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मेरे पति का दयालु दिल और मेरी पतिव्रता

प्रेषक अंकिता,

मेरी शादी हुए करीब दस साल हो गये थे। इन दस सालों में मैं अपने पति से ही तन का सुख प्राप्त करती थी। उन्हें अब डायबिटीज हो गई थी और काफ़ी बढ़ भी गई थी। इसी कारण से उन्हें एक बार हृदयघात भी हो चुका था। अब तो उनकी यह हालत हो गई थी कि उनके लण्ड की कसावट भी ढीली होने लगी थी।

लण्ड का कड़कपन भी नहीं रहा था। उनका शिश्न में बहुत शिथिलता आ गई थी। वैसे भी जब वो मुझे चोदने की कोशिश करते थे तो उनकी सांस फ़ूल जाती थी, और धड़कन बढ़ जाती थी। अब धीरे धीरे अंकुश से मेरा शारीरिक सम्बन्ध भी समाप्त होने लगा था। पर अभी मैं तो अपनी भरपूर जवानी पर थी, 35 साल की हो रही थी।

जब से मुझे यह महसूस होने लगा कि मेरे पति मुझे चोदने के लायक नहीं रहे तो मुझ पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव होने लगा। मेरी चुदाई की इच्छा बढ़ने लगी थी। रातों को मैं वासना से तड़पने लगी थी। अंकुश को यह पता था पर मजबूर था।

मैं उनका लण्ड पकड़ कर खूब हिलाती थी और ढीले लण्ड पर मुठ भी मारती थी, पर उससे तो उनका वीर्य स्खलित हो जाया करता था पर मैं तो प्यासी रह जाती थी। मैं मन ही मन में बहुत उदास हो जाती थी। मुझे तो एक मजबूत, कठोर लौड़ा चाहिये था ! जो मेरी चूत को जम के चोद सके।

अब मेरा मन मेरे बस में नहीं था और मेरी निगाहें अंकुश के दोस्तों पर उठने लगी थी। एक दोस्त तो अंकुश का खास था, वो अक्सर शाम को आ जाया करता था। मेरा पहला निशाना वही बना। उसके साथ अब मैं चुदाई की कल्पना करने लगी थी।

मेरा दिल उससे चुदाने के लिये तड़प जाता था। मैं उसके सम्मुख वही सब घिसी-पिटी तरकीबें आजमाने लगी। मैं उसके सामने जाती तो अपने स्तनो को झुका कर उसे दर्शाती थी। उसे बार बार देख कर मतलबी निगाहों से उसे उकसाती थी। यही तरकीबें अब भी करगार साबित हो रही थी।

मुझे मालूम हो चुका था था कि वो मेरी गिरफ़्त में आ चुका है, बस उसकी शरम तोड़ने की जरूरत थी। मेरी ये हरकतें
अंकुश से नहीं छुप सकी। उसने भांप लिया था कि मुझे लण्ड की आवश्यकता है। अपनी मजबूरी पर वो उदास सा हो जाता था। पर उसने मेरे बारे में सोच कर शायद कुछ निर्णय ले लिया था। वो सोच में पड़ गया …

“कोमल, तुम्हें भोपाल जाना था ना… कैसे जाओगी ?”
“अरे, वो है ना तुम्हारा दोस्त, राजा, उसके साथ चली जाऊंगी !”
“तुम्हें पसन्द है ना वो…” उसने मेरी ओर सूनी आंखो से देखा। मेरी आंखे डर के मारे फ़टी रह गई। पर अंकुश के आंखो में प्यार था।

“नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है … बस मुझे उस पर विश्वास है।”
“मुझे माफ़ कर देना, कोमल… मैं तुम्हें सन्तुष्ट नहीं कर पाता हूं, बुरा ना मानो तो एक बात कहूं?”
“जी… ऐसी कोई बात नहीं है … यह तो मेरी किस्मत की बात है…”
“मैं जानता हूं, राजा तुम्हें अच्छा लगता है, उसकी आंखें भी मैंने पहचान ली है…”
“तो क्या ?…” मेरा दिल धड़क उठा । दोस्तों आप ये कहानी मस्तराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है l

“तुम भोपाल में दो तीन दिन उसके साथ किसी होटल में रुक जाना … तुम्हें मैं और नहीं बांधना चाहता हूं, मैं अपनी कमजोरी जानता हूँ।”
“जानू … ये क्या कह रहे हो ? मैं जिन्दगी भर ऐसे ही रह लूंगी।” मैंने अंकुश को अपने गले लगा लिया, उसे बहुत चूमा… उसने मेरी हालत पहचान ली थी। उसका कहना था कि मेरी जानकारी में तुम सब कुछ करो ताकि समय आने पर वो मुझे किसी भी परेशानी से निकाल सके।

राजा को भोपाल जाने के लिये मैंने राजी कर लिया पर अंकुश की हालत पर मेरा दिल रोने लगा था। शाम की डीलक्स बस में हम दोनों को अंकुश छोड़ने आया था। राजा को देखते ही मैं सब कुछ भूल गई थी। बस आने वाले पलों का इन्तज़ार कर रही थी। मैं बहुत खुश थी कि उसने मुझे चुदाने की छूट दे दी थी। बस अब राजा को रास्ते में पटाना था। पांच बजे बस रवाना हो गई।

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