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हमारी सेक्स लाइफ की कहानी- 2

हमारे घर में रहते या कभी हॉस्टल में रहते वक़्त जब प्रियंका हमारे घर आती तो ‘मौसा जी! नमस्ते’ कह कर ही इतिश्री कर देती थी लेकिन उस दिन अपने घर में तो प्रियंका ‘मौसा जी!’ कह कर मुझ से ज़ोर से लिपट कर मिली. होंठों से होंठ सिर्फ दो इंच दूर थे और बाकी सारा शरीर एक दूसरे से मिला हुआ. मेरी बायाँ हाथ प्रियंका की पीठ पर ठीक ब्रा की पट्टी के ऊपर और प्रियंका के दोनों हाथ मेरी पीठ पर… प्रियंका का दायाँ उरोज़ मेरी छाती में इतनी ज़ोर से गड़ा हुआ था कि मैं स्पष्ट रूप से अपनी छाती पर प्रियंका के उरोज़ का सख़्त निप्पल महसूस कर सकता था, प्रियंका की दायीं जांघ मेरी दोनों टांगों के बीच थी और चूंकि मैं प्रियंका से लंबा था फलस्वरूप मेरा लिंग प्रियंका की नाभि की बगल में लग रहा था और मुझे ऐसा लगा कि प्रियंका जानबूझ कर अपने पेट से मेरे लिंग को दबाया भी.
एक क्षण में मेरे लिंग में ज़बरदस्त तनाव आ गया और मुझे लगा कि प्रियंका ने मेरी पीठ पर एक जोर से चिकोटी भी काटी थी शायद!

अलग होते वक़्त प्रियंका ने कपड़ों के ऊपर से ही अपने बाएं हाथ से मेरे लिंग को भी टटोला. यह सब कुछ क्षण भर में, सब घर वालों के सामने ही हुआ और किसी को भनक तक नहीं लगी. अलग होते वक़्त प्रियंका की आँखों में वही बिल्लौरी चमक और होठों पर वही कातिल मुस्कान थी.
मैं थोड़ा बदहवास सा हो चला था… मुझे प्रियंका से ऐसी दीदा-दिलेरी की उम्मीद हरगिज़ ना थी. कस्बई लड़की शहर में रह कर सयानी हो चली थी.

मामला यह था कि प्रियंका के माँ-बाप ने प्रियंका के लिए एक लड़का भी देख रखा था जो आस्ट्रेलिया में था लेकिन प्रियंका जिद वश हाँ नहीं कह रही थी. मेरी और मीनाक्षी की प्रियंका को समझाने की लम्बी कोशिश (जिस में असली मुद्दा तो यह था कि आस्ट्रेलिया जा कर प्रियंका अपने मां-बाप की दकियानूसी रोक-टोक से आज़ाद रहेगी और कुछ अपना अपने तौर पर कर पाएगी.) के बाद प्रियंका ने अपने माँ-बाप को उस रिश्ते के लिए हाँ कह दी.

शाम को वापिसी में और घर आ कर भी मैं कुछ अजीब सा खालीपन महसूस कर रहा था.
‘प्रियंका की शादी हो जायेगी… प्रियंका ऑस्ट्रेलिया चली जायेगी… फिर जाने प्रियंका से मुलाक़ात कब होगी… होगी भी या नहीं… पता नहीं? वक़्त के साथ प्रियंका की प्राथमिकतायें बदल जायेंगी और वो परी कथाओं जैसा हमारा मिलन भूली-बिसरी बात हो जायेगी. ओ भगवान! यह कहाँ ला कर पटका मुझे?’
मुझे, मेरे जानने वाले बहुत ही प्रैक्टिकल सोच वाला व्यक्ति मानते हैं लेकिन यह सोच तो हरगिज़ प्रैक्टिकल ना थी.

जैसे-तैसे खुद को संभाला मैंने… दुनियावी तौर पर प्रियंका पर मेरा किसी किस्म का कोई हक़ ही नहीं बनता था और सब से बड़ी बात यह थी कि मुझे अपना परिवार, अपनी बीवी जान से ज्यादा प्यारे थे. पर मन पर किस का ज़ोर चलता है.

अगले दिन शाम को जब मैं ऑफिस से घर आया तो देखा कि प्रियंका की माँ और प्रियंका के पिता यानि मेरी साली और साढू भाई घर आये बैठे थे. पूछने पर बताया कि आस्ट्रेलिया वाले लड़के ने आगामी नवंबर में आना है और प्रियंका की शादी नवंबर में ही होगी.
लेकिन लड़के ने कहा है कि प्रियंका को बेसिक कम्प्यूटर कोर्स और अगर हो सके तो C++ का डिप्लोमा जरूर करवा दें. अब उन लोगों का कम्प्यूटर से खुद का नाता तो ईंट और कुत्ते वाला ही था तो वो लोग मेरी शरण में आये थे.

यह सब तो मेरे लिए चुटकी बजाने जैसा आसान काम था क्योंकि शहर के 80% कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट मुझ से जुड़े थे. अभी तो अगस्त चढ़ा ही था सो इस फ्रंट पर तो कोई दिक्क़त नहीं थी.
उन का इरादा यह था कि प्रियंका मेरे सुझाये किसी अच्छे इंस्टिट्यूट में 2-3 घंटे की क्लास अटेण्ड करे और रोज़ घर वापिस लौट जाए पर मैंने उन लोगों को ऐसा समझाया कि C++ लैंग्वेज़ सीखने में बहुत मेहनत और समय चाहिए और समय ही हमारे पास कम है तो अच्छा रहेगा कि प्रियंका रोज़ घर आने जाने के चक्कर में ना पड़ कर 3 महीने यहीं शहर में रहे और सीखे.

मुझे पता था कि आम तौर पर कम्प्यूटर इंस्टिट्यूटस का अपना कोई हॉस्टल नहीं होता सो इस नेक काम के लिए मेरा घर तो था ही!

थोड़ी ना-नुकर के बाद प्रियंका के मां-बाप ने इस के लिए हाँ कर दी.
‘प्रियंका आने वाले 3 महीने हमारे घर में रहने वाली है.’ सोच कर ही मेरे लिंग में तनाव आ गया.

अगले ही दिन मैंने एक बहुत नामी कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट के मालिक से बात पक्की की जिसने एक-आध दिन पहले ही सुबह 10 से 2 टाइमिंग का नया बैच शुरू किया था और उसी शाम को थोड़ा अँधेरा हुये मैं अपनी कार पर प्रियंका को लेने प्रियंका के घर जा पहुंचा. चूंकि मीनाक्षी ने सब कुछ पहले से ही फ़ोन पर तय कर रखा था तो प्रियंका पहले से ही तैयार थी.

प्रियंका मोरपंखिया कुर्ते और काली लैगी में कहर ढा रही थी. प्राकृतिक तौर पर लाल होठों पर दिलक़श मुस्कान, बिना दुपट्टे का उन्नत वक्ष, पतला कटि-प्रदेश, सपाट पेट, अर्ध-गोलाई लिए कसे हुये नितम्ब, पुष्ट जाँघें, पारे से थिरकते जिस्म का एक-एक कटाव नुमाया हो रहा था.

प्रियंका को इस रूप में देख कर उत्तेजना से मेरा बुरा हाल था.
पाठकगण! वैसे तो यह कोई ऐसा छुपा राज़ नहीं… लेकिन फिर भी बता देता हूँ कि इन जनाना लैगियों में नाड़ा नहीं होता, इलास्टिक होता है जिस कारण जल्दी से लैगी उतारना और पहनना बहुत सुविधाजनक होता है और गाहे-बगाहे हाथ अंदर सरका कर स्त्री की योनि से खेलने और भगनासा सहलाने में बहुत सुविधा रहती है.

जल्दी से चाय आदि पी कर मैंने प्रियंका को ले कर वापस कार मोड़ी. आने वाले आधा-पौना घण्टा कार में मैं और प्रियंका बिलकुल अकेले होंगे, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. उत्कंठा के मारे मेरा गला सूख रहा था. क्या करूंगा मैं…??? क्या मैं और प्रियंका कार की पिछली सीट पर ही रति-रमण करेंगे या मैं प्रियंका को अपनी लैगी और पैंटी नीचे कर के अपनी ओर प्रियंका का मुंह कर के अपनी गोद बिठा कर ऊपर से प्रियंका के गुलाबी होठों का रस चूसूंगा और नीचे से मेरा लिंग प्रियंका का योनि-भेदन करेगा?

‘ना ना! हट… छिः छिः! यह कैसी छिछोरी सोच…?? यह तो वासना है… निकृष्टतम वासना… विकृत वासना का घिनौना रूप…!’ मेरे सोये विवेक ने वापिस अंगड़ाई ली.

‘मैं तो प्रियंका से प्यार करता हूँ… चाहे मुझे हक़ नहीं है ऐसा करने का, लेकिन करता हूँ. अपनी प्रियतमा से ऐसे पशुवत व्यवहार की कल्पना भी अपराध है!!! थू… थू… थू!!!’
मैं थोड़ा सयंत हुआ और कार के शीशे चढ़ा कर मैंने कार मंथर गति से आगे बढ़ाई।

क़स्बे की हद से निकलते ही मैंने हिम्मत कर के अपना बायाँ हाथ गियर रॉड से उठा कर प्रियंका के दायें हाथ पर रखा दिया। तत्काल एक लहर सी प्रियंका के रोम रोम से गुज़र गयी जिसे मैंने स्पष्ट महसूस किया. प्रियंका ने मेरे हाथ में अपने हाथ की उंगलियाँ कस कर पिरो दी. मैंने एक पल के लिए प्रियंका की ओर देखा। सामने से आते किसी वाहन की हैडलाईट के नीम उजाले में प्रियंका की कजरारी आँखों में वही बिल्लौरी चमक और गुलाबी होंठों पर वही जानी-पहचानी मोनालिसा मुस्कान दिखी।
हम दोनों एक दूसरे से कुछ बोल तो नहीं रहे थे लेकिन मौन सम्प्रेषण चालू था. प्रियंका के शरीर में रह रह कर उत्तेज़ना की तरंग उठ रहीं थी जिन के फलस्वरूप प्रियंका का हाथ मेरे हाथ पर कस कस जाता था जिन्हें मैं स्पष्ट महसूस कर रहा था. मैं निःसंदेह जन्नत में था.

दो पल बीते या सदियाँ गुज़र गयी, कुछ पता नहीं. अचानक मेरे कानों में प्रियंका की आवाज़ सुनाई दी…
“मैंने आप से एक बात करनी है.”
“कहो…!”
“आप बुरा ना मानना… प्लीज़!”
“अरे नहीं… तुम बोलो?” मैंने घूम कर एक नज़र प्रियंका की ओर देखा।

नज़र झुकाये, अपने दोनों हाथों में मेरा हाथ थामे, प्रियंका ग्रीक की कोई देवी की मूरत सी लग रही थी.
“आप मेरे जीवन के प्रथम-पुरुष हैं, मैं मन ही मन आप को पूजती हूँ और मेरे दिल में हमेशा आप की एक ऊंची और ख़ास जगह है और हमेशा रहेगी। इस के साथ ही यह भी सच है कि आप का और मेरा साथ किसी भी सूरत संभव नहीं. मेरी आप से विनती है कि जिसे मैंने अपने मन-मंदिर का देवता माना है वो देवता ही रहे.”

“मैं समझा नहीं?” मैंने अनजान बन कर पूछा हालांकि समझ तो मैं गया ही था.
“आप के और मेरे बीच एक बार जो हुआ वो किस्मत थी लेकिन मैं मीनाक्षी मौसी को बहुत प्यार करती हूँ और हरगिज़-हरगिज़ नहीं चाहती कि मैं उन के दुःख का कारण बनूँ. इंसान फ़ितरतन लालची है उसे और… और… और चाहिए लेकिन मैं नहीं चाहती कि इस और… और के लालच में ये जन्नत जो आज मेरे पास है, मैं उसे भी खो बैठूं!”

“प्रियंका! साफ़ साफ़ कहो कि तुम मुझ से चाहती क्या हो?”
“आइंदा क़रीब तीन महीने मुझे फिर से आप के घर में रहना है और मैं चाहती हूँ कि वहाँ घर में आप ना सिर्फ़ सब के सामने बल्कि अकेले में भी सिर्फ मेरे मौसा जी ही बन कर रहें.”
बहुत गहरी बात थी लेकिन बात तो प्रियंका ठीक कह रही थी पर उस की इस बात से मेरे अन्तर्मन को गहरी ठेस लगी. शायद नकारे जाने का अहसास था. मेरा हाथ जिस में प्रियंका का हाथ कसा हुआ था फ़ौरन ढीला पड़ गया. प्रियंका को तत्काल इस का भान हुआ और उस ने मेरा हाथ अपने हाथ में जोरों से कस लिया और मेरा हाथ यहाँ वहाँ चूमने लगी.

अचानक मेरी हथेली के पृष्ठ भाग पर पानी की दो गर्म गर्म बूंदें गिरी. मैंने तत्काल अपना हाथ छुड़ा कर कार साईड में रोकी और प्रियंका की ओर मुड़ा, उसकी ठुड्ढी उठा कर देखा तो प्रियंका की आँखों से गंगा-जमुना बह रही थी.
मेरा दिल भर आया, जैसे ही मैंने उसे खींच कर अपने गले से लगाया तो मानो कोई बाँध ही टूट गया. प्रियंका मुझ से कस कर लिपट गयी और ज़ार-ज़ार रोने लगी और मैं अनजाने में ही प्रियंका के कपोलों पर से अपने होंठों से उस के आंसू बीनने लगा.
कुछ ही क्षणों के बाद मैं प्रियंका के होंठ चूम रहा था और प्रियंका मेरे!

अचानक प्रियंका ने मेरे मुंह में अपनी जुबान धकेल दी और मैं आतुरता से प्रियंका की जुबान चूसने लगा, अपनी जीभ से प्रियंका की जीभ चाटी, प्रियंका के उरोज़ मेरी छाती में धंसे जा रहे थे और मैं दोनों हाथों से प्रियंका को आलिंगन में ले कर अपनी ओर खींचे जा रहा था. प्रियंका के होंठ चूमें, गालों पर, आँखों पर, माथे पर दर्ज़नों चुम्बन लिए, दोनों कानों की लौ चूसी, कानों के पीछे, गर्दन पर अपनी जीभ फेरी. दोनों उरोजों के बीच की घाटी को चूमा-चाटा पर सब्र कहाँ?

हम लोग बड़ी ही असुविधजनक स्थिति में बैठे थे लेकिन परवाह किस को थी. दोनों की साँसें इतनी तेज़ हो रही थी जैसे मीलों भाग कर आए हों. कार में इस से ज्यादा कुछ होने/करने की गुंजायश भी नहीं थी. धीरे-धीरे प्रेम-उद्वेग हल्का पड़ा तो दोनों के होशो-हवास वापिस आये. रात 9 बजे… बिज़ी नेशनल हाईवे पर खड़ी कार में प्रेम-आलाप… अव्वल दर्ज़े की मूर्खता के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता.
मैंने धीरे से प्रियंका को अपने-आप से अलग किया, प्यार से उसके चेहरे पर अपना हाथ फिराया, बाल पीछे किये, आँखें पौंछी और माथे पर एक चुम्बन लिया.
प्रियंका मुस्कुरा दी. वही जादुई मुस्कान जो सारे गम बिसरा दे. मैंने इक निःश्वास भरी- ठीक है प्रियंका! जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा.

“थैंक्यू! आप ने मेरे शब्दों की लाज रखी. आप कुछ भी मुझ से मांग सकते हैं… भगवान-कसम! मैं दे दूंगी.”
“छोड़! जाने दे.”
“नहीं प्लीज़! आप कहिये…. मुझे ख़ुशी मिलेगी.”
“नहीं… जाने दे.”
“अरे! कहिये तो… आप को मेरी कसम.”
“अरे छोड़! मैं तुझ से प्यार करता हूँ और जिस से प्यार करते हैं उस को दिया करते हैं, उस से मांगा नहीं करते.”
“चाहे दिल में कोई अधूरी तमन्ना… दिन-रात का चैन हराम किये रखे… तो भी??”

क्या कहना चाह रही थी लड़की? क्या उसे मेरे दिल में पल रही ख्वाहिश का पता चल गया था? हो ही नहीं सकता. यह बात तो मैंने ख़ुद अपने से भी नहीं कही थी किसी और से कहने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी थी. मैं नज़रें फेर कर चुप सा ही रहा और प्रियंका अपनी गहन दृष्टि सर मेरे चेहरे के भाव पढ़ती रही.
“ओ.के! अब अगर मैं आप से कुछ माँगूँ तो क्या आप मुझे देंगें??” कुछ पल बाद प्रियंका ने पूछा.
“तेरे लिए… कुछ भी! जान मांगे तो जान भी!!” कहते-कहते जाने क्यों मेरी आँख भर आयी.
प्रियंका ने हाथ बढ़ा कर मेरा मुंह अपनी ओर किया और मेरी आँखों में आँखें डाल कर बोली- लाखों, करोड़ों दुआएं क़ुबूल होने पर मिली मुराद जैसा

उस रात का मिलन… एक बार! सिर्फ़ एक बार और… फिर से मुझे दे दीजिये.
प्रियंका की यह बात सुन कर मैं भौंचक्का सा रह गया.
हे भगवान्… यह चमत्कार कैसे हुआ? क्या प्रियंका ने मेरा दिमाग पढ़ लिया था?
“लेकिन इस बार अँधेरे की बजाए उजाले में…” मैंने पलट कर कहा.
क्षण भर के लिए प्रियंका के चेहरे पर उलझन की बदली सी छायी… लेकिन जैसे ही उस को बात समझ में आयी तो उस के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, चेहरे पर हया की लाली छा गयी और उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा लिया.

“अगर ऐसा करने में तुम्हें कोई परेशानी है तो रहने दे प्रियंका!”
प्रियंका ने तिरछी नज़र से मेरी ओर देखा और बोली- ठीक है! जैसा आप चाहो… पर समय सीमा कोई नहीं.”
“लेकिन यक़ीनन तेरी शादी से पहले!”
“देखेंगे!!” प्रियंका के हाव भाव में फिर से शरारत लौट आयी.
मैंने कार स्टार्ट की और हम घर वापिस आ गए.

तमाम शिक़वे-शिकायतें दूर हो गए थे और मन हल्का हो गया था. इक अनाम सी ख़ुशी दिल में हिलोर मार रही थी. जिंदगी फिर शुरू हो गयी थी. प्रियंका वापिस अपने कमरे में सैटल हो गयी थी। पाठक-गण! आज भी हमारे घर में उस कमरे को ‘प्रियंका वाला रूम’ ही कहते हैं.
प्रियंका रोज़ 9 बजे तैयार हो कर एक्टिवा लेकर कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट चली जाती थी और करीब ढ़ाई बजे वापिस आ कर खाना खा कर थोड़ी देर आराम करती थी. पांच से सात मीनाक्षी के साथ रसोई आदि का काम, सात से नौ अपने कम्प्यूटर पर प्रेक्टिस, नौ बजे डिनर, साढ़े नौ से सोने के टाइम तक बच्चों और मीनाक्षी के साथ गप-शप.

मेरा और प्रियंका का आमना-सामना आम तौर पर डिनर टेबल पर या कभी कभार जब मैं ऑफिस से आता था तो प्रियंका मुझे पानी देने आती थी… तब होता था. पानी का गिलास मुझे थमाते वक़्त प्रियंका के होंठों पर वही ‘मोनालिसा मुस्कान’ देख कर मेरा मन तो कई बार मचला लेकिन क्या करता… वचन-बद्ध था.

दो-एक महीने बाद मैंने गौर किया कि प्रियंका भी मीनाक्षी के साथ हर शनिवार शाम को ब्यूटी-पॉर्लर-कम-स्पा जाने लगी थी.
एक रात सोने से पहले मैंने मीनाक्षी से इस बारे में पूछा तो उसने हंस कर कहा- अब उसकी शादी होने वाली है तो अपने शरीर को अपने पति का स्वागत करने के लिए तैयार कर रही है.
“पति के स्वागत की तैयारी? मैं समझा नहीं?”
“अरे बुद्धूराम! मैनिक्योर, पैडीक्योर, नेल-कलरिंग, नेल-पॉलिशिंग, स्किन-टोनिंग, फुल बॉडी वैक्सिंग, थ्रैडिंग, हेयर स्टीमिंग, हेयर कंडिशनिंग, स्टीम-बाथ, फुल बॉडी ऑइल-मसाज़ आदि आदि.”
“फुल बॉडी ऑइल-मसाज़? मतलब… सारे कपड़े उतार के?”
“और नहीं तो क्या… कपड़े पहन कर?”
“यार! तुम औरतें भी ना! अच्छा! एक बात बताओ… औरतें प्यूबिक हेयर भी वैक्स करवाती हैं?” (प्यूबिक हेयर मतलब- योनि के आस पास के बाल)
“हाँ! बहुत करवाती हैं लेकिन मैं नहीं करवाती… पर प्रियंका करवाती है.”
हुस्न की शमशीर को धार लग रही थी, कोई किस्मत वाला परम मोक्ष को प्राप्त होने वाला था. प्रियंका के रेशम-रेशम जिस्म की कल्पना करते ही मेरे लिंग समेत मेरे जिस्म का रोयाँ-रोयाँ खड़ा हो गया और उस रात बिस्तर में मैंने मीनाक्षी की हड्डी पसली एक कर के रख दी.
ऐसे ही अक्टूबर का आखिरी हफ्ता आ पहुंचा. बच्चों को दशहरे की छुट्टियाँ थी. प्रियंका का कंप्यूटर कोर्स भी अपने अंतिम चरण में था, पांच-छह दिन की और बात थी, 02 नवंबर को प्रियंका ने घर लौट जाना था.

प्रियंका का मंगेतर 10 नवंबर को आने वाला था और शादी 19 नवंबर की फ़िक्स थी.
इधर प्रियंका ने अभी तक मुझे अपने पुट्ठे पर हाथ तक नहीं धरने दिया था. मुझे अपने सपने का भविष्य बहुत अंधकारमय लग रहा था.
फिर अचानक एक चमत्कार हो गया. उसी शाम मेरी पत्नी मीनाक्षी के एक चाचा श्री हमारे घर पधारे. यह साहब एक बड़े ट्रांसपोर्टर है और इन की कोई 70-80 A.C टूरिस्ट बसें पूरे उत्तर भारत में चलती हैं, इन साहब ने अपनी कोई मनौती पूरी होने के उपलक्ष्य में अपने गोत्र की सारी लड़कियों समेत वैष्णो देवी दर्शन के लिए पूरी AC स्लीपर वाली वॉल्वो बस बुला रखी थी. यह साहब उस यात्रा के लिए हमें न्यौता देने आये थे.

सरिता रात को निकलना था, शुक्रवार सारा दिन चढ़ाई कर के दर्शन करने थे, शुक्रवार रात वहाँ से वापसी कर के शनिवार सवेरे वापिस घर पहुँच जाना था.
मीनाक्षी का बहुत मन था जाने का लेकिन मेरा जाना मुश्किल था क्यों कि सीज़न का समय था, मैं घर से सुबह का निकला रात 9-10 बजे घर आता था. चूंकि प्रियंका का कंप्यूटर कोर्स आँखिरी चरण में था तो प्रियंका भी सुबह की गयी शाम 5 के करीब घर वापिस आ पाती थी. तो प्रियंका की मम्मी को साथ चलने के लिए फ़ोन लगाया गया और साली साहिबा भी फटाक से मीनाक्षी के साथ चलने को तैयार हो गयी.
फ़ाइनल प्रोग्राम यह बना कि प्रियंका की माताश्री सरिता शाम तक हमारे घर आ जाएंगी और मीनाक्षी और उन को मैं सरिता शाम को चाचा जी के घर जा कर बस चढ़ा आऊंगा और शनिवार सुबह को चाचा जी के घर जा कर ले आऊंगा। दोनों बच्चे यहीं हमारे पास रहेंगें. एक ही दिन की तो बात थी.

सरिता शाम 7 बजे के लगभग मैं घर आया तो देखा कि मेरे दोनों बच्चों ने रो रो कर आसमान सर पर उठा रखा था, दोनों अपनी मां और मौसी के साथ जाने की जिद कर रहे थे. बड़े धर्म-संकट की स्थिति थी. भगवान् जाने! बस में अब एक्सट्रा स्लीपर उपलब्ध था भी या नहीं!
मीनाक्षी ने बहुत सकुचाते हुए चाचाजी को फ़ोन लगाया गया और मसला बयान किया. सुन कर चाचा जी फ़ोन पर ही रावण जैसी ऊँची हंसी हंसे और बोले- कोई बात ही नहीं… 5-7 जन और हों तो उन्हें भी ले आओ. बस एक नहीं, दो जा रहीं हैं. तुम लोग… बस! आ जाओ!
मामला हल हो गया था, आनन फ़ानन में बच्चों का भी बैग पैक किया गया. करीब 8 बजे मैं इन चारों को चाचा श्री के घर छोड़ने निकल पड़ा.

प्रियंका भी हमारे साथ ही थी. अचानक मुझे एक झटका सा लगा और महसूस हुआ कि आज की रात तो मुरादों वाली रात हो सकती है… आने वाले करीब 36 घंटे मेरी तमाम जिंदगी की हसरतों का हासिल हो सकते थे. ऐसा सोचते ही मैं तनाव में आ गया.

तभी मीनाक्षी ने पूछा- क्या बात है? आप अचानक चुप से क्यों हो गए?
“ऐसे ही… तुम अपना और बच्चों का ख्याल रखना.”
“अरे! एक दिन की तो बात है. आप फ़िक्र ना करें. बस आप कल शाम को टाइम से घर आ जाना, लेट मत होना. प्रियंका घर में अकेली होगी.”
“ठीक है.”
उन चारों को चाचा जी के घर छोड़ कर, जहाँ सब के लिए डिनर का प्रोग्राम भी था और साफ़ दिख रहा था कि बसें 11 बजे से पहले नहीं चलेंगी. खाना-वाना खा पी कर मुझे और प्रियंका को वापिस घर पहुँचते पहुँचते 10:30 बज गए.
घर पहुँचते ही प्रियंका कार से उतर कर दौड़ कर अपने कमरे में जा घुसी और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया.

मैंने गैरेज का शटर डाउन किया, मेन-गेट को अंदर से ताला लगाया और अंदर दाखिल हुआ, कपड़े बदले और किचन में जा कर कॉफ़ी बनायी।
“प्रियंका… कॉफी पियोगी?” मैंने आवाज लगाई.
कोई जबाब नहीं मिला.
दोबारा आवाज़ लगाई… फिर कोई जवाब नहीं!
अजीब बर्ताब कर रही थी लड़की!
ख़ैर! मैं अपना कॉफ़ी का मग उठा कर प्रियंका के दरवाज़े के पास आया और पूछा- प्रियंका! ठीक हो?
“हूँ” की एक मध्यम सी आवाज़ सुनाई दी.
मैं दो पल वहीं खड़ा रहा और फिर कॉफ़ी सिप करता करता अपने बैडरूम में आ गया. मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या हो गया था लड़की को?
सिप-सिप कर के मैंने अपनी कॉफ़ी ख़त्म की और वाशरूम में जा कर पहले ‘अपना हाथ, जगन्नाथ’ किया, फिर ब्रश किया. अंडरवियर उतार कर लॉन्ड्री-बास्केट में डाला और बिना अंडरवियर के नाईट सूट पहन लिया.
अजीब बात थी… मैं और मेरी मुजस्सम मुमताज़ घर में अकेले थे लेकिन एक नहीं हो पा रहे थे.

यही वो प्रियंका थी जो सवा डेढ़ साल पहले मीनाक्षी की मौजूदगी में भी मुझ से प्यार करने में नहीं हिचकी थी और आज जब कि घर में किसी के होने का, किसी को पता चल जाने का, मुहब्बत का राज़ फाश हो जाने जैसा कोई खतरा नहीं था तो ‘वो’ अपनी मर्ज़ी से, अपने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर के बैठी थी.
बेड पर अधलेटे से बैठे, ऐसा सोचते सोचते जाने कब मेरी आँख लग गयी. ट्यूब लाइट भी जलती रह गयी. बैडरूम का दरवाज़ा तो खुला था ही!
रात नींद में ही मैंने करवट ली तो किसी नर्म-गुदाज़ चीज़ से मेरा हाथ टकराया. यह एक जनाना कंधा सा था. मैंने झट्ट से आँखें खोली तो पाया कि बैडरूम का दरवाज़ा भी बंद था और बैडरूम की ट्यूब-लाइट तो बंद थी ही अपितु फुट-लाइट भी बंद थी. पूरे बैडरूम में घुप्प अँधेरा छाया हुआ था.

मैंने कपड़ों की हल्की सी सरसराहट और साँसों की मध्यम सी आवाज़ सुनी. मेरे ही बैड पर, मेरे दायीं ओर कोई था. एक पल को तो मेरे रौंगटे खड़े हो गए लेकिन जैसे ही मुझे प्रियंका के वहाँ होने का ध्यान आया तो मेरे लिंग में भयंकर तनाव आ गया. मैंने अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाया तो प्रियंका का मरमरी और नाज़ुक हाथ मेरे हाथ पर कस गया.

अँधेरे में साईड-वॉल पर रेडियम वाल-क्लॉक 1:10 का टाइम दिखा रही थी. दो चार पल मैं बिना कोई हरकत किये ऐसे ही करवट लिए पड़ा रहा. अचानक मैंने अपने सिरहाने लगी टेबल लैंप ऑन कर दिया.
सचमुच यह प्रियंका ही थी. प्रियंका ने तत्काल मेरा हाथ छोड़ा और चादर अपने सर तक ओढ़ ली और अपना सर जोर जोर से दाएं-बाएं हिलाती हुयी घुटी सी आवाज़ में बोली- प्लीज़… नहीं! लाइट बंद कर दीजिये.

“मगर क्यों?”
“मुझे शर्म आती है.”
“शर्म आती है… मगर किस से?”
“मुझे नहीं पता… लेकिन आप लाइट बंद कर दीजिये.”
“लेकिन यहाँ तो मैं और तुम ही हो और तीसरा तो कोई है ही नहीं.”
“पता है… पर प्लीज़ लाइट बुझाइये.”
“प्रियंका! लाइट बंद कर दी तो वादा कैसे पूरा होगा? ”
“मुझे नहीं पता… लेकिन आप लाइट बंद कीजिये.”

अगर मेरी प्रियतमा को ये सब छुप छुप कर करना पसंद था तो ठीक है… मैं जो उस को पसंद है वैसे ही करूंगा. मैंने हाथ बढ़ा कर टेबल लैम्प बंद कर के हल्की नीली लाइट वाली नाईट लैंप जला दी.
प्रियंका ने चादर से सर बाहर निकाला और नीली लाइट जलती देखकर मेरी ओर शिकायत भरी नज़रों से देखा लेकिन कहा कुछ नहीं। चलो! बात थोड़ा तो आगे बढ़ी. अब तक मैं पूर्ण तौर पर चैतन्य हो चुका था.

“सुनो!” अचानक प्रियंका ने सरगोशी की.
“सुनो!” की प्रियंका की आवाज़ सुन कर मुझे हल्का सा झटका सा लगा. यह संबोधन मेरे लिए सिर्फ मीनाक्षी प्रयोग करती थी. मैंने तकिये पर से सर उठाया और प्रियंका की ओर सवालिया नज़रों से देखा.
“उठो तो… ज़रा!” प्रियंका ने इल्तिज़ा सी की.
” ठूँ…?? बोले तो…?”
“अरे बाबा! उठ कर खड़े हो जरा…!”
“बैड पर…?”
“ज़मीन पर!!… बुद्धू राम!”

एक झटका और लगा. सिर्फ मीनाक्षी ही कभी-कभार एकांत में मुझे बुद्धूराम कहती थी. भगवान् जाने… क्या चल रहा था लड़की के दिमाग में? मैं आहिस्ता से उठा और बैड से नीचे उतर कर फर्श पर खड़ा हो गया.
“ज़रा ट्यूब-लाइट जलाओ तो.”
प्रियंका के लफ़्ज़ों में एक अधिकारपूर्ण और सत्तात्मक गूँज सी थी. मैंने नाईट-लैंप ऑफ़ कर के ट्यूब-लाइट ऑन कर दी. तभी प्रियंका बैड के परली तरफ से नीचे उतर आयी और आ कर ठीक मेरे सामने खड़ी हो गयी. अजीब हालत थी मेरी… बिना अंडरवियर के मेरा लिंग पजामे को तम्बू बनाये हुये था.
“अब आगे क्या?” मैंने मज़ाकिया लहज़े में पूछा.

अचानक ही प्रियंका ने झुक कर अपने दोनों हाथों से मेरे पैर छू कर अपना दायाँ हाथ अपनी मांग में ऐसे फेरा जैसे सिन्दूर लगाते हैं.
पल-भर के लिए मैं स्तब्ध रह गया- यह… यह क्या कर रही हो… प्रियंका?
कहते हुए मैंने प्रियंका को दोनों कांधों से पकड़ कर उठाया।
देखा तो काली कजरारी आँखों में आंसू बस गिरने की कगार तक भरे थे.

“मेरा ईश्वर गवाह है कि आप मेरे जीवन में आये प्रथम पुरुष हैं और उस रात के बाद से मैंने हमेशा आप को अपने पति के रूप में ही देखा और चाहा है. आज के बाद हम दोनों की जिंदगी में क्या क्या मोड़ आएं… मैं नहीं जानती लेकिन जो अभिसार अभी आप के और मेरे बीच में होने वाला है, मैं चाहती हूँ कि उसका स्वरूप एक पति-पत्नी के अभिसार का हो… ना कि प्रेमी-प्रेमिका के अभिसार का. आने वाले चंद घंटे मैं पूर्ण तौर पर आप की अर्धांगिनी की तरह गुज़ारना चाहती हूँ. इन चंद घंटों की मीठी याद के सहारे मैं जिंदगी की मुश्किल से मुश्किल दुश्वारी हसीं-ख़ुशी सह लूंगी. क्या आप आज मुझे यह अधिकार देंगें?”

बाप रे! … तो ये सब चल रहा था प्रियंका के दिमाग में! अब मैं समझा सारी बात. मेरे गले लग कर बेवज़ह रोना, अधिकारपूर्ण मुझे पुकारना, मेरे पांव छूना और फिर मेरे पांव की वही धूल अपनी मांग में लगाना… प्रियंका खुद को मीनाक्षी के स्थान पर रख कर मुझे अपना पति कह रही थी.
“प्रियंका! आने वाले चंद घंटे तो क्या तू हमेशा मेरे दिल में मेरी अपनी बन कर रहेगी। हो सकता है कि हम बरसों ना मिले लेकिन याद रखना कि मुझ पर तेरा इख़्तियार और अधिकार मीनाक्षी से कम नहीं.” कहते हुए मैंने भी कुछ भावुक हो गया और प्रियंका को अपने अंक में समेट कर उस के माथे पर प्यार की मोहर लगा दी.

ज़वाब में प्रियंका ने मुझे जोर से अपने आलिंगन में ले लिया। आलिंगन में बंधे-बंधे दोनों बैड पर आजू-बाजू (मैं दायीं तरफ, प्रियंका बायीं तरफ) लेट गए. अब की बार प्रियंका ने मुझे ट्यूब-लाइट बंद करने को नहीं कहा.
“अच्छा प्रियंका! दो-एक बातें तो बता?”
प्रियंका की भवें प्रश्नात्मक तौर पर मेरी ओर उठी.

“आम तौर पर तू मुझे “मौसा जी नमस्ते” कह कर ही टाल देती रही है लेकिन उस दिन जब मैं और मीनाक्षी तेरे घर गए थे तो क्या हुआ था तुझे?”
“उस दिन? उस दिन आप के आने से ज़रा पहले मेरी अपने पापा से जोरदार बहस हुई थी और उस टाइम मैं दिल से आप को याद कर रही थी.”
“और वो मेरा लिंग दबाना, सहलाना और पीठ पर चिकोटी काटना?”
” दबाने का तो ऐसा है कि वो या तो सिर्फ आप को पता या मुझे और यही बात पीठ पर चिकोटी काटने पर लागू होती है लेकिन सहलाने वाली बात का तो मैं कहूँगी कि वो सिर्फ एक एक्सीडेंट था.”
” और आज जब हम वापिस आये थे तो क्या हुआ था तुझे? तू क्यों अपने कमरे में बंद हो गयी थी और कहने पर भी दरवाज़ा क्यों नहीं खोला तुम ने?”

“आप समझे नहीं? पिछले तीन महीने से आप का इम्तिहान चल रहा था. इन तीन महीनों में आप ने मुझ से कभी कोई छिछोरी हरक़त नहीं की और आज शाम को आप का आखिरी इम्तिहान था. अगर आप ने मेरे कमरे का मुझ से दरवाज़ा खुलवाने की मनोमुनौवल की होती या जबरदस्ती दरवाज़ा खोलने की कोई जुगत की होती तो मुझे समझ आ जाना था कि आप सिर्फ एक जनाना जिस्म के पीछे पड़े हैं और प्रियंका से आप को कोई लेना-देना नहीं और बीते समय में आप का मेरे साथ कोई ग़ैर-इखलाकी हरकत ना करने का कारण सिर्फ मौका नहीं मिलना ही था. अगर ऐसा होता तो मैंने आप को खुद को कभी भी छूने नहीं देना था और तमाम उम्र आप के साथ कोई वास्ता भी नहीं रखना था.”

तौबा तौबा! क्या खुराफाती सोच थी… लड़की की!
“अच्छा! अब बता… मैं पास हुआ या फेल?”
“आप को क्या लगता है?”
“तू बता?”
“मुझे ख़ुशी है कि जिसे मैंने देवता माना, वो सच में एक देवता ही है.”

भावावेश में मैंने प्रियंका के चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी. हम दोनों के साँसों की गति निरंतर बढ़ती जा रही थी लेकिन इस से आगे ना वो बढ़ रही थी न मैं…
लेकिन मैं पुरुष था… पहल तो मुझे ही करनी थी!
आखिरकार आहिस्ता से मैंने अपना दायाँ हाथ ऊपर उठा कर प्रियंका के बायें गाल पर रख दिया. प्रियंका का दिल तेज़ी से धड़क रहा था, उसकी जलती गर्म सांसें मेरी कलाई झुलसाये जा रही थी. मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया तो मेरी तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच में प्रियंका के बाएं कान की लौ आ गयी जिसे मैंने हल्के से मसल दिया।
“सी… ई… ई… ई… ई… ई…!!!” शाश्वत आनन्द की पहली आनन्दमयी सिसकारी प्रियंका के होंठों से फूट पड़ी. हम दोनों के बीच में कोई डेढ़-एक फुट का फ़ासला था. मैं थोड़ा सा प्रियंका की तरफ़ सरका. अब मेरा दायाँ हाथ प्रियंका की पीठ पर धीरे धीरे दायें-बायें, ऊपर-नीचे फिर रहा था. कपड़ों के ऊपर से प्रियंका की कसी हुयी ब्रा की आउटलाइन स्पष्ट महसूस हो रही थी.

जैसे ही मैंने प्रियंका का बायाँ हाथ उठा कर अपने ऊपर रखा तो प्रियंका ने मुझे अपने साथ कस कर भींच लिया. दोनों के बीच का रहा सहा फासला भी ख़त्म हो गया. प्रियंका के उरोज़ मेरी छाती में धँसे हुये थे और उस का बायाँ हाथ मेरी पीठ को कस कर जकड़े हुए था.
कयामत तो तब बरपा हुई जब प्रियंका ने अपनी बायीं टांग उठा कर मेरे ऊपर रख दी. कपड़ों के ऊपर से ही प्रियंका की उतप्त योनि का ताप मेरे कठोर लिंग को जैसे जलाने पर आमादा था. मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई जलती हुयी अंगीठी मेरे लिंग के पास पड़ी हो.

मेरा दायाँ हाथ प्रियंका की पीठ पर ऊपर-नीचे गर्दिश करता करता अब नितम्बों पर से होता हुआ, पैंटी-लाइन नापता-नापता योनि-द्वार तक जा रहा था. प्रियंका की आँखें समर्पण के आनन्द के अतिरेक से बंद थी और प्रियंका का पूरा जिस्म रह रह कर हल्के-हल्के झटके खा रहा था.

मैंने अपना बायाँ हाथ प्रियंका की गर्दन के नीचे से ले जा कर प्रियंका को अपनी ओर खींचा तो प्रियंका के रस भरे होंठ मेरे प्यासे होंठों से आ मिले. तत्काल मैंने प्रियंका के होठों का अमृतपान करना शुरू कर दिया।
प्रियंका भी आज बहुत गर्मजोशी से मेरा साथ दे रही थी.

अचानक मेरे निचले होंठ पर किसी मधुमक्खी ने डंक मारा हो जैसे… मैं एकदम से हड़बड़ा गया और बैडरूम प्रियंका की खनकदार हंसीं से गूँज उठा. प्रियंका ने मेरे निचले होंठ पर काट लिया था. स्पष्ट था कि आज मेरा सामना छुई मुई प्रियतमा से नहीं बल्कि किसी जंगली बिल्ली से होने वाला था. मुझे सतर्क रहने की जरूरत थी लेकिन एक चीज़ मेरे हक़ में थी और वो थी मेरा बिस्तर में लम्बा अनुभव.
प्रियंका जिन शारीरिक अहसासों से अभी नयी नयी दो चार हो रही थी, वो सब मेरे बरसों के जाने पहचाने थे. मैंने प्रियंका के होंठों पर फिर से अपने होंठ फिराने शुरू कर दिए. बीच बीच में प्रियंका अपनी जीभ बाहर निकाल कर मेरे होंठों की गति अवरुद्ध करने की कोशिश कर रही थी लेकिन मैं उस की जीभ को ही चाटना चूसना शुरू कर देता था जिस से प्रियंका के जिस्म में बेचैनी और ज्यादा बढ़ती जा रही थी.

मेरे दोनों हाथ प्रियंका की पीठ पर सख़्ती से क्रॉस हो रहे थे. जैसे ही मेरा कोई हाथ उसकी पीठ सहलाते सहलाते उसकी दायीं या बायीं बगल की ओर बढ़ता तो प्रियंका उत्तेजनावश मुझे अपने आलिंगन में और जोर से कस कर मेरे मुंह पर यहाँ-वहाँ चुम्बनों की बारिश कर देती.

इधर मेरा दायाँ हाथ प्रियंका की पीठ पर पहुँच कर कपड़ों के ऊपर से ही ब्रा का हुक टटोल रहा था. जैसे ही मेरी उंगलियाँ ब्रा के हुक पर ठहरती तत्काल प्रियंका का बायाँ हाथ मेरे दाएं हाथ को इधर उधर झटक देता.

लड़की अभी और खेलने के मूड में थी…
ठीक है! मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी, सारी रात अपनी थी.

अब हालत यह थी कि हम दोनों के बीच में से हवा भी नहीं गुज़र सकती थी. उत्तेज़ना के मारे हम दोनों के दिल धक धक कर रहे थे. तत्काल मेरा दायाँ हाथ प्रियंका के बाएं कंधे पर से गर्दिश करते-करते नीचे की ओर अग्रसर हुआ, कोहनी और कलाई से होते हुये अंदर पेट की ओर मुड़ गया. नर्म गुदाज़ पेट और मेरे हाथ के बीच में सिर्फ एक टीशर्ट का पतला सा आवरण था.
मैं अपनी हथेली पर प्रियंका के जवान और मदमस्त जिस्म की झुलसा देने वाली गर्मी साफ़ महसूस कर रहा था. मैंने अपना हाथ ज़रा सा नीचे किया तो टीशर्ट का निचला सिरा मेरी उँगलियों के नीचे आ गया.

मैंने फ़ौरन टीशर्ट का सिरा उठा कर अपना हाथ अंदर सरका दिया और इसके साथ ही प्रियंका की टीशर्ट थोड़ी और ऊपर को ख़िसक गयी; तत्काल प्रियंका के सारे शरीर में एक कंपकंपी सी हुई और प्रियंका ने अपना दायाँ हाथ उठा कर मेरी गर्दन के नीचे से निकाल कर मुझे खींच कर अपने साथ लगा लिया.

अब मेरे दायें हाथ की उंगलियाँ प्रियंका के सपाट पेट पर ब्रा की निचली सीमा से ले कर कैपरी के ऊपरी इलास्टिक की सीमा तक ऊपर-नीचे, दाएं बाएं हरकत करने लगी. मैं जानबूझ कर ना तो प्रियंका के वक्ष को अभी सीधे हाथ लगा रहा था और ना ही उसकी योनि को!
पेट पर ऊपर की ओर गर्दिश करती मेरी उंगलियाँ ब्रा की निचली पट्टी को छूते ही और ऊपर को जाने की जगह दायें बायें बग़ल की ओर मुड़ जाती थी, ऐसा ही नीचे की ओर उँगलियों की गर्दिश करते वक़्त प्रियंका की कैपरी के ऊपरी इलास्टिक को छूते ही और नीचे जाने की बजाए पेट पर ही इधर उधर हो जाती थी.
अचानक मैंने गौर किया कि प्रियंका की काँखें एकदम रोमविहीन हैं, वहाँ एक भी बाल नहीं था और बग़लों के नीचे की त्वचा एकदम नरम और मुलायम थी.
“ऐसी ही बालों से रहित, रोमविहीन प्रियंका की मनमोहक और कोमल योनि भी होगी…” ऐसा सोचते ही मुझ में तीव्र उत्तेज़ना की लहर उठी.

मैंने उसकी टीशर्ट में अपना हाथ सरका दिया और इसके साथ ही प्रियंका की टीशर्ट थोड़ी और ऊपर को ख़िसक गयी; तत्काल प्रियंका के सारे शरीर में एक कंपकंपी सी हुई और प्रियंका ने अपना दायाँ हाथ उठा कर मेरी गर्दन के नीचे से निकाल कर मुझे खींच कर अपने साथ लगा लिया.
अब मेरे दायें हाथ की उंगलियाँ प्रियंका के सपाट पेट पर ब्रा की निचली सीमा से ले कर कैपरी के ऊपरी इलास्टिक की सीमा तक ऊपर-नीचे, दाएं बाएं हरकत करने लगी. मैं जानबूझ कर ना तो प्रियंका के वक्ष को अभी सीधे हाथ लगा रहा था और ना ही उसकी योनि को!
पेट पर ऊपर की ओर गर्दिश करती मेरी उंगलियाँ ब्रा की निचली पट्टी को छूते ही और ऊपर को जाने की जगह दायें बायें बग़ल की ओर मुड़ जाती थी, ऐसा ही नीचे की ओर उँगलियों की गर्दिश करते वक़्त प्रियंका की कैपरी के ऊपरी इलास्टिक को छूते ही और नीचे जाने की बजाए पेट पर ही इधर उधर हो जाती थी.
अचानक मैंने गौर किया कि प्रियंका की काँखें एकदम रोमविहीन हैं, वहाँ एक भी बाल नहीं था और बग़लों के नीचे की त्वचा एकदम नरम और मुलायम थी.
“ऐसी ही बालों से रहित, रोमविहीन प्रियंका की मनमोहक और कोमल योनि भी होगी…” ऐसा सोचते ही मुझ में तीव्र उत्तेज़ना की लहर उठी.

ऊपर मैंने प्रियंका के दायें कान की लौ होंठों से चुमकारना शुरू किया और मैं बीच बीच में प्रियंका के कान में रह रह कर अपनी जीभ भी फिरा रहा था.
“सी… ई… ई… ई… ई..ई..ई!!! आ… ई… ई..ई..ई!!! उफ़… फ़..फ़!!! आह… ह..ह..ह!! हा… ह..ह..ह!!!”
इस दोहरे काम-आक्रमण को झेलना प्रियंका के लिए हर्गिज़ आसान न था; प्रियंका के जिस्म में रह रह कर काम-तरंगें उठ रही थी और प्रियंका के मुंह से आनन्ददायक सिसकारियों की आवाज़ ऊँची… और ऊँची होती जा रही थी और प्रियंका की बेचैनी पल प्रतिपल उसके क़ाबू से बाहर होती जा रही थी.

अचानक प्रियंका ने मुझे अपने से थोड़ा परे किया और अपने बाएं हाथ से मेरे नाईट-सूट के बटन खोलने की कोशिश करने लगी लेकिन एक हाथ से बटन खोलना और वो भी बाएं हाथ से… थोड़ी टेढ़ी खीर थी.
बहुत कोशिश के बाद एक ही बटन खुल पाया। प्रियंका ने शिकायत भरी नज़रों से मुझे देखा. मैंने तत्काल इशारा समझा और फ़ौरन अपने हाथों को फ़ारिग कर के चंद ही पलों में अपने नाईट-सूट के अप्पर के सारे बटन खोल दिए और उसे उतार कर परे फ़ेंक दिया.

अब मैं सिर्फ बनियान और पज़ामे में था और प्रियंका के तन पर अभी भी टी-शर्ट और कैपरी थे.
मैंने प्रियंका को कमर में हाथ डाल कर थोड़ा ऊपर उठाया और प्रियंका के हाथ ऊपर कर के आराम से उस की टी-शर्ट निकाल दी. सफ़ेद कसी हुई ब्रा में प्रियंका का कुंदन सा सुडौल शरीर मेरे सामने दमक रहा था. प्रियंका ने हया-वश अपने वक्ष के आगे अपनी बाहों का क्रॉस बना कर सर झुका लिया। मैंने प्रियंका का चेहरा उस की ठोढ़ी के नीचे उंगली लगा कर उठाया तो प्रियंका ने शर्म के मारे आँखें बंद कर ली.
“आँखें खोलो प्रियंका!”
“उंहूं…! मुझे शर्म आती है.”

“अरे खोलो तो… यहाँ कौन है तेरे मेरे सिवा?” मैंने दोनों हाथों से प्रियंका के दोनों कंधे थाम लिए.
प्रियंका ने हौले-हौले अपनी आँखें खोली तो मुझे सीधे अपनी काली कज़रारी आँखों में झांकते पाया।
झट से प्रियंका ने मेरी ही आँखों पर अपना हाथ रख दिया- आप मुझे ऐसे ना देखो प्लीज़… मैं तो शर्म से ही पिघल जाऊँगी.
मैंने बहुत नरमी से अपने एक हाथ से अपनी आँखों पर रखे प्रियंका के हाथ को हटाया और उसी हाथ की हथेली का इक चुम्बन लेकर उसी हाथ की लम्बी पतली, नाज़ुक तर्जनी ऊँगली अपने मुंह में डाल ली और उसे चूसने लगा.
तत्काल प्रियंका बेचैन हो उठी और अपनी उंगली मेरे मुंह में इधर उधर मोड़ने-तोड़ने लगी. तब तक मैं करीब क़रीब आधा प्रियंका के ऊपर झुका हुआ था.

अचानक ही प्रियंका ने अपनी उंगली मेरे मुंह से निकाल ली और उसी हाथ का अंगूठा मेरे होंठों पर दाएं से बाएं, बाएं से दाएं फिराने लगी. बीच बीच में मैं मुंह से प्रियंका का अंगूठा पकड़ने की कोशिश भी करता, लेकिन प्रियंका अंगूठा किसी तरह छुड़ा लेती.
थोड़ी देर बाद ही मैंने प्रियंका के दोनों हाथों की उंगलियाँ अपने दोनों हाथों की उँगलियों में लॉक कर के (अपना दायाँ हाथ प्रियंका के बाएं हाथ में और अपना बायाँ हाथ प्रियंका के दाएं हाथ में) सिरहाने के आजू बाजू रख दिए और सीधे प्रियंका के ऊपर आ कर प्रियंका की आँखों में झांका।
प्रियंका के होंठों पर वही मोनालिसा मुस्कान आयी और प्रियंका ने अपनी उंगलियाँ मेरी उँगलियों में ज़ोर से कस दी.
क्या नज़ारा था…!!! साक्षात् रति भी इतनी सुन्दर ना होगी जितनी उस वक़्त प्रियंका लग रही थी. मैंने झुक कर प्रियंका के होंठों पर एक चुम्बन लिया, फिर धीरे से एक एक चुम्बन दोनों कपोलों पर लिया… एक ठोड़ी पर, एक गर्दन के बीच में ज़रा बायीं और दूसरा ज़रा दायीं ओर…
प्रियंका की गहरी साँसों में अब आनन्दमयी सीत्कारें निकलने लगी थी.

मैंने एक और चुम्बन ब्रा में कसे हुये दोनों उरोजों के मध्य में लिया और दोनों उरोजों में बनी दरार में अपनी जीभ घुसा दी.
बस जी! कहर ही बरपा हो गया जैसे… प्रियंका ने जोर से सीत्कार करते हुए ने जबरन अपने दोनों हाथ मेरे हाथों से छुड़ाए और दीवानावार मुझे यहाँ-वहाँ चूमने लगी; मेरे माथे पर… मेरे कंधे पर, मेरी गर्दन पर, मेरे सर पर.
प्रियंका का बायाँ हाथ मेरी पीठ पर कस गया और दायाँ हाथ मेरे सर के पृष्टभाग पर जमा कर प्रियंका मुझे ऐसे अपनी ओर दबाने लगी जैसे चाहती हो कि मैं उस के उरोजों में ही समा जाऊं. मैं प्रियंका के उरोज़ों के बीच की दरार की लम्बाई अपनी जीभ से नापने में मशग़ूल था.
“हा… हाँ, यहीं यहीं… और करो… यस! जोर से करो… यहीं हाँ यहीं… ओ गॉड!… आह हाय सी… ई..ई..ई!!! ” प्रियंका आनन्द के सागर में अनवरत गोते लगा रही थी.

अचानक मैंने अपना सर जरा सा उठाया तो प्रियंका की रोमविहीन आवरणहीन कोमल बायीं काँख पर मेरी नज़र पड़ी. मैंने अपनी जीभ को वक्षों की घाटी से निकला और प्रियंका के बाएं वक्ष की ऊपरी सतह की कोमल और नाज़ुक त्वचा को चाटते-चूमते प्रियंका की रोमविहीन बायीं बगल की ओर बढ़ा. प्रियंका की बेफिक्र ऊंची-ऊंची आनन्दमयी सिसकारियाँ पूरे बैडरूम में गूँज रही थी.
जैसे ही मेरे होंठों ने प्रियंका की बगल की नरम-नाज़ुक त्वचा को छुआ, तत्काल प्रियंका के मुंह से लम्बी सी सिसकारी निकल गयी और प्रियंका का दायाँ हाथ बनियान के अंदर से मेरी पीठ पर जोर जोर से ऊपर-नीचे फिरने लगा.

मैंने प्रियंका की बगल में मुंह दे कर एक जोर से सांस ली; एक नशीली सी सुगंध मुझे बेसुध करने लगी; इस सुगंध में प्रियंका के जिस्म की ख़ुश्बू, प्रियंका के डिओ की ख़ुश्बू, काम-तरंग में डूबे नारी-शरीर में उठती वो अलग एक ख़ास मादक सी खुशबू… सब मिली-जुली थीं.
मैंने प्रियंका की कांख को चूमा… तत्काल प्रियंका के मुंह से एक आनन्दमयी और लम्बी सीत्कार निकल गयी और मैंने प्रियंका की बगल की अंदर वाली रेशम रेशम त्वचा को अपनी जीभ से चाटा. प्रियंका के पसीने की खुशबू के साथ साथ प्रियंका के पसीने का का हल्का सा नमकीन स्वाद साथ में शायद डियो का कसैला सा स्वाद था.
यही सब मैंने प्रियंका की दायीं कांख पर दोहराया. कसम से! मजा आ गया. इधर प्रियंका मारे उत्तेजना के बिस्तर पर जल बिन मछली की तरह तड़फ रही थी. बिस्तर की चादर पर मुट्ठियाँ कस रही थी, रह रह कर बिस्तर पर पाँव पटक रही थी, ऊँची ऊँची सिसकारियाँ ले रही थी, लम्बी लम्बी सीत्कारें भर रही थी.

अचानक ही प्रियंका अपने दोनों हाथों से मेरी बनियान को ऊपर को खींचने लगी. मैंने ज़रा सा उठ कर फ़ौरन अपनी बनियान उतार फेंकी और साथ ही प्रियंका के कन्धों से उसकी ब्रा की पट्टियाँ बाहर की तरफ दाएं-बाएं उतार कर प्रियंका की आँखों में देखा. अब की बार प्रियंका ने पूरी बेबाकी से मुझ से नज़र मिलाई. काम-मद के कारण हो रही प्रियंका की गुलाबी आँखों में आने वाले पलों में मिलने वाले शाश्वत काम-आनन्द की बिल्लौरी चमक थी, उसकी सांस बेहद तेज़ चल रही थी और होंठ रह रह कर लरज़ रहे थे.
हम दोनों के बीच में से एक दूसरे से शर्म-हया नाम का अहसास कब का विदा ले चुका था. अब मैं और प्रियंका चाहे दो अलग-अलग जिस्म थे लेकिन एक जान हो चुके थे.
प्रणय के इस आदिम-खेल में अगली सीढ़ी चढ़ने का वक़्त आ गया था.

मैंने प्रियंका के पूरे जिस्म पर एक भरपूर नज़र मारी. बिस्तर पर सीधा लेटा पर तना हुआ एक स्वस्थ नारी शरीर. दोनों मरमरी बाहें सर के नीचे, रेशम-रेशम रोमविहीन साफ़ सुथरी त्वचा, तन का ऊपरी भाग लगभग आवरणहीन, दो अपेक्षाकृत गोरे उरोज़ जिन पर एक ढीली सी ब्रा के कप पड़े हुए, सपाट किसी भी दाग-धब्बे से रहित पेट के बीचोंबीच एक बायीं ओर विलय लेती हुई गहरी नाभि. नाभि से ढाई-तीन इंच नीचे से क्रीम रंग की पिंडलियों तक लम्बी एक कैपरी, नाज़ुक साफ़-सुथरी दायीं टांग के ऊपर बायीं टांग, दोनों पैरों के नाख़ून थोड़े बड़े पर अच्छे से तराश कर उन पर लाल रंग की नेलपॉलिश लगी हुई. टांगों के ऊपरी जोड़ पर कैपरी पर स्पष्ट बना एक V का आकार जिस में V की ऊपरी सतह कुछ उभरी-उभरी सी थी.
अप्सरायें शायद ऐसी ही होती होंगी.

मैंने झुक कर प्रियंका की गर्दन के निचले भाग पर अपने होंठ टिका दिए. तत्काल प्रियंका के मुंह से एक तीखी सिसकारी निकली। प्रिय के वक्ष अभी तक पूर्ण रूप से अनावृत नहीं हुए थे अपितु दोनों उरोजों पर ब्रा के कपों के ढीले से ही सही पर आवरण पड़े थे और मैं उन्हें अपने हाथों की बजाए होंठों से हटाने पर तुला हुआ था.
प्रियंका को इसका बराबर एहसास था और वो अपनी आँखें बंद कर के इस स्वर्गिक आनन्द के अतिरेक की अभिलाषा में बेसुध सी हो रही थी.
मेरे होंठ प्रियंका की गर्दन से धीरे धीरे नीचे की ओर सरकने लगे और प्रियंका के शरीर में भी शनै: शनै: हलचल तेज़ होने लगी. सर्वप्रथम उसके दोनों हाथ मेरे सर के पिछली ओर आ जमे और मुझे और मेरे होंठों को नीचे की ओर गाईड करने लगे, दूसरे, प्रियंका के मुंह से रह रह कर तेज़ सिसकारियाँ और आहें निकलने लगी- सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!! आई..ई..ई..ई.!!!! आह..ह..ह..ह..ह… ह..ह..ह!!!! उफ़..आ..आ..आ.. आ..आ.आ!!

अचानक मेरे गाल के धक्के से प्रिये के दाएं उरोज़ का कप थोड़ा ऊपर उठ तो गया लेकिन अभी प्रियंका की पीठ पर ब्रा का हुक बंद होने की वजह से हटा नहीं. लिहाज़ा मेरी होंठों और जीभ का सफ़र उस पर्वत की चोटी पर पहुँचने से पहले ही रुक गया. तत्काल मैंने अपने होंठों और जीभ का रुख अपने दायीं ओर मोड़ लिया और दोनों पर्वतों के बीच की घाटी को चुम्बनों से भरता हुआ और अपने मुंह के स्राव से गीला करता हुआ दूसरे पर्वतश्रृंग की ओर अग्रसर हुआ.
लेकिन यह यात्रा तो और भी जल्दी रुक गयी; अचानक ही प्रियंका ने मुझे पीछे हटाया और उठ कर बैठ गयी; अपने दोनों हाथ पीछे कर के ब्रा का हुक खोल कर ब्रा को परे रख दिया और अपने दोनों हाथ ऊँचे कर के अपने सर के आवारा बालों को संभाल कर, बालों की चोटी का जूड़ा करने लगी।
बाई गॉड! क्या नज़ारा था।
उजला गेहुंआ रंग, सिल्क सा नाज़ुक जिस्म, अधखुली नशीली आँखों के दोनों ओर बालों की एक-एक आवारा लट, हाथों की जुम्बिश के साथ-साथ वस्त्र विहीन, सख़्त और उन्नत दोनों उरोजों की हल्की हल्की थिरकन, दोनों उरोजों के ऊपर एक रुपये के सिक्के के आकार के हल्के बादामी घेरे और उन दो घेरों के बीचों-बीच 3-D चने के दाने के आकार के कड़े और तन कर खड़े निप्पल जो उरोजों की हिलोर से साथ-साथ ऐसे हिल रहे थे कि जैसे मुझे चुनौती दे रहे हों.
अधखुले आद्र और गुलाबी होंठों में बालों पर चढ़ाने वाला काला रबर-बैंड और बालों में बिजली की गति से चलती दस लम्बी सुडौल उंगलियाँ।

यकीनन मेरी कुंडली में शुक्र बहुत उच्च का रहा होगा तभी तो रति देवी मुझ पर दिल खोल कर मेहरबां थी.
तभी प्रियंका अपने बाल व्यवस्थित करने के उपरान्त मेरी ओर झुकी, उसकी कज़रारी आँखों में शरारत की गहन झलक थी.
अचानक ही प्रियंका ने मुझे पीछे हटाया और उठ कर बैठ गयी; अपने दोनों हाथ पीछे कर के ब्रा का हुक खोल कर ब्रा को परे रख दिया और अपने दोनों हाथ ऊँचे कर के अपने सर के आवारा बालों को संभाल कर, बालों की चोटी का जूड़ा करने लगी।
बाई गॉड! क्या नज़ारा था।

नाज़ुक जिस्म, अधखुली नशीली आँखों के दोनों ओर बालों की एक-एक आवारा लट, हाथों की जुम्बिश के साथ-साथ वस्त्र विहीन, सख़्त और उन्नत दोनों उरोजों की हल्की हल्की थिरकन और तन कर खड़े निप्पल जो उरोजों की हिलोर से साथ-साथ ऐसे हिल रहे थे कि जैसे मुझे चुनौती दे रहे हों.
अधखुले आद्र और गुलाबी होंठों में बालों पर चढ़ाने वाला काला रबर-बैंड और बालों में बिजली की गति से चलती दस लम्बी सुडौल उंगलियाँ।
यकीनन मेरी कुंडली में शुक्र बहुत उच्च का रहा होगा तभी तो रति देवी मुझ पर दिल खोल कर मेहरबां थी.
तभी प्रियंका अपने बाल व्यवस्थित करने के उपरान्त मेरी ओर झुकी, उसकी कज़रारी आँखों में शरारत की गहन झलक थी.

इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता या कर पाता, प्रियंका बैठे-बैठे आगे को झुकी, अपना बायाँ हाथ मेरे दाएं कंधे पर रखा और झुक कर मेरे बायें स्तनाग्र पर अपनी जीभ लगा दी. क्षण भर बाद ही प्रियंका मेरे बाएं स्तन का निप्पल चूस रही थी.

गहरी उत्तेजना की एक लहर मेरे अंग-अंग को सिहरा गयी. मैं ऐसी कामक्रीड़ा का आदी न था और यह सिनेरिओ मुझे सूट नहीं कर रहा था. कुछ पल तो मैंने ज़ब्त किया लेकिन फिर प्रियंका को दोनों कन्धों से पकड़ कर पीछे हटाया और बहुत कोमलता से वापिस बिस्तर पर लिटा कर प्रियंका की कैपरी का हुक खोला और साथ ही ज़िप नीचे की और अपने दोनों हाथ प्रियंका के कूल्हों के दाएं-बाएं जमा दिये.
प्रियंका ने तत्काल इशारा समझा और अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठा दी; मैंने तत्काल और देर ना करते हुए कैपरी को प्रियंका के शरीर से अलग किया.

पाठकगण! आप आँखें बंद कर के जरा कल्पना करें कि बिस्तर पर उस एक पूर्ण जवान और सोलह कला सम्पूर्ण कामविह्ल कामांगी की जो सिर्फ़ एक काले रंग की छोटी सी पैंटी में थी जो बस जैसे तैसे उसकी योनि को अनावृत होने बचाये हुई थी.

मैंने ऊपर से नीचे तक प्रियंका के दिलकश शरीर का गहन अवलोकन किया. प्रियंका के बायें उरोज़ के निचली ओर हल्के से बाहर की ओर, सफेद त्वचा पर शहद के रंग का एक बर्थ-मार्क था, दाएं उरोज़ के निप्पल के बादामी घेरे के बिलकुल ऊपर साथ में सफेद त्वचा पर एक काले रंग का तिल था. एक तिल दोनों उरोजों के बीच की घाटी की तलहटी में छुपा था. दाएं जाँघ के अंदर की ओर ऊपर की ओर दो तिल आजू-बाज़ू थे.

अभी मेरा अवलोकन पूरा भी नहीं हुआ था कि प्रियंका ने जल्दी से मेरा बाज़ू पकड़ कर मुझे अपने ऊपर गिरा लिया और तत्काल अपने दाएं हाथ से मेरे पजामे के ऊपर से ही मेरे गर्म और फौलाद की तरह सख़्त लिंग को अपनी ओर खींचने लगी.

प्रियंका प्रेम की पराकाष्ठा पर जल्दी से पहुँचने के लिए तमाम बंधन तोड़ने पर उतारू थी लेकिन मैं आज के अपने इस अभिसार को सदा-सर्वदा के लिए यादगार बनाने पर कटिबद्ध था. आज का मेरा और प्रियंका का अभिसार बहुत उन्मुक्त किस्म का था.

एक तो प्रियंका अभिसार में मुझ से अधिक से अधिक काम-सुख लेने के लिए, मुझ से मेरी पत्नी की तरह अधिकारपूर्वक व्यवहार कर रही थी, दूसरे… चूंकि आज घर में कोई नहीं था इसलिए अभिसार के दौरान प्रियंका के मुंह से निकलने वाली सिसकियों और सीत्कारों को किसी द्वारा सुन लेने का भय ना होने की वज़ह से प्रियंका का आज बिस्तर में व्यवहार बहुत ही बिंदास था.

मैं प्रियंका के नंगे जिस्म पर पूरा छा गया और धीरे से मैंने प्रियंका के दाएं उतप्त उरोज को अपनी जीभ से छुआ, तत्कार प्रियंका के शरीर में एक झनझनाहट की लहर सी उठी और प्रियंका ने अपने दोनों हाथों से मेरे सर के बाल अपनी मुठियों में कस लिया और खींच कर मुझे अपने तन से साथ लगाने का प्रयत्न करने लगी.

यूं तो मेरा सारा बदन प्रियंका के बदन के साथ ही लगा हुआ था लेकिन मैं जानबूझ कर थोड़ा सा ऑफ़-लाईन था… बोले तो… मेरी दायीं जाँघ प्रियंका की दोनों टांगों के बीच में थी,प्रियंका की दायीं टांग मेरी दोनों टांगों के बीच में कसी हुई थी, प्रियंका की योनि की गर्मी मेरी दायीं जाँघ का बाहर वाला ऊपरी सिरा झुलसाये दिए जा रही थी. मेरा फ़ौलादी लिंग प्रियंका की नाभि की बग़ल में टक्करें मार रहा था.

धीरे धीरे मैंने अपनी जीभ और होंठों को नये आयामों, नयीं ऊंचाइयों तक पहुंचाना शुरू किया. प्रियंका के दाएं वक्ष के शिखर पर बादामी घेरे को जीभ से पहले छूना फिर हल्के हल्के जीभ से चाटना शुरू किया. मैं उस वक्ष के बादामी घेरे पर अपनी जीभ निप्पल को बिना छूए दाएं से बाएं और फिर बाएं से दाएं फ़िरा रहा था और बेचैन प्रियंका अपने एक हाथ से अपना वक्ष पकड़ कर निप्पल मेरे मुंह में देने का बार बार प्रयास कर रही थी लेकिन मैं हर बार साफ़ कन्नी काट जाता था.

अचानक प्रियंका ने मेरे सर के पीछे के बाल अपने बाएं हाथ में कस कर जकड़ लिए और दाएं हाथ से अपना वक्ष पकड़ कर निप्पल बिलकुल मेरे होंठों पर रख दिया. जैसे ही मैंने अपने तपते होंठो में प्रियंका के उरोज़ का निप्पल लिया तत्काल ही प्रियंका के मुंह से एक तीखी किलकारी सी निकली और फ़ौरन ही प्रियंका ने अपना दायाँ हाथ नीचे ले जा कर पजामे के ऊपर से ही मेरा लिंग सख्ती से दबोच लिया और उसे आगे-पीछे हिलाने लगी.

मैंने प्रियंका का दायाँ निप्पल अपने मुंह में चुमलाते चुमलाते ज़रा अपने बायीं ओर करवट लेते हुए अपना दायें हाथ नीचे कर के अपने पजामे का नाड़ा खोल कर और पजामा घुटनों तक नीचे सरका कर प्री-कम से सराबोर अपना लिंग प्रियंका के हाथ में थमा दिया.

तत्काल प्रियंका अपनी उंगलियाँ मेरे लिंग के शिश्नमुंड पर फेरने लगी और मुठी में ले कर अपनी उँगलियों से मेरे लिंग की लम्बाई नापने लगी. इधर मेरे मुंह में अंगूर का दाना और सख्त, और बड़ा होता जा रहा था जिसे जब मैं बीच बीच में हल्के से अपने दाँतों से दबाता था तो न सिर्फ प्रियंका के मुंह से आनन्द भरी सीत्कारें निकलती थी बल्कि मेरे लिंग पर प्रियंका की उंगलियाँ और ज़्यादा कस जाती थी.

मैंने प्रियंका के निप्पल को मुंह से निकला और प्रियंका के वक्ष से ज़रा सा परे उठ बैठा तो प्रियंका को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और तत्काल प्रियंका ने नाराज़गी की सिलवटों भरे माथे सहित मेरी और देखा.
मुस्कुरा कर मैंने प्रियंका का बायाँ गाल ज़रा सा थपथपाया अपना पजामा उतार कर साइड में रख दिया और अपने दोनों हाथ प्रियंका की पैंटी पर रख दिए.

प्रियंका फ़ौरन मेरी मंशा समझ गयी और उसने मुस्कुराते हुए अपने कूल्हे जरा से ऊपर हवा में उठा दिए. मैंने प्रियंका की आँखों में देखते देखते, अपनी दोनों हथेलियों को प्रियंका के कूल्हों, प्रियंका की दोनों जाँघों पर हल्के से रगड़ते हुये पैंटी को हौले हौले नीचे सरकाना शुरू किया. प्रियंका की पूरी पैंटी प्रिय के योनि स्राव से सनी पड़ी थी.

इस समय प्रियंका बला की हसीन लग रही थी. कामवेग के कारण रह रह कर उसकी आँखें बंद हो रही थी, वो बार बार अपने चेहरे पर हाथ फेर रही थी, उरोज़ों पर हाथ फेर रही थी, रह रह कर अपने होंठों को जीभ से गीला कर रही थी और अपना निचला होंठ बार बार अपने दांतों में कुचल रही थी.

प्रियंका की पैंटी अब घुटनों तक नीचे आ चुकी थी. तभी प्रियंका ने अपनी बायीं टांग को मोड़ा और एकदम से अपने बाएं पैर से अपनी पैंटी छिटक दी और इधर मैंने प्रियंका की दायीं टांग को पैंटी की पकड़ से मुक्त कर दिया. अब हम दोनों ही बर्थडे सूट में थे. ना तो कपड़े की एक भी धज़्ज़ी प्रियंका के तन पर थी ना ही मेरे.

मैंने प्यार से प्रियंका को निहारा… कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है? प्रियंका का रति-मंदिर अभी भी छोटा सा ही था बल्कि प्रियंका का शरीर थोड़ा भर जाने की वज़ह से पहले से भी छोटा लग रहा था. एक साफ़-सुथरा छोटा सा, बीच में से फूला सा V का आकार, जिस पर किसी रोम या बाल का नामोनिशाँ तक नहीं, जिसकी भुजाओं का ऊपर का खुला फ़ासिला तीन इंच से ज्यादा नहीं और बिलकुल मध्य में जरा सा नीचे की ओर गोलाई लेती एक पतली सी दरार जिस के ऊपरी सिरे पर से ज़रा सा झांकता भगनासा.

उस वक़्त प्रियंका की योनि में से एक बहुत ही मादक सी खुशबू उठ रही थी. मैं नारी शरीर के उस अत्यंत गोपनीय अंग को निहार रहा था जिसको कभी सूर्य चन्द्रमा ने भी नहीं देखा था. बहुत ही किस्मत वाले होते हैं वो लोग जिन पर कोई नारी इतना विश्वास करती है कि उन्हें अपने गोपनीय नारीत्व के प्रतीक अंगों को निहारने और छूने की इज़ाज़त देती है.

“आओ ना…” प्रियंका की गुहार सुन कर मैं बेखुदी के आलम से वापिस पलटा। मैंने बहुत ही नाज़ुकता से प्रियंका को अपनी गोदी में बिठा कर आगे-पीछे हिलना शुरू कर दिया. मेरा लिंग प्रियंका के नितम्बों की दरार के साथ साथ बाहर की ओर से प्रियंका के नितम्बों के साथ रगड़ खा रहा था, प्रियंका की दोनों टांगें मेरी साइडों से मेरे पीछे सीधे फैली हुई थी. प्रियंका की योनि से निकला कामरस मेरे लिंग की जड़ पर से हो कर नीचे की ओर बह रहा था.

मेरे दोनों हाथों ने प्रियंका की पीठ को कस के जकड़ा हुआ था और प्रियंका के सुपुष्ट उरोज़ मेरी छाती में धंसे हुए थे और मैं प्रियंका के मुंह पर, आँखों पर, माथे पर, गालों पर, होंठों पर प्यार की मोहरें लगाता ही जा रहा था और प्रतिक्रिया स्वरूप प्रियंका के मुंह से कभी आहें कराहें और कभी लम्बी लम्बी सीत्कारें निकल रही थी.

अचानक प्रियंका मेरी गोदी से उठी और बिस्तर पर लेट कर याचना भरी नज़रों से मुझे देखने लगी. मैं ऐसी नज़रों का मतलब बख़ूबी समझता था. तत्काल मैंने बहुत ही इज़्ज़त और प्यार से प्रियंका की रति-तेज़ से धधकती योनि पर अपना दायाँ हाथ रख दिया; उसकी योनि तो पहले से ही कामऱज़ से सराबोर थी और अभी भी ऱज़स्राव चालू था. मैंने हथेली का एक कप सा बनाया जिस में मेरी उंगलियाँ नीचे की ओर थी और उससे प्रियंका की योनि को पूरा ढाँप लिया. मेरी बड़ी उंगली प्रियंका की योनि के पद्मदलों पर ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर विचरण करने लगी.

इधर प्रियंका ने मेरा काम-ध्वज अपने हाथ में ले कर उस का मर्दन शुरू कर दिया था. मैंने भी प्रियंका के ऊपर लेटते हुए उस के दोनों उरोजों के मध्य में अपना मुंह लगा कर चूसना शुरू कर दिया।

मेरी इस हरकत से प्रियंका के छक्के छूट गये; प्रियंका को अपने जिस्म में उठती मदन-तरंग को संभाल पाना असंभव हो गया, उसके के मुंह से जोर जोर से आहें-कराहें फूटनी शुरू हो गयी और प्रियंका अपनी दोनों टांगें रह रह कर हवा में लहराने लगी- आई..ई..ई..ई.!!!! सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!! आह..ह..ह..ह..ह… ह..ह..ह!!!! उफ़..आ..आ.. आ..आ..आ.आ!! जोर से करो… हाँ यहीं… ओ गॉड!… जोर से… आह… मर गयी! सी… ई..ई..ई!

यूं मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि प्रियंका की आहों कराहों के बीच यह “जोर से करो… हाँ यहीं…!” वाली डायरेक्शन मेरे होंठों के लिए थी या प्रियंका की योनि का जुग़राफ़िया नापती मेरी उँगलियों के लिए? बहरहाल… मेरा और प्रियंका का काम-उत्सव धीरे-धीरे अपने चरमोक्षण की ओर अग्रसर था. मेरे ख्याल से प्रियंका एक से ज्यादा बार पहले ही स्खलित हो चुकी थी लेकिन मैं अभी तक डटा हुआ था. तीव्र काम-उत्तेज़ना के कारण मेरे नलों में हल्का-हल्का सा दर्द भी हो रहा था लेकिन प्रियंका को सम्पूर्ण रूप से पाने की लगन कुछ और सूझने ही नहीं दे रही थी.
फिर मैंने आहिस्ता से अपनी मध्यमा उंगली प्रियंका की योनि की भगनासा सहलाई और अपनी उंगली जरा सी नीचे ले जा कर दरार के ज़रा सी अंदर घुसायी; तत्काल प्रियंका के मुख से आनन्दमयी कराहटों के साथ “सी… ई… ई..ई..ई..ई..!” की एक तेज़ सिसकी निकल गयी जिस में दर्द का अंश भी शामिल था.

यह सही था कि अब प्रियंका अक्षत-योनि नहीं थी क्योंकि पिछले साल मैंने ही तो प्रियंका को सुहागिन बनाया था तदापि सवा साल पहले के किये गए एक बार के मैथुन का असर तो कब का योनि पर से विदा हो चुका था. प्रियंका की योनि के पद्म दल फिर से सिकुड़ कर योनि की गुफा को फिर से अत्यंत संकरा बना चुके थे, इसी कारण मेरी उंगली प्रियंका की योनि के जरा सी अंदर जाने से प्रियंका के मुंह से दर्द भरी सिसकारी निकली थी.

लेकिन इस बार मैं काम-क्रीड़ा से पहले अपनी उंगलियों से योनि के छेद को ख़ुला करने के मूड में हरगिज़ भी नहीं था. आज लिंग का काम लिंग ही करने वाला था. प्रियंका की योनि से काम-रस बेतहाशा बह रहा था. मैंने प्रिय के बाएं निप्पल को मुंह में ले कर चुमलाया, तत्काल प्रियंका मेरे लिंग को अपनी योनि की ओर खींचने लगी.
एक बार फिर से आजमायश की घड़ी आ रही थी लेकिन मुझे खुद पर, अपने कौशल पर, अपने प्यार पर और सब से बढ़ कर अपनी जान प्रियंका पर भरोसा था कि सब ठीक हो जाएगा. प्यार हो रहा था… कोई लड़ाई नहीं जिस में किसी के जीवन-मृत्यु का सवाल हो!
“आओ न…!” प्रियंका कसमसाई और उस ने बिस्तर पर अपनी टाँगे खोल दी.
मैं थोड़ा अचकचाया।
“आप को मेरी कसम… अब के जो तरसाया तो…!” प्रियंका के लफ़्ज़ों में मनुहार के साथ साथ आदेशात्मक गूंज थी.
अब न कहनी मुश्किल थी; मैं प्रियंका की खुली टांगों के बीच में आया. चाहे कामऱज़ की वजह से प्रियंका की योनि पहले से ही खूब चिकनी हो रही थी, तदापि चित टांगों के साथ योनि भेदन में प्रियंका को बहुत दर्द होना था तो मैंने प्रियंका के दोनों पैर मोड़ कर प्रियंका के नितंबों से करीब एक फुट की दूरी पर रख दिए; इससे प्रियंका की योनि की मांसपेशियाँ थोड़ी सी ढीली हो गयीं जिस से मुझे प्रियंका की योनि में अपना लिंग प्रवेश करवाने में थोड़ी सुविधा होने वाली थी.
मैंने अपना लिंग अपने दायें हाथ में ले कर शिश्न-मुंड प्रियंका की ऱज़ से सराबोर प्रियंका की योनि पर नीचे से ऊपर भगनासा तक और फिर भगनासा से नीचे की ओर, और फिर नीचे से ऊपर भगनासा तक घिसाना-रगड़ना शुरू किया।
अचानक मेरा लिंग प्रियंका की योनि की दरार पर घिसाते-घिसाते, योनि की दरार के बीच में जरा सा नीचे की और किसी नीची जगह पर अटक सा गया. उत्तेजना के मारे प्रियंका के मुंह से व्यर्थ से, आधे-अधूरे ऐसे लफ़्ज़ निकल रहे थे, जिन का कोई अर्थ नहीं था.
“आह… मर गयी… तरसा दिया मुझे… ओ पतिदेव… आप ने… ओ गॉड!… आई..ई… मेरे अंदर समा जाओ… मार डालो मुझे… आह..ह..ह..ह.. सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!!” इत्यादि!
बेखुदी के इस आलम में भी प्रियंका मुझे अपना पति ही तस्सवुर कर रही थी. इधर कितनी ही रातों का भटका हुआ और प्यासा मुसाफिर आखिरकार अपनी मंज़िल-ऐ-मक़्सूद के मयख़ाने के दरवाज़े पर दस्तक़ दे रहा था. मैं अपने लिंग-मुंड को वहीं अटका छोड़ कर प्रियंका के ऊपर लम्बा लेट गया. आने वाले क्षणों में मिलने वाले आनन्द का तस्सवुर कर के प्रियंका ने भी आँखें बंद कर के मुझे ज़ोर से अपने आलिंगन में ले लिया.
मैंने प्रियंका के होंठों के कई चुम्बन लिए और कहा- प्रियंका!
“हुँ..!”
“आँखें खोलो!”
“मैं नहीं… आप करो.”
“अरे! खोलो तो…!”
प्रियंका ने अपनी आँखें खोली. मेरी आँखें ठीक उस की आँखों से तीन इंच ऊपर थी. मोटी-मोटी काली आँखें जिन में प्यार और काम अपनी सम्पूर्णता के साथ झलक रहे थे. प्रियंका ने झट से मेरे होंठों पर एक चुम्बन जड़ा और अपने दोनों पैरों से मेरी कमर पर कैंची सी मार ली और लगी मेरी कमर अपनी ओर खींचने.
“नहीं प्रियंका, ऐसे नहीं… आराम से! ऐसे तुम्हें दर्द होगा.”
“मुझे परवाह नहीं!”
“लेकिन मुझे है.”
प्रियंका ने मुदित आँखों से मुझे देखा, मुस्कुरायी और फिर प्यार से मेरे होंठों को चूम लिया. मैंने वापिस प्रियंका के दोनों पैर मोड़ कर प्रियंका के नितंबों से करीब रख दिए और मैंने अपना लिंग थोड़ा सा पीछे को खींचा और जरा से और ज़ोर से आगे को धकेला।
“सी… ई… ई..ई..ई..ई..!!!” एक लम्बी सिसकी प्रियंका के मुंह से निकल गयी लेकिन हर चीज़ अभी कंट्रोल में ही थी, मैंने थोड़ा सा ज़ोर और लगाया, अब लिंग-मुंड प्रियंका की जलती धधकती योनि के अंदर था.

प्रियंका के दोनों हाथ मेरी पीठ पर कस कर जमे थे; प्रियंका की योनि के अंदर का उत्ताप मेरे लिंग को जलाने पर उतारू था जैसे. लेकिन पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं था. इसी पल का पूर्ण समग्रता से सामना कर के बिस्तर पर अपना विजय अभियान सार्थक करने वाला ही सही मायने में मर्द कहलाता है और मुझे तो कुछ नया साबित भी नहीं करना था, सिर्फ अपने सामर्थ्य के पिछले कृत्य को एक नया मोड़ दे कर दोहराना भर था.
अभी भी प्रियंका के दोनों पैर उसके नितम्बों के पास थे और दोनों टांगों के घुटने हवा में खड़े थे. एक बार मेरा लिंग प्रियंका की योनि की अंतिम सीमा छू ले तो मैं प्रियंका की टांगें सीधी करवा देता लेकिन अगर कहीं अभी से प्रियंका ने टांगें सीधी कर ली तो प्रियंका को फिर से अक्षत-योनि भेदन वाला दर्द याद आ जाना था. मैंने प्रियंका के बाएं उरोज़ के निप्पल के साथ अपनी जीभ लड़ायी. अर्धसुप्त योद्धा एकदम से चैतन्य हो कर तन गया.
मैंने धीरे से निप्पल को चूमा और हल्के से उस के आसपास अपनी जीभ फेरी. प्रियंका के मुंह से निकली सिसकारी ने बता दिया कि प्रियंका की समस्त चेतना अभी उस के बाएं उरोज़ पर केंद्रित थी, मैंने अपने लिंग को हल्का सा पीछे खींच कर ज़रा ज़ोर से आगे को किया. अब आधा लिंग योनि में समा चुका था.

तत्काल प्रियंका ने मेरे सर के पीछे से बाल पकड़ मुझे थोड़ा परे धकेलने की कोशिश की लेकिन मैं ऐसे कैसे पीछे हटता!
मैंने अपनी वही पुरानी तक्नीक अपनायी, लिंग थोड़ा सा योनि से बाहर खींच कर जहाँ था, फिर से वही पहुंचा दिया, फिर थोड़ा बाहर निकाला और फिर जहाँ था, वही पहुंचा दिया, ऐसा मैं करता ही चला गया. पांच-सात मिनट बाद प्रियंका थोड़ा सहज़ हो गयी और मेरी ताल पर अपनी ताल देने लगी, इधर मैं अपना लिंग उस की योनि से बाहर खींचता तो प्रियंका अपने नितम्ब पीछे खींच लेती और जैसे ही मैं अपना लिंग उस की योनि में आगे धकेलता, प्रियंका अपने नितंब ऊपर को उछालती।

हर थाप के साथ मेरा लिंग, प्रियंका की योनि में थोड़ा और ज्यादा गहरे समाने लगा. तीन-चार मिनट बाद ही मेरा लिंग पूरे का पूरा प्रियंका की योनि में आने-जाने लगा. इधर ऊपर मेरा मुंह प्रियंका की बायीं बगल में कब समा गया, मुझे पता ही नहीं चला. मैं जीभ से प्रियंका के रस-भरे उरोज़ चाटता, चूसता प्रियंका की बालों रहित बगल में प्रियंका के पसीने की मादक सुगंध लेता-लेता बगल की रेशमी त्वचा चूम रहा था. प्रियंका इस आनन्द के कारण सातवें आसमान में थी और मैं जन्नत में. थप्प-थप्प… थप्प-थप्प… थप्प-थप्प…!! नीचे कबीरदास की चक्की पूरे यौवन पर चल रही थी.

प्रियंका ने चूस-चूस कर मेरा निचला होंठ सूज़ा दिया था, आवेश में आ कर अपने तीखे नाखूनों से मेरी पीठ पर अनगिनत खूनी लकीरें उकेर दी थी. मैंने भी उत्तेज़ना-वश चूस-चूस कर प्रियंका के दोनों उरोजों पर जगह जगह अनगिनत निशान डाल दिए थे.
मैं इन आनन्द के क्षणों को पूर्ण रूप से महसूस करना चाहता था इस लिए मैंने अपने लिंग को प्रियंका की योनि में गहराई में लेजा कर अचानक वहीँ रोक दिया. मैं अपने लिंग के चारों ओर प्रियंका की योनि की हल्की-हल्की पकड़ और स्पंदन महसूस कर रहा था. जैसे रेशम की नर्म-गर्म सी, नाज़ुक सी मुट्ठी जैसी कोई चीज़ मेरे मेरे लिंग पर रह-रह कर कस रही हो.
कुछ पल मैं इस स्वर्गिक आनन्द का मज़ा लेता रहा और फिर प्रियंका ने मुझे टहोका तो मैंने फिर से काम-क्रीड़ा शुरू की. अभी तीन चार बार ही

अपने लिंग को प्रियंका की योनि के निकाला डाला था कि अचानक प्रियंका ने अपनी दोनों टांगें सीधी कर ली; तत्काल मुझे अपने लिंग पर प्रियंका की योनि का एक ज़बरदस्त खिंचाव महसूस हुआ. मेरा लिंग जैसे किसी नर्म-ग़र्म संडासी में कस गया था. प्रियंका की योनि की दीवारों की मेरे लिंग पर रगड़ कई गुना बढ़ गयी थी और साथ ही प्रियंका के मुंह से निकने वाली आहों कराहों में गज़ब की तेज़ी आ गयी थी.
प्रियंका के टाँगें बिस्तर पर सीधी करने से प्रियंका की योनि में आये अति कसाव के कारण मेरे लिंग का प्रियंका की योनि में घर्षण बहुत ही बढ़ गया था और लिंग का योनि में आवा गमन बहुत मुश्किल हो रहा था.

जैसे ही अपने लिंग को मैं बाहर निकाल कर दोबारा योनि में धकेलने के लिए जोर लगाता था, प्रियंका के मुंह से इक दर्द भरी आह निकल जाती थी. प्रियंका की योनि में से कामरस के साथ साथ जैसे आग की लपटें निकल रही थी.
दोनों के लिए काम-शिखर अब ज्यादा दूर नहीं था. मैंने अपनी कमर की स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी; प्रियंका ने भी उसी अनुपात में अपनी कमर आगे पीछे करनी शुरू कर दी. प्रियंका की आँखें बदस्तूर बंद थी लेकिन प्रियंका स्वार्गिक-आनन्द के इन पलों के एक-एक क्षण का मज़ा ले रही थी. मेरे हर धक्के के साथ प्रियंका के मुंह से एक जोरदार “हक़्क़…” या “हा…!” की आवाज़ निकल जाती थी.
शनै:शनै: प्रियंका के शरीर में एक अकड़न सी उभरने लगी और मुंह से अस्पष्ट से शब्द निकलने लगे “ऊँ… ऊ… ऊँ… ऊँ… हाँ… आँ… हा… हाय… उ… हक़्क़… ई… ई… इ… ई… ई..इ… ग… यी”. प्रियंका का स्खलन अब दूर नहीं था और मैं भी अपनी मंज़िल के करीब ही था. मैंने अपना सारा वज़न अपनी कोहनियों पर ले लिया और अपनी कमर को बिजली की सी तेज़ी से चलाने लगा.
प्रियंका की सिसकारियाँ पूरे बैडरूम को गुँजाये दे रही थी जिन्हें सुन कर मैं और उत्तेजित हो कर हर वार पर बेरहमी से प्रियंका की योनि में अपने लिंग को जड़ तक उतारे जा रहा था.
तभी प्रियंका ने अपने दोनों हाथ मेरी पीठ पर ऐसी सख्ती से जकड़े कि प्रियंका का ऊपर वाला धड़ हवा में मेरी छाती के साथ चिपक गया. प्रियंका बेसाख्ता मुझ पर चुम्बनों की बरसात किये दे रही थी और नीचे मेरा लिंग प्रियंका की योनि को बिजली की तेज़ी से मथे दे रहा था.
अब तक मेरे लिंग पर प्रियंका की योनि की दीवारों का दबाब इस कदर बढ़ गया था कि मेरे लिए अपना लिंग प्रियंका की योनि से बाहर खींचना लगभग नामुमकिन सा हो गया था. अचानक प्रियंका का तमाम शरीर अकड़ने लगा, प्रियंका ने मेरे बाएं कंधे पर जोर से काटा और एक जोर से “आ… आ… आ… आ… आ… ह… ह… ह..ह…!!! ” की चीख सी मारी. साथ ही प्रियंका की आँखें उलट गयी तथा वो निष्चेष्ट सी हो कर मेरी बाहों में झूल गयी.
प्रियंका स्खलित हो चुकी थी.

मुझे प्रियंका की योनि के अंदर अपने लिंग के आसपास गर्म-गर्म द्रव सा महसूस होने लगा. जैसे ही मैंने अपना लिंग पूरी सख्ती से प्रियंका की योनि से बाहर खींच कर वापिस प्रियंका की योनि की गहराई की आखिरी हद तक पंहुचाया, तभी मेरे अंदर… मेरे खुद का ज्वालामुखी फट पड़ा. मैंने प्रियंका को सख्ती से अपनी बाहों में कस लिया और प्रियंका की योनि के अंदर मेरे लिंग से वीर्य की जोरदार एक बौछार हुई… फिर दूसरी… फिर तीसरी. मेरे वीर्य से प्रियंका की योनि बाहर तक सराबोर हो उठी और मैंने पसलियाँ तोड़ देने की हद तक प्रियंका को अपने आलिंगन में दबा डाला.
अचानक ही प्रियंका जैसे होश में आयी और मेरी सख्त पकड़ से खुद को छुड़ा कर प्रियंका ने मुझे ठीक अपने ऊपर, अपने आगोश में ले लिया और मेरे सर के बालों में अपनी उंगलियाँ फेरने लगी. सामने दीवार घड़ी पर साढ़े चार बज़ रहे थे. हम दोनों ने एक-दूसरे के साथ किया वादा निभा दिया था. अभी तो हम दोनों एक-दूसरे के आगोश में थे लेकिन अब जिंदगी में कभी ऐसा मौक़ा दोबारा आएगा या नहीं… और अगर आएगा भी तो प्रियंका पॉजिटिव रेस्पॉन्स देगी या नहीं, इस का जवाब तो भविष्य के गर्भ में ही था.

Updated: July 17, 2018 — 12:17 pm

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गुरु मस्तराम

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