गांड की गोलाइयों को देखकर मन विचलित-2

मैं आपको बता दूँ कि मैंने कभी किसी को मजबूर करके सेक्स नहीं किया। जिसके साथ सेक्स किया, हमेशा उसकी रजामंदी से! चाहे वह गृहिणी हो या कुंवारी लड़की, यदि सामने वाली चाहती है तो सेक्स करना बुरा नहीं है, न ही दोबारा सेक्स करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। कुल मिलकर आपसी सहमति से ही सेक्स को सुखद बनाया जा सकता है। प्यार और सेक्स एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

तो पिछली कहानी में सोरभी के साथ रात भर सेक्स किया, शायद इतना सुखद सेक्स पहली बार किया था, इच्छा दोनों की थी पर पहल मुझे करनी पड़ी थी। मतलब एक तरफा नहीं था, दोनों तरफ आग बराबर लगी हुई थी बस औरतें कह नहीं पाती, इशारा जरूर कर देती हैं, यदि समझ गए तो ठीक नहीं तो रास्ता अपना अपना।

सुबह 5 बजे जब मैंने जाने की बात की तो जाने से पहले उसने वादा लिया कि मैं दोबारा कभी भी इस बात की मांग नहीं करूँगा, न ही किसी से इसका जिक्र करूँगा।

वादा करके मैं उसके घर से चला गया क्यूंकि दस बजे से बाथरूम का काम शरू करना था तो मिस्त्री, बेलदार को लेकर पुनः सोरभी गुर्जर के घर आ गया। मिस्त्री को बाथरूम का पूरा नक्शा समझाया और एक कुर्सी पर बैठ गया।

पुराना निर्माण को तोड़ा जाने लगा, मुझे बैचैनी हो रही थी, सोरभी बच्चों के बेडरूम में थी। मुझे लगता था कि उससे आँखें तो चार होती ही रहेंगी।
परन्तु वह नहीं आई, मैं धीरे से उठा, सोरभी के पास गया और उसे बुलाया।
उसने पूछा- क्या बात है?
मैंने कहा- प्यास लगी है!
उसने एक जग में पानी और गिलास दे दिया, बात कुछ नहीं की।

मैंने कहा- सोरभीजी, मुझसे बात नहीं करोगी?
तो बोली- क्या बात करना है?
और कमरे में चली चली गई।

मैं पानी लेकर आया, फिर कुर्सी पर बैठ गया, सोचने लगा कि शायद सोरभी ने रात में अन्तर्वासना में बह कर वह सब किया होगा और अब ग्लानि महसूस कर रही है। मुझे इसका ख्याल रखना पड़ेगा कि उसे कोई ठेस न पहुँचे।

मैं आँखें बंद किये बैठा था कि तभी मुझे पायल की झनझनाहट सुनाई दी। मैंने देखा सोरभी थी।

उसने मुझे मुझे इशारे से बुलाया, कमरे में ले गई और आलमारी खोलकर 5000 रूपये मेरे हाथ पर रख दिए, बोली- यह तुम रख लो कल की बात को भुलाने के लिए।

शायद मुझ पर भी विश्वास नहीं था उसे, मैंने कहा- सोरभीजी, मैं इतना गया गुजरा नहीं हूँ, आप अपने रूपये अपने पास रखें और मेरा विश्वास करें!

रूपये वापस करके मैं बाहर आ गया, मिस्त्री को बोलकर मैं घर चला गया, मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था।

शाम को मिस्त्री घर आया, बताया- तोड़ने का काम ख़त्म, क़ल से निर्माण शुरू करना है।
मिस्त्री ने मेरे बताये अनुसार काम चालू कर दिया, दो दिन तक मैं वहाँ नहीं गया।

तीसरे दिन दोपहर में सोरभी का फोन आया- पॉल जी, आप क्यूँ नहीं आ रहे हैं? केवल मिस्त्री और मजदूर काम कर रहे हैं, उन्हें गॉइड कौन करेगा?

मैंने कहा- उसकी आप चिंता न करें, मिस्त्री को मैं समझा देता हूँ, उसी हिसाब से वह काम करता है।

सोरभी ने कहा- मेरी बात का बुरा मान गए?
मैंने कहा- नहीं!
तो सोरभी ने कहा- दोस्त बनकर तो आ सकते हो!

शायद सोरभी सामान्य हो गई थी, मैंने कहा- क़ल जरूर आऊँगा।

चौथे दिन टीम के साथ दस बजे सोरभी गुर्जर के घर पहुँचा, गुर्जर जी बैंक जाने की तयारी कर रहे थे, मुझसे बोले- आओ पॉल!
मैंने कहा- जी!

टीम को काम पर लगा दिया और गुर्जर जी के पास आ गया। उन्होंने आवाज लगाई- सोरभी दो कप चाय तो बना देना!
पूछने लगे- किसी और चीज की जरुरत हो तो बताना!
मैंने कहा- जी।

चाय खत्म करके टीम का काम देखने आ गया। सब अपने अपने काम में लगे थे, गुर्जर जी बैंक चले गए।
दोपहर में हिम्मत करके मैं सोरभी के पास गया, कहा- पानी चाहिए!
तो बोली- बैठो, लाती हूँ।
मैं बैठक मैं बैठ गया।

पानी देकर पूछा- चाय पियोगे?
मैंने कहा- नहीं, घर जा रहा हूँ, एक काम का ठेका है, वहाँ जाना है।

मिस्त्री को बोलकर वहाँ से चला गया। पांचवें दिन सोरभी की मिस काल आई, शायद सोरभी मुझसे कुछ कहना चाहती हो, फिर उसने पता नहीं क्या सोचकर फोन कट कर दिया। मैंने भी काल रिटर्न नहीं किया। छठे दिन काम लगभग पूरा हो गया था, मिस्त्री ने बताया। तो शाम को छह बजे गुर्जर जी के घर पहुँचा, गुर्जर जी बैंक से अभी आये थे, मेरे साथ बाथरूम देखने आये, कहने लगे- तुमने बहुत सुन्दर बाथरूम बना दिया है। पूरा बाथरूम चमचमा रहा था, दर्पण को दीवार पर लगा कर प्लास्टर और पुट्टी से बेलबूटा बना दिए थे, ऊपर बड़ा रोशनदान से रोशनी हवा आ रही थी.

दर्पण के सामने की दीवार से लगा बाथटब, बीच में आमने सामने की दीवार पर ठण्डे-गर्म पानी के कलात्मक नल, शावर और वाश बेसिन फिट कर दिए गए थे, जमीन में मार्बल, दीवार पर टाइल्स लग चुके थे। दर्पण में अपना पूरा प्रतिबिम्ब दिख रहा था, बाथटब भी पूरा दिख रहा था, यानि नहाने वाला अपने आप को नहाते हुए देख सकता है।

गुर्जर जी बोले- काम कब ख़त्म होगा?
मैंने कहा- काम तो लगभग पूरा हो गया, फ़ाइनल टच में 1-2 घण्टे लगेंगे, यानि क़ल दोपहर तक हो जायेगा।

तभी सोरभीजी ने आवाज लगाई तो गुर्जर जी मुझे लेकर बैठक में आ गए।
सोरभी ने हम दोनों को चाय दी, चाय देते समय मुझसे बात भी कर रही थी, थोड़ा मुस्कुराई भी थी।

गुर्जर जी ने जेब से 5000 रूपये देकर कहा- आप अपना पेमेंट चुकता ले लीजिये, क़ल दोपहर मैं बैंक चला जाऊँगा, शाम को आ पाऊँगा। परसों दिन में दौरे पर रहूँगा।
मैंने रूपये रख लिए और आज्ञा ली। मिस्त्री व मजदूरों को लेकर आ गया।

सुबह मिस्त्री का फोन आया कि वो काम पर नहीं आ सकता, बच्चे को बुखार है।
मैंने कहा- ठीक है।
सोचा, आज दूसरी जगह का काम की रूपरेखा बना लेंगे।

फिर मैंने गुर्जर जी को फोन लगाकर माफ़ी मांगी सारी बात बताकर कहा- आपका काम क़ल हो जायेगा!
वो बोले- कोई बात नहीं।

सारा दिन दूसरी साईट की तैयारी में निकल गया, दूसरे दिन सुबह मिस्त्री को लेकर सोरभी के घर गया। गुर्जर जी शायद दौरे पर चले गए थे, तो दरवाजा सोरभी ने खोला, उसने नारंगी रंग की साड़ी पहनी थी, बला की खूबसूरत लग रही थी।
मिस्त्री अपना काम करने लगा, मैं चेक कर रहा था कि कोई कमी तो नहीं रह गई है।

तभी सोरभी ने मुझे बैठक में बुलाया और अपनी गलती के किये क्षमा मांगी।
मैंने कहा- कौन सी गलती?

तो बोली- मैं तुम्हें समझ नहीं पाई थी, यह सोचकर कि कहीं तुम मुझे काम करने के बहाने रोज आकर गलत काम यानि सेक्स को मजबूर न करो या मुझे ब्लैकमेल न करो! ऐसे तो मैं बदनाम हो जाती। इसलिए मैं डर रही थी और तुम्हें रूपये देकर तुम्हारा मुँह बंद करना चाह रही थी, सॉरी! एक दिन यही बताने को मैंने तुम्हें फोन किया था, फिर सोचा कि तुम व्यस्त न हो, इसलिए कट कर दिया था, तुम बहुत अच्छे दोस्त हो, कभी फोन लगाऊँ तो मुझसे बात करोगे या नहीं?
मैंने कहा- सोरभी जी, उस रात को मैं एक सुन्दर सपने की तरह मानता हूँ, जो रात गई तो बात गई, मेरी तरफ से तुम निश्चिंत रहना।

तब तक मिस्त्री का काम हो गया था, मिस्त्री से मैंने कहा- तुम गाड़ी को गेट से बाहर निकालो, मैं मैडम को बाथरूम दिखाकर आता हूँ।
मिस्त्री चाभी लेकर बाहर चला गया, मैं सोरभी को लेकर बाथरूम मैं गया और पूछा- कैसा लगा?
बोली- कल्पना से भी ज्यादा सुन्दर!

हम दोनों दर्पण में दिख रहे थे, इच्छा हुई कि एक बार चूम लूँ पर मन को काबू में रखकर मैंने कहा- सोरभी जी, मैं चलता हूँ, अब आप बाथरूम इस्तेमाल कर सकतीं हैं और अपना हाथ बढ़ा दिया। सोरभी ने हाथ बढ़ाकर मुझसे हाथ मिलाया, मैं बाहर निकल गया। गेट से मुड़कर देखा तो सोरभी मुस्कुरा रही थी।

मैं और मिस्त्री निकल कर अपनी साईट पर पहुँच गए, मिस्त्री को वहाँ का सारा काम समझा कर अगले दिन से काम लगाने को कहा और अपने अपने घर चले गए।शाम के चार बजे थे, बीवी मायके से नहीं लौटी थी तो बियर फ्रिज से निकालकर पीने लगा।

साढ़े चार बजे फोन पर काल आई, देखा तो सोरभी का नंबर था, बोली- पॉल जी, आपसे काम है, समय हो तो तुरंत आ जाओ। मुझे कुछ नहीं सूझा, कहा- ठीक है! फोन कट गया, मैं समझ गया कि आज सोरभी ने फिर बाथरूम का दर्पण के सामने स्नान कर लिया होगा। गुर्जर जी हैं नहीं, सो मुझे बुलाया है।

साढ़े पाँच बजे मैं उसके घर पहुँचा तो उसने दरवाजा खोला। उसने लोअर और टॉप पहना था, बाल खुले थे, होंठों पर लिपस्टिक लगी थी, बदन से परफ़्यूम की खुशबू आ रही थी, आँखें लाल लग रही थी।
मैंने कहा- कहिये?
बोली- अन्दर तो आओ!
अन्दर जाकर मैं सोफे पर बैठ गया, वो मेरे पास बैठ गई।

मैंने पूछा- कैसे याद किया?
बोली- बस याद आ रही थी!
मैंने कहा- सोरभी जी, आपने तो मना किया था कि कभी भी इस प्रकार सोचने के लिए भी।
तो सोरभी बोली- तुम में यही तो खास बात है कि मुझे ही इस प्रकार सोचने पर मजबूर कर दिया।

मैं समझ गया कि मेरे हिसाब से यदि औरत को उसके हाल पर छोड़ दो तो जरुरत पर वह खुद बुला लेती है, जबरन चोदने की कोशिश करो तो बिचक जाती है।

अब मेरे लिए औपचारिकता की कोई जरूरत नहीं थी, मैंने सोरभी के हाथों को पकड़कर चूम लिया, पूछा- गुर्जर जी कब आयेंगे?
बोली- रात दस बजे तक!

मैंने उसे अपनी ओर खींच लिया, वह मेरे पहलू में पके फल की तरह आ गिरी। मैंने उसे चूमना शुरु किया, धीरे धीरे टॉप उतार दिया, ब्रा भी अलग कर दी, वह लता की तरह मुझसे लिपट गई। आज शायद शर्म नहीं लग रही थी उसे! मेरी शर्ट को खोलकर उसने अलग कर दी, मेरे सीने पर हाथ फिरा कर लिपट गई।

फिर मैं उसे बाँहों में उठाकर बेडरूम में ले गया उसके सारे कपड़े उतारकर उसके ऊपर छा गया। वो सिसकारने लगी। फिर उसने मेरी पैंट उतार दी, चड्डी हटा कर लंड को थामकर चूमने लगी।

मैं उसकी चूत को चूम रहा था, उसकी चूत से पानी रिस रहा था तो ज्यादा देर वह बर्दाश्त नहीं कर पाई, बोली- पॉल, अब मत तड़पाओ! जल्दी से अपना मेरे अन्दर डाल दो।

मैंने अपना लंड उसकी चूत पर रखा और एक धक्का लगाया तो लंड चूत के अन्दर चला गया। मैं उसके स्तन को मसलने और चूसने लगा, उसके मुँह से आह… सी… पॉल…करो… सी… आह… जैसी आवाजें निकल रही थी, साथ अपनी गाण्ड को उचकाकर लंड को अधिक से अधिक अन्दर लेने की कोशिश करने लगी।

मैंने भी धक्के मारने शुरु कर दिए। दस मिनट में उसका शरीर अकड़ने लगा, मैंने भी धक्के तेज कर दिए। वो मुझसे लिपट कर शांत पड़ गई, थोड़ी देर में मेरा भी छुट गया। थोड़ी देर ऐसे ही पड़े हम एकदूसरे को चुमते रहे, फिर हम नंगे ही बाथरूम में अपने आप को साफ करने गए। दोनों एकदूसरे को साफ कर रहे थे। दर्पण में हम दोनों नंगे एकदूसरे को देख कर फिर उत्तेजित हो गए, मेरा लंड फिर खड़ा हो गया।

हमने शावर चालू किया और नहाते हुए खड़े खड़े ही चूत में लंड डालकर सोरभी को गोद में ले लिया। उसने अपनी टांगों को मेरी कमर में लपेट लिया। कुछ देर बाद सोरभी को घोड़ी बनाकर चोदा, वो दर्पण में मुझे पीछे से चोदते हुए देख कर बहुत उत्तेजित हो रही थी।

जब वो चरम पर पहुँच गई तो जमीन पर चित्त लेट गई, अपने पैर मोड़ कर ऊपर कर लिए और बोली- जोर से करो पॉल! बहुत अच्छा लग रहा है।

दस मिनट में मेरा माल निकल गया। हम एक बार फिर नहाए और बेडरूम आकर अपने कपड़े पहने। तब तक रात के आठ बज चुके थे।

सोरभी ने खाना लगा दिया, हमने साथ खाना खाया।

सोरभी बोली- पॉल, मैं कभी याद करुँगी तो तुम इसी तरह मेरे पास आ सकते हो?
तो मैंने कहा- जरूर, लेकिन परिस्थिति के अनुसार! यानि यदि मैं आने की स्थिति में हूँ तो जरूर आऊँगा।

साढ़े आठ पर मैंने कहा- सोरभी, अब मुझे चलना चाहिए!
अनमने ढंग से बोली- ओके।
मैंने उसे चूमा और अपने घर चला आया।

मेरे हालचाल पूछने के लिए हफ्ते में एकाध फोन वो जरूर लगा लेती है। मैं चाहकर भी फोन नहीं लगाता कि मालूम नहीं कौन फोन उठा ले।
अगर सोरभी से फिर मिलना हुआ तो जरूर लिखूँगा।

बाथरूम का दर्पण की यह अंतिम कड़ी है।

अब अपनी कहानी पर आते हैं।

एक दिन मोबाईल पर हेमा का फोन आया, बोली- पॉल, तुमसे मिले कितने दिन गुजर गए, तुमने एक भी फोन नहीं किया?

मैंने कहा- मैं तुम्हारे फोन के इंतजार के सिवा कुछ नहीं कर सकता था, कारण तुम्हे पता है कि मैं इसलिए फोन नहीं लगाता कि पता नहीं फोन कौन उठा ले। फिर मैंने कहा भी था की जब तुम्हारा फोन आएगा तभी बात करूँगा अन्यथा तुम्हें तंग नहीं करूँगा। खैर छोड़ो, तुम्हारा फोन आया, विश्वास नहीं हो रहा है, तुमसे बात करके बहुत ख़ुशी हो रही है, आज तुम्हें हमारी याद कैसे आ गई?

बोली- पॉल तुमसे बात करने की इच्छा हमेशा होती रहती है पर मन को मारकर रखना पड़ता है, आज कंट्रोल नहीं हुआ तो फोन लगाना पड़ा। कारण मेरे पति 15 दिन पहले कम्पनी की तरफ से एक माह की ट्रेनिंग पर पूना गए हुए हैं, 15 दिन और बाकी हैं, उन्हें बीच में आने के लिए छुट्टी नहीं मिल रही है, मुझे बहुत बुरा लग रहा है, शरीर की आग मुझे जलाये दे रही है, तब मुझे तुम्हारे अलावा कोई दूसरा रास्ता समझ में नहीं आया। क्या तुम हमारे यहाँ आकर इस जलती आग को ठंडा नहीं करोगे?

मैंने फ़ौरन हाँ करने का सोचा परन्तु रुक गया, सोचा कि एकदम नहीं, थोड़ा परेशान करो, मैंने कहा- अभी तो नहीं आ सकता, कुछ जरूरी काम हैं।

बोली- पॉल, क्या तुम मेरे लिए थोड़ा सा समय नहीं निकाल सकते प्लीज…?
मेरा तो अब तक खड़ा भी हो गया था, मैंने कहा- देखूँगा, थोड़ी देर से फोन लगाकर बताता हूँ।
बोली- पॉल, मैं इंतजार कर रही हूँ, जल्दी फोन करना प्लीज…
फिर फोन कट गया।

मैंने सोचा, इन्सान और जानवर में कोई ज्यादा फर्क नहीं है, जानवरों में मादा एक निश्चित समय पर गर्मी पर होती है लेकिन नर उसे देख कर कभी भी गर्म हो जाता है और लार टपकाने लगता है फिर मैथुन के लिए पीछे लग जाता है।

मेरा मन भी बहक चुका था, अपने आप पर काबू नहीं कर प़ा रहा था और ऐसा मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता था, फिर हेमा जैसी सुंदरी के साथ यह मौका कभी मिले या न मिले सोचकर फोन लगा ही दिया।

हेमा ने फोन उठाकर सीधा सवाल किया- कब आ रहे हो?
मतलब वो मेरा जबाब जानती थी, मैंने कहा- कब आना है?
बोली- शाम को आना और रात यहीं रुकना है।
मैंने कहा- आज तो नहीं आ पाऊँगा, क़ल आ रहा हूँ!
बोली- एक दिन और इंतजार कराओगे?

मैंने कहा- जरूरी काम है, क़ल पक्का आ रहा हूँ शाम की गाड़ी से!
बोली- मैं लेने आ जाऊँगी!
मैंने कहा- नहीं मैं आ जाऊँगा, घर मेरा देखा हुआ है, तुम परेशान मत होना।

दूसरे दिन शाम को हेमा के घर पहुँचने के दस मिनट पहले फोन से बता दिया कि मैं पहुँचने वाला हूँ!
तो बोली- हाँ आ जाओ!

जब उसके घर की गली में कदम रखा तो दिल की धड़कनें तेज हो गई और जब उसको गेट पर खड़े देखा तो दिल का दौरा आते आते बचा, कारण उसकी सुन्दरता थी।

आज उसने जामुनी रंग की साड़ी पहनी थी जिस पर जरी वर्क था, वैसी ही बिंदी और लाल लिपस्टिक! उसका वर्णन मैं शब्दों में नहीं कर पा रहा हूँ, एकदम पतिव्रता लग रही थी।बोली- हल्लो पॉल!

और गेट खोल दिया। मैं अन्दर आया तो गेट बंद कर दिया और मकान का दरवाजा खोल दिया। मैं घर के अन्दर आ गया, वो भी अन्दर आ गई और दरवाजे की सिटकनी लगा कर मुझसे ऐसी लिपटी जैसे वर्षों के बिछड़े प्रेमी मिले हों।

मैंने भी उसे भींच लिया, उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए नितम्बों तक हाथ चलने लगा। वो चुम्बन पर चुम्बन किये जा रही थी, छोड़ ही नहीं रही थी।
मैंने कहा- हेमा, पानी नहीं पिलाओगी?

तब उसने मुझे छोड़ा, उसका चेहरा देखा तो लगा कुछ पलों ही में उसकी आँखें नशीली हो गई थी, खुमारी जैसी छा गई थी।

वो अदा से देखते हुए पानी लेने चली गई, साड़ी में उसके नितम्बों की मटकन अलग ही मजा दे रही थी।

मैंने बाथरूम जाकर मुँह-हाथ धोए, फिर बैठक में आकर बैठ गया। वो पानी लेकर आई और मुझसे सटकर बैठ गई, बोली- पॉल कुछ खाने को लेकर आते हैं!

मैंने कहा- जानू, पहले तुम्हें खायेंगे, खाना के लिए तो रात बाकी है।

सोफ़े पर बैठे बैठे ही मुझसे लिपटने लगी। सारा काम बड़ा ही आसान था, साड़ी में से होकर एक हाथ उसकी पेंटी के अन्दर तक पहुँच गया, दूसरा हाथ ब्लाउज़ के अन्दर की गोलाइयों को नाप रहा था, होंठों से होंठ और जीभ से जीभ का मिलन चल रहा था।

हेमा ने मेरी पैंट की जिप खोलकर लंड को बाहर निकाल लिया और बड़े प्यार से सहलाने-चूमने लगी। मैं तो जैसे जन्नत की सैर कर रहा था बस, हर पल आनन्द बढ़ता ही जा रहा था, हम दोनों अपने होशोहवास खो चुके थे।

एक घंटा कब निकल गया, पता ही नहीं चला, होश तब आया जब हेमा के नाख़ून हमारी पीठ और गर्दन पर जोरों से चुभ रहे थे।

हमें यह समझ नहीं आया कि हम दोनों के कपड़े कब उतर गए। दोनों जन्मजात नंगे चुदाई में रत कमरे में बिछे हुए कालीन पर थे। शांत कमरे में सिर्फ दोनों की आहों, सीत्कारों के स्वर उभर रहे थे।

हेमा की आँखें बंद थी, मैं समझ गया कि हेमा चरम को प्राप्त कर झर गई है। एक दो मिनट में मैं भी झरने वाला था, हेमा से कहा- हेमा, निरोध नहीं लगाया, मैं भी झरने वाला हूँ, क्या करूँ?

बोली- अन्दर ही झरना प्लीज!
मैं बोला- तुम्हारा महीना कब आया था?
बोली- बीस दिन पहले!

मुझे राहत मिल गई यह सोचकर कि गर्भ ठहरने का कोई खतरा नहीं है। फिर मैंने हेमा के घुटने मोड़कर टांगों को ऊपर किया और जोरों से पूरा का पूरा लंड उसकी चूत में डालने लगा। हेमा नीचे से चूतड़ों को उठा उठा कर सहयोग करने लगी, उसे भी मजा आ रहा था। पच्चीस तीस धक्कों के बाद मैं झरने लगा, पिचकारी की पहली धार निकलने पर ऐसा महसूस हुआ जैसे जिन्दगी बस यहीं पर थम जाये, फिर हर धार के आनन्द को हेमा ने भी ऐसे लूटा कि वो तो भाव- विभोर ही हो गई थी। मैं लंड को अन्दर को दबाकर निढाल सा उसके ऊपर पसर गया, वो मुझे और मैं उसको चूमता रहा। फिर हम दोनों उठकर बाथरूम में गए और साथ में नहाए। इच्छा तो नहाते वक्त भी हुई लेकिन सोचा कि जल्दी क्या है रात तो बाकी है।

कपड़े पहनकर मैं बैठक में टीवी चालू करके समाचार देखने लगा, हेमा ने सुन्दर काली ब्रा पेंटी पहन कर मेक्सी पहन ली, बोली- खाना क्या खाओगे?

मैंने कहा- परांठे और चावल जीराफ्राई।

किचन में जाकर उसने पहले पापड़ तले फिर फ्रिज से पानी और वोदका की आधी भरी बाटल लेकर आई, बोली- पॉल, पहले थोड़ा ठंडा हो जाये!

उसने दोनों के लिए पेग बना दिए, मैंने पूछा- पहले से मंगा रखी थी क्या?

तो बोली- मेरे पति की है, कभी कभी उनके साथ एक आध पेग ले लेती हूँ।

मैं बोला- आकर पूछेंगे तो…?

हेमा- बोल दूँगी, नींद नहीं आती थी तो मैंने पी ली, तुम चिंता नहीं करो।

अपना पेग ख़त्म करके वो रसोई में चली गई। मैंने दूसरा पेग बनाया टीवी देखते हुए पीने लगा। तब तक हल्का सुरूर आने लगा था।

आधे घंटे में रसोई से हेमा आई, बोली- खाना तैयार है!

फिर से पेग बनाने लगी, मैंने अपना मना कर दिया- यदि तुम चाहो तो ले लो!

बोली- एक और!
मैंने कहा- मैं यहाँ गम गलत करने नहीं खुशियाँ बाँटने आया हूँ।

वो बोतल उठाकर रख आई और खाना लगा दिया। हमने साथ खाना खाया फिर हेमा बोली- बेडरूम में चलो, मैं भी वहीं आती हूँ।

थोड़ी देर में हेमा अपने कामों से फारिग होकर बेडरूम में आ गई, हम बिस्तर पर लेट कर एक-दूसरे को सहलाते हुए बातें करने लगे।

मैं बोला- तुम्हारी सोरभी से कब से बात नहीं हुई? उसे कुछ बताया तो नहीं?
हेमा बोली- काफी दिनों से बात नहीं हुई, मैं उसे क्यों कुछ बताऊँगी।
फिर बोली- सोरभी को फोन लगाती हूँ, तुम आवाज मत करना।

उस समय रात के नौ बज चुके थे। हेमा ने फोन लगाकर स्पीकर चालू कर दिया।

दूसरी ओर से आने वाली आवाज शायद सोरभी के पति की थी, बोले- हेल्लो कौन…?

‘नमस्ते भाईसाब, मैं हेमा… सोरभी की सहेली… सोरभी से बात करनी है!’
वो बोले- सोरभी किचन में है, अभी फोन देता हूँ और तुम कैसी हो?
हेमा- एकदम ठीक हूँ…

दूसरी ओर बर्तनों की आवाज आ रही थी…

‘सोरभी! हेमा का फोन है, लो बात करो…’

‘हाय हेमा! कैसी है तू?’

हेमा- एकदम ठीक! तुम कैसी हो?
सोरभी- एकदम मजे में कट रही है, बहुत दिनों बाद तूने फोन लगाया…?
हेमा- तुम भी तो मुझे भूल गई हो!
सोरभी- ऐसी बात नहीं है, काम में कब दिन गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता, और तुम्हारे वो कैसे हैं..?
हेमा- एक माह की ट्रेनिंग पर पुणे गए हैं, अकेली हूँ!
सोरभी- तभी मेरी याद आ गई?

हेमा- और सुना, पॉल से कभी बात हुई दुबारा?
सोरभी- नहीं यार, मैं अपने पति से ही बहुत खुश हूँ। पॉल हवा के झोंके की तरह था, आया, चला गया! मैं पति के साथ खुश हूँ और शायद मैं अब उसे फोन ही नहीं लगाना चाहती पर तू यह सब क्यों पूछ रही है?
हेमा- बस ऐसे ही! तुम्हारी सहेली जो हूँ…

सोरभी- कहीं तू भी पॉल के चक्कर में तो…?
हेमा- नहीं यार…
सोरभी- पड़ना भी नहीं वर्ना अपने आपको संभालना मुश्किल हो जाता है।

बात बदलते हुए हेमा- और बच्चे कैसे हैं?
सोरभी- बिल्कुल ठीक हैं।
हेमा- फोन बंद करती हूँ, शायद उनका फोन आ रहा है, गुड नाईट।
सोरभी- ओके..

हेमा ने फोन काट दिया, सोरभी की बात सुनकर हेमा कुछ नर्वस सी हो गई थी जैसे मुझे बुलाकर पछता रही हो।

मैंने कहा- क्या हुआ?
बोली- कुछ भी तो नहीं।

मैं उसे गर्म करने में लग गया। वो भी मुझे सहलाने-चूमने लगी। एक बार फिर नग्न होकर हम दोनों वासना के समुन्दर में गोते लगाने लगे, एक-दूसरे के शरीर के हर अंग को हम दोनों आपस में चूम-चाट रहे थे, हर अंग से खेल रहे थे, लग रहा था जैसे दुनिया में हम बस यही काम करने के लिए आये हैं।

कितना असीम सुख मिल रहा था, बयाँ करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

दोनों ही एक साथ स्खलित हुए, सांसों का तूफान थम नहीं पाया था कि हेमा का फोन बज उठा। फोन उठाकर हेमा ने जैसे ही देखा तो हाथ से फोन ही छुट गया। घबरा गई, बोली- उनका फोन है, अब क्या करूँ?

जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।

मैंने कहा- इतना घबराने की जरूरत नहीं है, फोन किया है उन्होंने, तुम्हें कोई मेरे साथ देख नहीं लिया।

तब तक फोन बंद हो गया।

मैंने उसे समझाया कहा- अभी फिर से आएगा!

वो थोड़ी संतुलित हुई, तभी घंटी बजी, उसने फोन उठाया, दूसरी तरफ से आवाज आई- जानू, फोन उठाने में इतनी देर क्यूँ?

हेमा- जान, नींद लग गई थी, थोड़ी सी जो पी ली है, आज तुम्हारी बहुत याद सता रही थी इसलिए दो पेग लगा लिए, तुम्हारी बोतल में से!पति- जानू, पीकर मुझे न भुला देना, मैं भी तुम्हारी याद में सो नहीं पाता हूँ। खैर जल्दी ही आकर तुम्हें घुमाने के लिए कहीं बाहर ले चलूँगा। अपना ख्याल रखना। सुबह फिर फोन करूँगा, सो जाओ!

और फोन कट गया…

हेमा की कंपकंपाहट अभी भी जारी थी। मैंने उसे गले से लगा लिया और लिपट कर सो गया। रात को एक बार फिर सेक्स किया, फिर दोनों नीद में चले गए।

आठ बजे नींद खुली, हेमा नहाकर नाश्ता बना रही थी। मैंने उठकर मुँह-हाथ धोए, चाय पीकर फ्रेश होने चला गया। फिर नाश्ता किया।

मैंने कहा- हेमा, अब मैं निकलूँगा पर जाने से पहले एक बार फिर..!

‘नहीं!’ हेमा का स्वर बदला सा था, बोली- पॉल, रात में सोरभी और अपने पति से बात करने के बाद मुझे लगा कि कहीं मैं गलत तो जरुर हूँ। इसलिए रात के साथ बात को भी भुलाने में हमारी भलाई है, हम अच्छे दोस्त बनकर जरूर रह सकते हैं।

मैंने कहा- जरूर! तुम से मुझे जो भी मिला यह तो मेरी खुशकिस्मती है।
फिर वहाँ से चला आया।

शायद हेमा ने सही फैसला किया है।

दोस्तो, इस कहानी के बारे में अपनी राय जरूर दें!