Mastaram.Net

100% Free Hindi Sex Stories - Sex Kahaniyan

नौकरानी, ड्राइवर और मेरी कहानी -2

 

नौकरानी, ड्राइवर और मेरी कहानी -1

सुमनसा ने आगे बताया-
एक दिन अनिल बाज़ार से सामान लेकर आया.. तो बताया कि वो फ़िश मार्केट से काफ़ी बड़ी मछली लाया था। मैंने उससे बताने के लिए कहा.. तो वो बोला कि ऐसे नहीं.. ऐसी मछली तुमने आज तक नहीं देखी होगी। पहले आँखें बन्द करो फ़िर दिखाऊँगा।
उसने मुझे कुर्सी पर बिठाया और मैंने आँख बन्द की और उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया। कुछ क्षणों में उसने मेरे हाथ में एक बहुत बड़ी.. मोटी-ताज़ी मछली थमा दी।

लेकिन वो कुछ नई तरह की मछली थी। उसकी खाल पर काँटे नहीं थे और आम मछली से ज्यादा कड़क थी। मैंने जैसे ही उसे देखने को आँखें खोलनी चाही.. अनिल ने हाथ से मेरी आँखें बन्द कर दीं.. और बोला कि इतनी होशियार हो तो हाथों से टटोल कर बताओ.. कौन सी मच्छी है?
मैंने अपना हाथ मछली पर फ़िराया। लेकिन मैं पहचान नहीं पाई। उसका मुँह वगैरह दोनों हाथों से टटोल लिए पर मुझे कोई सुराग नहीं मिला।
मछली का पिछला हिस्सा अनिल ने पकड़ रखा था इसलिए में उसकी पूंछ वगैरह नहीं टटोल पाई। एक और बात दीदी.. जैसे-जैसे मैं मछली को टटोल रही थी.. वो मेरे हाथों में और बड़ी व कड़क हो गई थी।

मैं मछली की गन्ध से उसे पहचान लेती हूँ इसलिए उसे सूंघने लगी। जब उसे नाक से लगाया.. तो उसमें किसी जानी-पहचानी मछली की गन्ध नहीं थी।
ध्यान से सूंघा तो उसमें अनिल के पसीने की गन्ध सी आ रही थी।
तभी अनिल ने मेरी आँखों पर से हाथ हटाया और मैंने देखा कि मेरे हाथ में कोई मछली नहीं थी बल्कि अनिल का.. ‘वो’ था।
‘वो क्या?’ इंद्रिका ने उसे छेड़ा।
‘वो’ ही दीदी.. आपको पता ही है ना कि लड़कों का..’ सुमनसा शरमा गई।
‘मुझे तो पता है.. पर मैं देखना चाहती हूँ कि तुझे क्या क्या पता है?’ इंद्रिका ने फ़िर से छेड़ा।
‘उस हरामी ने सब कुछ सिखा दिया।’ सुमनसा ज़ोर से बुदाबुदाई।

‘फ़िर बता उसे क्या कहते हैं?’
इंद्रिका को भी जैसे रोमांच हो आया, अचानक उसे उन बातों में रस आने लगा।
सुमनसा की आंखें शर्म से ज़मीन में गड़ गईं।
कुछ देर के मौन के बाद बोली- उसको लण्ड बोलते हैं ना? अनिल उसको लौड़ा भी बोलता है।’
इंद्रिका की सांसें जैसे रुक गईं, सुमनसा के मासूम मुँह से ऐसे शब्द सुन कर उसके बदन में सनसनी सी दौड़ने लगी।
‘हूँऽऽ फ़िर?’

इंद्रिका ने बात आगे बढ़ाने कि गरज़ से पूछा।
‘फ़िर क्या.. इतना बड़ा लौड़..आ.. मेरा मतलब वो.. देख कर मुझे एक झटका लगा। मैंने घबरा कर उसको छोड़ा और उससे दूर हट गई। अनिल ने ज़ोर का ठहाका लगाया और मुझे दिखा-दिखा कर हिलाता रहा।
मुझे थोड़ा डर लगा.. मेरी आँखों में आँसू आ गए। ये देख कर अनिल ने मज़ाक बन्द कर दिया और जल्दी से अपना ‘वो’ पैण्ट के अन्दर डाल दिया। फ़िर ‘सॉरी’ बोल कर रसोई से चला गया।

उस दिन मैंने तय कर लिया था कि अब मैं उससे कभी नहीं बोलूंगी। दो-तीन दिन मैं बोली भी नहीं.. रसोई के काम के लिए बोलना भी पड़ता.. तो उसकी ओर नहीं देखती थी।
मेरी बेरुख़ी देख.. वो भी मुझसे बोलने की हिम्मत नहीं कर पाया।’
‘फिर?’

‘फिर एक हफ़्ते भर बाद ही.. मैं उसे और उसके मज़ाक को मिस करने लगी। वो ज्यादा नहीं बोलता.. तब मुझे अच्छा नहीं लगता। इसलिए एक दिन जब वो बाज़ार से सामान लेकर आया तो मैंने उससे बात करने कि गर्ज़ से पूछा कि आजकल तुम बाज़ार से मछली नहीं लाते? तो वो बोला कि किसी को पसन्द नहीं है.. इसलिए नहीं लाता।’
‘हम्म..’

‘दीदी.. फिर मैं उसके पास गई और बोली कि किसने कहा.. मुझे तो पसन्द है.. इस पर वो मुस्कुराया और बोला कि ठीक है.. कल ले आऊंगा।’
‘फिर..’
‘फिर..इतने दिनों बाद अनिल के चेहरे पर मुस्कान देख कर मुझे अच्छा लगा। मुझे पता नहीं क्या सूझा.. मैं उसके बिल्कुल करीब गई और पैण्ट के ऊपर से उसका लण्ड पकड़ लिया और..’
‘और..?’
‘और.. मैंने उसके लण्ड को रगड़ते हुए कहा कि अनिल साहब.. मुझे ये मछली चाहिए।’

इंद्रिका की साँसें तेज होने लगीं और वो उत्कंठा से आगे का मंजर जानने के लिए आँखें सुमनसा की तरफ किए बैठी थी।
‘दीदी.. अनिल का लण्ड मेरे हाथ के नीचे फ़ूलने लगा। उसको शायद यक़ीन नहीं हो रहा था.. कि ये मैं कर रही हूँ। यकीन तो मुझे भी नहीं था कि मैं ये कर रही हूँ.. पर ना जाने क्यों मैं अपना हाथ नहीं हटा पाई।’
‘ओह्ह.. फिर..?’

‘अनिल वैसे ही बुत बना खड़ा था। मानो उसे डर था कि अग़र वो हिला तो कहीं मैं अपना इरादा ना बदल दूँ। वो मुझे देखे जा रहा था कि मैंने उसके पैण्ट की चैन खोल के हाथ अन्दर सरका दिया..’ सुमनसा बोलते-बोलते रुक गई।
वो सोचने लगी कि उसकी इस बेशर्म हरकत पर इंद्रिका की ना जाने क्या प्रतिक्रिया होगी। वो चुप हो कर ज़मीन को ताकने लगी।

इंद्रिका को सुमनसा की बेहयाई पर हालांकि झटका ज़रूर लगा था लेकिन अब उसे बातें सुनने में एक अज़ीब सा मज़ा आ रहा था।
सुमनसा जब अनिल के लण्ड के बारे में बता रही थी.. तब इंद्रिका की आँखों के सामने अनिल का गठीला.. नंगा ज़िस्म तैर गया था और उसके अंगों में एक फ़ुरफ़ुरी सी हो रही थी।
‘फ़िर क्या हुआ?’ उत्तेजना मिश्रित जिज्ञासा से उसने पूछा।

‘फ़िर..’ सुमनसा उसकी आवाज़ में जिज्ञासा को भाँप कर राहत महसूस करने लगी।
‘फ़िर अनिल ने मुझसे पूछा कि ये मछली खाओगी? मुझे उसकी बात का मतलब तो समझ नहीं आया लेकिन मैंने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया।
इस पर अनिल ने मुझे पास पड़ी एक चेयर पर बिठाया और खुद मेरे सामने खड़ा हो गया। मैं कुछ समझ पाती इसके पहले उसने अपना पैण्ट खोल के नीचे खिसका दिया। अब उसका लण्ड ठीक मेरे मुँह के सामने था। उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपना लण्ड पकड़ाया। इस बार मैं डरी नहीं। उसका लण्ड मुट्ठी में ले कर मसलने लगी।’

सुमनसा इंद्रिका की ओर देखने लगी, इंद्रिका पर उत्तेजना हावी होती जा रही थी, उसका चेहरा तमतमाने लगा था।
सुमनसा ने आगे बताया- दीदी.. सच कहूँ तो मेरी हालत बहुत खराब हो गई थी। मैं अन्दर तक भीग गई थी। तभी अनिल बोला कि अब खाओ मछ्ली.. मैंने पूछा कैसे.. तो उसने बताया कि पहले मैं उसके लण्ड को किस करूँ।
मुझे थोड़ा अज़ीब लगा.. पर मैं लण्ड को किस करने लगी.. फ़िर वो बोला कि अब इसे ऐसे चूसो जैसे तुम आइसक्रीम खाती हो.. मैंने मना कर दिया।
तो वो बोला कि अरे करके तो देखो.. कितना मज़ा आता है।

उसके थोड़ा ज़ोर देने पर मैंने उसका लण्ड मुँह में ले लिया और चूसने लगी। पहले तो थोड़ा गंदा लगा.. लेकिन फ़िर मज़ा आने लगा। मेरे नीचे एक मीठी सनसनी होने लगी, मैं अब ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगी।
अनिल को मज़ा आने लगा, वो मुझसे मिन्नतें करने लगा कि मैं और ज़ोर से चूसूँ।
मैं काफ़ी देर तक उसका लण्ड चूसती-चाटती रही कि अचानक उसने अपना लण्ड मेरे मुँह से बाहर खींच लिया और बोला तू भी तो कपड़े उतार.. तुझे नंगी देखना है।’

सुमनसा की यह बात सुनकर इंद्रिका को एक बार फिर अनिल का लौड़ा दिखने लगा था।
‘यह सुन कर मानों मेरी साँसें रुक गईं। हट हरामी.. कह कर मैं कुर्सी से खड़ी हुई तो अनिल ने मुझे बाँहों में जकड़ लिया। मैं छूटने के लिए कसमसाई तो अनिल ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उन्हें चूमने लगा।
उसके चूमने में जैसे कोई जादू था। एक-दो क्षणों में.. मैं अपना सारा विरोध भूल कर अनिल से लिपट गई और उसे चूमने लगी। मैं अनिल के एक एक चुम्बन के साथ आनन्द के भँवर में गोते लगाने लगी। अनिल मेरे होंठों को.. मेरे गालों को.. मेरी गर्दन और मेरे कन्धों को चूमता-चूसता हुआ अपने हाथों से मेरे शरीर को सहलाने लगा।’

ये सब बताते-बताते सुमनसा की साँसें फ़िर फूलने लगीं। इंद्रिका को लग गया कि पहले मिलन को याद कर सुमनसा फिर से गर्म हो रही थी।
ख़ुद इंद्रिका की हालत खराब हो रही थी। जिस बेबाकी से कमसिन सुमनसा अपने यार के साथ मौज-मस्ती का बयान कर रही थी.. उसे सुन कर इंद्रिका का शरीर भी मस्ती से भरने लगा था। इंद्रिका को अपनी चूत में से भी पानी छूटता महसूस हुआ।
इंद्रिका ने पूछा- आगे क्या हुआ?

‘दीदी.. किस करते-करते अनिल के हाथ मेरे मम्मों को सहलाने लगे। मेरा मज़ा जैसे दुगुना हो गया। वो कुर्ते के ऊपर से ही मेरे स्तनों को दबाने लगा।
मैंने उसका हाथ लेकर अपने कुर्ते के नीचे पेट पर रख दिया। नंगे पेट पर उसका खुरदुरा स्पर्श पा कर मैं जैसे बौरा उठी। अनिल भी मेरा इशारा समझ गया। उसका हाथ बिना वक़्त गँवाए ऊपर की ओर बढ़ने लगा। जल्दी ही वो काले रंग की ब्रा में कसे मेरे उरोजों तक पहुँच गया और उन्हें मसलने लगा।

मैं तो जैसे पगला गई थी। अनिल की शर्ट में हाथ डाल कर उसकी बालों वाली छाती को सहलाते हुए मैं उसे और भी ज़ोरों से किस करने लगी।
अनिल ने मेरी ब्रा का हुक खोल दिया और ब्रा को ऊपर खिसका दिया। जैसे ही मेरे मक्खन जैसे मम्मे उसके सामने आए.. वो पागलों की तरह उन पर टूट पड़ा। दोनों हाथों से उन्हें दबाते हुए वो उन्हें चूमने-चाटने लगा।मेरे कड़क निप्पलों को अपनी जीभ से चाट रहा था। निप्पल तो तन कर एकदम कड़क हो चुके थे। वो हाथों से दबा भी रहा था। हाय दीदी.. क्या बताऊँ इतना मज़ा आ रहा था कि पूछो मत।’ सुमनसा ने साइड बदलते हुए कहा।
वो इतनी गर्म हो रही थी कि उसके लिए एक पोजिशन में बैठना मुश्किल हो रहा था।
सुमनसा ने आगे कहा- दीदी.. तभी मुझे उसका हाथ नीचे अपनी जाँघों के बीच महसूस हुआ। मेरी रूह जैसे झनझना उठी। सलवार के ऊपर से ही वो ‘वहाँ’ दबाने लगा.. हाथ रगड़ने लगा।
‘चूत पे?’ इंद्रिका पूछे बिना नहीं रह सकी।

सुमनसा ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। शायद वो इंद्रिका से ‘चूत’ जैसा शब्द बोलने की आशा नहीं कर रही थी.. इसलिए खुद भी बोलते हुए हिचक रही थी।
इंद्रिका ने उसे अपने को घूरते देखा तो ठहाका लगा के हँस दी- आगे बताओ सुमनसा रानी!
कह कर उसने सुमनसा को छेड़ा।

‘दीदी उसने मेरी चूत को रगड़ना चालू रखा। चूत में से ढेर सारा पानी निकलने लगा। उत्तेजना के मारे मैं अब खड़ी नहीं रह पा रही थी.. तो उसने मुझे रसोई के प्लेटफ़ॉर्म पर लिटा दिया, कुर्ता और ब्रा ऊपर कर उसने अपना मुँह मेरे मम्मों पर लगा लिया और हाथ मेरी चूत पर!’
‘तेरे ब्रेस्ट वैसे तो काफ़ी बड़े दिखते हैं.. साइज़ क्या है उनकी?’ इंद्रिका अचानक पूछ बैठी।
‘दीदी मैंने तो कभी नापे नहीं।’ सुमनसा बोली- पर मेरी ब्रा पर कुछ 36 जैसा लिखा है।
‘हम्म..’ इंद्रिका मुस्कुराई, ‘पहले से इतने बड़े थे.. कि अनिल ने कर दिए?’
‘क्या दीदी आप भी..’ सुमनसा एकदम से लजा गई।
‘हा..हा..हा..’

‘जाओ मैं नहीं बताती आपको कुछ भी।’ सुमनसा झूठमूठ की रूठ गई।
‘अच्छा-अच्छा नहीं छेडूंगी.. आगे बता.. अनिल ने तेरी सलवार उतारी?’ इंद्रिका ने सीधे ही सवाल कर दिया।
सुमनसा एक क्षण के लिए ठिठक गई.. उसे इंद्रिका से ऐसी बेबाक़ी की उम्मीद नहीं थी।
वो बोली- अरे दीदी.. वो कहाँ छोड़ने वाला था ऐसे.. एक ही झटके में उसने मेरी सलवार और चड्डी दोनों खींच दिए नीचे.. हरामी ने एकदम से नंगा कर दिया।

मैं शर्म के मारे दोहरी हो गई, शर्म के मारे मैंने घुटने मोड़ लिए तो उसने जबर्दस्ती उन्हें सीधा कर दिया और..’ आगे कहते-कहते सुमनसा रुक गई।
‘और क्या?’ इंद्रिका ने पूछा- बोल ना.. शर्मा क्यों रही है?
‘जी वो.. फ़िर उसने मेरी टाँगें फ़ैला दीं।’ सुमनसा धीरे से बोली।
‘हुम्म..’ इंद्रिका की धड़कन जैसे ठहर गई।
‘और.. मेरी चूत से अपना मुँह सटा लिया। मेरी जाँघों पर उसकी जीभ का गरम और गीला स्पर्श होने लगा। वो पागलों की तरह मेरे क़मर के नीचे चूमने-चाटने लगा।

मेरे शरीर में जैसे बिज़ली का करण्ट दौड़ने लगा, मेरी साँसें तेज़-तेज़ चलने लगीं। इतना अच्छा मुझे कभी नहीं लगा था।
मैंने अपनी जाँघें थोड़ी और फ़ैला लीं.. ताकि वो मेरी चूत को अच्छे से चूम सके। उसने अपना मुँह मेरी चूत से सटा लिया और चूत पर चुम्बन अंकित करने लगा। फ़िर वो अपनी जीभ से चूत में से निकलने वाला पानी चाटने लगा। मेरे कोमल अंगों पर तेज़ी से लपलपाती उसकी जीभ मुझे पागल बनाए जा रही थी।

उसने मेरी क़मर को थाम रखा था। मैं अब मस्त हुई जा रही थी। एक तूफ़ान सा मेरे अन्दर उमड़ रहा था। मैं चाह रही थी कि उसके जीभ की चोट मेरी चूत पर ऐसे ही पड़ती रहे।
हर एक गुज़रते क्षण में मेरे अन्दर का तूफ़ान बड़ा होता जा रहा था, मेरा तन एक अज़ीब से तनाव से भर उठा।
शायद अनिल कि जीभ मेरी चूत के भीतर तक घुस चुकी थी, वो तेज़ी से जीभ बाहर-अन्दर कर रहा था और चूत बावली हो कर और और रस छोड़ रही थी।

अनिल की उंगलियाँ मेरी चूत के दाने को मसल रही थी। वो इस खेल का पक्का खिलाड़ी था.. उसने मुझ पर अपने सारे हुनर आज़मा लिए।
मैं अब आनन्द के चरम पर थी। मैंने उसका सिर दोनों हाथों से अपनी चूत में दबा रखा था और नीचे से अपने नितम्ब उछाल रही थी। वो बेफ़िक्री से मेरी रसभरी चूत को चाटे जा रहा था।

कुछ समय तक ऐसे ही चलता रहा फ़िर अचानक़ मुझे कुछ हो गया.. मैं अपने होश खो बैठी। मेरे शरीर के भीतर से जैसे कुछ छूटा और मैं आनन्द के चरम पर पहुँच गई, मेरा शरीर हल्के-हल्के झटके खाने लगा, मुझे और कुछ याद नहीं रहा.. सिवाय मेरे ज़िस्म में दौड़ती करण्ट की लहरों के।
यह मेरे जीवन का पहला चरमानन्द था, वो वक़्त शायद संसार का सबसे हसीन पल था अल्लाह कसम..’

इंद्रिका ने देखा सुमनसा का शरीर काँप रहा था। शायद वो मस्ती के उन पलों को याद करती हुई फ़िर उसी चरमानन्द का अनुभव करने लगी थी।
‘पता नहीं कितनी देर तक मैं यूँ ही पड़ी.. उस हसीन अनुभव को जज़्ब करती रही। अनिल मेरे करीब आ गया और मैं उससे लिपट गई।
कुछ देर मुझे सीने से सटा कर रखा तो मैंने उसे किस करने शुरू हर दिए। मैं उसका शुक्रिया करना चाहती थी और वो हरामी फ़िर शुरू हो गया।
मैं प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ गई और वो मेरी टाँगों के बीच खड़ा था। वो मेरे मम्मों को थाम कर उन्हें हल्के-हल्के मसलने लगा और निप्पलों को हल्के-हल्के से चूसने-चाटने और दांतों से काटने भी लगा।

एक रोमांच फ़िर से दिल में होने लगा। मैंने अपना कुर्ता और ब्रा को तन से अलग कर दिया और उसकी शर्ट के बटन खोलने लगी। क़मर से नीचे तो वो वैसे भी नंगा था ही.. शर्ट के उतरते ही.. ना उसके ज़िस्म पर एक भी कपड़ा था.. ना मेरे!’
इतना कह कर सुमनसा ने इंद्रिका की ओर देखा इंद्रिका बड़ी तन्मयता से उसे सुन रही थी।
सुमनसा ने कहना शुरू किया- मैं प्लेटफ़ॉर्म से टाँगें नीचे लटका कर बैठी थी और वो उनके बीच में था। वो जब मुझसे सटा तब उसका लण्ड मेरे पेट से टकराया। मैंने उसको मुट्ठी में भर लिया और मसलने लगी।

हम दोनों ना जाने कब तक किस करते रहे कि अचानक़ अनिल मेरे कान में फ़ुसफ़ुसाया- चुदोगी?
मैंने कहा- धत्त्..
और मैं नीचे देखने लगी।
उसने फ़िर पूछा- मेरा लौड़ा लोगी अपनी भोसड़ी में?

मैंने उसका लण्ड और ज़ोर से पकड़ लिया। दिल अचानक़ ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा और चूत फ़िर से गीली हो गई।
अनिल ने वहीं प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े अपने पैण्ट की जेब से एक कण्डोम निकाला और अपने तने हुए लण्ड पर चढ़ा दिया। मेरा दिल धक्क से रह गया।मुझे पता था कि अनिल अब मुझे चोदने वाला था।
सुमनसा ने यह कहा तो इंद्रिका रोमांचित हो उठी, उसकी चूत भी गीली हो गई।

‘मैंने कुछ बोलना चाहा तो अनिल बोला कि भरोसा करो.. कुछ नहीं होगा।’
मैंने कहा- पर अनिल.. मुझे बहुत दर्द होगा.. तुम्हारा तो काफ़ी बड़ा है। ये मेरे अन्दर कैसे जाएगा?
अनिल बोला- सब मुझ पर छोड़ दो। तुम बस मज़े लो।
इतना कह कर उसने खूब सारा थूक अपने हाथ में लिया और पहले अपने लण्ड पर और फ़िर मेरी चूत के अन्दर लगाया। उसका हाथ अपनी चूत पर लगाते ही मैं जैसे सारे विरोध भूल गई।
उसने मुझे प्लेटफ़ॉर्म पर लेट जाने को कहा और मेरी एक जाँघ अपने कन्धे पर रख दी। फ़िर अपना थूक से सना लण्ड मेरी चूत के मुँह पर रख कर रगड़ने लगा।

फ़िर बोला- सुमनसा बस शुरू में थोड़ा सा दर्द होगा.. तुम हिम्मत रखना फ़िर बहुत मज़ा आएगा।
यह कह कर उसने अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसाना शुरू किया। चूत के रस और थूक के कारण चूत हालांकि पूरी लसलसाई हुई थी और लण्ड का आगे का कुछ हिस्सा मेरी चूत में आसानी से घुस गया। लेकिन पीछे से उसका लण्ड बहुत मोटा है दीदी.. जैसे ही उसने एक धक्का दिया..
मुझे बहुत ज़ोर का दर्द हुआ, मेरी जान निकल गई और मैं उसे रोकने लगी- आहऽऽ अनिल..
इस पर उसने धक्के रोक दिए और अपना लण्ड बाहर खींच लिया। फ़िर अपनी हथेली में ढेर सारा थूक लेकर अपने लण्ड पर लगाया। वापस मेरी चूत के मुँह पर रख कर एक धक्का दिया।

इस बार लण्ड कुछ ज्यादा अन्दर चला गया, थोड़ा दर्द तो हुआ पर अनिल हल्के-हल्के से धक्के लगाने लगा।
मुझे दर्द तो हुआ.. लेकिन कुछ मज़ा भी आया।
अनिल ने मेरे मम्मों को थाम लिया और मुझे किस भी करने लगा, मेरा ध्यान दर्द से हट गया और मैं उसके गहरे चुम्बनों का आनन्द लेने लगी।
अनिल ने मुझे आराम में पाकर अपने धक्कों की रफ़्तार थोड़ी बढ़ा दी। उसका मोटा लण्ड मेरी चूत की दीवारों से रगड़ खा रहा था। दर्द हालांकि हो रहा था.. लेकिन मज़ा ज्यादा आ रहा था।

फच्च-फच्च की आवाज़ मेरी गीली चूत से आने लगी और मेरे मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं।’
इंद्रिका सुमनसा की बातों से मानो खुद को चुदास के नशे में डूबती हुई महसूस करने लगी थी।
‘दीदी.. मुझ पर नशा सा सवार हो गया था। मस्ती की लहरें मेरे तन-मन को भिगो रही थीं। मैं तेज़-तेज़ साँसें लेने लगी। मैं भी अपने नितम्ब उछाल-उछाल कर अनिल के लण्ड को पूरा लेने को बेताब हो रही थी।

अनिल ने ये देख कर अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी। पूरी रसोई ‘फ़च्च फ़च्च’ की आवाज़ और मेरी सिसकारियों से गर्मा गई थी।
मैं अनिल को देख रही थी उसका बदन पसीने-पसीने हो गया था और साँसें भी तेज़ चल रही थीं.. लेकिन उसकी चोदने की गति कम नहीं हुई।
मेरे शरीर का तूफ़ान अब ज़ोर मारने लगा था, आनन्द की लहरें योनि की दीवारों से उठ कर दिमाग को झनझना रही थीं। मेरा तन अकड़ने लगा।
दिमाग में वैसे ही हल्के-हल्के विस्फ़ोट होने लगे.. जैसे थोड़ी देर पहले चरम सुख पर पहुँचने के वक़्त हो रहे थे।

मैं चरम के निकट थी, मैंने अनिल की क़मर को थाम लिया और उसके चोदने की ताल से ताल मिलाने लगी, मेरे मुँह से भी सीत्कारें फूटने लगीं- आहऽऽ.. अनिल.. आऽऽह.. हाँ अनिल ऐसे ही चोदो मुझे.. हाँ अनिल ज़ोर से और ज़ोर से..’ की मादक आवाज़ें निकालने लगीं।
‘मेरी इन सिसकारियों ने अनिल की उत्तेजना को और बढ़ा दिया वो मुझे बेरहमी से पेलने लगा।
मेरी साँसें और तेज़ हो गईं.. मैं अब झड़ने लगी थी।

मेरी चूत अब आनन्द का सरोवर बन चुकी थी.. जिसमें अनिल और मैं गोते लगा रहे थे।
थोड़ी देर में ही मेरे अन्दर से आनन्द का एक फ़व्वारा छूटा और मैं अपनी सुध-बुध खो बैठी। अगले कुछ मिनटों तक मुझे कुछ होश नहीं रहा। सुध-बुध लेटी तो महसूस हुआ कि अनिल का लौड़ा अभी भी मेरी चूत की दीवारों से सिर टकरा रहा था।
आनन्द की लहरें कम हुई तो दर्द लौट आया। पूरी चूत और जाँघों में पीड़ा होने लगी। या मालिक ये इन्सान थकता नहीं हैं क्या? मेरी कराहें निकलने लगीं।

इंद्रिका एकदम से गर्म हो उठी थी और वो बस आँखें फाड़े एकटक सुमनसा की तरफ निहार रही थी।
‘उई अम्मा.. मैं मर गई.. हाय दैय्या.. बस करो अनिल मेरी फ़ट जाएगी अनिल..’
मैं मिन्नतें करने लगी, अनिल तुम्हें अल्लाह का वास्ता.. बस भी करो। अब कल कर लेना अनिल.. प्लीज़ मुझे छोड़ दो प्लीज़।
अनिल को मेरे दर्द का एहसास शायद हो गया था इसलिए उसने अपना लण्ड बाहर खींच लिया।
मैंने राहत की साँस ली। वो तेज़ी से मेरे मुँह के पास अपना लण्ड लाया.. उसने अपना कण्डोम खींच कर निकाला और अपने हाथ से अपने लौड़े को तेज़ी से हिलाने लगा।

मैंने देखा कि उसका लण्ड मेरी चूत का पानी पी कर और मोटा हो गया था।
कुछ पलों के बाद लण्ड से गाढ़े और गर्म वीर्य का एक फ़व्वारा छूटा जो मेरे चेहरे.. मुँह और दूधिया छातियों को भिगो गया। कुछ वीर्य मेरे मुँह में भी चला गया।नमकीन सा स्वाद अज़ीब था.. लेकिन अच्छा लगा।
अनिल ने मेरे मम्मों पर पड़ा सारा वीर्य मेरे बदन पर फ़ैला दिया।

मैंने मुस्कुरा कर कहा- हरामी ये क्या कर रहा है.. अब मुझे नहाना पड़ेगा।
तो मुझे चूम कर बोला- चल रानी.. इकट्ठे ही नहा लेते हैं। मैंने हँस कर उसके पिछवाड़े पर एक चपत जमा दी।
फ़िर वो बोला- तेरे मुँह से ‘हरामी’ सुनना बड़ा अच्छा लगता है.. अब से तू मुझको हरामी ही बुलाना।’
‘तू है ही हरामी साले.. कितना ज़ोर-ज़ोर से चोदता है। कितना दर्द हुआ.. मुझे लगा फ़ट ही जाएगी मेरी तो..’
‘दीदी.. वो हँसा और अपने कपड़े पहन कर बाहर चला गया और मैं ना जाने कितने देर तक वैसे ही पड़ी रही।’
इंद्रिका शबनम के चहरे पर तृप्ति की लाली साफ़ देख पा रही थी।

आप इन सेक्स कहानियों को भी पसन्द करेंगे:

Disclaimer: This site has a zero-tolerance policy against illegal pornography. All porn images are provided by 3rd parties. We take no responsibility for the content on any website which we link to, please use your won discretion while surfing the links. All content on this site is for entertainment purposes only and content, trademarks and logo are property fo their respective owner(s).

वैधानिक चेतावनी : ये साईट सिर्फ मनोरंजन के लिए है इस साईट पर सभी कहानियां काल्पनिक है | इस साईट पर प्रकाशित सभी कहानियां पाठको द्वारा भेजी गयी है | कहानियों में पाठको के व्यक्तिगत विचार हो सकते है | इन कहानियों से के संपादक अथवा प्रबंधन वर्ग से कोई भी सम्बन्ध नही है | इस वेबसाइट का उपयोग करने के लिए आपको उम्र 18 वर्ष से अधिक होनी चाहिए, और आप अपने छेत्राधिकार के अनुसार क़ानूनी तौर पर पूर्ण वयस्क होना चाहिए या जहा से आप इस वेबसाइट का उपयोग कर रहे है यदि आप इन आवश्यकताओ को पूरा नही करते है, तो आपको इस वेबसाइट के उपयोग की अनुमति नही है | इस वेबसाइट पर प्रस्तुत की जाने वाली किसी भी वस्तु पर हम अपने स्वामित्व होने का दावा नहीं करते है |

Terms of service | About UsPrivacy PolicyContent removal (Report Illegal Content) | Disclaimer | Parental Control

error: Content is protected !!