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यानि तुम्हारा लंड मेरी चूत नहीं गांड में घुसेगा ?

यानि तुम्हारा लंड मेरी चूत नहीं गांड में घुसेगा ? : यह मेरी सच्ची कहानी है मेरी शादी ठीक ठाक से हो गयी | मेरे जिम्मे सिर्फ़ दो काम थे, पहला घर और ससुराल में शादी की सभी परम्पराएँ पूरी करना और दूसरा शादी में शामिल मेहमानों से शादी की शुभकामनाएँ स्वीकारना | इसके अलावा शादी की तैयारियों के कई काम भी जो चलते फिरते मुझे नजर आते, जल्दी ही उन्हें करना पड़ता या उन्हें करने के लिए किसी को कहना पड़ता।

बारात लेकर रम्भा के गांव जाना और फ़िर रम्भा के साथ शादी करके लौटते समय तक तो मैं बहुत थक गया था। पर सारी थकान इस सोच से दूर करता कि अब रम्भा मुझे रोज चोदने के लिए मिल गई है। हमारे समुदाय में एक कहावत है- ‘लुगाई रो हाथ कर ले अपणा, सख्ती कम जोर घणा’
इस कहावत को चरितार्थ होते मैंने अभी ही देखा।

मेरी सारी थकान तब फुर्र हो जाती जब रम्भा का हाथ ऊपर से ही सही मेरे लंड पर लग जाता। इस आनन्द को बताने मुझे शब्द नहीं मिल रहे हैं। पर साथ ही मैं महसूस कर रहा था कि रम्भा भी मेरे साथ सैक्स का यह खेल खेलने का मजा ले रही है। उसे जब भी मौका मिलता, वह मेरे लंड पर हाथ रख देती।

लौटते में हम अपनी कार में थे और ड्राइवर तथा मेरे भाई के दोनो बच्चे साथ में होने के कारण हमें ज्यादा कुछ करते नहीं बना। बस कभी वह मेरे लंड को छू लेती, या मैं उसके बूब्स या चूत दबा देता। कार में रम्भा ज्यादातर सोते हुए ही आई। हम लोग शाम तक घर पहुंचे, और आज रात को ही हमारी सुहागरात थी। सो घर पहुँचते ही मैं सोया, रात को जागना था ना इसलिए।

करीब दो घण्टे बाद मैं उठा, देखा तो पूरा कमरा फूलों से सजा हुआ था। कमरे से बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी, रूम फ़्रेशनर स्प्रे किया गया था। मैं अभी कमरे को देख ही रहा था कि वहाँ भाभी आ गई।

उन्होंने मुझसे कहा- आप थोड़ी देर बाहर बैठिए, हमें इस कमरे को अभी और ठीक करना है। मैं उठकर बाहर आ गया और वहाँ मेहमानों के पास बैठ गया। यहाँ बैठे हुए मुझे एक घंटे से भी ज्यादा समय हो गया। तभी भाभी वहाँ आईं और मुझे बुलाकर अंदर कमरे में ले गई ।

यहाँ मुझे खाना दिया गया। मैं खाना खाकर उठा ही था कि हमारे पड़ोस में रहने वाली अंजलि भाभी आईं और मुझे बोली- हीरा पाया है तुमने जस्सूजी। अब ऐश करिए जिंदगी भर। मैंने कहा- भाभी, आप रम्भा से मिलकर आ रहीं हैं ना ?

उर्वशी भाभी बोली- मिलकर? अरे उसे आपके पास जाने के लिए तैयार कर रही थी। अब उन्हें देखकर बताइएगा कि कैसी लगी।

मैं गदगद हो गया, वाह अब इत्मिनान से रम्भा को चोदने में मजा आ जएगा। अंजलि भाभी चली गई, इसके थोड़ी ही देर बाद भाभी व उनके साथ तीन महिलाएँ आईं, मुझसे बोली- चलिए जस्सूजी।

मैं तुरंत खड़ा हुआ और बोला- चलिए। मेरे यह कहते ही सभी महिलाएँ खिलखिला उठी, उनमें से एक बोली- कितना बेचैन है बिचारा। अब मैंने बात पलटते हुए कहा- कहाँ चलना है बताइए ना ? यह सुहागरात की सेक्स स्टोरी आप मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | इस कहानी का शीर्षक यानि तुम्हारा लंड मेरी चूत नहीं गांड में घुसेगा ? है |

भाभी बोली- आपके कमरे में चलिए जस्सूजी । मैं खुशी में विभोर हो उनके साथ चल पड़ा। मेरे कमरे के बाहर भाभी ने मुझे रोका और बोली- आप थोड़ी देर यहाँ रूकिए, मैं बस दो मिनट में रम्भा से मिलकर आती हूँ ।

यह बोलकर भाभी अंदर गई और जल्दी ही बाहर आ गई। अब सभी महिलाएँ मुझे मेरे कमरे में दरवाजे के बाहर से ही धक्का देकर कमरा बाहर से बंद कर लिया।

मैं भी अब राहत की सांस लेकर दरवाजे को अंदर से बंद करके पलंग की ओर बढ़ा। रम्भा पलंग पर घुटने मोड़ कर बैठी हुई थी।

मैंने उसके पास पहुँच कर कहा- अब क्या नई दुल्हन की तरह शर्माते हुए बैठी हो, चलो जल्दी से कपड़े उतारो।

मैं पलंग पर चढ़ने लगा, तभी रम्भा जल्दी से नीचे उतर गई। मैं भी नीचे आया और बोला- क्या हो गया ?

तभी रम्भा मेरे पैरों पर गिर कर बोली- आज से आप मेरे भगवान हैं। मुझे अपने से दूर मत कीजिएगा ।

मेरी आँखों में आँसू आ गए- अरे, मैं तुम्हें अपने से दूर क्यूं करूँगा। तुम ही मुझे छोड़कर कहीं मत जाना।

यह कहते हुए मैंने रम्भा को पलंग पर बिठाया व कहा- आज अपना चेहरा तो दिखा दो। कितनी देर हो गई है, तुम्हें देखने को तरस रहा था मैं !
ऐसा कहकर मैंने उसका चेहरा ऊपर किया और उसे आज भेंट करने के लिए खरीदा नेकलेस उसके गले में डाल दिया। मैंने देखा कि आज तो रम्भा गजब की सुन्दर दिख रही है।

उसकी उपमा किस हिरोइन से करूं, आज तो वह सभी हिरोइनों से भी सुंदर दिख रही थी, मानो परी हो कोई | वही संगमरमरी रंग, सुतवाँ नाक, आँखें ऐसी मानो किसी ने गोरे खिले रंग पर हरा काजू रख दिया हो। उसका गला देखकर मुझे ऐसा लग रहा था कि यह कुछ भी खाएगी पता चल जाएगा।

उसके स्तन वैसे ही उठे हुए, और आज सबसे ज्यादा देखने की चीज तो उसके चूतड़ थे, ये उसके सीने से भी ज्यादा उठे हुए दिख रहे थे। उसके रूप पर मंत्रमुग्ध हो मैंने रम्भा से कहा- चलो फटाफट कपड़े उतार दो अब |

रम्भा बोली- एक मिनट रूकिए, मैं फारमेल्टी तो पूरी कर लूँ। यह बोलकर वह मेज के पास तक गई और वहाँ रखा गिलास लाकर मुझे देकर बोली- चलिए, इस दूध को जल्दी से खत्म कीजिए। यह सुहागरात की सेक्स स्टोरी आप मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | इस कहानी का शीर्षक यानि तुम्हारा लंड मेरी चूत नहीं गांड में घुसेगा ? है | मैंने उसके स्तन पर हाथ रखा, बोला- आज रात को ये वाला दूध पीया जाता है, चलो निकालो जल्दी। उसने कहा- ये वाला दूध और चूत दोनों पीने व चोदने को मिलेगी, पर पहले इस दूध को पीजिए जल्दी।

मैंने उससे गिलास लिया और दूध पीने के बाद उसी मेज पर रखे जग से और दूध लेकर उसी गिलास में डाला व रम्भा को देते हुए कहा- लो अब तुम भी जल्दी से पियो।

रम्भा ने करीब आधा गिलास ही दूध पी और गिलास वहीं रख दिया। रम्भा को देर करते देख मैंने खुद ही उसके जेवर और कपड़े उतारने शुरू किए।
पहले उसके माथे पर सोने की चेन से लटके हुए तारों को उतारने के लिए दोनो कानों के पीछे बंधी चेन को खोला। अब नाक पर पहनी बड़ी सी नथनी भी उसी चेन से लगी हुई थी, नथनी रम्भा उतारने लगी।

मैंने उससे कहा- बाली भी निकाल लेना ! और मैं उसके गले के पीछे नेकलेस के हुक खोलने लगा, इसके बाद कमरबंद को निकाला।

सब जेवर उतारकर वह बोली- अब अच्छा लग रहा है। मैंने पहले उसकी साड़ी, फिर ब्लाउज व पेटीकोट उतारा। अब वह क्रीम रंग की ब्रा-पैन्टी के सेट में थी। उसे देखकर मैं सोच रहा था कि रम्भा को इस रूप में देखने के लिए मुझसे भी मालदार लोग इस पर ना जाने क्या-क्या लुटाने को तैयार रहते, पर भगवान ने इसे मुझे सौंप दिया। यह सोचकर मैंने अपने भगवान के प्रति दिल से आभार जताया ।

रम्भा अब मेरे कपड़े उतारने लगी। मैंने भी जल्दी-जल्दी कर अपना कुर्ता-पजामा व बनियान को उतारा, अब मैं भी सिर्फ अंडरवियर में था। मैंने रम्भा को अपनी बांहों में लिया और उसके होंठों को अपने होंठों से दबाया, पहले निचले फिर ऊपर के होंठ को जी भरकर चूसा। इसके बाद जीभ से उसकी जीभ को छेड़ा। काफी देर तक ऐसा करने के बाद अब मैंने उसकी ब्रा का हुक खोलकर ब्रा को पलंग पर फेंका ।

मैंने देखा कि उसकी खुली छाती पर तने हुए उरोज अपने सिरे पर गुलाबी छतरी ताने मुझे ललचा रहे थे। मैंने एक तरफ के गुलाबी चुचूक को अपने मुँह में रखा और दूसरे को उंगलियों के बीच फंसाकर हल्के से दबाने लगा। थोड़ी देर बाद दूसरे निप्पल को मुँह में भरा व इधर के निप्पल को उंगलियों से दबाने लगा।

अब मुझे बिस्तर की जरूरत महसूस हुई तो रम्भा को अपनी गोदी में उठाकर बिस्तर में लाकर डाल दिया। मैं उसके पास पहुँचा वैसे ही रम्भा ने मेरा अंडरवियर खींचकर नीचे सरका दिया, व मेरे तने हुए लंड को अपने मुँह में भर लिया।

वह गरमा गई थी, लंड को मुंह के जितना अंदर तक ले सकती थी उतने अंदर तक ले रही थी । अब मुझे लगा कि ऐसे में तो मेरा जल्दी ही गिर जाएगा और यह जीत जाएगी। तो मैं उसके बूब्स को दबाते हुए 69 के पोज में आ गया और उसकी पैन्टी को उतारकर चूत चाटने लगा ।

वह इतनी ज्यादा उत्तेजित हो गई थी कि अपनी चूत को मेरे मुंह में डाल देने की कोशिश में अपनी कमर को झटका लगाए जा रही थी। हम दोनों एकदम नंगे होकर एक दूसरे के प्राइवेट पार्ट को पूरी तन्मयता से अपने-अपने भीतर समाने की कोशिश कर रहे थे, पर हमारा यह प्रयास ज्यादा देर नहीं चला पहले मेरा गिरा, मेरे थोड़ी देर बाद ही रम्भा ने भी अपनी चूत का फ़व्वारा मेरे मुँह में छोड़ दिया। उधर उसने और इधर मैंने मुंह में समाए पूरे माल को गटकने के बाद लंड व चूत को चाटने का कार्यक्रम जारी रखा।

यह हमारी सुहागरात की खासियत रही कि हम दोनों ने अपने पार्टनर का माल ना सिर्फ चखकर उसका स्वाद पता किया बल्कि उसे उदरस्त भी किया । अब हम दोनों एक दूसरे से चिपककर लेट गए। मैंने रम्भा से कहा- यार आज हमारा हनीमून हैं, कहते हैं इस दिन वर और वधू अपना यौवन एक दूसरे को जिंदगी भर के लिए सौंपते हैं ।

रम्भा बोली- मैं तो अपना सब कुछ तुम्हें सौंप चुकी हूँ । यह सुहागरात की सेक्स स्टोरी आप मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | इस कहानी का शीर्षक यानि तुम्हारा लंड मेरी चूत नहीं गांड में घुसेगा ? है |मैं बोला- रम्भा, हम दोनों ने अपना बदन शादी से पहले ही एक दूसरे को दे दिया था। कायदे से हमारा हनीमून तो उस दिन तुम्हारे ही घर में हो गया था। तुम्हारी चूत की झिल्ली का रक्त भी तुम्हारे घर की चादर में ही लगा था। यानि आज तो हम रीति रिवाज से एक दूसरे के हो रहे हैं, नया कुछ भी नहीं है ना ?

रम्भा बोली- हाँ, यह तो है, तो आज क्या खास किया जाए जिससे हमें आज का दिन हमेशा याद रहे।

मैं बोला- मुझे एक आइडिया आया है, मानो तो बोलूं।

रम्भा बोली- मानूँगी, आप बोलो तो सही।

मैं बोला- क्यूं ना तुम्हारी गांड की सील तोड़कर हनीमून मनाएँ?

रम्भा बोली- यानि तुम्हारा लंड मेरी चूत नहीं गांड में घुसेगा?

मैं बोला- हाँ कोशिश करते हैं ना।

रम्भा बोली- पर उसमें बहुत दर्द होगा।

मैं बोला- देखो जैसे चूत में पहली बार लंड जाने से दर्द होता है ना। सो गांड में भी पहली बार लंड जाएगा, तब दर्द तो होगा पर बाद में बहुत मजा आएगा, गांड में भी लौड़ा लेने की इच्छा होगी।

रम्भा बोली- वो तो ठीक है, पर यदि दर्द ज्यादा हुआ तो आप अपना लंड बाहर निकाल लीजिएगा प्लीज।

मैं बोला- एकदम निश्चिंत रहो रम्भा, जब तुम दर्द को सहन न कर पाओ तो मुझे कह देना मैं तुरंत अपने लंड को बाहर निकाल लूँगा।

इस प्रकार हमने अपनी सुहागरात में गांड के दरवाजे खोलने का निर्णय लिया। यह नया प्रयोग था, मैंने भी अभी तक किसी की गांड नहीं मारी थी पर गांड मारते समय होने वाले दर्द के बारे में सुना जरूर था। मैं ड्रेसिंग टेबल से क्रीम और तेल उठा कर लाया। मैंने कहानी की शुरुआत में ही रम्भा की उभरी हुई गांड के बारे में बताया था। लड़की चोदने को मिले तो हर कोई स्वाभाविक रूप से उसकी चूत ही चोदता है। मैंने भी यही किया पर शादी के बाद तो इसे जिंदगी भर चोद सकूंगा सो अब मेरी नजर रम्भा की गांड पर थी।

उसके पास पहुँच कर मैंने कहा- तुम मेरे लौड़े पर यह तेल व क्रीम लगाना और मैं तुम्हारी गांड में यह लगाकर बढ़िया मालिश कर देता हूँ। मैंने पहले उसे घुटने टेक कर कूल्हे ऊपर करने कहा, उसने वैसा ही किया।

मैंने पहले उसके कुल्हों और गाण्ड के पास तेल लगाकर अच्छे से मालिश की, इस दौरान छेद के अंदर भी उंगली डालकर लंड जाने का रास्ता बनाया। फिर गाण्ड में क्रीम लगाकर उसे और चिकना किया। इस प्रकार रम्भा की गांड अब चुदने को तैयार थी।

गांड से मेरा हाथ हटते ही रम्भा मेरे लौड़े के पास आई और उस पर तेल डालकर खूब मालिश की। तेल के बाद उसने भी लंड के सुपारे पर खूब क्रीम लगाई। मेरा लंड भी अब उसकी गांड में जाने तैयार था।

अब मैं भी घुटने के बल ही उसकी गांड के पीछे आया और अपने लंड को उसकी गांड के छेद पर रखा और लंड को धक्का दिया। लंड का सुपारा थोड़ा सा अंदर हुआ। लंड अंदर जाने से रम्भा पलंग पर उल्टा ही पूरा लेट गई और बोली- दर्द हो रहा है, बाहर निकालो। पर मैं जानता था कि अभी छोड़ दिया तो फिर नहीं करने देगी। तो मैंने थोड़ा और भीतर घुसा दिया।

अब रम्भा की कराह व ‘लौड़ा बाहर निकालो’ की आवाज और तेज हो गई, मैं डरा कि कहीं बाहर लोग जमा न हो जाएँ, रम्भा से कहा- आवाज नीची करो। यह सुहागरात की सेक्स स्टोरी आप मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | इस कहानी का शीर्षक यानि तुम्हारा लंड मेरी चूत नहीं गांड में घुसेगा ? है |

ऐसे में मैं थोड़ा-थोड़ा और अंदर डाल रहा था। रम्भा की आवाज नहीं रूक रही थी, ना ही वह चुदाई में मुझे सहयोग दे रही थी। अबकी बार मैंने उसे थोड़ा ढांढस बंधाया और लंड को पूरा अंदर कर दिया। उसकी गांड के किनारे फट गए और उनसे खून की हल्की धार निकल रही थी।

मुझे दुख तो हुआ पर खडे लंड के जोश के आगे मुझे उसके दुख ने रुकने नहीं दिया। अब मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दिया और कुछ ही देर में मेरा गिर गया। रम्भा दर्द से बेहाल थी, मैंने उसे पुचकारना शुरू किया। मेडीबाक्स से डेटाल की शीशी लाया और डेटाल रूई में लगाकर उसकी गाण्ड के चारों ओर लगाया। उसे सामान्य होने में थोड़ा समय लगा। चादर में उसके खून के अलावा थोड़ी गंदगी भी गिर गई थी सो इस चादर को उसने निकालकर पलंग के नीचे ही डाल दी।

पलंग पर दूसरी चादर डालकर हम लोग अब लेट गए। रम्भा के दर्द को कम करने के लिए मैंने उससे बात शुरू की और उसके बूब्स को सहलाने लगा। कुछ देर बाद वो ठीक हुई और हमने फिर चुदाई का दौर शुरू किया।

इस बार मैंने उस पर प्यार की बरसात करते हुए अपने लंड को उसकी चूत में डाला। अब तक सुबह के 5 बज गए थे। हम दोनों एक दूसरे की बाहों में आबद्ध हो सो गए।

तो प्यारे मस्ताराम डॉट नेट के पाठको, यह थी हमारी सुहागरात की बात। हम दोनों इस रात की बात आज भी करते हैं। हमारी सुहागरात जिसने हमें बहुत खुशी दी, उसकी मुख्य बात यह रही कि किसी भी औरत के शरीर में तीन छेद रहते हैं, मुंह, चूत और गांड, और रम्भा नें सुहागरात में अपने इन तीनों छेदों में मेरा लंड डलवाया।

अगर आप मुझसे कुछ कहना चाहते है तो कमेंट कर दे मै आप को रिप्लाई करूँगा या मेरी वाइफ भी रिप्लाई कर सकती है क्यों की मेरी वाइफ भी मस्ताराम डॉट नेट की कहानियां पढ़ने की दीवानी है |

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The Author

गुरु मस्तराम

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त मस्ताराम, मस्ताराम.नेट के सभी पाठकों को स्वागत करता हूँ . दोस्तो वैसे आप सब मेरे बारे में अच्छी तरह से जानते ही हैं मुझे सेक्सी कहानियाँ लिखना और पढ़ना बहुत पसंद है अगर आपको मेरी कहानियाँ पसंद आ रही है तो तो अपने बहुमूल्य विचार देना ना भूलें

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