अन्तर्वासना की सच्ची कहानी

गतांग से आगे …

प्रीतम से सब कुछ सुनते समय निकिता की मनोदशा अजीब थी. उन्हें कभी प्रीतम पर क्रोध आ रहा था, कभी उनसे घृणा हो रही थी और कभी अपने दुर्भाग्य पर रोना आ रहा था. जब अंत में उन्होंने शीला की विचित्र शर्त सुनी तो वे जैसे आसमान से गिरीं. एक नौकरानी की यह मजाल! फिर उन्हे लगा कि सारी मूर्खता तो उनके पति की थी. शीला और उसके पति ने अपनी चालाकी से प्रीतम की बेवकूफ़ी का फायदा उठाया था. कुछ भी हो, अब इस मूर्खता का परिणाम तो उन्हें भुगतना था. वे एक भारतीय नारी थीं. उन्होंने सोचा कि उनके लिए पति के जीवन से कीमती कुछ भी नहीं है. उन्होंने आज समय पर पहुँच कर प्रीतम को आत्महत्या करने से तो रोक दिया था पर उन्हें आगे आत्महत्या से रोकना भी उन्ही का दायित्व था.

जब उन्होंने अपने जज्बात पर काबू पा लिया तो उनकी बुद्धि ने भी काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने प्रीतम से कहा, जो हो चुका सो हो चुका. उसे मिटाया नहीं जा सकता है. हमें आगे के बारे में सोचना है. कोई न कोई रास्ता जरूर होगा.

उनकी बात सुन कर प्रीतम को सबसे पहले तो यह तसल्ली हुई कि निकिता ने उनको माफ़ कर दिया है. जो हो गया उसे उन्होंने एक भारतीय पत्नी की तरह अपनी नियति समझ कर स्वीकार कर लिया है. फिर जब उन्होंने कहा कि ‘हमें’ आगे के बारे में सोचना है, तो उनका मतलब था कि अब जो भी करना है वे दोनों मिल कर करेंगे. प्रीतम ने सोचा कि उनका निकिता को शॉक देने का नुस्खा कारगर साबित हुआ था. उन्होंने मन ही मन अपनी एक्टिंग को दाद दी. एक्टिंग जारी रखते हुए उन्होंने हताशा से कहा, मैं तो हर पल यही सोच रहा हूँ पर मुझे शीला की बात मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिख रहा है.

निकिता ने जवाब में कहा, ये लोग गरीब नौकर हैं. इन्हें पैसों का लालच न हो, यह हो ही नहीं सकता. पर एक-दो हज़ार से बात नहीं बनेगी. तुम उसे ज्यादा पैसों का लालच दो. जरूरत पड़े तो हम दस-बीस हज़ार तक भी जा सकते हैं.

प्रीतम ने सोचा कि वे कोई अफसर नहीं बल्कि एक क्लर्क हैं. उनके लिए दस-बीस हज़ार रुपये ऐसे ही दे देना कोई मामूली बात नहीं थी. पर अपने घर की लाज बचाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे. उन्होंने बुझे स्वर में कहा, ठीक है, मैं कल शीला से बात करता हूँ.

निकिता ने दृढ़ता से कहा, इससे ज्यादा भी देने पड़ें तो संकोच मत करना. जरूरी हुआ तो मैं अपने गहने भी बेच दूँगी.

प्रीतम शर्मिंदगी से बोले, तुम्हारे पास है ही क्या? जो है वो भी मेरे कारण चला जाएगा!

निकिता ने कहा, तुम्हारी जान और घर की इज्ज़त के सामने गहने और पैसे क्या हैं!

प्रीतम का अभिनय तो अब ऑस्कर अवार्ड के लायक हो चला था. उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे. उन्होंने रुंधे गले से कहा, पता नहीं पिछले जन्म में मैंने क्या पुण्य किया था कि भगवान ने मुझे तुम्हारे जैसी पत्नी दे दी! और मैं फिर भी यह नीच काम कर बैठा. अगर भगवान की कृपा और तुम्हारे भाग्य ने इस बार मुझे बचा लिया तो मैं भगवान की कसम खाता हूं कि किसी परायी स्त्री की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखूँगा.

निकिता ने द्रवित हो कर अपने पति को गले से लगा लिया. प्रीतम के आंसू उनके कंधे को भिगो रहे थे पर अब अगले दिन का इंतजार करने के अलावा कोई चारा न था.

अगली सुबह तक का समय बहुत मुश्किल से बीता. प्रीतम आशंकित थे पर निकिता के मन में आशा थी. दोनों ने मिल कर तय किया कि शीला के आने के बाद निकिता मंदिर चली जायेंगी ताकि प्रीतम अकेले में शीला से बात कर सकें. वैसे भी मंदिर में निकिता को भगवान से बहुत विनती करनी थी.

बहरहाल अगली सुबह आई और नियत समय पर शीला भी आ गई. जब उसने निकिता को घर में पाया तो वह बहुत खुश हुई. अब उसके पति का उधार चुकता हो जाएगा, वो उधार जो कई दिनों से प्रीतम बाबू पर था. निकिता ने अपने आप को सामान्य दिखाते हुए उससे थोड़ी औपचारिक बात की. निकिता को सामान्य देख कर शीला को आश्चर्य हुआ. उसे शंका हुई कि शायद बाबूजी ने उनसे ‘वो’ बात नहीं की थी. जब शीला का काम ख़त्म होने को था, निकिता ने प्रीतम को कहा कि वे मंदिर जा रही हैं, और वे पूजा का कुछ सामान ले कर घर से निकल गयीं. शीला जल्दी से अपना काम ख़त्म कर के प्रीतम के पास पहुंची और उनसे बोली, बाबूजी, कितने बजे भेज रहे हैं बीवीजी को? उन्हें आप पहुंचाएंगे या मैं लेने आऊँ?

प्रीतम के सामने वो मुश्किल घडी आ गई थी जिसे वे टालना चाहते थे. दोस्तो आप मस्ताराम डॉट नेट पर अन्तर्वासना की सच्ची कहानी पढ़ रहे है |  उन्होंने फिर एक्टिंग का सहारा लिया और बोले, शीला, मैं कई दिनों से तुम्हारी बात पर गौर कर रहा हूँ और मुझे समझ में आ गया है कि मैं कितना मूर्ख था!

शीला सोच रही थी कि इनको अब अक्ल आई है. प्रीतम बोलने के साथ-साथ शीला के मनोभावों को पढने का भी प्रयास कर रहे थे. उन्होंने अपनी बात जारी रखी, मैं जानता हूं कि तुम्हारी ज़िन्दगी में कितने अभाव हैं. एक-दो हज़ार रुपये ज्यादा मिलने से तुम्हारे अभाव दूर नहीं होंगे. लेकिन सोचो कि तुम्हे दस-पंद्रह हज़ार रुपये एकमुश्त मिल जाएँ तो तुम्हारी कौन-कौन सी जरूरतें पूरी हो सकती हैं!

उनकी आशा के विपरीत उन्हें शीला के चेहरे पर कोई ख़ुशी या सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दिखी. वे समझ गए कि इतने से बात नहीं बनेगी. वे आगे बोले, बल्कि मैं तो सोचता हूँ कि यह भी कम हैं. अगर बीस-पच्चीस हज़ार …

शीला उनकी बात को काटते हुए बोली, बाबूजी, मैंने न तो इतने रुपये देखे हैं और न ही मैं जानती हूं कि इतने रुपयों से क्या-क्या हो सकता है. ये बातें मेरा मरद ही समझ सकता है. आप कहें तो मैं उसे पूछ कर आपको जवाब दे दूं.

शीला न तो खुश दिख रही थी और न दुखी. प्रीतम को लग रहा था कि उनका दाव बेकार गया. फिर उन्होंने सोचा कि शायद शीला के घर में इतने बड़े फैसले करने का अधिकार उसके मर्द को ही होगा. उन्होंने कहा, ठीक है, तुम उसे पूछ लो.

शीला चली गई.

निकिता जब घर वापस आयीं तो उन्हें शीला नहीं दिखी. उन्होंने बेताबी से प्रीतम से पूछा, क्या हुआ? वो मान गई?

नहीं, प्रीतम ने सर झुकाए हुए कहा.

नहीं! निकिता ने आश्चर्य से कहा. तुमने कितने तक की बात की? कहीं कंजूसी तो नहीं दिखाई?

तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ नहीं है, प्रीतम ने कहा. मैंने बीस-पच्चीस हज़ार तक की बात की थी.

फिर?

उसने कहा कि वो यह सब नहीं समझती, प्रीतम ने उत्तर दिया. वो अपने पति से बात कर के जवाब देगी.

कब?

उसने यह नहीं बताया.

उसने रुपयों के अलावा किसी और चीज़ की बात तो नहीं की? निकिता ने पूछा.

नहीं.

लगता है बात बन जायेगी, निकिता थोड़ी आश्वस्त हुईं. लेकिन हो सकता है कि उसका पति तेज-तर्रार हो और इतने में भी न माने. सुनो, जरूरी लगे तो तुम चालीस-पचास तक भी चले जाना!

चालीस-पचास हज़ार! प्रीतम ने विस्मय से कहा. कहाँ से लायेंगे हम इतने रुपये?

तुम चिंता मत करो, निकिता ने कहा. मैंने कहा था न कि जरूरत हुई तो मैं अपने गहने भी बेच दूँगी. भगवान सब ठीक करेंगे. मैं तो मंदिर में प्रसाद भी बोल कर आई हूं.
शाम को पति-पत्नी दोनों अपने-अपने खयालों में खोये थे कि किसी ने दरवाजा खटखटाया. निकिता ने जा कर दरवाजा खोला. बाहर शीला खड़ी थी.

नमस्ते बीवीजी, बाबूजी हैं? उसने निकिता से पूछा.

हां, तुम रुको. मैं उन्हें भेजती हूँ.

निकिता उसे ड्राइंग-रूम में छोड़ कर अन्दर गई तो प्रीतम ने बेचैनी से पूछा, कौन था?

शीला है, निकिता ने कहा. ड्राइंग रूम में आप का इंतजार कर रही है.

इतनी जल्दी आ गई, प्रीतम ने उत्तर दिया. वे डर रहे थे कि अब क्या होगा! जिस घड़ी को वे टालना चाहते थे वो आ गई थी.

निकिता ने कहा, जाओ और होशियारी से बात करना.

प्रीतम ड्राइंग रूम में पहुंचे तो शीला खड़ी हुई थी. उन्होंने बैठते हुए कहा, तुम खड़ी क्यों हो?

शीला उनके सामने फर्श पर बैठने लगी तो उन्होंने उसे सोफे पर बैठने को कहा. पर शीला ने नीचे बैठ कर कहा, मैं यहीं ठीक हूं, बाबूजी. आप जैसे बड़े लोगों के बराबर बैठने की हिम्मत मुझ में कहाँ!

प्रीतम समझ गए कि उन्होंने जितना सोचा था शीला उससे कहीं ज्यादा चालाक है. कुछ दिन पहले उनके नीचे और ऊपर लेटने वाली औरत आज कह रही है कि वो उनके बराबर बैठने के लायक नहीं है! उन्हें वास्तव में होशियारी से बात करनी पड़ेगी.

उन्होंने झिझकते हुए पूछा, कुछ बताया तुम्हारे पति ने?

शीला ने कहा, हां बाबूजी, उसने कहा कि हमारे बड़े भाग हैं कि बाबूजी ने तुम्हे अपनी सेवा करने का मौका दिया. उसने कहा कि बड़े लोगों की सेवा करने का फ़ल भी बड़ा मिलता है. इसलिए अब हमारे भी दिन फिरने वाले हैं.

प्रीतम को लगा कि शीला की तरह यह आदमी भी बहुत चालाक है. उन्होंने सावधानी से पासा फेंका, हां, मैं सोच रहा था कि इस महंगाई के ज़माने में बीस-पच्चीस हज़ार रुपये से भी क्या होता है!

उनकी बात पूरी होने से पहले ही शीला ने कहा, सच है, बाबूजी. मेरा मरद भी यही कहता है. आजकल बीस-पच्चीस हज़ार से कुछ नहीं होता! कोई सरकार हम गरीबों के बारे में नहीं सोचती. यह तो भगवान की कृपा है कि आप जैसे दयालु लोग हम गरीबों की फ़िक्र करते हैं. दोस्तो आप मस्ताराम डॉट नेट पर अन्तर्वासना की सच्ची कहानी पढ़ रहे है |

प्रीतम समझ गए थे कि उनका पाला एक पहुंचे हुए इन्सान से पड़ा है. अब बीस-पच्चीस हज़ार से काफी आगे जाना पड़ेगा. उन्होंने सोचा कि आगे बढ़ने से पहले उन्हें शीला की थाह लेने की कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने सतर्कता से कहा, तो तुमने भी कुछ तो सोचा होगा. मैं कोई अमीर आदमी नहीं हूं पर जितना हो सकता है उतना करने की कोशिश करूंगा.

बाबूजी, अब आपसे क्या छिपाना, शीला ने अपनी आवाज नीची कर के अपनी बात आगे बढाई. सच तो यह है कि मेरे मरद के मन में लालच आ गया था. हमारे मुहल्ले में एक आदमी है जो हर तरह के उलटे-सीधे धंधे करता है – चरस, गांजा, स्मैक, गन्दी फिलमें – वो सब कुछ खरीदता और बेचता है. मेरा मरद उसके पास पहुँच गया. उसने उस आदमी से कहा कि मेरे एक दोस्त के पास एक शरीफ और घरेलू किस्म के मरद-औरत की गन्दी फिलम है. वो कितने में बिक सकती है? उस आदमी ने कहा कि आजकल कोई नैट नाम का बाज़ार बना है जहाँ ऐसी चार-पांच मिनट की फिल्म के भी एक लाख रुपये तक मिल सकते हैं. सुना आपने, बाबूजी? एक छोटी सी फिलम के एक लाख रुपये!

अब प्रीतम की बोलती बंद हो गई. वे चालीस-पचास हज़ार रुपये भी मुश्किल से जुटा पाते लेकिन यहां तो बात एक लाख की हो रही थी. उन्हें लगा कि बाज़ी हाथ से निकल चुकी है. अब कुछ नहीं हो सकता. लेकिन फिर उन्हें याद आया कि अभी शीला ने यह नहीं कहा था कि उसके पति ने फिल्म बेच दी. शायद कोई रास्ता निकल आये! उन्होंने डरी हुई आवाज में कहा, फिर तुम्हारे मरद ने क्या किया?

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