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मैं जयपुर में नौकरी करता हूं और मैं जिस कंपनी में नौकरी करता हूं उस के सिलसिले में मुझे कई बार अन्य शहरों में भी जाना पड़ता है मैं अपने घर पर बहुत कम ही समय बिताया करता हूं क्योंकि मुझे ज्यादातर बाहर ही रहना पड़ता है। एक बार मैं अपने काम के सिलसिले में दिल्ली चला गया दिल्ली में मेरे चाचा जी भी काम करते हैं वह सरकारी विभाग में है और वहां पर उन्हें काम करते हुए 3 साल हो चुके हैं मैं जब भी दिल्ली जाता हूं तो मैं उन्हीं के पास रुकता हूं। मैंने अपने चाचा जी को फोन किया और कहा मैं दिल्ली आने वाला हूं चाचा कहने लगे ठीक है बेटा तुम आ जाओ मैं अपने चाचा जी के पास चला गया वह लोग सरकारी क्वार्टर में रहते हैं उन्हें गवर्नमेंट की तरफ से रहने के लिए घर मिला हुआ है।

चाचा जी मुझे कहने लगे बेटा तुम यहां कितने दिनों तक रुकने वाले हो मैंने चाचा से कहा अब देखते हैं कितने दिन यहां पर लगते हैं चाचा कहने लगे बेटा मैं भी सोच रहा था कि तुम्हारे साथ ही इस बार जयपुर चलूं काफी समय हो गया है जब हम लोग भैया भाभी से भी नहीं मिले और हमारा घर पर भी आना नहीं हो पाया। हम लोग अभी ज्वाइंट फैमिली में रहते हैं लेकिन चाचा जी की नौकरी की वजह से उनका परिवार उन्ही के साथ रहता है हमारे साथ मेरे ताऊजी और उनका परिवार रहता है हमारा परिवार काफी बड़ा है मेरे चाचा जी का नेचर भी बहुत अच्छा है और मेरे पापा मेरे ताऊजी की बड़ी तारीफ किया करते हैं वह कहते हैं अमरदीप भाई साहब बडे ही समझदार है।

मेरे चाचा पढ़ने में बहुत अच्छे थे इसलिए उन्होंने सरकारी नौकरी की और जब उनकी नौकरी लग गई तो उसके बाद उन्होंने अपनी जिम्मेदारी खुद ही उठाई। मेरे दादा जी का देहांत काफी समय पहले ही हो चुका था लेकिन मेरे ताऊजी और मेरे पिता जी ने बहुत मेहनत की और उन्होंने चाचा के लिए कभी कोई कमी नहीं की इसीलिए वह भी मेरे पिताजी और ताऊजी जी की बड़ी इज्जत करते हैं। मैंने चाचा से कहा हां चाचा क्यों नहीं आप भी इस बार जयपुर चलिए आपको भी घर आए हुए काफी समय हो चुका है चाचा कहने लगे बेटा तुम्हें तो मालूम है परिवार के साथ अब कहीं भी जाना संभव ही नहीं हो पाता मैंने चाचा से कहा तो आप इस बार जरूर चलिएगा चाचा कहने लगे ठीक है बेटा इस बार जरूर चलेंगे।

मैं कुछ दिनों तक दिल्ली में ही रहने वाला था मैं सुबह अपने काम से निकल जाया करता था और शाम को आता था एक शाम जब मैं अपने काम से लौटा तो उस दिन उनके पड़ोस में रहने वाली एक आंटी आई हुई थी और वह हमारी चाची के साथ बात कर रही थी। मेरी चाची ने मुझसे उनका परिचय करवाया मैंने उनसे उनके हालचाल पूछा और मैं रूम के अंदर चला गया मैं फ्रेश होने के लिए चला गया और जब मैं कपड़े चेंज करके बाहर आया तो मैंने देखा एक लड़की भी बैठी हुई थी। मेरी चाची ने कहा यह सुनिधी है मैंने जब सुनिधी को देखा तो मुझे वह बहुत अच्छी लगी और उसे देखते ही मेरे दिल में जैसे उसके प्रति एक अलग ही फीलिंग आने लगी मैं सुनिधी को देखता रहा चाची ने सुनिधी को भी मुझसे मिलवाया और कहा यह हर्षित है।

मुझे नहीं मालूम था कि सुनिधी उन्ही आंटी की लड़की है जो कुछ देर पहले चाची से बात कर रही थी चाची ने मुझे बताया कि अभी जो आंटी मुझसे बात कर रही थी वह सुनिधी की मम्मी है। मैंने सुनिधी से बडे ही फ्रैंकली तरीके से बात की और उसे पूछा तुम क्या कर रही हो सुनिधी कहने लगी मैं स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हूं। वह एक प्राइवेट स्कूल में टीचर है लेकिन जब मैंने सुनिधी को देखा तो उसे देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा मैं पहली बार ही सुनिधी से मिला था परंतु उसके चेहरे की मासूमियत मुझे अपनी तरफ खींच रही थी और ना जाने मुझे एक अलग ही फीलिंग उसे लेकर आने लगी।

मैं सुनिधी से बात कर रहा था तो मुझे अच्छा लगा लेकिन ज्यादा देर तक मैं उससे बात ना कर सका वह अपने घर चली गई सुनिधी जब अपने घर गई तो मुझे ऐसा लगा जैसे कि मैं उससे बात करता ही रहूं लेकिन यह संभव नहीं था फिर मैंने सुनिधी से उसके बाद बात नहीं की और ना ही वह मुझे मिली। मैं चाचा और चाची के साथ जयपुर वापस आ गया था वह लोग कुछ दिनों तक जयपुर में रहे लेकिन मैं सोचने लगा कि कब मैं दिल्ली जाऊंगा और कब मेरी सुनिधी से दोबारा मुलाकात हो लेकिन मेरा दिल्ली जाना हो ही नहीं पा रहा था।

मैंने एक दिन सोचा कि क्यों ना मैं छुट्टी लेकर चले जाऊं मैंने अपने ऑफिस से कुछ दिनों की छुट्टी ले ली और मैं दिल्ली चला गया। मैं जब दिल्ली गया तो मुझे बहुत अच्छा लगा और उस वक्त मेरी मुलाकात सुनिधी से हो गई सुनिधी से मैं जब भी बात करता तो मुझे अच्छा लगता मैं चाहता था कि मुझे सुनिधी का नंबर मिल जाए ताकि मेरी बात उससे फोन पर होती रहे। एक दिन सुनिधी से मैंने उसका फोन नंबर ले लिया और उससे मैं फोन के माध्यम से बात करने लगा लेकिन सुनिधी को मेरा फोन पर बात करना अच्छा नहीं लगता था इसलिए वह मेरा फोन कम ही उठाया करती थी। वह बहुत ही अच्छी लड़की है उसे यह एहसास हो चुका था कि मैं उससे बात करने की कोशिश कर रहा हूं और मैं जानबूझकर उसे फोन करता। मुझे सुनिधी से बात करना वाकई में अच्छा लगता है और सुनिधी से बात कर के मुझे बहुत खुशी होती सुनिधी को मैंने अपने दिल की बात नहीं बताई थी लेकिन उसे मैं जल्द ही अपने दिल की बात बताना चाहता था।

कुछ ही समय मे मैंने सुनिधी को अपने फीलिंग का इजहार कर दिया लेकिन उसने मुझे मना कर दिया और कहा देखो हर्षित मैं तुम्हें एक अच्छा लड़का मानती हूं और मुझे मालूम है कि तुम दिल के बहुत अच्छे हो लेकिन मैं इन चक्करो में नहीं पढ़ना चाहती। मैंने उसे कहा क्या हम लोग यह सब बातें एक दूसरे से थोड़ा समय निकाल के कर सकते हैं सुनिधी ने कुछ देर सोचा और कहने लगी ठीक है मैं देखती हूं मैं तुम्हें फोन करता हूं जब मैं फ्री हो जाऊंगी। मैं सुनिधी का इंतजार करता रहा लेकिन उसका फोन मुझे नहीं आया और मुझे वापस जयपुर आना पड़ा क्योंकि मेरी छुट्टियां भी खत्म हो चुकी थी मैं जयपुर चला आया था।

सुनिधी का मुझे एक दिन फोन आया और वह कहने लगी मैं तो सोच रही थी कि तुम कुछ दिन और यहां रुकोगे लेकिन तुम तो जयपुर चले गए मैंने उसे कहा मेरी छुट्टियां खत्म हो गई थी इसलिए मुझे जयपुर आना पड़ा लेकिन तुम्हारे पास वक्त ही नहीं था और ना ही तुमने मुझे फोन किया। सुनिधी को भी शायद अपनी गलती का एहसास था सुनिधी ने मुझे सॉरी कहा मैंने उसे कहा तुम्हें मुझे सॉरी कहने की जरूरत नहीं है मैं तो सिर्फ चाहता था कि हम दोनों साथ में बैठकर अकेले में बात करें क्योंकि तुम्हें मेरे बारे में अभी अच्छे से नहीं पता और ना हीं तुम मेरे बारे में कुछ जानती हो।

तुम अपनी जगह बिल्कुल सही थी इसलिए तो मैं चाहता था कि हम लोग एक दूसरे से बात करें ताकि हम दोनों एक दूसरे को समझ सके मेरे दिल में जो तुम्हारे लिए फीलिंग थी मैंने तुम्हें वह बता दी थी। सुनिधी मुझे कहने लगी मुझे मालूम है कि तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो मैंने सुनिधी से कहा मेरे दिल में तुम्हारे लिए बड़ी इज्जत है और मैंने जब तुम्हें पहली बार देखा था तो उसी वक्त मैं तुमसे प्यार कर बैठा था। सुनिधी कहने लगी जब तुम दिल्ली आओ तो मुझे फोन कर देना मैंने सुनिधी से कहा ठीक है मैं जब भी दिल्ली आऊंगा तो मैं तुम्हें फोन कर दूंगा। मैं सुनिधी से काफी समय तक मिल नहीं पाया परंतु मुझे काफी समय बाद सुनिधी से मिलने का मौका मिला मैं दिल्ली चला गया। जब मैं दिल्ली गया तो मैंने सुनिधी को फोन किया उससे मेरी बात फोन पर ही हुई। वह मुझे कहने लगी क्या तुम दिल्ली आए हुए हो मैंने उसे बताया हां मैं दिल्ली आया हूं।

वह मुझे कहने लगी तुम शाम को मुझे मिलना शाम के वक्त मै घर पर ही रहूंगी हम लोग मेरे घर पर ही बैठ जाएंगे। मैंने सुनिधी से कहा ठीक है मैं शाम के वक्त अपने ऑफिस के काम से भी फ्री हो जाऊंगा और तुमसे मिलने के लिए आ जाऊंगा। मैं शाम के वक्त अपने ऑफिस के काम से फ्री हुआ तो मैंने सुनिधी को फोन किया सुनिधी मुझे कहने लगी तुम घर पर आ जाओ। मै सुनिधी से मिलने के लिए घर पर चला गया जब मैं सुनिधी से मिलने उसके घर पर गया तो वह सोफे पर बैठी हुई थी।

सुनिधी ने मुझसे कहा आओ बैठो मैं सुनिधी की तरफ देखने लगा और उसके बगल में जाकर बैठ गया। हम दोनों एक दूसरे से बात कर रहे थे सुनिधी ने मुझसे कहा देखो हर्षित तुम मुझे अच्छे लगते हो लेकिन मैंने कभी तुम्हारे बारे में ऐसा नहीं सोचा। मैंने सुनिधी से कहा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं और यह कहते हुए मैंने उसे अपने गले लगाने की कोशिश की लेकिन वह मुझसे दूर जाने लगी।

मैंने उसे अपनी बाहों में ले लिया मैं अपने अंदर के ज्वालामुखी को ना रोक सका और वह उस वक्त फट गया। मैंने उसके होठों को किस किया और सुनिधी को सोफे पर लेटा दिया वह छटपटाने लगी लेकिन मैंने उसे छोड़ा नही। मैंने जब उसके कपड़े उतारे तो उसके स्तनों को मैंने काफी देर तक चूसा उसके स्तन बड़े ही लाजवाब थे मैंने जैसे ही अपने लंड को उसकी योनि पर सटाते हुए अंदर की तरफ धकेला तो वह चिल्ला उठी। वह काफी तेजी से चिल्लाई मुझे उसे धक्के देने में बहुत मजा आया मैंने उसे तेजी से धकके दिए।

काफी देर तक मैंने उसके बदन की गर्मी को महसूस किया जब मैं पूरी तरीके से संतुष्ट हो गया तो मैंने उसे अपने गले लगा लिया और कहा तुम्हें रोने की आवश्यकता नहीं है मैं तुमसे सच्चा प्यार करता हूं। उस दिन के बाद वह मुझसे प्यार कर बैठी और उसे समझ आ गया की मैं उससे कितना प्यार करता हूं। जब भी मैं दिल्ली जाता तो वह मुझे कहती तुम घर पर ही आ जाओ मैं उससे मिलने के लिए घर पर ही चला जाता हूं।