खूबसूरत चूत ने पहले किसी लंड का मज़ा नहीं चखा

ऑफ़िस के काम से मुझे छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बे में जाना पड़ा. हमारी कंपनी एक मल्टी नैशनल कंपनी है. कंपनी की ओर से मुझे होटल, खाने पीने और सफ़र के सारे ख़र्चे मिल जाते हैं. जैसा कि हर आम आदमी का ये उसूल है कि कंपनी को चूतिया बनाओ और पैसे बचाओ. वैसे ही मैं भी ऑफ़िस से मिले पैसों को बचाने की कोशिश करता हूं और फिर उन पैसों से ऐश करता हूं.

उस कस्बे मे मुझे कंपनी के प्रॉडक्ट की रिसर्च करनी थी. सबसे पहले तो मैने सोचा कि कोई बहुत ही सस्ता सा होटल या गेस्ट हाउस ढूंढ़ा जाए और वहां के मैनेजर को पटा कर बहुत बड़ा सा बिल बनाया जाए, ताकि ऑफ़िस में सबमिट करके पैसे बना सकू. मावली पोरा जाने के लिए मुझे जमाल पुर स्टेशन उतरना था. जमाल पुर उतर कर मैने रिक्शे वाले को तलाश करना शुरू किया. शाम हो चली थी. स्टेशन के बाहर रिक्शे वाले नहीं थे, लोग बैल गाड़ी ले कर खड़े थे. ट्रांसपोर्ट का यहां यही साधन था. मैने एक नौजवान बैलगाड़ी वाले को बुलाया और पूछा कि मावली पोरा जाने का वो क्या लेगा. वो बोला, साब कुछ भी दे देना. आप जैसे साब लोग तो यहां कभी कभी ही आते हैं. आप तो हमारे मेहमान हैं. कुछ भी दे देना.

मैं उसकी बैल गाड़ी में बैठ गया. बैलगाड़ी चल पड़ी. उसने किसी फ़िल्मी बैल गाड़ी वाले की तरह एक स्थानीय गीत गाना शुरू कर दिया. धीरे धीरे अंधेरा छाने लगा था. मैंने उससे पूछा… तुम्हारा नाम क्या है.
वो बोला… साब वैसे तो हमारा नाम गोपाल है, लेकिन लोग हमें गोपु कहते हैं. फिर उसने पूछा… साब, यहां किससे मिलने आए हो ?

किसी से भी नहीं. मैं अपनी कंपनी के काम से आया हूं. दो दिन रहूंगा.”

किस के घर पर रहोगे ?’

घर पर कहां. होटल में.”

वो हंस कर बोला, “होटल कहां है यहां साब, एक गेस्ट हाउस है….

” हां तो वहीं रह लूंगा.”

मेरी बात मानिए साब तो यहां के डाक बंगले में रहिए… सस्ता पड़ेगा.

” डाक बंगले में ? पर वो तो सरकारी होता है.”

“काहे का सरकारी साब… जब भी आप जैसा कोई साब यहां आता है, वहीं रहता है… वहां का चौकीदार कुछ पैसे ले कर रहने, खाने पीने का प्रबंध कर देता है.

” ठीक है तो मुझे वहीं ले जाओ.” लगभग बीस मिनट के बाद मावली पोरा गांव आ गया. बैल गाड़ी वाला मुझे डाक बंगले ले गया और बोला, “साब आप यहीं ठहरो, मैं दमन को बुला कर लाता हूं…”

दमन कौन?” मैंने पूछा. वही इस डाक बंगले का चौकीदार.” वो चला गया और फिर थोड़ी देर बाद एक बूढ़े आदमी को साथ ले कर आ गया.

साब ये दमन है. आप बात कर लीजिए.”

मैंने कहा, “ कितने पैसे लोगे भाई दो रात गुजारने के?”

वो चापलूसी से मुस्कुराया और बोला…“साब आप तो हमारे मेहमान हैं… कुछ भी दे देना.”

मैं हंस कर बोला…“ यहां जो भी आता है, गांव वालों का मेहमान होता है क्या… चलो बताओ, कितना लोगे ?’

वो कुछ झिझकते हुए बोला…“ सौ रुपये दे देना साब’

मैं मन ही मन में खुश हो गया. कंपनी को दो हज़ार का चूना लगाऊंगा. मैंने कहा, ठीक है… ये बताओ, कुछ खाने पीने को मिलेगा क्या अभी ?

वो बोला, क्यों नहीं साब… अभी हम अपनी लड़की को बोल देते हैं… फटाफट तैयार कर देगी. आप क्या खाते हैं… बैजिटेरियन या नान बैजिटेरियन?

मुझे फिर हंसी आ गई …. नॉन वेज मिल जाए तो मजा आ जाए.

अभी लो साब…. अभी आपके लिए एक देसी मुर्गी तैयार कर देते हैं. आप आराम करो जब तक.

मैने बैल गाड़ी वाले को दस रुपये दिए. वो खुश हो कर चला गया. चौकीदार मुझे डाक बंगले में ले गया. मैने देखा कि डाक बंगला अच्छा खासा था. एक साफ सुथरा बेड था और रूम भी काफी बड़ा था. उसने पंखा चालू कर दिया और खाने का इंतज़ाम करने चला गया.

सफ़र की थकान उतारने के लिए मैंने सोचा नहा धो कर फ्रेश हो लिया जाए. बाथ रूम गया तो पानी नहीं था. मैं चौकीदार का इंतज़ार करने लगा. इतने में दरवाज़े पर नज़र गई तो आंखे चौंधिया गईं. एक बीस बाईस साल की लड़की कमर पर पानी का घड़ा लिए खड़ी थी.

मैं उसे देखता ही रह गया. ऐसा लगा जैसे चांद निकल आया हो. वो अंदर आ गई और बोली…. बापू ने भेजा है… मोरी में पानी नहीं है… ये रखने आई हूं.

मैं थूक निगल कर बोला… रख दो. वो बाथ रूम में पानी का घड़ा रखने चली गई और मैं सोचने लगा, ऐसे पिछड़े गांव में भी हुस्न है ! पानी रख कर वो सर झुकाए मेरे सामने से चली गई और मैं उसकी मस्त चाल और कमर के नीचे के भाग को मतवाले अंदाज़ में हिलता देखता रह गया.
मैं बिस्तर पर लेट गया. नहाने का इरादा मैंने छोड़ दिया. एक घड़े पानी में क्या नहाऊं. थोड़ी देर बाद चौकीदार आया और बोला… साब, खाना थोड़ी देर में तैयार हो जाएगा…. हमारी बेटी आ कर दे जाएगी. और कुछ चाहिए तो उसे बोल देना..
लगभग एक घंटे बाद वो लड़की खाने पीने का सामान ले कर आ गई. उसने सलीके से टेबल पर खाना लगा दिया और फिर मेरी तरफ़ देखने लगी.

मैने कहा, ठीक है. मैं खा लूंगा. वो चली गई. मैने खाना शुरू किया. खाना अच्छा पका था. भूख लगी थी, शायद इसलिए खाना अच्छा लग रहा था. थोड़ी देर बाद वो बरतन लेने चली आई और सब सामान समेट कर चली गई. मैंने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया. पांच मिनट बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई. मैने उठ कर दरवाज़ा खोला तो वही खड़ी थी. मैंने हैरत से पूछा… क्या बात है ?

वो बोली… और कुछ तो नहीं चाहिए ?

नहीं, और क्या है… चाय मिल सकती है क्या ?

चाय तो नहीं है साब….सुबह मिलेगी. तो और कुछ नहीं चाहिए. वो अंदर चली आई.

मैं हैरत से उसे देखने लगा. वो मुस्कुराई और मेरी आंखों में देखती हुई बोली. आप थक गए होगे, मालिश करवा लीजिए.

मालिश??? कौन करेगा मालिश ???

मैं और कौन ?

क्या ?

हां साब. हम बहुत अच्छा मालिश करते हैं.

मैं उसे देखने लगा. वो लगातार मुस्कुरा रही थी. मुझे ये समझते देर न लगी कि ये लड़की काफ़ी अनुभवी लगती है. फिर भी मैंने उससे पूछा…. किस तरह की मालिश करती हो ?

साब, हम दो तरह की मालिश करते हैं…. गरम और ठंडा.

गरम क्या होता है और ठंडा क्या ?

गरम मालिश में हम तेल लगाते हैं और ठंडे में ऐसे ही.

मेरे बदन में झुरझुरी सी आ गई. मैने दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए कहा… तुम्हारे पिताजी को मालूम है कि तुम इस तरह मालिश करती हो.

अरे उन्होंने ही तो भेजा है. कहा है कि मेहमान को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए.

अंधा क्या चाहे दो आंखें. मैं अपनी खुशी को दबाते हुए बोला… ठीक है, तो कर दो…. मालिश.

गरम या ठंडा?

दोनों ही कर दो…. देखें क्या फर्क है दोनों में.

वो मुस्कुराई और दरवाज़ा बंद करने चली गई. मेरा सारा जिस्म हल्के हल्के कांपने लगा. मैं आगे होने वाली घटना को याद करके थरथराने लगा.

कपड़े उतार दो साब, वो बोली….

मेरा हलक सूखने लगा. लड़खड़ाते हुए लहजे में मैंने पूछा… कक्क…क्या ? कपड़े…

उतार दो. मालिश क्या यूं ही करवाओगे ?

हां… हां… ठीक है. मेरी हालत ख़राब हो रही थी. मैंने कांपते हाथों से अपना शर्ट उतारा और उसे देखने लगा.

वो हंसी और बोली… लेट जाइए.

अच….छा !

मैं चित हो कर बिस्तर पर लेट गया. वो भी पलंग पर चढ़ गई. फिर उसने अपने घाघरे की नाड़ी में ठंसी हुई तेल की बोलत निकाली और उसे खोलने लगी. मैने बच्चों की तरह पूछा… तेल है ? कौनसा तेल है ?

सरसों का…

बहुत अच्छा होता है मालिश के लिए.

हां, मैने भी सुना है. उसने मेरी छाती पर थोड़ा से तेल उंडेला और हल्के हल्के मलने लगी. मेरी रग रग में बिजली सी दौड़ गई. उसके हाथ बहुत कोमल और गर्म थे, या पता नहीं तेल ही गर्म था. धीरे धीरे वो अपना हाथ मेरे पेट तक ले गई और फिर मेरी नाभि में उंगली करने लगी. मेरी घबराहट कम होने लगी और मुझे मज़ा आने लगा. मैं उसे लगातार देख रहा था. वो काफ़ी सुंदर थी. आंखें किसी हिरनी की तरह काली और गहरी थी और अब उसमें लाली सी छाने लगी थी. मैंने देखा कि उसके गाल भी सुर्ख हो रहे हैं. वो धीमे धीमे मुस्कुरा रही थी. उसके दोनों हाथ मेरी छाती और पेट को मल रहे थे. फिर उसने धीरे से अपनी उंगलियां मेरी पैंट के अंदर डाल दी और उसके हाथों में मेरे लंबे लंबे झांट आ गए.

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