्कार निकल गई.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई तो प्रीतम की नींद खुल गई. उन्होंने देखा कि बिस्तर पर वे अकेले थे. वे बुदबुदा उठे इसी वक़्त आना था .पर वे घड़ी देख कर खिसिया गए. सुबह हो चुकी थी. दुबारा दस्तक हुई तो उन्होंने उठ कर दरवाजा खोला. बाहर शीला खड़ी थी, उनकी कामवाली, जो एक मिनट पहले ही उनके अधूरे सपने से ओझल हुई थी. उसके अन्दर आने पर प्रीतम ने दरवाजा बंद कर दिया.

जबसे उनकी पत्नी निकिता गई थी वे बहुत अकेलापन महसूस कर रहे थे. निकिता की दीदी शादी के पांच वर्ष बाद गर्भवती हुई थी. वे कोई जोखिम नही उठाना चाहती थीं इसलिए दो महीने पहले ही उन्होंने निकिता को अपने यहाँ बुला लिया था. पिछले माह उनके बेटा हुआ था. जच्चा के कमजोर होने के कारण निकिता को एक महीने और वहां रुकना था. इसलिये प्रीतम इस वक्त मजबूरी में ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे.

काफी समय से उनका मन अपने घर पर काम करने वाली शीला पर आया हुआ था. शीला युवा थी. उसके नयन-नक्श आकर्षक थे. उसका बदन गदराया हुआ था. अपनी पत्नी के रहते उन्होंने कभी शीला को वासना की नज़र से नहीं देखा था. निकिता थी ही इतनी खूबसूरत! उसके सामने शीला कुछ भी नहीं थी. पर अब पत्नी के वियोग ने उन की मनोदशा बदल दी थी. शीला उन्हें बहुत लुभावनी लगने लगी थी और वे उसे पाने के लिए वे बेचैन हो उठे थे. प्रीतम जानते थे कि शीला बहुत गरीब है. वो मेहनत कर के बड़ी मुश्किल से अपना घर चलाती है. उसका पति निठल्ला है और पत्नी की कमाई पर निर्भर है. उन्होंने सोचा कि पैसा ही शीला की सबसे बड़ी कमजोरी होगी और उसी के सहारे उसे पाया जा सकता है. प्रीतम जानते थे कि पैसे के लोभ में अच्छे-अच्छों का ईमान डगमगा जाता है. फिर शीला की क्या औकात कि उन्हें पुट्ठे पर हाथ न रखने दे.

शीला को हासिल करने के लिए उन्होंने एक योजना बनाई थी. आज उन्होंने उस योजना को क्रियान्वित करने का फैसला कर लिया. शीला के आने के बाद वे अपने बिस्तर पर लेट गए और कराहने लगे. शीला अंदर काम कर रही थी. जब उसने प्रीतम के कराहने की आवाज सुनी तो वो साड़ी के पल्लू से हाथ पोछती हुई उनके पास आयी. उन्हें बेचैन देख कर उसने पूछा, बाबूजी, क्या हुआ? तबियत खराब है?

दर्द का अभिनय करते हुए प्रीतम ने कहा, सर में बहुत दर्द है.

आपने दवा ली?

हां, ली थी पर कोई फायदा नहीं हुआ. जब निकिता यहाँ थी तो सर दबा देती थी और दर्द दूर हो जाता था. पर अब वो तो यहाँ है नहीं.

शीला सहानुभूति से बोली, बाबूजी, आपको बुरा न लगे तो मैं आपका सर दबा दूं?

तुम्हे वापस जाने में देर हो जायेगी! मैं तुम्हे तकलीफ़ नहीं देना चाहता पर घर में कोई और है भी नहीं, प्रीतम ने विवशता दिखाते हुए कहा.

इसमें तकलीफ़ कैसी? और मुझे घर जाने की कोई जल्दी भी नहीं है, शीला ने कहा.

शीला झिझकते हुए पलंग पर उनके पास बैठ गई. वो उनके माथे को आहिस्ता-आहिस्ता दबाने और सहलाने लगी. एक स्त्री के कोमल हाथों का स्पर्श पाते ही प्रीतम का शरीर उत्तेजना से झनझनाने लगा. उन्होंने कुछ देर स्त्री-स्पर्श का आनंद लिया और फिर अपने शब्दों में मिठास घोलते हुए बोले, शीला, तुम्हारे हाथों में तो जादू है! बस थोड़ी देर और दबा दो.

कुछ देर और स्पर्श-सुख लेने के बाद उन्होंने सहानुभूति से कहा, मैंने सुना है कि तुम्हारा आदमी कोई काम नहीं करता. वो बीमार रहता है क्या?

बीमार काहे का? खासा तन्दरुस्त है पर काम करना ही नहीं चाहता! शीला मुंह बनाते हुए बोली.

फिर तो तम्हारा गुजारा मुश्किल से होता होगा?

क्या करें बाबूजी, मरद काम न करे तो मुश्किल तो होती ही है, शीला बोली. दोस्तो आप मस्ताराम डॉट नेट पर अन्तर्वासना की सच्ची कहानी पढ़ रहे है | कितनी आमदनी हो जाती है तुम्हारी? प्रीतम ने पूछा | वही एक हजार रुपए जो आपके घर से मिलते हैं.

कहीं और काम क्यों नहीं करती तुम?

बाबूजी, आजकल शहर में बांग्लादेश की इतनी बाइयां आई हुई हैं कि घर बड़ी मुश्किल से मिलते हैं. शीला दुखी हो कर बोली.

लेकिन इतने कम पैसों में तुम्हारा घर कैसे चलता होगा?

अब क्या करें बाबूजी, हम गरीबों की सुध लेने वाला है ही कौन? शीला विवशता से बोली.

थोड़ी देर एक बोझिल सन्नाटा छाया रहा. फिर प्रीतम मीठे स्वर में बोले, अगर तुम्हे इतने काम के दो हज़ार रुपए मिलने लगे तो?

शीला अचरज से बोली, दो हज़ार कौन देता है, बाबूजी?

मैं दूंगा. प्रीतम ने हिम्मत कर के कहा और अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया.

शीला उनके चेहरे को आश्चर्य से देखने लगी. उसे समझ में नहीं आया कि इस मेहरबानी का क्या कारण हो सकता है. उसने पूछा, आप क्यों देगें, बाबूजी?

शीला के हाथ को सहलाते हुए प्रीतम ने कहा, क्योंकि मैं तुम्हे अपना समझता हूँ. मैं तुम्हारी गरीबी और तुम्हारा दुःख दूर करना चाहता हूँ.

और मुझे सिर्फ वो ही काम करना होगा जो मैं अभी करती हूँ?

हां, पर साथ में मुझे तुम्हारा थोड़ा सा प्यार भी चाहिए. दे सकोगी? प्रीतम ने हिम्मत कर के कहा.

कुछ पलों तक सन्नाटा रहा. फिर शीला ने शंका व्यक्त की, बीवीजी को पता चल गया तो?

अगर मैं और तुम उन्हें न बताएं तो उन्हें कैसे पता लगेगा? प्रीतम ने उत्तर दिया. अब उन्हें बात बनती नज़र आ रही थी.

ठीक है पर मेरी एक शर्त है …

यह सुनते ही प्रीतम खुश हो गए. उन्होंने शीला को टोकते हुए कहा, मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है. तुम बस हां कह दो.

मैं कहाँ इंकार कर रही हूं पर पहले मेरी बात तो सुन लो, बाबूजी. शीला थोड़ी शंका से बोली.

अब प्रीतम को इत्मीनान हो गया था कि काम बन चुका है. उन्होंने बेसब्री से कहा, बात बाद में सुनूंगा. पहले तुम मेरी बाहों में आ जाओ.

शीला कुछ कहती उससे पहले उन्होंने उसे खींच कर अपनी बाहों में भींच लिया. उनके होंठ शीला के गाल से चिपक गए. वे उत्तेजना से उसे चूमने लगे. शीला ने किसी तरह खुद को उनसे छुड़ाया, बाबूजी, आज नहीं. आपको दफ्तर जाना है. कल इतवार है. कल आप जो चाहो कर लेना.

अगले चौबीस घंटे प्रीतम पर बहुत भारी पड़े. उन्हें एक-एक पल एक साल के बराबर लग रहा था. वे शीला की कल्पना में डूबे रहे. उनकी हालत सुहागरात को दुल्हन की प्रतीक्षा करते दूल्हे जैसी थी. किसी तरह अगली सुबह आई. रोज की तरह सुबह आठ बजे शीला भी आ गई. जब वो अन्दर जाने लगी तो प्रीतम ने पीछे से उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया. वे उसे तुरंत बैडरूम में ले जाना चाहते थे लेकिन शीला ने उनकी पकड़ से छूट कर कहा, ये क्या, बाबूजी? मैं कहीं भागी जा रही हूँ? पहले मुझे अपना काम तो कर लेने दो.

काम की क्या जल्दी है? वो तो बाद में भी हो सकता है! प्रीतम ने बेसब्री से कहा.

नहीं, मैं पहले घर का काम करूंगी. आपने कहा था ना कि आप मेरी हर शर्त मानेंगे.

अब बेचारे प्रीतम के पास कोई जवाब नहीं था. उन्हें एक घंटे और इंतजार करना था. वे अपने बैडरूम में चले गए और शीला अपने रोजाना के काम में लग गई. प्रीतम ने कितनी कल्पनाएं कर रखी थीं कि वे आज शीला के साथ क्या-क्या करेंगे! एक घंटे तक वही कल्पनाएं उनके दिमाग में घूमती रहीं. बीच-बीच में उन्हें यह भी लग रहा था कि शीला आज काम में ज्यादा ही वक़्त लगा रही है! प्रीतम का एक घंटा बड़ी बेचैनी से बीता. कभी वे बिस्तर पर लेट जाते तो कभी कुर्सी पर बैठते कभी उठ कर खिड़की से बाहर झांकते तो कभी अपनी तैय्यारियों का जायज़ा लेते (उन्होंने तकिये के नीचे एक लग्जरी कन्डोम का पैकेट और जैली की एक ट्यूब रख रखी थी.)

नौ बज चुके थे. धूप तेज हो गई थी. पंखा चलने और खिड़की खुली होने के बावजूद कमरे में गर्मी बढ़ गई थी. पर प्रीतम को इस गर्मी का कोई एहसास नहीं था. उन्हें एहसास था सिर्फ अपने अन्दर की गर्मी का. वे खिड़की के पर्दों के बीच से बाहर की तरफ देख रहे थे कि उन्हें अचानक कमरे का दरवाजा बंद होने की आवाज सुनाई दी. उन्होंने मुड़ कर देखा. शीला दरवाजे के पास खड़ी थी. उसकी नज़रें शर्म से झुकी हुई थीं.

शीला के कपडे हमेशा जैसे ही थे पर प्रीतम को लाल रंग की साडी और ब्लाउज में वो नयी नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी. वे कामातुर हो कर शीला की तरफ बढे. उनकी कल्पना आज हकीकत में बदलने वाली थी. पास पहुँच कर उन्होने शीला को अपने सीने से लगा लिया और उसे बेसब्री से चूमने लगे. दोस्तो आप मस्ताराम डॉट नेट पर अन्तर्वासना की सच्ची कहानी पढ़ रहे है |  उन्होने अब तक अपनी पत्नी के अलावा किसी स्त्री को नहीं चूमा था. शीला को चूमने में उन्हें एक अलग तरह का मज़ा आ रहा था. जैसे ही उनका चुम्बन ख़त्म हुआ, शीला थोड़ा पीछे हट कर बोली, “ऐसी क्या जल्दी है, बाबूजी? खिड़की से किसी ने देख लिया तो?”

खिड़की के बाहर तो सुनसान है. वहां से कौन देखेगा?

मर्द लोग ऐसी ही लापरवाही करते हैं. उनका क्या बिगड़ता है? बदनाम तो औरत होती है. हटिये, मैं देखती हूँ.

शीला खिड़की के पास गई. उसने पर्दों के बीच से बाहर झाँका. इधर-उधर देखने के बाद जब उसे तसल्ली हो गई तो उसने पर्दों को एडजस्ट किया और प्रीतम के पास वापस आ कर बोली, सब ठीक है. अब कर लीजिये जो करना है.

करना तो बहुत कुछ है. पर पहले मैं तुम्हे अच्छी तरह देखना चाहता हूँ.

देख तो रहे हैं मुझे, अब अच्छी तरह कैसे देखेंगे?

अभी तो मैं तुम्हे कम और तुम्हारे कपड़ों को ज्यादा देख रहा हूँ. अगर तुम अपने कपडों से बाहर निकलो तो मैं तुम्हे देख पाऊंगा. प्रीतम ने कहा.

“मुझे शर्म आ रही है, बाबूजी. पहले आप उतारिये,” शीला ने सर झुका कर कहा.

नौकरानी के सामने कपडे उतारने में प्रीतम को भी शर्म आ रही थी पर इसके बिना आगे बढ़ना असंभव था. प्रीतम अपने कपड़े उतारने लगे. यह देख कर शीला ने भी अपनी साडी उतार दी. प्रीतम अपना कुरता उतार चुके थे और अपना पाजामा उतार रहे थे.

शीला को उनके लिंग आकार अभी से दिखाई देने लगा था. उसने अपना ब्लाउज उतारा. प्रीतम की नज़र उसकी छाती पर थी. जैसे ही उसने अपनी ब्रा उतारी, उसके दोनो स्तन उछल कर आज़ाद हो गये. फिर उसने अपना पेटीकोट भी उतार दिया. उसने अन्दर चड्डी नही पहनी थी. उसका गदराया हुआ बदन, करीब 36 साइज़ के उन्नत स्तन, तने हुए निप्पल, पतली कमर, पुष्ट जांघें और जांघों के बीच एक हल्की सी दरार यह सब देख कर प्रीतम की उत्तेजना सारी हदें पर कर गई. उन्होंने अनुभव किया कि शीला का नंगा शरीर निकिता से ज्यादा उत्तेजक है. वो अब उसे पा लेने को आतुर हो गये.

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