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देसी पहलवान के साथ क्रेजी सेक्स- 2

देसी पहलवान के साथ क्रेजी सेक्स- 1

 

अचानक ही उन्होंने गाड़ी से एक हाथ छोड़कर मेरा हाथ पकड़ा और अपनी जैकिट के अंदर पेट के सामने रख दिए… और बोले- ऐसे रख ले दूसरा हाथ भी…
मेरी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी थी क्योंकि मैंने तो जैकिट की जेब में हाथ रखने का सोचा था लेकिन उन्होंने तो जैकिट के अंदर अपने पेट पर मेरे हाथ रखवा दिए थे अब उनके जिस्म और मेरे हाथ के बीच में बस एक टीशर्ट बची थी।
वास्तव में उनके जिस्म में काफी गर्मी थी मेरे ठंडे हाथ गर्म हो चुके थे… उनकी इस तरह की हरकत से मुझे किसी राजपुताना महाराजा की कमसिन महारानी होने की फीलिंग आ रही थी… और अब मैं भी अपनी शर्म और औपचारिकता छोड़कर उनके जिस्म से लिपट चुका था और अपने देसी मर्द के हॉट जिस्म की गर्मी में डूब चुका था।

मेरे दोनों हाथ उनकी जैकिट के अंदर उनके सख्त पेट पर रखे हुए थे और मैं पीछे बैठा हुआ उनके जिस्म की खुशबू को पाने की कोशिश कर रहा था लेकिन जिस्म की खुशबू मुझे नहीं आ पा रही थी क्योंकि उन्होंने लेदर जैकिट पहन रखी थी। मैं बस यूं ही उनकी चौड़ी पीठ पर अपना सर रखकर आनन्द ले रहा था।

निल्जय भैया लगभग एक साल पहले तक गांव में कुश्ती लड़ते थे लेकिन अब उनकी कसरत थोड़ी छूट चुकी थी लेकिन अब भी उनका जिस्म बिल्कुल कड़क और हट्टा कट्टा था… क्योंकि यह उनकी बचपन की मेहनत थी… हालांकि समय मिलने पर आज भी वे कसरत कर लिया करते थे।
उनकी जैकिट से उनकी छाती लगभग 4 इंच उभरी हुई दिखाई देती थी और उस पर हल्के बाल जो कि उनकी टीशर्ट की ऊपरी खुली बटन से बाहर की और निकल आते थे। इसके अलावा उनकी जैकिट की आस्तीन में उनके हाथ की भुजायें (बाईसेप) काफी मोटी और फंसी हुई दिखाई देती थी… ऐसा लगता था मानो अभी जैकिट को फाड़कर आज़ाद हो जायेंगी।

मैं अक्सर यही सब देख करता था… और देखते ही देखते मेरे अंदर अन्तरवासना की बाढ़ सी आ जाती और मानो मैं बेकाबू सा हो जाता… निल्जय भैया के ऐसे जिस्म से लिपटकर अब मेरे लिए काबू कर पाना मुश्किल था।
क्योंकि ठंड थी इसलिए वो चुपचाप होकर गाड़ी चला रहे थे ताकि मुंह में हवा ना घुसे। मेरे हाथ उनके पेट पर मानो बंध से गये थे… मैं ना तो उन्हें हटा सकता था और ना ही अपनी मर्जी के मुताबिक उनके कसरती गर्म जिस्म पर सहला सकता था। मेरा दिल कर रहा था कि अभी उनकी कड़क उभार वाली मज़बूत छाती पर अपनी उंगलियों से छूकर उनके मर्दाना जिस्म को अपने आगोश में भर लूं… लेकिन ऐसा तो संभव नहीं था।

अब हमें पहुँचने में लगभग 20 मिनट और लगने वाले थे और मेरे दिल में उथल पुथल मची हुई थी कि आखिर क्या किया जाए।
मैंने बात निकलते हुए कहा- भैया आप तो सालों से कुश्ती लड़ा करते थे और कसरत भी करते हैं… आपका पेट सख्त तो लग रहा है लेकिन आपकी सिक्स पैक एब्स नहीं है… और म्रितुन्जय को तो बस 5-6 महीने हुए है जिम करते हुए और उसके सिक्स पैक साफ दिखते हैं।

मेरी बात सुनकर वह थोड़ा हँसे और बोले- भाई कुश्ती और अखाड़े की कसरत में सिक्स पैक का कोई काम नहीं है… ये तो सब नकली काम होता है सिक्स पैक वगेरह… आजकल के लौंडों को बस 2-3 महीनों में थोड़ी कसरत और दवाइयों से सिक्स पैक बनवा देते हैं जिम वाले… उनमें कोई ताकत थोड़े ही होती है। जबकि अखाड़े की खिलाई और कसरत शरीर को पूरा बलवान बनाती है… छाती और भुजाओं में बल देती है… सिक्स पैक तो नकली चीज़ है… मेरा पेट सख्त है और छाती की मजबूती देख तू… खुद अपने हाथों से ही छूकर देख ले तू!

उनका इतना कहना हुआ और मानो मेरे हाथ उनकी मर्दाना छाती को छूने को आतुर हो गए… मैंने जैकिट के अंदर ही अंदर अपने हाथ उनकी कातिलाना छाती के उभार पर रख दिये और बस एक ही बार उनकी कांख(अंडर आर्म) से लेकर छाती के उभार के बीच बनी लकीर तक अपने हाथ को चला दिया जिससे उनके सेक्सी हल्के बालों वाली छाती का पूरा 4-5 इंच का उभार और सख्ती मुझे महसूस हुई।
और अब मैं सेक्स में पागल हो चुका था और मेरा लन्ड झटके मारने लगा था… मेरा लन्ड प्री कम से लथपथ हो चुका था और वीर्य बस आने को ही था. मुझे अपने आप को कंट्रोल करना बहुत ज़रूरी था… मेरी आवाज नहीं निकल रही थी लेकिन फिर भी मैंने कहा- हाँ यार भैया… बहुत सख्त है आपकी छाती तो… किसी पत्थर जैसी मज़बूत है।

इसके जवाब में वो कहने लगे- मैंने म्रितुन्जय को भी समझाया था कि ये जिम और सिक्स पैक के चक्कर में मत पड़… लेकिन उसको तो बस फिल्में देख देख कर हीरो ही बनना है… पागल है.
वे पता नहीं क्या क्या बोले जा रहे थे लेकिन अब मेरे दिमाग में तो उस उनकी मज़बूत छाती की कड़क छुअन का अनुभव ही चल रहा था… मुझे आगे की उनकी कोई बात मानो ध्यान ही नहीं थी।

अगले 5 मिनट में हम पहुँचने वाले थे और लन्ड को शांत करना ज़रूरी था… अब मैं थोड़ा पीछे हटा और अपने हाथ यह कहते हुए बाहर निकल लिए कि ‘पहुँचने वाले हिं अब तो हम लोग…’
पीछे हटकर मैंने अपना एक हाथ निल्जय भैया की मोटी भुजा पर रख दिया और दूसरे हाथ से अपनी लोवर की चेन खोली और अपना हाथ अंदर डालकर लन्ड को 4-5 झटके दिए… इतने में ही निल्जय भैया के लन्ड की प्यास में फड़फड़ाते हुए मेरे लन्ड से ढेर सारा माल निकल पड़ा.
मैंने अपनी नाक उनके बालों में लगा दी और उनके बालों की खुशबू को अपने में समा लिया और कड़क भुजा को महसूस करते हुए आनन्द लिया।
हालांकि मुठ मारने से मुझे थोड़ी शांति तो मिली थी लेकिन अभी भी दिल की तड़प जारी थी और इसका समाधान सिर्फ और सिर्फ निल्जय भैया का दानवी लन्ड ही हो सकता था जिसे पाना मेरे लिए शेर के मुँह से खाना छीनने जितना कठिन था।

निल्जय भैया ने मुझे अपने फ्लैट के सामने छोड़ दिया क्योंकि शाम हो चुकी थी ऊपर से मैं अब मुठ मारकर थक चुका था… सेक्सी देसी मर्द को छूकर मेरा ढेर सारा माल निकल चुका था जिससे अब थोड़ी कमजोरी, भूख, ठंड और नींद मुझे सताने लगी थी, इसीलिए मुझे जल्दी ही नींद आ गयी।

सुबह जल्दी ही मेरी नींद खुल गयी और कड़ाके की ठंड में लन्ड फिर खड़ा हो गया और निल्जय भैया के राजपूताना जिस्म और मस्त लन्ड की भूख मुझे फिर से सताने लगी, मुझे रह रह कर आंखों के सामने बस उनकी 4 इंच उभरी सख्त छाती और उनका चोदू अंदाज़ दिखाई दे रहा था।
जैसे शेर यदि खून का स्वाद चख ले तो वह खाकर ही मानता है कुछ वैसा ही आज मेरे साथ हो रहा था, मेरे दिमाग पर निल्जय भैया का लन्ड ही छाया हुआ था। मैं थोड़ा गुमसुम कुछ सोचता और खोया हुआ सा हो गया था और भैया भाभी को भी ऐसा लगने लगा था कि मुझे क्या हो गया है।
एक दो दिन में मुझे वापस लौटना था और इसीलिए चिंता थोड़ी बढ़ चुकी थी। अब मैं यह सोच रहा था कि मुझे निल्जय भैया के लफड़े में पड़ना ही नहीं था, बड़ा परेशान हो रहा हूँ अब।
लेकिन दिल कहाँ मानने वाला था अब… अब तो बस दिल तड़प रहा था किसी न किसी तरह महाराजा निल्जय के जुझारू लन्ड के स्वाद को चखने के लिये।
लेकिन हर चीज़ की कोई कीमत होती है।

बीते दिन हुए निल्जय भैया के जिस्म के दीदार ने मानो शेर के मुँह में खून लगा दिया था और जैसे शेर यदि खून का स्वाद चख ले तो वह खाकर ही मानता है कुछ वैसा ही आज मेरे साथ हो रहा था, मेरे दिमाग पर निल्जय भैया का लन्ड ही छाया हुआ था।

कल शाम की थकान के बाद शाम को जल्दी नींद आ गयी थी और अब सुबह जल्दी ही मेरी नींद खुल गयी और कड़ाके की ठंड में लन्ड फिर खड़ा हो गया और निल्जय भैया के राजपूताना जिस्म और मस्त लन्ड की भूख मुझे फिर से सताने लगी, मुझे रह रह कर आंखों के सामने बस उनकी 4 इंच उभरी सख्त छाती और उनका चोदू अंदाज़ दिखाई दे रहा था।

सुबह के 7 बजे और म्रितुन्जय दूध लेकर आया, भाभी ने दूध लिया और मैं भी उसके साथ सड़क तक घूमने निकल गया। म्रितुन्जय ने बताया कि वह आज शाम को कुछ काम से गाँव जा रहा है और कल लौटेगा।
यह जानकर मैं बिल्कुल खुश नहीं था, समझ नहीं आ रहा था कि आज का दिन कैसे कटेगा और क्या होगा आगे?
दिन गुजरा, शाम हुई मैं निल्जय भैया की डेयरी पर पहुँचा, मुझे देखकर निल्जय भैया बोले- आज तो तेरा दोस्त नहीं है यार! गांव गया है।

मैंने कहा- हाँ भैया, पता है… अकेला बोर हो रहा था तो घूमता हुआ यहाँ चला आया!
“अच्छा किया तूने जो आ गया, मैं भी सुबह से यहीं बैठा बोर हो रहा हूँ, म्रितुन्जय नहीं है तो कही दुकान से बाहर जा ही नहीं पाया.” दूध की थैली बांधते हुए निल्जय भैया ने कहा और काउंटर का गेट मुझे अंदर आने के लिए खोल दिया।
निल्जय भैया ने गहरे लाल रंग की शर्ट और हल्की नीली जीन्स पहन रखी थी, शर्ट की आस्तीन आधी चढ़ी हुई थी जिससे उनकी मोटी मज़बूत गोरी कलाइयाँ जिन पर उभरी हुई नसें और उन पर हल्के बाल और अंत में एक भारी भरकम पीतल का कड़ा मानो दुनिया के सबसे सेक्सी जवान मर्द होने का एहसास करवा रहे थे।
वास्तव में आज तक इतने सेक्सी हाथ मुझे दिखाई नहीं दिए, जबकि अब इस बात को लगभग पांच साल हो चुके हैं।

हम लोग बातचीत करते हुए हंसी मजाक कर रहे थे, तभी एक स्कूटी डेयरी के सामने आकर रुकी और एक 21-22 साल की लड़की काउंटर पर 25 रुपये रखते हुए बोली- एक लीटर दूध देना!
और मुझे देखते हुए हल्के से मुस्कुराई।
उस समय 25 रुपये का एक लीटर दूध आ जाता था।
निल्जय भैया ने उसके वी शेप गले वाले कुर्ते में थोड़े से दिखाई देते मम्मों दो देखने की नाकामियाब कोशिश की और पीछे रखे दूध के डीप फ्रीजर से दूध निकालकर पॉलीथिन में भरने लगे। वास्तव में वह लड़की देखने लायक थी 32-28-32 का फिगर होगा उसका, अंडाकार गोरा चहरा जिस पर छोटे छोटे होंठ।

निल्जय भैया के पीछे मुड़ जाने पर वह लड़की एकटक निल्जय भैया को निहार रही थी, आखिर निल्जय भैया थे ही इतने सेक्सी… मैं उस लड़की की सब हरकत देख रहा था। जैसे ही उसे ध्यान आया कि मैं उसे देख रहा हूँ उसने तुरंत अपनी नज़रें उन पर से हटा ली।
निल्जय भैया ने जल्दी ही एक लीटर दूध उसके हाथों में थमा दिया और वह वहाँ से चली गयी। उसके थोड़े आगे चले जाने पर निल्जय भैया ने अपने दांतों को आपस में भींचते हुए और अपने लन्ड को खुजाते हुए बड़े ही सेक्सी टोन में कहा- हाई जान! दूध के बदले दूध तो देती जाती!
इस घटना के बाद मेरे सामने निल्जय भैया का एक नया रूप उजागर हुआ और उनके लन्ड खुजाने और कामुक अंदाज़ को में देखता ही रह गया। उन्होंने मेरी ओर देखा और पूछा- तेरी तरफ बड़ा मुस्कुरा रही थी… लन्ड लेगी क्या तेरा?

मैंने हँसते हुए कहा- अरे भैया, यह तो हमारे ही अपार्टमेंट में रहती है, थोड़ी बहुत बात हो जाती है बस, इसीलिए शायद मुस्कुरा रही थी।
“वाह भाई! गजब लौंडिया रहती है यार तेरे अपार्टमेंट में तो। देगी क्या? पूछना यार भाई!” अपनी आरामदायक कुर्सी पर आराम की मुद्रा में बैठते हुए निल्जय भैया ने कहा।
उन्हें नहीं पता था कि वह लड़की भी उन्हें ताड़ रही थी।

आज म्रितुन्जय के ना होने पर निल्जय भैया बिल्कुल अलग ही तरह की बातें कर रहे थे। उनकी सेक्सी बातें सुनकर और आज का उनका रंगीन चोदू मिजाज़ देखकर दिल कर रहा था कि महाराजा निल्जय की खिदमत में अभी इसी वक्त चुदाई का मेला लगा दूँ; खुद भी उनके लन्ड का आनन्द लूं और रास्ते की सभी आती जाती लड़कियों को बंदी बनाकर किसी क्रूर बिगड़ैल शहज़ादे निल्जय की रखैल बनाकर चुदाई करवाऊँ और निल्जय भैया के फड़फड़ाते कड़क लन्ड की प्यास बुझा दूँ।
यही सब सोच में डूबा हुआ मैं मानो अन्तरवासना के समंदर में और मेरी नज़रें उनके मज़बूत कलाइयों पर टिकी हुई थी जिन्हें में चाटना चाहता था।

मैंने बात बनाते हुए कहा- भैया, हाथ का कड़ा मस्त है यार आपका! दिखाना ज़रा?
“अरे भाई! यह ले देख ले! अच्छा लग रहा है तो भले ही ले ले कड़ा लेकिन तेरी बिल्डिंग वाली की दिलवा दे यार!” कहते हुए निल्जय भैया ने अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया।

उनके भारी मज़बूत हाथ को मैंने महसूस किया और उसकी उभरती नसों को सहलाया जिसका एहसास उन्हें नहीं हो पाया क्योंकि वो उस लड़की की बातों में लगे हुए थे। अब मुझमे आत्मविश्वास आ गया था और मैंने ठान लिया कि महाराजा निल्जय का लन्ड तो मैं लेकर रहूंगा।
शाम के 7:30 बज चुके थे। भाभी ने खाना खाने के लिए फोन किया और मैं वहाँ से घर आ गया। घर आने से पहले मैंने निल्जय भैया को विश्वास दिलाया कि मैं उन्हें उस लड़की की चिकनी चूत जरूर दिलवाऊंगा। यह बात सुनकर उन्होंने मुझे अपनी बांहों में भर लिया और मैं लम्बी सांस लेते हुए उनके जिस्म की खुशबू को पी गया और उनकी उभरी छाती पर एक छोटी सी पप्पी लगा दी।
घर आकर बस लन्ड की भूख ही सताए जा रही थी इसीलिए खाना नहीं खा पा रहा था, जैसे तैसे थोड़ा खाना खाया और निल्जय भैया को दिमाग से निकालने की नाकाम कोशिश करने लगा। थोड़ी देर बातचीत की भैया भाभी से, बच्चों के साथ खेला, टीवी देखी लेकिन दिल दिमाग सब कुछ बस निल्जय भैया के लन्ड में ही उलझ गए थे।

लन्ड को भूल जाने की सभी ज़द्दोज़हद बेकार साबित हुई और रात के लगभग साढ़े नौ बजे मैं घर से निल्जय भैया की दूध डेयरी की ओर निकल पड़ा। आगे क्या होने वाला है इसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं था लेकिन अनायास ही मेरे कदम उस जवान के मज़बूत लौड़े की महान चुदाई के लिए आगे बढ़ रहे थे।
ठंडी हवा चल रही थी और दूध डेयरी वाला इलाका थोड़ा सुनसान था क्योंकि वहाँ नए प्लाट और नई बिल्डिंग बन रही थी और कड़ाके की ठंड ने लोगों को रज़ाई में दुबक जाने पर मजबूर कर दिया था। इसलिए उस सुनसान सड़क पर में अकेला चलता जा रहा था।
डेयरी के पास पहुंचकर चाल थोड़ी धीरे हुई और मैं आहिस्ता आहिस्ता डेयरी के सामने से गुज़र गया और थोड़ा आगे जाकर रुक गया क्योंकि में अब क्या करने वाला था मुझे खुद भी पता नहीं था।

डेयरी के आसपास इक्का दुक्का दुकानें थी जो अब बंद हो चुकी थी। सड़क सुनसान था और दुकान के सामने की तरफ पड़े मैदान में अंधेरा था जहाँ से आते ठंडी हवा के झोंके मानो कम्पकपा देते थे।
काफी दूरी पर एक स्ट्रीट लाइट हल्की रोशनी कर रही थी और दूध डेयरी में भी अब एक छोटा सा बल्ब हल्की रोशनी दे रहा था। मैंने हिम्मत की और मैं आहिस्ता से डेयरी के थोड़ी नज़दीक गया और दुकान के शटर के बिल्कुल नज़दीक दीवार से पीठ लगाकर चुपचाप खड़ा हो गया, जैसे पुलिस वाले फिल्मों में बंदूक लेकर दीवार से पीठ लगाकर खड़े हो जाते हैं।

मेरे दाएं वाली दुकान बंद थी और बायें में डेयरी के काउंटर के अंदर कुर्सी पर निल्जय भैया आराम से कुर्सी पर बैठे हुए फोन पर किसी से बात कर रहे थे। जैसा कि दूध डेयरी सामान्यतः 10 बजे के बाद ही बंद होती है इसलिये निल्जय भैया बैठे हुए थे।
उनकी आवाज़ मुझे साफ सुनाई दे रही थी जबकि फोन के दूसरी तरफ की आवाज़ सुनने में परेशानी हो रही थी। निल्जय भैया उनकी पत्नी से बात कर रहे थे और दोनों ही सेक्स के लिए काफी उत्तेजित हो चुके थे।

दोनों ही गंदी गन्दी बातचीत कर रहे थे और निल्जय भैया अपने रॉड जैसे कड़क हो चुके लन्ड को जीन्स के ऊपर से ही मसल रहे थे।
उनकी पत्नी बोली- 15 दिन हो गए जी! इस बार तो आप रविवार की चुदाई के लिए भी नहीं आये, चूत में हलचल मच रही है आजकल… अपना अजगर लेकर जल्दी आओ जानू… तड़प रही हूं मैं! बोलते हुए मानो वह अपनी चूत में उंगली करने लगी।
निल्जय भैया बोले- हाई जानू… लन्ड तो तड़प रहा है तुम्हारे लिए… सामने होती तो अभी गले तक घुसा देता, तृप्त कर देता तुम्हारी चूत!
बोलते हुए वह अपने लन्ड को तेजी से खुजाने लगे।
यह माहौल देखकर तो मैं मानो बेकाबू हो गया और मेरी अन्तरवासना के समंदर में सुनामी सी आ गयी। इतना सेक्सी माहौल, सेक्सी बातें और देसी चोदू जवान तने हुए मूसल लन्ड के साथ हल्का उजाला।

अब मैंने आव देखा ना ताव, मैंने अपना एक हाथ धीरे से काउंटर पर रखा जिससे निल्जय भैया का ध्यान मुझ पर गया, इतने मैं ही मैंने अपना दूसरा हाथ उनके लन्ड वाली जगह पर रख दिया और उनके लोहे की रॉड से कड़क हो चुके लन्ड को ज़ोर से मसल दिया।
यह सब मात्र 4-5 सेकेंड में हुआ था उन्हें कुछ समझ नहीं आया और थोड़ा हड़बड़ाते हुए वो खड़े होने लगे लेकिन इस बात का अहसास शायद वो अपनी पत्नी को नहीं होने देना चाहते थे इसलिए पत्नी के पूछने पर उन्होंने बिल्ली के होने का बहाना बना दिया।
मैंने उनके लन्ड को जीन्स के ऊपर से ही रगड़ना जारी रखा, क्योंकि जब खड़े फ़नफ़नाते लन्ड को कोई सहलाने लगे तब कोई भी मर्द चाहकर भी आपको मना नहीं कर पाता और सोचता है कि जो हो रहा है हो जाने दो।

मैंने अपनी उंगली उनके होंठों पर रखते हुए ‘श…’ की आवाज़ निकलते हुए उन्हें चुप रहने का इशारा करते हुए फिर से कुर्सी पर बिठा दिया और बातचीत जारी रखने का इशारा किया और काउंटर पर से होते हुए अंदर दाखिल हो गया और उनके बिल्कुल सामने एक कुर्सी लगाकर बैठ गया और लगातार उनके लन्ड को सहलाने लगा।

आज मानो मेरी हिम्मत रंग लाती सी दिखाई दे रही थी और लग रहा था कि आज इस दानवी मोटे ताज़े लंड का कमरस मुझे पीने को मिलने वाला है और इस जवान राजपूत के राजपूताना अंदाज़ में चुदाई होने वाली है।
हाथ से सहलाते हुए मुझे निल्जय भैया के मोटे और लम्बे लन्ड का अंदाज़ा लगने लगा था, जो अंडरवियर और जीन्स के अंदर ही काफी फनफना रहा था और झटके मार रहा था क्योंकि मेरे सहलाने के बाद वो बिल्कुल गन्दगी पर उतर आये थे, अपनी बीवी के साथ और बहुत ही सेक्सी बातें कर रहे थे।

मुझे 5 मिनट हो चुके थे और अब निल्जय भैया से रहा नहीं जा रहा था और बाहर से कोई देख न ले इसीलिए वो खड़े हो गए और एक हाथ से फ़ोन पर बात करते हुए ही दूसरे हाथ से दुकान का शटर गिराने लगे जिसमें मैंने उनकी मदद की और अब हम दोनों दुकान में बन्द हो चुके थे।
शटर लगाकर वो काउंटर से थोड़ा टिक गए और उनकी फोन पर बातचीत जारी रही। शटर बन्द हो जाने से मैं भी बेफिक्र हो चुका था और अब मैं बस उस राजपूताना जिस्म और गंडफाड़ू लन्ड के सागर में डूब जाना चाहता था।

अब मैं घुटनों के बल निल्जय भैया के सामने बैठ गया और जीन्स के ऊपर से ही उनके लन्ड के उभार को अपने चेहरे से रगड़ने लगा और कभी कभी उनके लन्ड के नीचे के गोटे वाले हिस्से में ज़ोर से अपना मुँह भर देता और फिर से उनके लन्ड के आसपास अपना चेहरा रगड़ने लगता और कभी कभी जीन्स के ऊपर से ही उनके लन्ड को दांतों से ही काट लेता।
यह सब करने से निल्जय भैया काफी कामुक हो चुके थे क्योंकि मेरे अलावा उनको उनकी पत्नी भी गंदी बातें करके उकसा रही थी, उनकी पत्नी की सेक्सी बाते भी मुझे साफ सुनाई दे रही थी।
लेकिन गज़ब की बात तो यह थी कि इतना कुछ होने के बावजूद निल्जय भैया ने मुझे किसी भी तरह से उकसाया नहीं ना ही मुझे कुछ करने के लिए मज़बूर किया न दबाव बनाया जबकि किसी मर्द के लन्ड के साथ ऐसा करने पर अब तक वह जबरदस्ती अपना लन्ड मेरे मुँह में डाल चुका होता।

जो कुछ कर रहा था, मैं अपने आप ही कर रहा था, मानो उन्होंने अपने आपको मेरे सुपुर्द कर दिया हो।
अब निल्जय भैया दुकान से ही अटेच छोटे से कमरे में आ गए जो छोटा 10×10 का गोदाम था। यहाँ पर 5 वाट के पुराने ज़माने वाले बल्ब की हल्की रोशनी में दूध की खाली टंकियाँ, छाछ से भर हुआ तपेला, एक दूध का फेट चेक करने की मशीन दिखाई दे रही थी।
दीवार पर लगी कीलों पर 3-4 कपड़े टंगे थे और दीवार के एक साइड एक खटिया खड़ी हुई रखी थी। अब निल्जय भैया दूध की एक खाली टंकी पर बैठ गए, मुझसे भी अब रहा नहीं जा रहा था इसलिए मैंने बिना देर किये जीन्स की चेन को खोल दिया और चेन में से ही अपनी उंगलियां जीन्स के अंदर डाल दी और उनके लन्ड को चड्डी के ऊपर से ही पकड़ने और सहलाने की कोशिश करने लगा।

जीन्स की चेन काफी छोटी होती है और वो बैठी अवस्था में थे इसीलिए मेरा पूरा हाथ उनकी चेन के अंदर घुसा नहीं पा रहा था, लेकिन कोशिश जारी थी और मैं अपनी उंगलियों से ही उनके लन्ड को सहला रहा था।

उन्हें शायद मेरी परेशानी का एहसास हुआ इसीलिए अब उन्होंने खटिया को बिछा दिया और उस पर बिल्कुल लम्बे चौड़े होकर लेट कर बातचीत जारी रखी। वाह क्या समां था… एक जवान मदमस्त हट्टा कट्टा मर्द मेरे सामने लेटा हुआ अपने लन्डपान का न्योता दे रहा था मानो।
मैंने बिना देर किये निल्जय भैया के बेल्ट का हुक और बटन खोला और जीन्स को नीचे खीच दिया… वाह… जॉकी की फ्रेंच कट पहन रखी थी जिसमें एक मोटे खीरे की तरह लन्ड साफ दिखाई दे रहा था, ग्रामीण होते हुए भी ब्रांडेड कपड़ों का काफी शौक था उन्हें। और खास बात यह थी कि लन्ड अंडरवियर के अंदर सीधा नाभि की दिशा में नहीं था बल्कि तिरछा होते हुए कमर की ओर होते हुए बिल्कुल चड्डी की इलास्टिक तक पहुँचा हुआ था।

मतलब यदि लन्ड को चड्डी में बिल्कुल सीधा नाभि की दिशा में सेट किया जाए तो लन्ड लगभग एक या डेढ़ इंच अंडरवियर की इलास्टिक से बाहर निकल जाए, साइड में होने की वजह से वह अब तक जाल में कैद था… ऐसा खूंखार लन्ड था सामने।
आपको बता दूं कि बंटी भैया का लन्ड भी इतना ही बड़ा है, बंटी भैया के बारे में किसी ओर कहानी में बताऊंगा।

अब मैंने अपनी जुबान से उनके लन्ड के उभार को आहिस्ता चाटना शुरू कर दिया, और अब इसका असर उनके चेहरे पर दिखने लगा था, मेरी हर जुबान के साथ उनके चेहरे पर आनन्द और सुकून का झोंका सा आ जाता और हर बार लन्ड में एक लहर सी भी आती…
और अब वो ज्यादा बोल भी नहीं रहे थे, बस उनकी बीवी ही कुछ बोल रही थी और वह बस हूँ हाँ से उनका जवाब दे रहे थे; उनकी आंखें बन्द हो चुकी थी, उनके पूरे बदन में मानो काम का रति रस घुल चुका था और अपना रति रस निकाल कर वो मुझे भी तृप्त कर देने वाले थे, जिसे सोच सोच कर मैं भी बड़े ही सिस्टेमेटिक तरीके से उनके लन्ड के उभार को चाट रहा था।

पुरानी बात एक बार फिर आपको याद दिला दूं कि लन्ड के झटके मारने के बावजूद भी उन्हें कोई जल्दी नहीं थी ना ही वो उतावले हो रहे थे अपने लोहे की रॉड से कड़क हो चुके लन्ड को मेरे मुँह या गांड में घुसाने के लिए…

अब फोन भी उन्होंने कट करके साइड में रख दिया था। अब वो बिल्कुल आराम की मुद्रा में थे और ऐसा लग रहा था मानो अब वो सो चुके हैं।
में भी बड़ा असमंजस में था क्योंकि मेरे आने से अबतक लगभग 30 मिनट हो चुके थे लेकिन निल्जय भैया ने मुझसे कोई बात नहीं की और ना ही मेरे किये काम पर कोई प्रतिक्रिया दी थी, बल्कि अब तो वह मानो आंखें बन्द करके सो ही गए थे। लेकिन एक बात ज़रूर थी कि उनको आनन्द ज़रूर मिल रहा था।

लन्ड के मोटे सुपारे से निकले प्रीकम ने अंडरवियर पर एक गोल घेरा बना दिया था जिस पर मैं अपनी नाक को रगड़ते हुए लम्बी सांसों से सूंघने लगा, जहाँ से वीर्य, पसीने और मूत्र की मिक्स मनमोहक महक आ रही थी।
वाह… क्या खुशबू थी… मेरी ज़िन्दगी की सबसे मनपसन्द महक… हर 3-4 सेकेंड में लन्ड में एक लहर आती और लन्ड लगभग 1 इंच ऊपर उछल जाता।
पता नहीं क्या बात थी जो निल्जय भैया मेरे साथ कुछ भी नहीं कर रहे थे, सब कुछ मैं ही कर रहा था। क्या निल्जय भैया मेरे साथ सेक्स नहीं करना चाहते थे। क्या एक लड़के के साथ सेक्स करने से उन्हें एतराज़ था। क्या मुझे उनके लन्ड का काम रस मिल पाया या फिर मुझे प्यासा ही भुवनेश्वर से लौटना पड़ा.

लन्ड के मोटे सुपारे से निकले प्रीकम ने अंडरवियर पर एक गोल घेरा बना दिया था जिस पर मैं अपनी नाक को रगड़ते हुए लम्बी लम्बी सांसों से सूंघने लगा, जहाँ से वीर्य, पसीने और मूत्र की मिक्स मनमोहक महक आ रही थी।
वाह… क्या खुशबू थी… मेरी ज़िन्दगी की सबसे मनपसन्द महक… हर 3-4 सेकेंड में लन्ड में एक लहर आती और लन्ड लगभग 1 इंच ऊपर उछल जाता।

अब मैंने उनके मज़बूत राजपूती पहलवानी जिस्म की तरफ अपना ध्यान लगाया… सबसे पहले लेदर जैकिट की चेन को खोला और शर्ट के ऊपर से ही उनकी उभरी छाती को छुआ और उनकी बगल से आती हल्की महक को सूंघते हुए छाती पर एक चुम्बन ले लिया, वैसे में अपने एक हाथ से उनके लन्ड को सहला रहा था, जिससे उनके आनन्द में कोई बाधा ना आये।

अब मैंने एक एक करके शर्ट की सभी बटन खोल दी… वाह क्या जिस्म था… छाती के दोनों उभार मानो बनियान को फाड़ डालने वाले थे, इतनी खिंची और कसी हुई सी थी उनकी बनियान। बिल्कुल गोरी छाती में लगभग 4 से 5 इंच का उभार था जिस पर हल्के-हल्के काले बाल… गले में ग्रामीण क्षेत्रों में गले में पहना जाने वाला छोटा सा तावीज़ और उसका काला धागा छाती की खूबसूरती को और भी बढ़ा रहे थे.
वाह… क्या कातिलाना जिस्म था…

हमेशा ही मैंने हड़बड़ी में ही सेक्स किया था लेकिन आज मेरे पास मानो बहुत समय था और आज इस देसी पहलवान के साथ में बिल्कुल आराम और सुकून से आनन्द लेना चाहता था इसीलिए अब मैंने अपना सिर निल्जय भैया की कड़क फूली छाती पर रख दिया और अपनी नाक उनके बगल (अंडरआर्म) की तरफ करके लम्बी सांसें लेने लगा जिससे उनके जिस्म और बगल की महक मेरी सांसों में घुलने लगी… वह एक अलग ही महक थी जो मुझे आज तक दोबारा नसीब नहीं हुई।

मैं लगभग 5 मिनट तक ऐसे ही छाती पर लेटा रहा और एक हाथ से लन्ड को सहलाता रहा, निल्जय भैया की कोई प्रतिक्रिया नहीं। अब मैं उनकी छाती से उठा और उनकी खुशबूदार कड़क फूली मज़बूत छाती पर ताबड़तोड़ चूमने और चाटने लगा।
मुझे किसी भी मर्द की भुजायें (डोले शोले) सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं लेकिन निल्जय भैया के डोलों को तो में अभी तक देख भी नहीं पाया था क्योंकि उन्होंने शर्ट और लेदर जैकिट पहनी थी जिसे सिर्फ मैंने छाती के सामने से खोला था लेकिन उनकी बाजु, पीठ और हाथ अभी भी कपड़ों से ढके थे जिन्हें निकालना मेरे लिए असंभव था क्योंकि वो लेटे हुए थे।

अब मैं छाती के उभारों के बीच बनी लकीर को चूमते हुए पेट से होकर लन्ड तक पहुँच गया और चुदाई को तड़पते हुए लन्ड के सिर्फ सुपारे को अंडरवीयर की इलास्टिक से होते हुए बाहर निकाल लिया। मतलब मैंने पूरा लन्ड बाहर नहीं निकाला था, सिर्फ लन्ड का मुँह ही बाहर निकाला था।
मैंने बिना ज़्यादा देर किये सुपारे की चमड़ी को थोड़ा पीछे करते हुए अपने गर्म मुँह में भर लिया और उस कड़ाके की ठंड में अपने मुँह की गर्म हवा छोड़ते हुए लन्ड के सुपारे के चारों और दो बार अपनी जुबान घुमा दी, मेरे ऐसा करते ही लन्ड में एक ज़ोरदार लहर आयी जिसने लन्ड को चड्डी की इलास्टिक में दबे होने के बावजूद लगभग 1 इंच ऊपर तक झटका दिया।

इसी के साथ पहली बार निल्जय भैया के मुँह से आवाज़ निकली “सीईईईईई… आह… माँ चोद दी यार…”
उनकी सिसकारी बहुत कामुक थी और आवाज़ बिल्कुल ऐसी थी जैसी किसी को गर्म चिमटा चिपका देने पर कोई करता है।
सी… सी… करते हुए निल्जय भैया ने अपने आड़ूओं को खुजाया और बैठे हो गए और बोले- चल चलते हैं यार अब… दुकान मंगल करने का टाइम भी हो गया है.

मैंने उन्हें रोकते हुए कहा- अरे भैया… रुको तो अभी यार… थोड़ी देर… रुको… प्लीज़…
कहते हुए उनके लन्ड को और भी सहलाने की कोशिश की.
वो बोले- क्या कर रहा है यार तू… मां चोद दी यार भेजे की तूने… मत हाथ लगा यार भाई लन्ड को… ये मादरचोद को अभी चूत चाहने लगेगा… बहुत टाइम हो गया यार वैसे भी चूत चोदे हुए… एक तो बीवी ने खड़ा कर दिया और बचा हुआ तूने…

“क्या करता रहता है यार तू भी, अपन तो लड़के है यार… तू तो तेरी बिल्डिंग वाली की चूत दिलवा दे यार… मस्त माल है वो… मेरे पप्पू को मज़ा आ जाएगा…” कहते हुए निल्जय भैया खड़े हो गए और अपनी जीन्स का बटन लगाने लगे।
मेरे तो मानो सारे अरमानों पर पानी ही क्या… बाढ़ ही आ गयी थी… अब… क्या होगा… दिमाग और दिल दोनों ही इस मौके को छोड़ना नहीं चाहते थे क्योंकि ऐसा मस्त गबरू जवान सेक्सी राजपूती मर्द और लन्ड पता नहीं मुझे पूरे जीवन भर भी मिले या ना मिले… क्योंकि यह मेरा अपना अनुभव था कि ज्यादा सेक्सी हैंडसम मर्द कभी किसी लड़के के साथ सेक्स को तैयार नहीं होते हैं… और आज का यह निवाला जो मुँह तक आ गया है उसे कैसे जाने दूँ!

मैंने उनकी दोनों भुजाओं को पकड़ लिया और उनकी छाती के करीब आ गया बिल्कुल किसी बीवी की तरह और बोला- भैया सुनो मेरी बात… मैं बिल्कुल पक्के में वो सुबह वाली लड़की… वो… वो… बिल्डिंग वाली लड़की की चूत आपको दिला दूँगा… मेरी अच्छी पहचान है भैया… आप चिंता मत करो… पक्की बात भैया… लेकिन आप अभी मत जाओ थोड़ी देर ओर रूक जाओ…

यह सुनकर उनके चेहरे पर मानो रौनक आ गयी और वो थोड़ा मुस्कुराते हुए बोले- वाह रे चालू खोपड़ी… पक्के में जुगाड़ जमा देगा तू?
“डन भैया… कल या परसो में आपका काम हो जाएगा!” कहते हुए मैंने उनके हाथ जो शर्ट की बटन लगा रहे थे, उनको पकड़ते हुए बटन से हटा कर नीचे कर दिया।

“वाह रे मेरे चीते… जो तुझे करना है कर ले भाई… लेकिन यार क्या मजा आ रहा है तुझे ये सब करने में… मुझे तो फिर भी थोड़ा मज़ा आ रहा है लेकिन तेरा क्या… जैसी तेरी मर्ज़ी यार… क्या बोलूं अब…” कहते हुए पास ही की एक खाली दूध की टंकी से टिक कर खड़े हो गए।
मैंने कहा- भैया, आप वो सब छोड़ो और अपनी आंखें बन्द कर लो और उस सुबह वाली लड़की के बारे में सोचो और फील करो कि जो भी कर रही है, वही कर रही है… कसम से आपको भी मज़ा आ जाएगा…

निल्जय भैया ने वैसा ही किया और अब वो आंख बन्द करके बिल्कुल ढीले होकर खड़े हो गए… इससे अच्छा समां कभी नहीं हो सकता… ऐसा मर्द पूरा मेरे हवाले… मैंने फिर से उनके शर्ट के सारे बटन खोल दिए और एक बार फिर से उनके लन्ड को सहलाने लगा और जीन्स नीचे उतार कर बिल्कुल पहले की तरह ही उनके लन्ड के सुपारे को अपने मुँह में भर लिया।
इस बार भी वो मानो तड़पने लगे और सिसकारियाँ लेने लगे.

अब मैं धीरे धीरे खड़े होते हुए उनके पेट से लेकर फूली छाती तक अपने मुलायम हाथ और अपने चेहरे को रगड़ते हुए ले गया. मेरी साँसें बहुत गर्म और तेज चल रही थी, ऊपर से उनकी गर्म सांसें भी मुझे महसूस हो रही थी।
अब मैंने लेदर जैकिट को दोनों हाथों से उतार दिया. इसके बाद आहिस्ता से उनके शर्ट को उतारने लगा… धीरे धीरे ज़िन्दगी में पहली बार उस बाहुबली की भुजायें मुझे थोड़े थोड़े दिखने लगे, लेकिन कड़क और फूली भुजाओं के बीच शर्ट की बाहें मानो फंस ही गयी थी।

मैंने आधे उतारे और फँसे हुए शर्ट के साथ ही एक बार फिर उन्हें अपनी बांहों में भर लिया और शर्ट से आती उनके मर्दाना जिस्म की खुशबू का लगभग 1 मिनट तक आनन्द लिया जिसके बाद तेजी से खींचकर शर्ट को अलग किया और बिना देर किये बनियान भी उतार फेंकी।
और बिना देर किये सबसे पहले उनके मज़बूत फूली हुई भुजाओं को पास से देखा और अपने हाथों से मोटे मोटे डोलों को सहलाया और उभरे हुए शेप को अपनी जुबान से चाटा और चूमा भी, पूरे हाथ को चूमा क्योंकि हाथ भी काफी मस्त मर्दाना, मोटा और कड़क था जिस पर हल्की नसें दिखाई दे रही थी और अंत में पीतल का कड़ा था।

हाथ पर से हल्की दूध की और शरीर की मिक्स महक ने मुझे दीवाना कर दिया और मैंने उनकी उंगलियों को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा। इसके बाद उनके डोलों को ऊपर उठाया और उनके बगल (अंडरआर्म्स) को भी चाटकर आनन्द लिया।
इसके बाद उस राजपूती महाराजा के मस्त पहलवानी जिस्म से लिपट गया और अपने जिस्म को उनके जिस्म से रगड़ने लगा और अपना एक हाथ अंडरवियर के अंदर डालते हुए उनके आंडूओ और लन्ड को रगड़ने लगा, जिससे उनको भी जोश आ गया क्योंकि वो उस लड़की के ख्यालों में खोये हुए थे।

अब निल्जय भैया ने मुझे अपनी मज़बूत भुजाओं में जकड़ लिया और अपने दोनों हाथ मेरे लोवर में घुसा दिए और मेरे गोल गोल चिकने चूतड़ को बेइंतेहा मसलने लगे… मैंने भी अपने आपको पूरी तरह से उनके हवाले कर दिया और अब मैं उनको बड़ी गौर से देखने लगा.
क्या बताऊँ उस सीन के बारे में… एक देसी राजपूत महाराजा जिसका गठीला नंगा जिस्म काम की आग में जलता हुआ… चेहरा, होंठ, छाती, हाथ, आंखें, सांसें हर जगह से सेक्स की ज्वाला निकल रही थी और मैं उनकी हर बात को नोटिस कर रहा था और उन्हें निहार रहा था, मानो इतना सेक्सी मर्द ऐसी हरकतें करता मुझे कभी जीवन में दिखने ही नहीं वाला हो।

निल्जय भैया के मर्दाना कड़क हाथों ने मेरी गांड को मसलकर मानो रस बना दिया था, मुझे भी बड़ा ही आनन्द आ रहा था और चाहे खून ही क्यों न आने लगे गांड से लेकिन अपनी गांड को उनके हाथों से छुड़ाना नहीं चाहता था, बल्कि अब मैंने उनके दोनों बाईसेप को दोनों हाथों से पकड़ लिया था और उनके द्वारा मेरी गांड मसलने से उनके डोलों में जो ऊपर नीचे होने और ट्राईशेप बनने की हरकत हो रही थी, मैं उसे महसूस करते हुए उनके कान के नीचे गले पर किस कर रहा था।

अब तक का शायद ये पहला मर्द था जिसने मुझे अपने जिस्म से इतना खेलने दिया था, वर्ना मर्द बस अपने लन्ड तक ही सीमित रखते है छाती और मुँह तक तो आने ही नहीं देते।
वैसे मैंने भी उनका नाज़ायज़ फायदा नहीं उठाया और उनके चेहरे से कोई छेड़खानी नहीं की, वैसे चेहरा भी मस्त महाराजाओं वाला और सेक्सी लुक वाला था.

निल्जय भैया बहुत गर्म हो चुके थे मानो उन्हें बुखार हो और इतनी कड़ाके की ठंड में वो पसीने से भीगने लगे थे और उनकी सांसें बहुत ज़्यादा तेज़ी से बहुत गर्म चल रही थी। इसके अलावा मुँह से भी बहुत ज़्यादा गर्म हवा निकल रही थी और मेरी मुट्ठी में पकड़ा हुआ लन्ड अब बहुत ज़ोर ज़ोर से झटके मारने लगा था।

सबसे बड़ी दिक्कत तो मुझे यही थी कि निल्जय भैया कुछ बोलते ही नहीं थे ना कुछ अपने आप करते… बस मेरी गांड मसले जा रहे थे… मुझे ऐसा लगा कि कहीं निल्जय भैया को कुछ हो तो नहीं गया… तबियत ख़राब या सेक्स सम्बन्धित कुछ… क्योंकि सेक्स के समय ऐसी हालत मैंने कभी नहीं देखी थी किसी की।
लन्ड की नसें बहुत ज़्यादा कड़क हो चुकी थी, वैसे भी लन्ड काफी मोटा था मतलब मेरी मुट्ठी में नहीं आ पा रहा था और लम्बा भी अच्छा था. हालांकि अभी तक मैंने पूरे लन्ड के दर्शन नहीं किये थे और 1 घण्टा बीत चुका था, ऊपर से उनकी हालत…

कहानी अभी भी यह ख़त्म नहीं होती इस कहानी का the end हम इसके लास्ट पार्ट में देखेंगे.

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