अन्तर्वासना की सच्ची कहानी

गतांग से आगे …

एक लाख की बात सुन कर उसके मुंह में पानी आ गया पर फिर कुछ सोच कर उसने वो फिलम न बेचना ही ठीक समझा. वापस आ कर उसने मुझे सारा किस्सा सुनाया और कहा ‘शीला, रुपये तो हाथ का मैल है. किस्मत में लिखे हैं तो कभी न कभी जरूर आयेंगे. पर तेरी मालकिन जैसी एक नम्बर की मेम दुबारा नहीं मिलेगी. मैं कितना ही मुंह मार लूं पर मुझे औरत मिलेगी तो तेरे दर्जे की ही. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेमसाहब जैसा टनाटन माल मेरी किस्मत में हो सकता है! अब किस्मत मुझ पर मेहरबान हुई है तो मैं ये मौका क्यों छोडूं? तू तो बस एक दिन के लिए मेमसाहब को मुझे दिला दे.’ सुना आपने, बाबूजी? उस मूरख ने बीवीजी के लिए एक लाख रुपये छोड़ दिए!

यह सुन कर प्रीतम स्तब्ध रह गये. यही हाल निकिता का था जो परदे के पीछे खडी सब सुन रही थीं. दोनों सन्न थे. दोनों के समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें. निकिता किसी तरह दीवार का सहारा ले कर खड़ी रह पायीं. प्रीतम गुमसुम से खिड़की की तरफ देख रहे थे. तभी शीला ने सन्नाटा तोडा, क्या हुआ, बाबूजी? आपकी तबियत ठीक नहीं लग रही है. गर्मी भी तो इतनी ज्यादा है. मैं आपके लिए पानी लाती हूँ.

निकिता ने चौंक कर खुद को संभाला. उन्हें डर था कि कहीं शीला अन्दर आ कर उनका हाल न देख ले. तभी उन्हें प्रीतम की आवाज सुनाई दी, नहीं नहीं, मैं ठीक हो जाऊंगा.

अन्दर से बीवीजी को बुलाऊं? शीला ने हमदर्दी दिखाते हुए कहा. उसकी बात सुन कर निकिता तेज़ी से बेडरूम में चली गयीं.

प्रीतम ने कहा, नहीं, कोई जरूरत नहीं है. मुझे अब थोडा ठीक लग रहा है.

पर फिर भी आपको उनसे बात तो करनी होगी न! शीला उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी.

बात? हां, मैं बात करूंगा. शीला, क्या तुम अभी जा सकती हो? कल तक के लिए?

ठीक है बाबूजी, इतने दिन बीत गए तो एक दिन और सही! मैं चलती हूँ. शीला उठ कर दरवाजे की ओर चल दी. बाहर निकलने से पहले उसने कहा, जो भी तय हो वो आप कल मुझे बता देना.

उसके जाने के बाद प्रीतम किंकर्तव्यविमूढ से बैठे रहे. वे जानते थे कि अब शीला के पति की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं था. पर उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे यह बात निकिता को कैसे बताएं. निकिता को भी भान हो गया था कि शीला जा चुकी थी. उन्हें यह भी ज्ञात हो गया था कि पति की इज्ज़त और जान बचाने के लिए उन्हें उस घटिया आदमी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी. वे जानती थीं कि प्रीतम के लिए उनसे यह बात कहना कितना कठिन होगा. उन्होंने अपना जी कड़ा किया और ड्राइंग रूम में पहुँच गयीं. उन्होंने देखा कि प्रीतम की सर उठाने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी.

निकिता ने उनके कंधे पर हाथ रख कर दृढता से कहा, तुम चिंता छोडो. मैं कर लूंगी.

कर लोगी? प्रीतम ने आश्चर्य से कहा. क्या कर लोगी?

वही जो शीला की शर्त है और जो उसका पति चाहता है, निकिता ने कहा.

यह सुन कर प्रीतम को अपनी पत्नी की इज्ज़त लुटने का दुःख कम और अपना पिंड छूटने की ख़ुशी ज्यादा हुई. उन्हें पता था कि वो फिल्म इन्टरनेट पर आ जाये तो वे किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे. पर उन्होंने अपने चेहरे पर संताप और ग्लानि की मुद्रा लाते हुए कहा, मैं कितना मूर्ख हूं! मैंने यह भी नहीं सोचा कि मेरी मूर्खता की कीमत तुम्हे चुकानी पड़ेगी. अगर मैं अपनी जान दे कर…

मैंने कहा था न कि तुम ऐसी बात सोचना भी नहीं, निकिता ने उनकी बात काटते हुए कहा. सब ठीक हो जाएगा. मुझे तो बस एक ही बात का डर है.

प्रीतम ने थोड़े शंकित हो कर पूछा, डर? कैसा डर?

यही कि इसके बाद मैं तुम्हारी नज़रों में गिर न जाऊं! निकिता ने कहा. कहीं तुम मुझे अपवित्र न समझने लगो!

यह सुन कर प्रीतम की चिंता दूर हो गई. उन्होंने निकिता को गले लगा कर कहा, कैसी बात करती हो तुम! इस त्याग के बाद तो तुम मेरी नज़रों इतनी ऊपर उठ जाओगी कि तुम्हारे सामने मैं बौना लगने लगूंगा.

अब यह तय हो गया था कि निकिता को क्या करना था. दोनों कुछ हद तक सामान्य हो गए थे. अब अगला सवाल था कि यह काम कहाँ, कब और कैसे हो? शीला का पति राजे (उसका नाम राजेश था पर सब उसे राजे ही कहते थे) एक-दो बार इनके घर आया था, यह बताने के लिए कि शीला आज काम पर नहीं आ सकेगी. दोनों को याद था कि वो एक मजबूत कद-काठी वाला पर काला-कलूटा और उजड्ड टाइप का आदमी था. उसकी सूरत कुछ कांइयां किस्म की थी. उसका ज्यादा देर घर के अन्दर रुकना पड़ोसियों के मन में शंका पैदा कर सकता था क्योंकि वो किसी को भी उनका रिश्तेदार या दोस्त नहीं लगता.

दूसरा रास्ता था कि निकिता उनके घर जाये. पर इसमें भी जोखिम था. उस मोहल्ले में निकिता का शीला के घर एक-दो घन्टे रुकना भी शक पैदा कर सकता था. काफी सोच-विचार के बाद उन्हें लगा कि यदि निकिता रात के अँधेरे में वहां जाएँ और भोर होते ही वापस आ जाएँ तो किसी के द्वारा उन्हें देखे जाने की संभावना बहुत कम हो जायेगी. साथ ही वे साधारण कपडे पहनें और थोडा सा घूंघट निकाल लें तो वे शीला और राजे की रिश्तेदार लगेंगी. यह भी तय हुआ कि रात होने के बाद निकिता एक निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जायेंगी और वहां से शीला उन्हें ले जायेगी. अगली सुबह तडके शीला उन्हें वापस पंहुचा देगी. प्रीतम ने शीला से एक दिन का समय मांगा था इसलिए यह काम अगली रात को करना तय हुआ.

खाना खाने के बाद पति-पत्नी सोने के लिए चले गए पर नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी. निकिता की आँखों के सामने बार-बार राजे का चेहरा घूम रहा था. उन्हें याद था कि वो जब-जब यहाँ आया, उन्हें लम्पट दृष्टि से देखता था. उन्हें ऐसा लगता था जैसे वो अपनी आँखों से उन्हें निर्वस्त्र करने की कोशिश कर रहा हो. उन्हें यह सोच कर झुरझुरी हो रही थी कि कहीं उसने वास्तव में उन्हें नग्न कर दिया तो उन्हें कैसा लगेगा! उसकी बोलचाल भी गंवार किस्म की थी. न जाने वो उनके साथ कैसे पेश आएगा! निकिता को उससे प्रीतम जैसे सभ्य व्यवहार की आशा नहीं थी. और वो बिस्तर पर उनके साथ जो करेगा उसकी तो वे कल्पना भी नहीं करना चाहती थीं. दोस्तो आप मस्ताराम डॉट नेट पर अन्तर्वासना की सच्ची कहानी पढ़ रहे है |

उधर प्रीतम का भी यही हाल था. शुरू में तो उन्हें भय और तनाव से मुक्त होने की ख़ुशी हुई थी पर बाद में उनका मन न जाने कहाँ-कहाँ भटकने लगा. उन्हें लग रहा था कि उनका शीला को भोगना तो एक सामान्य बात थी पर राजे जैसा आदमी उनकी पत्नी को भोगे यह सोच कर उन्हें वितृष्णा हो रही थी. फिर उन्हें महसूस हुआ कि राजे ही क्यों, किसी भी पर-पुरुष को अपनी पत्नी सौंपनी पड़े तो उन्हें इतना ही बुरा लगेगा. उन्हें यह सर्वमान्य पुरुष स्वभाव लगा कि अपनी पत्नी को दूसरों से बचा कर रखो पर दूसरों की पत्नी मिल जाए तो बेझिझक उसका उपभोग करो. फिर प्रीतम के मन में विचार आया कि राजे भी तो यही कर रहा है. दूसरे की पत्नी मिल सकती है तो वो उसे क्यों छोड़ेगा. पर वे वे हैं और राजे राजे!

एक और डर प्रीतम को सताने लगा. राजे कहीं निकिता को शारीरिक नुकसान न पहुंचा दे! वो ठहरा एक हट्टा-कट्टा कड़ियल मर्द जबकि निकिता एक कोमलान्गी नारी थीं. उन दोनों में कोई समानता न थी. शारीरिक समानता तो दूर, उनके मानसिक स्तर में भी जमीन आसमान का फर्क था. निकिता एक सुसंस्कृत और संभ्रांत स्त्री थीं. रतिक्रिया के समय पर भी उनका व्यवहार शालीन और सभ्य रहता था. जबकि राजे से सभ्य आचरण की अपेक्षा करना ही निरर्थक था. प्रीतम शीला का यौनाचरण देख चुके थे. कहीं राजे ने भी निकिता के साथ वैसा ही व्यवहार किया तो?

अपने-अपने विचारों में डूबते-तरते पता नहीं कब वे दोनों निद्रा की गोद में चले गए.

अगली रात को – निकिता एक पूर्व-निर्धारित स्थान पर पहुँच गयीं जो उनके घर से थोड़ी ही दूर था. शीला वहां उनका इंतजार कर रही थी. जब वे दोनों शीला के घर की ओर चल पडीं तो रास्ते में शीला ने निकिता को कहा, बीवीजी, मैने अपने एक-दो पड़ोसियों को बताया है कि रात को मेरी भाभी इस शहर से गुज़र रही है. वो हम लोगों से मिलने कुछ घंटों के लिये हमारे घर आएगी. उसे जल्दी ही वापस जाना है इसलिए वो अपना सामान स्टेशन पर जमा करवा के आयेगी. अब आप बेफिक्र हो जाइये. किसी को कोई शक नहीं होगा. कल सुबह आप सही-सलामत अपने घर पहुँच जायेंगी और मेरे मरद की इच्छा भी पूरी हो जाएगी.

आखिरी वाक्य सुन कर निकिता को फिर झुरझुरी सी हुई. लेकिन अब वे लौट नहीं सकती थीं! उन्होंने स्वीकार कर लिया कि जो होना है वो तो हो कर रहेगा. और वो होने में ज्यादा देर भी नहीं थी क्योंकि बातों-बातों में वे शीला के घर पहुँच गए थे. घर के अन्दर पहुँच कर निकिता एक और समस्या से रूबरू हुईं. उस घर में एक कमरा, एक छोटा सा किचन और एक बाथरूम था. सवाल था कि शीला कहाँ रहेगी!
राजे एक कुर्सी पर लुंगी और बनियान पहने बैठा था. जैसे ही शीला ने दरवाजा बंद किया, राजे लपक कर निकिता के पास गया और उसने अपने दोनों हाथ उनकी कमर पर रख दिए. उसकी भूखी नज़रें उनके चेहरे पर जमी हुई थीं. लगता था कि वो उन्हें अपनी आँखों से ही खा जाना चाहता हो. वो उन्हें लम्पटता से घूरते हुए शीला से बोला, शीला, बाबूजी के पास ऐसा जबरदस्त माल था फिर भी तू उनकी नज़रों में चढ़ गई! पर जो भी हो, इसके कारण मेरी किस्मत खुल गई. अब मैं इस चकाचक माल की दावत उड़ाऊंगा.

उसने अपना मुंह निकिता के होंठों की ओर बढाया पर वे अपनी गर्दन पीछे कर के बोलीं, नहीं, यहाँ शीला है.

तो क्या हुआ, मेमसाहब? राजे ने कहा. इसके साथ बाबूजी ने जो किया, वो मैंने देखा. अब मैं आपके साथ जो करूंगा, वो इसे देखने दीजिये. हिसाब बराबर हो जाएगा.

शीला ने अपने पति का परोक्ष समर्थन करते हुए कहा, अरे, हिसाब की बात तो अलग है. पर अब मैं जाऊं भी तो कहाँ? इस घर में तो जगह है नहीं और मैं किसी पडोसी के घर गई तो वो सोचेगा कि यह रात को अपनी भाभी को अपने मरद के पास छोड़ कर हमारे घर क्यों आई है? बीवीजी, आपको तकलीफ तो होगी पर मेरा यहाँ रहना ही ठीक है.

अब निकिता के पास कोई चारा न था. और शीला जो कह रही थी वह ठीक भी था. उन्होंने हलके से गर्दन हिला कर हामी भरी. अब राजे को जैसे हरी झंडी मिल गई थी. उसने उनके होंठों पर ऊँगली फिराते हुए कहा, ओह, कितने नर्म हैं, फूल जैसे! और गाल भी इतने चिकने!

उसका हाथ उनके पूरे चेहरे का जुगराफिया जानने की कोशिश कर रहा था. पूरे चेहरे का जायजा लेने के बाद उसका हाथ उनके गले और कंधे पर फिसलता हुआ उनके सीने पर पहुँच गया. उसने आगे झुक कर अपने होंठ उनके गाल से चिपका दिए. वो अपनी जीभ से पूरे गाल को चाटने लगा. साथ ही उसकी मुट्ठी उनके उरोज पर भिंच गई. निकिता डर रही थी कि वो उनके स्तन को बेदर्दी से दबाएगा पर उसकी मुट्ठी का दबाव न बहुत ज्यादा था और न बहुत कम.

राजे ने अपने होंठों से उनके निचले होंठ पर कब्ज़ा कर लिया और वो उसे नरमी से चूसने लगा. कुछ देर उनके निचले होंठ को चूसने के बाद उसने अपने होंठ उनके दोनों होठों पर जमा दिये. उनके होंठों को चूमते हुए वो कपड़ों के ऊपर से ही उनके स्तन को भी मसल रहा था. निकिता ने सोचा था कि राजे जो करेगा, वे उसे करने देंगी पर वे स्वयं कुछ नहीं करेंगीं. वैसे भी काम-क्रीडा में ज्यादा सक्रिय होना उनके स्वभाव में नहीं था.

उनके होंठों का रसपान करने के बाद राजे ने अपनी जीभ उनके मुंह में घुसा दी. जब जीभ से जीभ का मिलन हुआ तो निकिता को कुछ-कुछ होने लगा. वे निष्काम नहीं रह पायीं. वे भी राजे की जीभ से जीभ लड़ाने लगीं. उनके स्तन पर राजे के हाथ का मादक दबाव भी उनमे उत्तेजना भर रहा था. उन्हें लगा जैसे वे तन्द्रा में पहुंच गयी हों. उसी तन्द्रा में वे अपनी प्रकृति के विपरीत राजे को सहयोग करने लगीं. उनकी तन्द्रा शीला के शब्दों ने तोड़ी जब वो राजे से बोली, अरे, ऊपर-ऊपर से ही दबाएगा क्या? चूंची को बाहर निकाल ना. पता नहीं ऐसी चूंची फिर देखने को मिलेगी या नहीं!

शीला के शब्दों और उसकी भाषा से निकिता यथार्थ में वापस लौटीं. उन्हें पता था कि निचले तबके के मर्दों द्वारा ऐसी भाषा का प्रयोग असामान्य नहीं था पर एक स्त्री के मुंह से ‘चूंची’ जैसा शब्द सुनना उन्हें विस्मित भी कर गया और रोमान्चित भी. राजे ने उनकी साड़ी का पल्लू गिराया और वो शीला से बोला, आ जा, तू ही बाहर निकाल दे. फिर दोनों देखेंगे.

शीला ने उनके पीछे आ कर पहले उनका ब्लाउज उतारा और फिर उनकी ब्रा. जैसे ही उनके उरोज अनावृत हुए, राजे बोल उठा, ओ मां! शीला देख तो सही, क्या मस्त चून्चियां हैं, रस से भरी हुई!

अब शीला भी उनके सामने आ गई और मियां-बीवी दोनों उनके उरोजों को निहारने लगे. दोनों मंत्रमुग्ध से लग रहे थे. उनकी दशा देख कर निकिता को अपने स्तनों पर गर्व हो रहा था. उनकी नज़र अपने वक्षस्थल पर गई तो उन्हें भी लगा कि उनकी ‘चून्चियां’ वास्तव में चित्ताकर्षक हैं. फिर उन्होंने तुरंत मन ही मन कहा, ‘यह क्या? मैं भी इन लोगों की भाषा में सोचने लगी!’ पर उन्हें यह बुरा नहीं लगा.

राजे ने उनकी साड़ी उतार कर उन्हें पलंग पर लिटा दिया. उसने कहा, मेमसाहब, अब तो मैं जी भर कर इन मम्मों का रस पीऊंगा.

यह नया शब्द सुन कर निकिता की उत्तेजना और बढ़ गई. राजे ने उनका एक मम्मा अपने हाथ में पकड़ा और दूसरे पर अपना मुँह रख दिया. अब वह एक मम्मे को अपने हाथ से सहला रहा था और दूसरे को अपनी जीभ से. कमरे में लपड़-लपड़ की आवाजें गूंजने लगीं. निकिता की साँसें तेज़ होने लगीं. उनका चेहरा लाल हो गया. जब राजे की जीभ उनके निप्पल को सहलाती, उनका पूरा शरीर कामोत्तेजना से तड़प उठता. उन्हें लग रहा था कि राजे इस खेल का मंजा हुआ खिलाडी है. उनकी आँखें बंद थीं और वे कामविव्हल हो कर मम्मे दबवाने और चुसवाने का आनंद ले रही थीं.

शीला एक बार फिर उन्हें यथार्थ के धरातल पर ले आई. उसने पूछा, बीवीजी, आपको तकलीफ तो नहीं हो रही है? यह ठीक तरह से दबा रहा है?

निकिता ने आँखें खोल कर सिर्फ इशारे से जवाब दिया. शीला समझ गई कि वे खुश हैं. उसने राजे से पूछा, और तुझे कैसा लग रहा है रे? ऐसे चूस रहा है जैसे खाली कर देगा!

तेरी कसम शीला, ऐसी रसीली चून्चिया भगवान किसी किसी को ही देता है. तू चूस के देख. तू भी मान जायेगी.

सच? शीला के कहा. चल, एक तू चूस और एक मुझे चूसने दे.

अब मियां-बीवी दोनों टूट पड़े निकिता की छाती पर. एक चूंची राजे के मुंह में और एक शीला के मुंह में! दोनों ऐसे चूस रहे थे जैसे अपनी जन्म-जन्म की प्यास बुझाना चाहते हों. और इस दोहरे हमले तले निकिता को ऐसे लग रहा था जैसे वे आसमान में उड़ रही हों. उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनका पेटीकोट उतरा और कब चड्डी. उन्हें केवल यह पता था कि किसी की उँगलियाँ उनकी जाँघों के बीच थिरक रही हैं और उन्हें स्वप्नलोक में ले जा रही हैं. उनकी तन्द्रा फिर शीला के शब्दों से टूटी. वो कह रही थी, अब दोनों चूंचियां मैं सम्भालती हूं और तू बीवीजी की चूत को संभाल. दोस्तो आप मस्ताराम डॉट नेट पर अन्तर्वासना की सच्ची कहानी पढ़ रहे है |

इस बार शीला की भाषा ने उन्हें विस्मित नहीं किया. साथ ही वे यह भी समझ गईं कि अब राजे का असली हमला झेलने का समय आ गया है. पर उनकी उत्तेजना उन्हें इस हमले के लिए तैयार कर चुकी थी. तैयार ही नहीं, वे कामातुर हो कर इस आक्रमण की प्रतीक्षा कर रही थीं. पर हुआ कुछ और ही. उन्हें अपने भगोष्ठों पर राजे के कठोर हथियार की बजाय एक कोमल स्पर्श महसूस हुआ, एक गीला और मादक स्पर्श! उन्होंने अपनी आँखें खोल कर नीचे की ओर झाँका. शीला उनके सीने पर झुकी हुई थी पर फिर भी उन्हें अपनी जाँघों के बीच राजे का सर नज़र आ रहा था. उन्होंने सोचा, ‘हे भगवान! यह अपनी जीभ से वहां क्या कर रहा है?’ फिर उन्होंने मन ही मन सोचा, ‘वो जो भी कर रहा है, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.’ उनके लिए यह एक नया अनुभव था जो उन्हें कामोन्माद की ओर धकेल रहा था.

ऊपर शीला जुटी हुई थी. उसने निकिता के मम्मों को चूस-चूस कर बिल्कुल गीला कर दिया था. उसका मम्मे चूसने का अंदाज़ उनकी कामोत्तेजना को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा था. जल्द ही वो घडी आ गई जिसका उनको आभास नहीं था. उनका बदन लरजने लगा. वे बेबसी में इधर-उधर हाथ पैर मारने लगीं. और फिर उत्तेजना की पराकाष्ठा पर पहुँच कर उनका शरीर धनुष की तरह अकड़ गया. शीला और राजे की सम्मिलित कामचेष्टा ने उन्हें यौन-आनंद के चरम पर पहुंचा दिया था.

जब निकिता की चेतना लौटी, वे अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थीं. उनको ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे उन्हें एक असह्य तनाव से मुक्ति मिली हो. उन्होंने आँखें खोलीं तो पाया कि शीला और राजे उन्हें विस्मय से देख रहे हैं. शीला बोली, बीवीजी, आपको झड़ते देख कर तो मुझे भी मज़ा आ गया. आपको मज़ा आया?

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