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गांड की गोलाइयों को देखकर मन विचलित हुआ

लेखक पॉल,

मैं तीस साल का युवक हूँ कद 5’6″ एवं स्मार्ट हूँ, सागर विश्वविद्यालय से स्नातक किया है, इंजीनियर बनाने की चाहत थी पर बन नहीं पाया परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी थी पर भवन निर्माण के काम करने की चाहत थी सो वह काम करने लगा।
ठेकेदारी से नवनिर्माण एवं पुराने मकानों में सुधार एवं सजावट का काम करके भी आजीविका ठीक से चल जाती है, उन्हें वास्तु के हिसाब से सुधार करना एवं नया रूप देना हमारे शौक एवं कमाई दोनों को पूरा करता है।

इस काम के लिए मैंने ऑफिस नहीं बनाया बल्कि मोबाइल से ही मुझे इतने ऑर्डर मिलते रहते हैं कि काम करने का समय तय करना मुश्किल हो जाता है। जब समय मिलता है तो आर एस एस पे कहानियाँ पढ़ता हूँ एवं सेक्सी साईट पर सर्फिंग अच्छा लगता है।

अब मतलब की बात पर आते हैं! मेरे साथ हुई एक खूबसूरत घटना जो एकदम सत्य है, आपको लिख रहा हूँ।

तो हुआ यूँ 21 मार्च 2011 को दोपहर में मेरे मोबाईल पर फोन आया जो मिस्टर रोमिल गुर्जर (बदला हुआ नाम) ब्रांच मैंनेजर का था जो पास की तहसील के एक बैंक में कार्यरत हैं, उन्होंने पूछा- मैं अपने पुराने बाथरूम को नए तरीके से बनाना चाहता हूँ, क्या तुम इसे बना सकते हो? इसका क्या खर्चा होगा?

क्यूंकि मेरा अन्य जगह पर काम चल रहा था तो मैंने कह दिया कि शाम सात बजे तक आ जाऊँगा।
उन्होंने कहा- ठीक है।

काम में व्यस्तता के कारण समय का पता ही नहीं चला और रात के आठ बज गए। गुर्जर जी का फोन आया तो मैंने उन्हें सॉरी कहकर अगले दिन आने को कह दिया।
तो उन्होंने कहा- सुबह दस बजे तक जरूर आ जाना!
और फोन कट गया। अगली सुबह नौ बजे बाइक से मैं निकल पड़ा लेकिन पाँच किलोमीटर ही चला था कि टायर पंचर हो गया। साढ़े दस तक पंचर बनवाकर 11 बजे गुर्जर साहब के घर पहुँचा।

पुराना लेकिन शानदार मकान बना था। गेट के बाहर बाइक को छोड़कर अन्दर गया, बगीचे में सुन्दर पौधे और फूल लगे थे।

मुख्य दरवाजे पर पहुँच कर घण्टी बजाई तो थोड़ी देर में एक महिला ने दरवाजा खोला जो इतनी खूबसूरत थी कि मैं उसे देखता रह गया।

उसने पूछा- क्या काम है?
मैंने कहा- गुर्जर साहब से मिलना है बाथरूम की रिपेयरिंग के लिए!

तो वह बोली- मैं मिसेज़ सोरभी गुर्जर (बदला हुआ नाम) हूँ, साहब बैंक चले गए है आप अन्दर आकर बाथरूम देख लीजिये। उसके बाद बैंक जाकर साहब से मिल लेना।

वो मुझे अन्दर ले गई और बैठक में बिठाकर रसूई की ओर चली गई। सोरभी गुर्जर ने उस समय आसमानी रंग की झालरदार और सुन्दर मेक्सी पहनी थी, जिसका गला बहुत ही गहरा था, अन्दर की गोलाइयों के बीच की घाटी साफ दिखाई दे रही थी, उनकी उम्र 32 के आसपास होगी फिगर 34-30-36 होगा, पीछे से उसकी चाल और उसकी गाण्ड की गोलाइयों को देखकर मन विचलित होने लगा। मन पर काबू करके मैंने मकान का जायजा लिया, अन्दर से भी बहुत शानदार कोठी थी, सारा सामान करीने से सजा हुआ था।

तभी वो ट्रे में पानी का गिलास और जूस लाई और मेज़ पर रख दिया। रखते समय मम्मों की झलक देख कर मेरे लिंग में तनाव पैदा होने लगा।

मैं जूस पीने लगा तो उसने बताया कि साहब को दो दिन के दौरे पर जाना है आप बाथरूम में लगने वाले सामान की लिस्ट बनाकर साहब को उनके जाने के पहले बैंक में दे देना।

फिर मैं उनके साथ बाथरूम देखने के लिए चलने लगा। सामने गैलरी में दो दरवाजे दिखे, एक साहब के बेडरूम में खुलता है और दूसरा बाथरूम में! बाथरूम का दरवाजा खोला तो उसमें से तेज गंध आई जैसे वहाँ पर हवा का आना-जाना न हो।

अन्दर जाकर देखा तो 8 बाई 10 का कमरा था। मेरे हिसाब से इतनी जगह बाथरूम के लिए पर्याप्त होती है। इसमें एक दीवार की ओर टोयलेट सीट लगी थी उसके सामने की दीवार पर 1 बाई 1 फ़ुट का छोटा रोशनदान लगा था, बीच की एक दीवार पर नल और सामने की दूसरी दीवार पर पुराना सा शॉवर लगा था। कुल मिला कर पुराने समय का बाथरूम था।

मैंने पूछा- मैडम, आप को कैसा बाथरूम बनवाना है?

बोली- मुझे यहाँ पर मार्डन टाइप बाथटब जिसमे हैंड-शॉवर, ठंडा-गर्म पानी के नल हों, एक दीवार पर सुन्दर सा शॉवर जो बाथरूम के मध्य में हो, वाशबेसिन, सुन्दर से नल, 5 फीट ऊँचाई तक सुन्दर टाइल्स, जमीन पर मारबल और अच्छा सा दरवाजा!

तब मैंने कहा- मैडम, अगर आप बुरा न मानें तो मैं एक सुझाव देना चाहता हूँ।

तो वो बोली- हाँ जरूर! इसीलिए तो आपको बुलाया है!

तब मैंने कहा- मैडम बाकी सब तो आपने सही चुना है, मैं चाहता हूँ कि आपके बाथरूम में रोशनदान बड़ा हो हवा और रोशनी के लिए, क्यूंकि रोशनदान के नीचे की दीवार खाली है। मैं चाहता हूँ कि यहाँ पर आदमकद दर्पण लगना चाहिए क्यूंकि नहाते वक्त अपने आप को दर्पण में देखना बड़ा ही सुखद और आनंददायक लगता है!

यह सुनते ही उसके होंठों पर हल्की मुस्कान, गालों पर लाली छा गई और शायद शर्म के कारण चेहरा घुमाकर दूसरी ओर देखने लगी।

मैंने सोचा कि बाथरूम में जाकर दर्पण का मुआयना करूँ और निकलूँ!
बाथरूम में गया तो रोशनदान के नीचे दर्पण दीवार के सहारे रखा था, उसके ऊपर पानी व साबुन की बूंदें थी, कुछ सादे पानी की बूंदें थी, पूरा बाथरूम साबुन की महक से महक रहा था।

मैंने बाथरूम का जायजा लिया तो एक तरफ सूखे ब्रा पेंटी पड़े हुए थे जिन पर पानी के छींटे दिखाई दे रहे थे, टोयलेट सीट के पास शेविंग का सामान रखा था, खूंटी पर सुबह वाली मेक्सी टंगी थी।

अब कुछ कुछ बातें मेरी समझ में आ रही थी। सोरभी का लजाना, शर्माना यानि वो कल्पना में खो गई थी कि दर्पण के सामने नहाने में कैसी लगूंगी और दर्पण के आने के बाद वह इतना उत्तेजित हुई होगी कि अपने आप को नहाने से रोक नहीं पाई होगी।

दर्पण इतना बड़ा था कि उसमें सामने की पूरी दीवार भी दिखाई दे रही होगी। उसके बाद सोरभी ने अपने आप को शांत करने के लिए उसने ऊँगली से या जैसे भी हस्तमैथुन भी किया होगा। अब मेरे दिमाग ने सोचा कि शायद ऐसा न हो और यह कोरी हमारी कल्पना हो!

और यदि यह सच हुआ तो निश्चित है की सोरभी की प्यास मुठ से नहीं बुझी होगी और बहुत कुछ हो सकता है।

अब पता यह लगाना है कि इन दो बातों में से सच क्या है।

तभी सोरभी वहाँ आ गई लेकिन जैसे ही उसकी नजर ब्रा पेंटी और शेविंग किट पर पड़ी, वो एकदम से हड़बड़ा गई, ऐसे खड़ी हो गई कि मुझे वह सब न दिख सके, कहा- चलो, बाहर बैठते हैं।

मैं बाहर आ गया, कुछ देर में सोरभी भी आ गई, अबकी बार फिर उसके गालों पर लाली और शर्म दिख रही थी, आकर मेरे सामने बैठ गई पर नजरें नहीं मिला रही थी।

मैंने लोहा गर्म देखकर सोचा कि वार कर दो, जो होगा देखा जायेगा, बात नहीं बनी तो माफी मांगकर मना लूँगा।

अब मुझे हर कदम फूंक-फूंक कर रखना था, बात की शुरुआत मैंने की, पूछा- कैसा लगा दर्पण आपको?
नाख़ून कुरेदते हुए बोली- अच्छा!

मैंने कहा- और दर्पण में देखते हुए नहाना कैसा लगा?
कुछ गुस्से में बोली- यह आप क्यों पूछ रहे हैं

मैंने कहा- देखिये, आप बुरा न मानें, लगता है आप दर्पण का पूरा मजा लेकर नहाई तो हैं ही, जैसा मैंने बाथरूम में देखा, इसलिए पूछ लिया। वैसे मैडम पूरा बाथरूम बनकर तैयार होने दीजिए, तब आप बाथरूम का असली आनन्द ले पाएँगी।

सोरभी ने बात को बदलते हुए पूछा- आपके घर में कौन कौन है?
मैंने कहा- मैं और मेरी बीवी जो अभी मायके गई हुई है। हमारा बाकी परिवार गाँव में रहता है।

उस समय शाम के सात बज गए थे, मैंने धुंए में वार किया- घर जाकर खाना बनाना पड़ेगा, इसलिए चलता हूँ मैडम.. सुबह मिस्त्री और बेलदार को लेकर दस बजे तक आ जाऊँगा।

तो सोरभी ने कहा- खाना यहीं खा लो! साहब तो आएँगे नहीं, उनके हिस्से का रखा है!

मैं यही चाह रहा था पर दिखावा किया- साहब के हिस्से का…?

बात अधूरी छोड़ दी…

सोरभी बोली- जब वो नहीं है और उनके हिस्से का तुम खा लोगे तो इससे किसी को क्या फर्क पड़ेगा!
कहते हुए अचानक झेंप गई यह सोचकर कि मैंने यह क्या कह दिया।

मैंने कहा- जैसा आप कहें!

अब मैं समझ गया था कि सोरभी मुझे रोक रही है, वो भी रात को जबकि वह अकेली है। अब शुरुआत मुझे ही करनी होगी अपनी बातों का जाल फेंककर।

फिर मैंने यहाँ-वहाँ की बातें करके उसे खोलने की कोशिश की, कुछ चुटकले भी सुनाये तो वह खुलकर हंसने भी लगी।

फ़िर कुछ वयस्क चुटकले, फिर कुछ अश्लील भी सुनाए। रात के साढ़े आठ हो चुके थे, मैंने कहा- मैडम, इतनी रात को कोई आ गया तो क्या सोचेगा?

मैडम ने कहा- यहाँ कोई नहीं आता, हमारे सारे रिश्तेदार दूरदराज में हैं, तुम ही हो जो हमारे दोस्त बन गए हो, नहीं तो यहाँ साहब के मिलने वाले भी नहीं आते।

अब मैं निश्चिंत हो गया और अगला जाल फेंका, मैंने कहा- मैडम, एक बात पूछूँ अगर आप नाराज न हो तो?
हंसकर बोली- पूछो!
मैंने कहा- आपने बाथरूम में नहाते वक्त क्या महसूस किया?

बोली- पॉल, तुम फिर वही बात करने लगे?
मैंने कहा- मैडम, अगर हमें दोस्त माना है तो प्लीज़ बताओ न!
बोली- इससे क्या होगा?
मैंने कहा- मैं अपने अनुभव को बढ़ाना चाहता हूँ बस।
सोरभी बोली- बाथरूम में गई, नहाई और बाहर आ गई बस।

मैंने कहा- मत बताएं, पर मैं सब जानता हूँ…
बोली- क्या जानते हो?
मैंने कहा- बात कुछ प्राइवेट है, जोर से बोल नहीं सकता, दीवार के भी कान होते हैं, सच सुनना चाहो तो मैं आपके पास आकर बताऊँ?

तो बोली- ठीक है, पर शैतानी नहीं करना। समझे?
मैंने कहा- ठीक है!

सोरभी के बगल में सोफ़े पर बैठ गया, मैंने कहा- दिल थामकर सुनना और बीच में रोकना नहीं, यदि मेरी बात गलत लगे तब बोलना!
बोली- ठीक है!

अब मैंने कहा- मैडम, सुबह जब मैंने आपसे दर्पण के बारे में कहा था तो आप शर्मा गई थी और मन में इस तरह से नहाने का ख्याल आया था, सच है?
तो बोली- हाँ!

मैंने कहा- शाम को जब सामान के साथ दर्पण आया तो आपने फोन किया था मैंने कह दिया कि आधा घंटे में आऊँगा, आपने सारा सामान बैठक में रखवा दिया लेकिन दर्पण को बाथरूम रखवा दिया क्यूंकि आप जल्द से जल्द अपनी कल्पना को साकार करना चाहती थी! सही है?
बोली- सही है।

‘उसके बाद आपने बाथरूम में जाकर अपने आप को निहारा और इच्छा हुई कि अभी नहा लिया जाये! आपने अपने कपड़े उतार कर खूंटी पर टांग दिए फिर ब्रा-पेंटी में अपने आपको निहारने लगी!’

यह सुनकर सोरभी खड़ी होकर जाने लगी, मैं भी यही चाहता था, मैंने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया और बोला- पहले बोलो हाँ या ना?
बोली- हाँ!

हाथ तो मैं पकड़ ही चुका था, खींच कर बिठाने लगा तो मुँह फेरकर बैठ गई।

मैंने आगे कहा- उसके बाद आपने ब्रा-पेंटी उतारकर रख दिए और दर्पण में अपने नंगे जिस्म को हर दिशा से देखा। तुम्हारी आँखों में एक नशा सा छा रहा था, तुम उत्तेजित हो गई थी, एक हाथ तुम्हारी दोनों टांगों के बीच कुछ सहला रहा था, दूसरा सीने को सहला रहा था?

इतना सुनकर वो फिर खड़ी होकर जाने का प्रयास करने लगी, हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो मैंने फिर खींच लिया। अबकी बार वो मेरे सीने से आकर टकराई तो मैंने उसे कमर से भी पकड़ लिया, मैंने कहा- बोलो सच है?
बोली- हाँ!

‘फिर तुम्हें आईने में अपने सुन्दर जिस्म पर बढ़े हुए बाल दिखे जो तुम्हारी सुन्दरता में रुकावट बन रहे थे तो तुम शेविंग किट उठाकर ले आई और नीचे के एवं बगलों के बाल साफ किये। तब तुम्हारी उत्तेजना चरम पर पहुँच गई थी तो तुमने शावर चालू किया और ठण्डे पानी के नीचे खड़ी हो गई और नहाने लगी। बोलो, सच है?’
तो बोली- प्लीज़ छोड़ दो मुझे!

मैंने कहा- पहले जबाब दो तो आगे की बात भी बताएँ!
अब वह अचंभित थी!
मैंने कहा- बोलो?
उसने कहा- हाँ!

अब मेरे हाथ उसके बदन को धीरे से दबाने लगे थे क्यूंकि वह तो कहानी का चरमोत्कर्ष सुनने को बेताब थी।
‘फिर मैडम, नहाने से भी जब आपको ठंडक नहीं मिली तो आपने मजबूरी में वह रास्ता अपनाया…!’
इस बात को मैंने अधूरा छोड़ दिया।
वो समझ गई होगी कि मेरा मतलब मुठ से है..

‘फिर आप साबुन लगाकर नहाई, नहाकर जैसे ही चुकी, आपके घर की घण्टी बजी, आपने जल्दी से कपड़े पहने और दरवाजा खोला तो सामने मैं खड़ा था!’
इस समय मेरे होंठ उसके गालों पर रेंग रहे थे और हाथ वक्ष पर!
मैंने पूछा- यह सच है या नहीं?
अबकी बार उसने पूरी ताकत लगाकर अपने को छुड़ा लिया और…मेरे होंठ उसके गाल पर थे और हाथ चुची पर!
मैंने पूछा- सच है या नहीं?
अब उसने पूरी ताकत से खुद को छुड़ा लिया और… दौड़ कर बेडरूम में चली गई।

मैंने सोचा कि हाथ छोड़कर मैंने गलती की है, सोचा, अब क्या करूँ? फिर दिमाग ने कहा- सब कुछ यहाँ पर थोड़े हो सकता है! बेडरूम में जाओ, बाकी का काम तो वहीं पर होगा!

अभी रात के 9:30 बजे थे, मैं तुरंत ही सोरभी के बेडरूम में पहुँचा, बड़ा सुन्दर कमरा था, डबलबेड, ड्रेसिंग टेबल, नक्काशी वाली अलमारी, एक मेज पर कंप्यूटर रखा था, कोने में एक सुन्दर सा छत्र वाला लेम्प रखा था। कमरा में ए.सी. भी लगा हुआ था।

सोरभी बिस्तर पर बेसुध सी पड़ी हुई थी, सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी, स्तन बड़े बड़े गोलों के रूप में कपड़ों से बाहर निकलने को बेताब थे, एक हाथ को कोहनी से मोड़कर कलाई से आँखों को ढक रखा था, मेक्सी घुटनों से ऊपर को सरक गई थी जिससे गोरी, मांसल एवं चिकनी जांघें क़यामत ही ढा रही थी।

एक पल ऐसा लगा कि मेक्सी को ऊपर उठाकर चूत को चोद डालूँ पर जल्दबाजी में बात बिगड़ सकती थी, मैंने कहा- मैडम, क्या हुआ? आप इस तरह क्यूँ भाग आई?

और उनसे सटकर बैठ गया, उसके हाथ को पकड़कर हटाया, तब भी उसने आँखें नहीं खोली। मैंने लगे हाथ गालों पर चुम्बन कर दिया। उसका सारा बदन ऐसे कांप रहा था जैसे ठण्ड के दिन हों!

कहने लगी- प्लीज़, मुझे मत बहकाओ! मैंने आज तक अपने पति से बेवफाई नहीं की, न ही करना चाहती हूँ! मैं ऐसी औरत नहीं हूँ जैसी तुम समझ रहे हो!

मैंने सोचा- यह डायलोग तो हर उस औरत ने पहली बार जरूर बोला है जिसे मैंने पहले चोदा है। लगता है सारी औरतें एक जैसी होती हैं, मैंने कहा- मैडम, आपका रूप है ही ऐसा सुन्दर, यह गोरा रंग, सुन्दर चेहरा, कटीले नयन, सुतवां नाक, सुर्ख होंठ, सुराहीदार गर्दन, पहाड़ के शिखर जैसे तुम्हारे वक्ष, पतली कमर, उभरे गोल नितम्ब, मक्खन जैसी चिकनी गोरी मांसल टांगें! इन्हें देखकर इन्सान तो क्या देवता भी भटक जाये!

तो सोरभी ने कहा- पॉल, मैं कोई भी गलत काम नहीं करना चाहती। प्लीज़, छोड़ दो मुझे!

मैंने कहा- सोरभी जी, मैं आपकी मर्जी के बगैर कोई भी काम नहीं करूँगा, मुझे सिर्फ आपके इस भरपूर यौवन, सुन्दर जिस्म और लाजबाब हुस्न को बेपर्दा देखने की इजाजत दो जिसे मैं सिर्फ देखना और सहलाना चाहता हूँ, चूमना चाहता हूँ क्यूंकि आप जैसी सुन्दर हसीना मैंने आज तक इतने करीब से नहीं देखी।

तो उसने इतना ही कहा- मुझे डर लग रहा है!

मैं उससे सटकर लेट गया और उसके गले और कान के पास चूमने लगा। सोरभी ने सिसकारी लेना शुरू कर दिया था।

अब मेरा एक हाथ उसके कपड़ों के अन्दर वक्ष पर घूम रहा था, दूसरा हाथ पीठ के नीचे था जो उसकी मेक्सी की बेल्ट खोल रहा था। सोरभी कसमसा रही थी, मैं समझ गया था कि

अब दिल्ली दूर नहीं है!

बेल्ट खोलकर मैंने उसकी मेक्सी को उतारना चाहा तो उसने मेरे हाथ पकड़ लिए। मेक्सी ऊपर गले तक आ गई थी, संतरे जैसे चूचे ब्रा में से दिख रहे थे। मैंने अपना मुँह उन पर रखा और होंठों से दबाने लगा तो सोरभी ने अपने आप को शिथिल छोड़ दिया।

मैंने मौका देखकर मेक्सी सर से बाहर निकाल दी। सोरभी ब्रा-पेंटी में क़यामत सी हसीना लग रही थी। मेरा लंड तो बहुत देर से पैंट में बैचैन हो रहा था। मुझे अपने कपड़े भी उतारने थे, मैंने कहा- सोरभी जी, बहुत गर्मी लग रही है, ए.सी. ऑन कर लूँ क्या?
वो बोली- कर लो!

मैं बिस्तर से उतरकर अपनी शर्ट और जींस को जल्दी से उतार और ए.सी. चालू करके बिस्तर पर आ गया। सोरभी घुटने मोड़कर अपनी पेंटी और हाथों से ब्रा को ढके हुए थी।

अब मैं सीधा उसके ऊपर आ गया, होंठ से होंठ, सीने से सीना, लंड से चूत, टांगों से टाँगें दबा ली थी। धीरे से पीठ को सहलाते हुए ब्रा के हुक को खोल दिया और ब्रा को हटा दिया। अब अनावृत तने हुए स्तन मेरी आँखों के सामने थे, नीचे मेरा लंड 90 अंश का कोण बना रहा था जिससे चूत की दरार पर दबाव पड़ने से सोरभी के पैर थोड़े से फ़ैल गए थे और लंड चड्डी सहित अन्दर को धंस सा गया था।

सोरभी के मुँह से आ..ह.. से ..सी… सी… की आवाज आने लगी थी, बोली- तुमने वादा किया है कि हद पार नहीं करोगे?
मैंने कहा- मुझे याद है कि देखना चूमना और सहलाना है, आगे कुछ नहीं करना है!

मैंने एक स्तन को मुँह में भर लिया, दूसरे को हाथ से मसलने लगा। मुझे लग रहा था कि मेरे लंड के आँसू आने लगे थे, यह समझ नहीं आ रहा था कि गम के हैं या ख़ुशी के! वो बाहर आने को तड़प रहा था।

मैंने सोचा कि यदि सोरभी को चोदा तो हो सकता है मेरा लंड समय से पहले ही शहीद हो जाए, इसको एक बार स्खलित कर देना ही उचित होगा।
मैंने सोरभी से कहा- मैं बाथरूम जा रहा हूँ।

बाथरूम में जाकर सोरभी की संतरे जैसी गोलाइयों को याद करके मुठ मारा, बहुत सारा माल निकला, फिर लंड को अच्छी तरह से धोया, पेशाब किया और कमरे में आ गया।

सोरभी अपने हाथ से चूत को मसल रही थी, दूसरे हाथ से चुची को! मुझे देखकर उसने हाथ हटा लिए। मैं चड्डी उतारकर फिर से सोरभी के ऊपर था, स्तनों को चूस चूस कर लाल कर दिया मैंने, फिर सहलाते हुए नीचे को आ रहा था, एक हाथ स्तन पर दूसरा नाभि के पास सहला रहा था, होंठ ऊपर से नीचे चुम्बन का काम कर रहे थे। धीरे धीरे चेहरे को चूत के सामने ले आया कमर पर हाथ फिराते हुए पेंटी पर ले गया। पेंटी चूत के स्थान पर फूली थी और नीचे की ओर बुरी तरह से चूत रस से भीग गई थी।

मैंने पेंटी को नीचे खिसकाना चाही तो सोरभी ने टांगें आपस में भींच ली।

मैंने कहा- सिर्फ चूमना है! पेंटी को निकाल लेने दो प्लीज़!

बड़ी मुश्किल से वो राजी हुई, एक झटके से पेंटी निकाल फेंकी। अब सोरभी मेरे सामने एकदम निर्वस्त्र एवं बेपर्दा लेटी हुई थी, मैं उसकी चूत के दर्शन करने लगा, एकदम नई और कोरी लग रही थी, त्वचा एकदम मुलायम थी, थोड़ी देर पहले ही तो शेविंग हुई थी चूत को खोलकर देखा तो गुलाबी छिद्र कमल की पंखुड़ी जैसा दिखाई दिया।

मैंने चूत का चूमा लिया तो सोरभी चिहुंक उठी और मेरे सर को थाम लिया। मैंने चूत के ऊपर मदनमणि को जीभ से सहला दिया, होंठों से भी दबाकर खींचा। अब कमरे की शांति सोरभी की आहों से भंग हो रही थी, मेरा लंड फिर से खड़ा होने लगा था।

अब सोरभी मुझे अपनी ओर खीच रही थी, मैंने सोरभी को बिस्तर पर ही खड़ा करके निहारा फिर पूरे शरीर को चूम डाला।

अब सोरभी से ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था, वो मेरी बाँहों में झूल गई।

मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर आकर स्तन दबाने लगा, वे सच में बहुत कठोर हो गए थे। मैं स्तनाग्र को मुँह में लेकर चूसने लगा। मेरा लंड पूरी तरह से तन्ना गया था, वह तो अपने लिए जगह खोजने में लगा था और धीरे धीरे मदनमणि को ठोकर मार रहा था। सोरभी की आह रुकने का नाम नहीं ले रही थी। मैं भी यही चाहता था!

अबकी बार दोनों चूचियों को दोनों हाथ से पकड़ कर अपने होंठों को सोरभी के होंठ पर रख कर जीभ को मुँह में डाल दिया। वह मेरी जीभ को सिसकारते हुये चूस रही थी। मैंने मौका देखकर लंड को सही स्थान पर लेकर थोड़ा दबाव डाला तो सुपारे का आगे का भाग चूत के मुँह पर फिट हो गया।

मैं सोरभी की मर्जी का इंतजार कर रहा था वादा जो किया था।

अब सोरभी ने मुझे जोरों से भींचना चालू कर दिया, नाखून भी गड़ा डाले! मैं स्तन और मुखचोदन में ही अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए था।

अब सोरभी कसमसा रही थी, अपने चूतड़ हिलाने की कोशिश कर रही थी।

मैंने थोड़ी सी ढील दी तो उसने गाण्ड को झटके से ऊपर उठा दिया और आधा लंड चूत मे समां गया।

मैंने कहा- सोरभी जी ये…??
जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

तो सोरभी ने इतना ही कहा- प्लीज़ पॉल…
मैं समझ गया पर अंजान बनकर कहा- क्या?

उसने कुछ नहीं कहा बस एक और झटका नीचे से लगा दिया, मेरा सात इंच का लवड़ा उसकी चूत में समां गया था। मैंने अब भी कोई हरकत नहीं की तो उसने मुझे पकड़कर ऐसे पलटी लगाई कि वो ऊपर और मैं नीचे आ गया।

अब वह बिना रुके अपनी गाण्ड उठा-उठा कर मुझे चोद रही थी, पूरा कमरे में हम दोनों की सिसकारियाँ गूंज रही थी। थोड़ी ही देर में उसका बदन अकड़ने लगा, मुँह से बड़ी तेज अजीब सी आवाज आने लगी थी। वो हाँफते हुए मेरे सीने पर गिर पड़ी, मैं उसकी पीठ को सहलाता रहा, मेरा लंड चूत के अन्दर फड़फड़ा रहा था।

अबकी बार मैंने पलटी लगाई, सोरभी नीचे, मैं ऊपर!

फिर धक्के लगाना चालू कर दिया। थोड़ी देर बाद मैंने सोरभी को बेड के किनारे पर सरका दिया और पैर बेड से नीचे लटकाने को कहा। मैं बेड के नीचे खड़ा होकर धक्के लगाने लगा। मेरा पूरा लंड चूत के अन्दर तक जाने लगा, हर वार में सोरभी की आह निकल रही थी, हर पल धक्के की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी।

कुछ देर बाद मैंने कहा- सोरभी, अब मैं झरने वाला हूँ, क्या करूँ?
बोली- अन्दर ही कर दो!

फिर मैंने उसकी टांगों को ऊपर उठाकर सीने की तरफ मोड़ दी और तेजी से गहरे धक्के मारने लगा और फिर लंड ने फूलना शुरू कर दिया।

इतने में सोरभी का शरीर फिर से अकड़ने लगा, वो मुझसे चिपक गई। तभी मेरा वीर्य पिचकारी की तरह सोरभी की चूत में छूटने लगा। पांच मिनट तक ऐसे ही लेटे एक दूसरे को प्यार करते रहे, फिर उठकर बाथरूम गए और अपने आप को साफ किया।

इस समय रात के सवा गयारह बजे थे। फिर हमने एक साथ खाना खाया। सोरभी अब भी मुझसे नजरें नहीं मिला रही थी।

मैंने कहा- सोरभीजी, अगर आप कहें तो मैं रात को यहीं रुक जाऊँ? सुबह 5 बजे चला जाऊँगा।
उसने कहा- ठीक है!

खाना खाकर बेडरूम में गए तो फिर इच्छा होने लगी, फिर से चुदाई का कार्यक्रम चालू हो गया।

मैंने उससे लंड को मुँह में लेने को कहा तो उसने हाथ से तो सहला दिया पर मुँह में नहीं लिया। फिर उसको घोड़ी बनाकर और भी कई प्रकार से चोदा।

रात के दो बजे तक की चुदाई में मेरा लंड में और सोरभी की चूत में दर्द भी होने लगा था।

सोरभी ने 5बजे मुझे जगाया, शायद वह रात भर सोई नहीं थी। शायद अपने द्वारा की गई गलती के लिए शर्मिंदा थी।

उसने मुझसे वादा लिया कि आज की रात जो भी हुआ हम दोनों को इसे भुलाना पड़ेगा, इस नियत से कभी तुम हमारे घर नहीं आओगे, न ही किसी से इस बात का जिक्र करोगे।
मैंने वादा किया- ऐसा ही होगा।

फिर मैं बाइक उठाकर चला गया सुबह काम जो शुरू करना था।

गाड़ी चलाते हुए सोच रहा था कि अभी तो बाथरूम का दर्पण लगा नहीं और इतना कुछ हो गया जब बाथरूम तैयार होगा और उसमें दर्पण लगेगा तो फिर क्या होगा।

फिर ऐसा हुआ भी! सोरभी ने ही मुझे बुलाया था!

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