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नौकरानी, ड्राइवर और मेरी कहानी -1

इंद्रिका की दोपहर की नींद आज कुछ जल्दी ही उचट गई। उसे प्यास लगी थी और उसकी नौकरानी सुमनसा उसके कमरे में पानी रखना भूल गई थी। पहले तो उसका मन हुआ कि वो सुमनसा को आवाज़ लगा कर पानी मँगा ले.. फ़िर सोचा इस भरी दोपहरी में वो भी सो रही होगी। उसने ख़ुद ही उठने की सोची।
जैसे ही रसोई में पहुँची.. उसे नीचे गैराज़ में से कुछ अजीब सी आवाजें आईं।
ध्यान से सुनने पर उसे लगा कि यह तो सुमनसा के रोने की आवाज़ है।
किसी अनहोनी की आशंका से वो तुरन्त नीचे गैराज़ की ओर बढ़ी।

रसोई के पीछे कुछ सीढ़ियाँ उतर कर वो जैसे ही गैराज़ के दरवाज़े तक पहुँची.. अन्दर के नज़ारे पर नज़र पड़ते ही उसका दिल धक से रह गया।
यहाँ तो मामला कुछ और ही था।
सुमनसा रो नहीं रही थी.. वो अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों के साथ कोने वाली टेबल पर लेटी हुई थी और इंद्रिका का ड्राइवर अनिल.. सुमनसा की गोरी-चिकनी टाँगों के बीच उस पर झुका हुआ था और जिसे वो सुमनसा के रोने की आवाज़ समझ रही थी.. वो यौन-क्रीड़ा की मस्ती में मदहोश.. सुमनसा की सिसकारियाँ थीं।

इंद्रिका को एक झटका सा लगा.. सहसा उसे विश्वास ही नहीं हुआ.. जो उसने देखा।
‘ओ माय गॉड.. ही इज़ फ़किंग हर..’
इंद्रिका के पैर जैसे वहीं जम गए।

उसने देखा कि सुमनसा का घाघरा उसकी जाँघों से ऊपर तक सरक आया था.. उसका एक पैर अनिल के कन्धे पर था।
अनिल ने एक हाथ से उसकी जाँघ और दूसरे से उसकी पतली क़मर को थाम रखा था और पूरे दम से धक्के लगा रहा था।
सुमनसा के ब्लाउज़ के बटन खुले हुए थे और उसके बड़े-बड़े दूधिया स्तन अनिल के हर धक्के के साथ ऊपर को उछल रहे थे।
सुमनसा जैसे मस्ती में पगला सी गई थी, उसकी गहरे गुलाबी बड़े-बड़े निप्पल उत्तेजना से ऐंठ कर खड़े हो गए थे।
बड़ी बेशर्मी से वो अनिल को और ज़ोर से धक्के मारने को कह रही थी। अनिल के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था और वो पूरे दम से उसे चोद रहा था।

इंद्रिका सन्न रह गई।
उसकी 20 साल की नौकरानी.. जिसे वो मासूम बच्ची समझती थी.. वो और उसका ड्राइवर भरी दोपहर में उसी के घर के गैराज़ में सैक्स कर रहे थे।
नंगेपन का यह ख़ुला खेल देख कर गुस्से से उसके पूरे बदन में तनाव सा आ गया, उसकी साँसें तेज़-तेज़ चलने लगीं।
अचानक़ इंद्रिका की नज़र अनिल पर पड़ी तो उसका दिल धक से रह गया, पूरा नंगा अनिल.. सुमनसा को चोदते हुए इंद्रिका की ओर ही देख रहा था यानि कि वो जान चुका था कि इंद्रिका वहाँ खड़ी थी।

दोनों की नज़रें आपस में मिलते ही इंद्रिका के बदन में एक सिहरन सी उठी.. लेकिन वो उम्मीद कर रही थी कि अपने इस राज़ के खुलने पर अनिल शर्म से पानी-पानी हो जाएगा।
लेकिन ये क्या.. अनिल एक क्षण को ठिठका जरूर.. लेकिन अगले ही पल उसने अपनी मज़बूत बाँहों में सुमनसा को जकड़ लिया और इंद्रिका की ओर देखते हुए अपने चोदने की रफ़्तार बढ़ा दी।

पगलाई सुमनसा भी अपने नितम्ब उछाल-उछाल कर अनिल का साथ दे रही थी। उसकी सिसकारियाँ अब मिन्नतों में बदल रही थीं- आऽऽऽह.. अनिल आऽऽऽह.. ऽऽऽराऽऽज चोदो मुझे.. और ज़ोर से जाऽऽऽनू.. मेरी प्यासी चूत की प्यास बुझा दो अनिला.. ऽऽआह आहऽऽ..
साफ़ ज़ाहिर था कि काम-क्रीड़ा के चरम पर वो अनिल से पहले पहुँचना चाहती थी। अनिल अभी भी इंद्रिका की ओर ही देख रहा था और उसकी आँखों में एक ढिठाई थी।

यह बात इंद्रिका को नाग़वार ग़ुज़री.. वो उत्तेजना और गुस्से से काँपती हुई गैराज़ के बीचों-बीच आ गई और ज़ोर से चिल्लाई- यह क्या हो रहा है?
उसकी आवाज़ सुन कर सुमनसा की रूह काँप उठी। मस्ती के सातवें आसमान से भय के धरातल पर धड़ाम से गिरी सुमनसा ने अनिल को परे धकेल कर उठने की कोशिश की..
लेकिन अनिल की कसरती भुजाओं ने उसे बेबस कर दिया।

सुमनसा कसमसा कर छूटने का प्रयास करने लगी, वो चिल्लाने और गालियाँ भी देने लगी.. मानो अनिल उसके साथ ज़बरदस्ती कर रहा हो। लेकिन अनिल पर उसके चिल्लाने.. गालियाँ देने का कोई असर नहीं हो रहा था, उसने अपनी कसरती भुजाओं में सुमनसा को दबोचा और अपनी उसी रफ़्तार से मंजिल की ओर बढ़ने लगा, उसने अपनी चुदाई की रफ्तार को और तेज़ कर दिया।

इंद्रिका देख रही थी कि कुछ देर में सुमनसा बेबस हो चुकी थी। उसके तन की गहराइयों से निकलने वाली आनन्द की लहरों का प्रभाव उसके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहा था। उसकी आँखें बन्द थीं.. वो अब भी अनिल के चंगुल से छूटने का दिखावटी प्रयास कर रही थी।
इधर अनिल की साँसें तेज़ हो गई थीं.. वो शायद अपनी मनमानी के अन्तिम दौर में था। उसका मज़बूत बदन पसीने से लथपथ हो गया था तथा सुमनसा को चोदने की उसकी रफ़्तार और तेज़ हो गई थी। उसके ताक़तवर ज़िस्म के ज़ोरदार धक्कों से पैदा गर्मी से सुमनसा अपने यौन आनन्द के चरम पर पहुँच चुकी थी।

सुमनसा के अधनंगे ज़िस्म में एक तनाव आया और कुछ झटकों के साथ तृप्ति की गहरी साँसें लेती हुई वो निढाल हो गई।
इंद्रिका ने अनिल को देखा.. वो अभी भी उसकी ओर ही देख रहा था। इंद्रिका जहाँ उसकी ढिठाई को देख कर अवाक् थी.. वहीं उसका मज़बूत सुघड़ शरीर और अनथक सैक्स सामर्थ्य देख कर दंग रह गई।
अनिल कितनी देर से सुमनसा के शरीर के साथ खेल रहा था।

सुमनसा की गोरी-चिकनी जाँघों के बीच में तेज़ी से आगे-पीछे होती उसकी क़मर.. चौड़ी बालदार छाती.. गोल कन्धे और मज़बूत बांहों की मर्दाना माँसपेशियां देख उसे अपने शरीर में कुछ अज़ीब सा महसूस होने लगा।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा.. साँसें तेज़ चलने लगीं और शरीर काँपने लगा।
शायद गुस्से से.. या फ़िर उत्तेजना से.. यह वो तय नहीं कर पा रही थी।
उसे ये सब कुछ किसी फ़िल्म जैसा लग रहा था.. एक एडल्ट नंगी फ़िल्म जैसा।

अचानक अनिल के मुँह से तेज़ आवाज़ निकली.. वो स्खलित हो रहा था। दो-चार ज़ोर के झटके खा कर वो चरम आनन्द के साथ सुमनसा की नग्न छाती पर लुढ़क गया।
तब तक सुमनसा आनन्द के सुखदाई सागर में भरपूर गोते लगा कर सच्चाई की सतह पर आ चुकी थी.. जहाँ उसकी मालकिन उससे कुछ ही कदमों की दूरी पर आँखें फ़ाड़े उनके इस नंगे नाच को देख रही थी।
सुमनसा को जैसे काटो तो खून नहीं।

अनिल की पकड़ अब ढीली हो चुकी थी, सुमनसा ने अनिल को एक ओर धकेला और अपने कपड़े सम्भालती हुई तेज़ी से गैराज़ के बाहर भाग गई।
इंद्रिका ने अनिल की ओर देखा।
अनिल अपने लण्ड पर से कण्डोम हटा कर उसमें गाँठ बाँध रहा था।
अनिल की पीठ इंद्रिका की ओर थी। पता नहीं क्या आकर्षण था कि इंद्रिका उसे एकटक देखे जा रही थी।

अचानक अनिल ने गर्दन घुमाई और इंद्रिका की ओर देखा। इंद्रिका एकदम से हड़बड़ा गई.. जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।
झेंप मिटाने के लिए वो गुस्से से बोली- इसी बात की तनख़्वाह लेते हो तुम?
उसकी बात सुन कर अनिल उसकी ओर घूम गया। इंद्रिका का दिल धक्क से रह गया.. जब उसकी नज़र वीर्य से भीगे अनिल के अर्द्ध उत्तेजित लण्ड पर पड़ी।
‘उफ़्फ़ कितना बड़ा है।’

इंद्रिका ना चाहते हुए भी यह नोटिस किए बिना नहीं रह सकी।
अनिल ने भी अपनी मर्दानगी को छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया.. वो बेफ़िक़्री से इंद्रिका के पास आ कर.. उसकी आँखों में आँखें डाल कर बोला- नहीं मैडम.. यह काम तो मैं मुफ़्त में करता हूँ।
फ़िर हल्की सी एक मुस्कराहट के साथ, हाथ का कण्डोम कचरे के डब्बे में उछाल कर सुमनसा की पैण्टी से वो अपने गीले लण्ड को पौंछने लगा जो भागने की जल्दी में सुमनसा से वहीं छूट गई थी।
अनिल के इस बेहया रवैये से इंद्रिका तिलमिला गई, वो तेज़ी से गैराज़ से निकल गई।

अपने कमरे में आ कर इंद्रिका धम्म से सोफ़े पर गिर पड़ी, गुस्से के मारे उसकी साँसें तेज़ी से चल रही थीं, उसकी आँखों में गैराज़ के दृश्य तैर रहे थे और कानों में सुमनसा की निर्लज्ज सिसकारियाँ।
तभी सुमनसा कमरे में आई और इंद्रिका के पास आ कर चिरौरियाँ करने लगी- दीदी जी, प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो। मेरी कोई ग़लती नहीं है।
इंद्रिका ने गुस्से में मुँह दूसरी ओर घुमा लिया।

‘मैडम इस अनिल ने मुझे अकेली देख कर दबोच लिया था। मैं तो कभी उससे बात भी नहीं करती हूँ.. लेकिन ये मुझे अकेले में छेड़ता रहता है। आज भी उसने मुझे चाय देने के बहाने गैराज़ में बुलाया और जब मैं चाय देने गई तो मुझे पकड़ कर ज़बरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था। आपने देखा ना.. आपके सामने भी वो मुझे छोड़ने को तैयार नहीं था। अच्छा हुआ आप वक़्त पर आ गईं.. वर्ना वो कमीना मेरी इज़्ज़त लूट लेता।’
सुमनसा रोते हुए अपनी सफ़ाई दे रही थी।

इंद्रिका को उसकी दलीलों पर बड़ी खीज आई, गुस्सा दबाते हुए वो सुमनसा से बोली- अच्छा.. तो अनिल ज़बरदस्ती कर रहा था तेरे साथ?
‘हाँ दीदी!’ सुमनसा बोली।
‘वो जो हो रहा था.. तेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हो रहा था?’
इंद्रिका ने उसे घूरा।

सुमनसा इंद्रिका से आँख नहीं मिला सकी.. उसने नज़रें चुराते हुए ‘हाँ’ में सिर हिलाया।
इंद्रिका को सुमनसा के झूठ पर गुस्सा आने लगा- छिनाल.. ज़बरदस्ती वो बड़ी धीरे कर रहा था कि तू अपने कूल्हे उछाल-उछाल के उसको ज़ोर-ज़ोर से करने का कह रही थी? इंद्रिका ने झुंझला कर पूछा।
सुमनसा के पैरों तले ज़मीन ख़िसक गई, उसकी पोल खुल चुकी थी। उसे जब कुछ नहीं सूझा तो वो इंद्रिका के पैरों में गिर पड़ी- दीदी मुझसे ग़लती हो गई, आज के बाद ऐसा कभी नहीं होगा। प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो मैडम।
वो गिड़गिड़ाने लगी- किसी को पता चला तो मैं बर्बाद हो जाऊँगी।

काफ़ी देर तक सुमनसा रोती रही।
‘अच्छा अच्छा अब उठ.. मेरे लिए चाय बना।’
कुछ देर बाद आखिर इंद्रिका का मन पसीज़ गया।
‘मुझे किसी से कह कर क्या लेना..’

सुमनसा की जान में जान आई.. फ़िर भी आशंका से उसने पूछा- आप मुझे काम से तो नहीं निकालेंगी ना? दीदी.. मेरा बापू मुझे जान से मार डालेगा। दीदी मैं वादा करती हूँ आगे से ऐसा कभी नहीं होगा।
‘अगर तू एक मिनट में यहाँ से नहीं गई रसोई में.. तो मैं तुझे ज़रूर निकाल दूंगी।’ इंद्रिका ने बनावटी गुस्से से कहा।

सुमनसा ने राहत की साँस ली और रसोई की ओर चल दी।
सुमनसा के जाते ही इंद्रिका की आँखों में फ़िर वो मंज़र तैर गया, उसने अपनी ज़िन्दगी में कभी अपने पति के अलावा किसी और मर्द को इस तरह नंगा नहीं देखा था।
अनिल के कसरती बदन की तस्वीर ज़ेहन में आते ही एक अज़ीब सी सुरसुरी उसके तन में छूट गई।

इंद्रिका अनिल की हिमाक़त पर हैरान भी थी कि उसे देखने के बाद भी उसने अपनी हरक़त बन्द नहीं की। इतना ही नहीं बाद में नंगा ही उसके सामने खड़ा हो गया। अनायास ही इंद्रिका को अनिल का मोटा लण्ड याद आ गया। इंद्रिका की साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं।
इतने में सुमनसा चाय लेकर आ गई और इंद्रिका के विचारों का सिलसिला टूट गया।
उसे चाय देकर सुमनसा भी वहीं नीचे बैठ गई।

39 साल की इंद्रिका का वैसे तो एक भरा-पूरा परिवार था। रुपये-पैसे की कोई कमी नहीं थी.. किन्तु पति शुरू से ही कारोबार के सिलसिले में अधिकतर बाहर रहते थे। ऐसे में जब बेटा भी अपनी इन्जीनियरिंग की पढ़ाई के लिए होस्टल चला गया.. तो अकेलापन काटने के लिए क़रीब चार-पाँच साल पहले वो सुमनसा को अपने मायके से ले आई।
कमसिन उम्र की सुमनसा उसके मायके के पास रहती थी। वैसे नाम उसका शबनम था.. पर सब उसे सुमनसा ही बुलाते थे। सुमनसा की माँ मर चुकी थी और अकेला बाप तीन जवान होती लड़कियों का बोझ नहीं ढो पा रहा था।

तीन बहनों में सबसे छोटी और चुलबुली सुमनसा इंद्रिका से बहुत हिली-मिली थी। अपनी मदद के लिए इंद्रिका उसे अपने साथ ले आई। अब वही उसके अकेलेपन का सहारा थी। घर के काम-काज़ के साथ वो प्राइवेट पढ़ाई भी कर रही थी।
इंद्रिका के यहाँ रहते हुए वो एक बच्ची से सुन्दर किशोरी कब बन गई.. इंद्रिका को पता ही नहीं चला। उसकी जवानी काफ़ी गदरा गई थी। छातियों के उभार और नितम्बों का आकार अब लोगों का ध्यान खींचने लगा था। लेकिन इंद्रिका के लिए तो वो एक चुलबुली बच्ची ही थी।
अनिलेश सिंह उनका ड्राईवर था.. जिसे सब अनिल बुलाते थे.. बंगले के आउट हाउस में रहता था। अपने पति के दोस्त रफीक की सिफ़ारिश पर उसने अनिल को छ: महिने पहले ही नौकरी पर रखा था। चौबीस-पच्चीस साल का अनिल वैसे तो बहुत शालीन था। बंगले की रख-रखाव और बाज़ार से सौदा लाना उसके काम थे.. जिसे वो ईमानदारी से करता था।
लेकिन आज उसका ये रूप सामने आने के बाद से इंद्रिका हैरान थी।
और सुमनसा?

उसे तो वो बच्ची समझ रही थी। लेकिन आज गैराज़ की टेबल पर वो एकदम खेली-खाई औरत जैसा बर्ताव कर रही थी। जिस बेशर्मी से वो चुदाई का मज़ा ले रही थी उससे साफ़ ज़ाहिर था कि वासना का ये खेल उसके लिए नया नहीं था।
‘कब से चल रहा हैं ये सब?’
इंद्रिका ने पूछा तो सुमनसा की चाय उसके हलक में ही रह गई।
‘जी.. आज ही!’ सुमनसा ने बा-मुश्किल चाय निगलते हुए कहा।
‘मुझे क्या बच्ची समझ रखा है?’ इंद्रिका ने मुस्कुराते हुए पूछा।

‘टेबल पर तेरे रंग-ढंग देख कर कोई बच्चा भी कह सकता हैं कि अनिल ने तुझे ये खेल बहुत पहले ही सिखा दिया है, तुझे पूरी औरत बना दिया है.. बता कैसे शुरू हुआ ये सब?’ इंद्रिका के गुस्से पर अब जिज्ञासा हावी होती जा रही थी।
‘जी वो.. जी वो..’

सुमनसा हिचकिचाई तो इंद्रिका बोली- अरे डर मत.. मैं तुझसे नाराज़ नहीं होऊँगी।
इंद्रिका ने कुछ प्यार से कहा तो सुमनसा का हौसला कुछ बढ़ा।
‘दीदी.. ये जब से आया था ना.. मुझे घूरता था.. मुझसे बात करने की कोशिश करता रहता था। पहले तो मैंने उससे ज्यादा बात नहीं की.. लेकिन साथ-साथ काम करते-करते थोड़ी बहुत बातें होने लगीं और जब बातें होने लगी तो धीरे-धीरे वो चुटकुले सुनाने लगा। फ़िर उसके चुटकुले गंदे होते गए, अश्लील इशारे भी करने लगा..’ सुमनसा ने बताया।

सुमनसा ने इंद्रिका की ओर देखा, उसकी आँखों में गुस्से की जगह जिज्ञासा के भाव देख कर सुमनसा को तसल्ली हुई और वो खुल कर बताने लगी- पहले पहले तो मुझे अजीब सा लगता था.. लेकिन धीरे-धीरे उसके मज़ाक मेरे जवान होते मन को अच्छे लगने लगे। वो जब गंदी बातें करता.. तो मेरे तन में एक फ़ुरफ़ुरी सी होती और मैं अन्दर से भीग जाती थी।
सुमनसा की स्वीकारोक्ति सुन कर इंद्रिका के दिल में कुछ हलचल सी हुई।

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