मेरा बचपन जवानी मे बदल गया

हाय दोस्तों,
मेरा नाम सुमन चौहान है और मैं बिहार कि रहने वाली हूँ। मेरी उम्र 13 वर्ष है और मैं 8 वी में पढती हू। मेरा रंंग गेंहूआ है। मेरी कद काठी भी सामान्य है। मेरा शरीर इकहरा है तथा मेरे वक्षस्थल अभी छोटे हैं। लेकिन शरीर आकर्षक है। मैं मस्तराम की नियमित पाठिका हूँ। इसकी कहानियाँ काफ़ी उत्तेजक तथा अच्छी होती हैं। नही चाहते हुए भी बिना कहानी पढ़ें चैन नहीं पड़ती। कुछ कहानियाँ काल्पनिक तो कुछ सच्ची लगती है। चाहें कुछ भी हो लेकिन कहानियाँ पढ़कर मन उत्तेजित हो जाता  है तथा मन मे एक घबराहट सी होने लगती है। पूरा शरीर टूटने लगता है। लेकिन मन में एक गुदगुदी जैसी लगती है। इतनी कहानियाँ पढ़कर मुझे भी अपनी एक सच्ची घटना बताने का मन हुआ।
बात उन दिनो की है जब मैं 4थे क्लास में पढ़ती थी। उस समय समय मेरी उम्र 10 साल थी। मेरा शहर में दो मंंजिला मकान है जिसके निचले तल में हमलोग रहते हैं जबकि उपर का तल किराए पर है। मेरे घर में जो किराएदार रहते थे वे पड़ोस के ही हाई स्कूल में टीचर थे। उनको दो लड़के थे एक की उम्र १४ साल तो दूसरे की उम्र ११ साल थीं। बड़े का नाम विवेक तथा छोटे का नाम तनय था। वे कुल चार लोग थे पति पत्नी और दो लड़के। मैंं उन्हेें चाचा चाची तथा लडको को बडे भैया तथा छोटे भैया कहती थी। इतना ही नहीं पिछले दो सालों से जब वे किराए पर आए थे तबसे रक्षाबंधन को राखी भी बांधती थी।
मैं अपने पिताजी की इकलौती बेटी थी। मेरे पिताजी की जेनरल स्टोर की दुकान है। वे बहुत गुस्सैल थे। बात बात में  नाराज होते थे। हमसब उनसे डरते थे। वो रोज़ सुबह 8 बजे दुकान पर चले जाते हैं और रात में ही आते है। घर में मैं और मेरी मम्मी ही सारा दिन रहते थे। वहीं ऊपर के किराएदार चाचा जी स्कूल चले जाते थे जबकि उनकी पत्नी ही घर पर रहती थीं। दिन में तो मैं स्कूल जाती थी। शाम को वापस आने के बाद या तो टीवी देखती थी या किराएदार के छोटे लड़के तनय के साथ खेलती थी। कभी मेरे साथ खेलने वो नीचे आ जाता कभी मैं उसके साथ खेलने छत पर चली जाती। एक दिन तनय को बुखार था तथा उसकी मम्मी मेरी मम्मी के साथ दिखाने के लिए डाक्टर के पास ले गयी थीं। घर में मैं और किराएदार बडे भैया ही रह गये।
मैं शाम को खेलने के लिए छत पर गयी लेकिन तनय तो वहाँ था नही लेकिन विवेक भैया छत पर थे। उन्होंने मुझसे कहा कि तनय तुम्हारी और मेरी मम्मी के साथ डाक्टर के घर गया हैैं। तुम चाहो तो मेरे साथ खेल सकती हो। मैं उनके पास चली गयी। उन्होंने मुझे अपने बिस्तर पर बिठा दिया और मुझे गुदगुदी करने लगे। मैं हँसने लगी। वो गुदगुदी करते जा रहे थे मैं हँसती जा रही थी। हँसते हँसते मैं उनके गोद में झुक गयी। लगातार हंसते रहने से अब तो साँस लेने में भी तकलीफ़ होने लगी। मैंने कई बार मना किया लेकिन विवेक भैया मेेेेरे मना करने पर भी नही माने तो मैंने उनको ज़ोर से दाँत काट लिया। वो ज़ोर से चिल्लए तथा गुदगुदाना छोड़ कर अपनी पैंट के अंदर देखने लगे।
उन्होंने मुझसे कहा कि मैंने उनके सूसू को ही काट लिया है और वो ये बात मेरे पापा मम्मी को बताएँगे। मैं डर गयी। मैंने कहा कि आप झूठ बोल रहे है। उन्होंने अपनी पैंट खोलकर अपने नूनू को दिखाया जो मोटा और बड़ा था तथा उसपर दाँत के निशान थे। मैंने डर कर उनसे कहा कि आपको मैंने जानबूझकर वहाँ नहीं कटा है। मैं गुदगुदी से बचने के लिए झुकी थी। जब आप गुदगुदी से रोकने पर नही माने तो मैंने झुके झुके ही काट लिया। आप किसी से मत कहना।
विवेक भैया ने कहा कि मैं नही कहूँगा लेकिन एक शर्त है। मैंने पूछा क्या तो उन्होंने कहा कि मैं भी तुम्हें वहीं कटूँगा। मैं मार खाने के डर से तैयार हो गायी। विवेक भैया ने मेरी फ़्राक हटाकर मेरी चड्ढी खोल दी और अपना मुँह मेरे सूसू पर लगा दिया। मैंने आंखें बंद कर उनके काटनेे का इंतजार करने लगी। लेकिन अचानक मुझे अपने सूसू पर गुदगुदी सी महसूस हुई। शेष कहानी अगले अंक में ।