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चूत को करार मिल ही गया भाग – 1

सबसे पहले मै मस्ताराम डॉट नेट के सभी पाठको का तहेदिल से शुक्रिया अदा करती हूँ मै जिया खान आपकी प्यारी और मस्ताराम की पाठिका अपनी एक सहेली की कहानी आप सभी को पढ़ने के लिए भेज रही हूँ ये मेरी सहेली पाकिस्तान में रहती है पर मैंने नाम और जगह को बदल दिया है ये सब मेरी सहेली ने ही करने को बोला था सो आप सभी के सामने अब सच्ची कहानी ये रही |

शबाना की पहली शादी ग्रेजुएशन पूरा करते ही २१ साल की उम्र में हुई थी पर शादी के कुछ ही महीनों बाद उसके शौहर की मौत एक हादसे में हो गयी। शबाना बेवा हो कानपूर में अपने माँ-बाप के घर आ गयी। उनका मिडल-क्लास घर था। शबाना के वालिद की रेडिमेड गार्मेंट्स की दुकान थी। शबाना माँ-बाप पर बोझ नहीं बनना चाहती थी इसलिये वो शहर के एक बड़े अपस्केल लेडिज़ बुटीक में असिस्टेंट के तौर पे काम करने लगी। बुटीक में ही ब्यूटी पार्लर भी था तो शबाना के लिये ये अच्छा तजुर्बा था…

कपड़े-लत्ते पहनने और बनने संवरने के सलीके सीखने का। इस दौरान उसके माँ-बाप रूकसाना की दूसरी शादी के लिये बहोत कोशिश कर रहे थे। शबाना बेहद गोरी और खूबसूरत और स्मार्ट थी लेकिन इसके बावजूद कहीं अच्छा और मुनासिब रिश्ता नहीं मिल रहा था। फिर साल भर बाद एक दिन उसके मामा ने उसकी शादी फ़िरोज़ नाम के आदमी से तय कर दी।

तब फ़िरोज़ की उम्र अढ़तीस साल थी और शबाना की तेईस साल। फ़िरोज़ की पहली बीवी का इंतकाल शादी के तेरह साल बाद हुआ था और उसकी एक नौ साल की बेटी भी थी। फ़िरोज़ रेलवे में जॉब करता था। इसलिये घर वालों ने सोचा कि सरकारी नौकरी है… और किसी चीज़ की कमी भी नहीं… इसलिये शबाना की शादी फ़िरोज़ के साथ हो गयी। फ़िरोज़ की पोस्टिंग शुरू से ही बिहार के छोटे शहर में थी जहाँ उसका खुद का घर भी था।

शादी कहिये या समझौता… पर सच तो यही था कि शादी के बाद शबाना को किसी तरह की खुशी नसीब ना हुई…. ना ही वो कोई अपना बच्चा पैदा कर सकी और ना ही उसे शौहर का प्यार मिला। बस यही था कि समाज में शादीशुदा होने का दर्ज़ा और अच्छा माकूल रहन-सहन। शादी के डेढ़-दो साल बाद उसे अपने शौहर पर उसके बड़े भाई की बीवी जायरा के साथ कुछ नाजायज़ चक्कर का शक होने लगा और उसका ये शक ठीक भी निकला। एक दिन जब फ़िरोज़ के भाई के बीवी उनके यहाँ आयी हुई थी, तब शबाना ने उन्हें ऊपर वाले कमरे में रंगरलियाँ मनाते… ऐय्याशी करते हुए देख लिया।

जब शबाना ने इसके बारे में फ़िरोज़ से बात की तो वो उल्टा उस पर ही बरस उठा। पता नहीं जायरा ने फ़िरोज़ पर क्या जादू किया था कि फ़िरोज़ ने शबाना को साफ़-साफ़ बोल दिया कि अगर ये बात किसी को पता चली तो वो शबाना को तलाक़ दे देगा… और उसकी बुरी हालत कर देगा। शबाना ये सब चुपचाप बर्दाश्त कर गयी। जितने दिन जायरा उनके यहाँ रुकती… फ़िरोज़ और जायरा दोनों खुल्ले आम शराब के नशे में धुत्त होकर हवस का नंगा खेल घर में खेलते। उन दोनों को अब शबाना की जैसे कोई परवाह ही नहीं थी….

कभी-कभी तो शबाना के बगल में ही बेड पर फ़िरोज़ और जायरा चुदाई करने लगते। ये सब देख कर शबाना भी गरम हो जाती थी पर अपनी ख्वाहिशों को अपने सीने में दबाये रखती और ज़िल्लत बर्दाश्त करती रहती। शबाना के पास और कोई चारा भी नहीं था। बेशक जायरा बेहद खूबसूरत और सेक्सी थी लेकिन शबाना भी खूबसूरती और बनने-संवरने में उससे ज़रा भी कम नहीं थी। जायरा ने फ़िरोज़ की ज़िंदगी इस क़दर तबाह कर दी थी कि वो जो कभी-कभार शबाना के साथ सैक्स करता भी था…. वो भी करना छोड़ दिया।

धीरे-धीरे उसकी मर्दाना ताकत शराब में डूबती चली गयी। कोई दिन ऐसा नहीं होता जब वो नशे में धुत्त गिरते पड़ते घर ना आया हो। इस सबके बावजूद फ़िरोज़ चुदक्कड़ नहीं था कि कहीं भी मूँह मारता फिरे। उसका जिस्मानी रिश्ता सिर्फ़ जायरा के साथ ही था जिसे वो दिलो-जान से चाहता था।

शबाना ने शुरू-शुरू में अपने हुस्न और खूबसूरती और अदाओं से फ़िरोज़ को रिझाने और सुधारने की बेहद कोशिश की… लेकिन उसे नाकामयाबी ही हासिल हुई। फिर शबाना ने समीरा… जो कि फ़िरोज़ की पहली बीवी से बेटी थी… उसकी परवरिश में और घर संभालने में ध्यान लगाना शुरू कर दिया। अपनी जिस्मानी तस्कीन के लिये शबाना हफ़्ते में एक-दो दफ़ा खुद-लज़्ज़ती का सहारा लेने लगी।

इसी तरह वक़्त गुज़रने लगा और शबाना और फ़िरोज़ की शादी को दस-ग्यारह साल गुज़र गये। शबाना ३२ साल की हो गयी और समीरा भी २१ साल की हो चुकी थी और कॉलेज में फ़ायनल इयर में थी। शबाना कभी सोचती थी कि समीरा ही इस दुनिया में उसके आने की वजह है… उसका दुनिया में होना ना होना एक बराबर है…. पर कर भी क्या सकती थी… जैसे तैसे ज़िंदगी कट रही थी। इस दौरान शबाना ने खुद को भी मेन्टेन करके रखा था लेकिन फ़ारूक़ ने उसकी तारीफ़ में कभी एक अल्फ़ाज़ भी नहीं कहा। शौहर की नज़र अंदाज़गी और सर्द महरी के बावजूद अपनी खुद की खुशी और तसल्ली के लिये हमेशा मेक-अप करके… नये फैशन के सलवार-कमीज़ और सैंडल पहने…

सलीके से बन-संवर कर हमेशा तैयार रहती थी। वो उन गिनी चुनी औरतों में से थी जिसे शायद ही कभी किसी ने बे-तरतीब हालत में देखा हो। चाहे शाम के पाँच बजे हों या सुबह के पाँच बजे…. वो हमेशा बनी संवरी रहती थी।

फिर एक दिन वो हुआ जिसने उसकी पूरी ज़िंदगी ही बदल दी। उसने कभी सोचा भी ना था कि ये बेरंग दिखने वाली दुनिया इतनी हसीन भी हो सकती है… पर शबाना को इसका एहसास तब हुआ जब उन सब की ज़िंदगी में समीम आया।

समीम की उम्र बीस-इक्कीस साल की थी। बीस साल का होते-होते ही उसने ग्रैजूएशन कर लिया था। उसके घर पर सिर्फ़ समीम और उसकी माँ ही रहते थे। बचपन में ही पिता की मौत के बाद माँ ने समीम को पाला पोसा पढ़ाया लिखाया। उसके पापा के गुज़रने के बाद माँ को उनकी जगह रेलवे में नौकरी मिल गये थी।

सिर्फ़ दो जने थे… इसलिये पैसो की कभी तंगी महसूस नहीं हुई। समीम की पढ़ायी लिखायी भी एक साधारण से स्कूल और फिर सरकारी कॉलेज से हुई थी… इसलिये समीम की माँ को उसकी पढ़ायी लिखायी का ज्यादा खर्च नहीं उठाना पढ़ा। समीम पढ़ायी लिखायी में बेहद होशियार भी था। ग्रैजूएशन करते ही समीम ने रेलवे में नौकरी के लिये फ़ॉर्म भर दिये थे।

उसके बाद परिक्षायें हुई और समीम का चयन हो गया और जल्दी ही समीम को पोस्टिंग भी मिल गयी। समीम बेहद खुश था पर एक दुख भी था क्योंकि समीम की पोस्टिंग बिहार में हुई थी। समीम पंजाब का रहने वाला था। इसलिये वहाँ नहीं जाना चाहता था कि पता नहीं कैसे लोग होंगे वहाँ के… कैसी उनकी भाषा होगी… बस यही सब ख्याल समीम के दिमाग में थे।

समीम की माँ भी उदास थी पर समीम के लिये सुकून की बात ये थी कि दस दिन बाद ही समीम की माँ का रिटायरमेंट होने वाला था। इसलिये वो अब सुकून के साथ बिना किसी टेंशन के समीम के मामा यानी अपने भाई के घर रह सकती थी।

जिस दिन माँ को नौकरी से रिटायरमेंट मिला… उसके अगले ही दिन समीम बिहार के लिये रवाना हो गया। वहाँ एक छोटे शहर के स्टेशन पर उसे क्लर्क नियुक्त किया गया था। जब समीम वहाँ पहुँचा और स्टेशन मास्टर को रिपोर्ट किया तो उन्होंने स्टेशन के बाहर ही बने हुए स्टाफ़ हाऊज़ में से एक फ़्लैट समीम को दे दिया।
जब समीम फ़्लैट के अंदर गया तो अंदर का हाल देख कर परेशान हो गया।

फ़र्श जगह -जगह से टूटा हुआ था… दीवारों पर सीलन के निशान थे… बिजली की फ़िटिंग जगह-जगह से उखड़ी हुई थी। जब समीम ने स्टेशन मास्टर से इसकी शिकायत की तो उसने समीम से कहा कि उसके पास और कोई फ़्लैट खाली नहीं है… एडजस्ट कर लो यार! स्टेशन मास्टर की उम्र उस वक़्त पैंतालीस के करीब थी और उसका नाम जावेद था।

जावेद: “यार समीम कुछ दिन गुजारा कर लो… फिर मैं कुछ इंतज़ाम करता हूँ!”

समीम: “ठीक है सर!”

उसके बाद जावेद ने समीम को उसका काम और जिम्मेदारियाँ समझायीं! समीम की ड्यूटी नौ बजे से शाम पाँच बजे तक ही थी। धीरे-धीरे समीम की जान पहचान स्टेशन पर बाकी के कर्मचारियों से भी होने लगी। जब कभी समीम फ़्री होता तो ऑफ़िस से बाहर निकल कर प्लेटफ़ोर्म पर घूमने लगता… सब कुछ बहुत अच्छा था। आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

सिर्फ़ समीम के फ़्लैट को लेकर जावेद भी अभी तक कुछ नहीं कर पाया था। समीम उससे बार-बार शिकायत नहीं करना चाहता था। एक दिन समीम दोपहर को जब फ़्री था तो वो ऑफ़िस से निकल कर बाहर आया तो देखा जावेद भी प्लैटफ़ोर्म पर कुर्सी पर बैठे हुए थे। समीम को देख कर उन्होंने उसे अपने पास बुला लिया।

जावेद: “सॉरी समीम यार… तुम्हारे फ़्लैट का कुछ कर नहीं पा रहा हूँ!”

समीम: “कोई बात नहीं सर… अब सब कुछ तो आपके हाथ में नहीं है… ये मुझे भी पता है!”

जावेद: “और बताओ मैं तुम्हारे लिये क्या कर सकता हूँ… अगर किसी भी चीज़ की जरूरत हो तो बेझिझक बोल देना!”

समीम: “सर जब तक मेरे फ़्लैट का इंतज़ाम नहीं हो जाता… आप मुझे पास में ही कहीं हो सके तो किराये पर ही रूम दिलवा दें!”

जावेद (थोड़ी देर सोचने के बाद): “अच्छा देखता हूँ!”

तभी जावेद की नज़र प्लैटफ़ोर्म पे थोड़ी सी दूर फ़िरोज़ पर पड़ी। फ़िरोज़ रेल सेवा महकमे में ऑफिसर था। उसका ऑफिस प्लैटफ़ोर्म के दूसरी तरफ़ की बिल्डिंग में था। उसे देख कर जावेद ने फ़िरोज़ को आवाज़ लगायी।
जावेद: “अरे फ़िरोज़ यार ज़रा सुनो तो!”

फ़िरोज़: “हुक्म कीजिये जावेद साहब!” फ़िरोज़ उन दोनों के पास आकर खड़ा हो गया। फ़िरोज़ और जावेद दुआ सलाम के बाद बात करने लगे।

जावेद: “फ़िरोज़ यार! ये समीम है… अभी नया जॉइन हुआ है इसके लिये कोई किराये पर रूम ढूँढना है… तुम तो यहाँ करीब ही रहते हो कोई कमरा अवैलबल हो तो बताओ!”

फ़िरोज़: “जरूर… कमरा मिलने में तो कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिये…! कितना बजट है समीम तुम्हारा?”

समीम : “अगर दो-तीन हज़ार किराया भी होगा तो भी चलेगा!”

जावेद: “और हाँ… रूम के आसपास कोई अच्छा सा ढाबा भी हो तो मुनासिब रहेगा ताकि इसे खाने पीने की तकलीफ़ ना हो!”

फ़िरोज़ (थोड़ी देर सोचने के बाद बोला): “समीम अगर तुम चाहो तो मेरे घर में भी एक रूम खाली है ऊपर छत पर… बाथरूम टॉयलेट सब अलग है ऊपर… बस सीढ़ियाँ बाहर की बजाय घर के अंदर से हैं… अगर तुम्हें प्रॉब्लम ना हो तो… और रही खाने के बात तो तुम्हें मेरे घर पर घर का बना खाना भी मिल जायेगा… पीने की भी कोई प्रॉब्लम नहीं… है क्या कहते हो?”

समीम: “जी आपका ऑफर तो बहुत अच्छा है… आपको ऐतराज़ ना हो तो शाम तक बता दूँ आपको?”

फ़िरोज़ के जाने के बाद समीम ने जावेद से पूछा कि क्या फ़िरोज़ के घर पर रहना ठीक होगा… तो उसने हंसते हुए कहा, “यार समीम तू आराम से वहाँ रह सकता है… वैसे तुझे पता है कि ये जो फ़िरोज़ है ना बड़ा पियक्कड़ किस्म का आदमी है… रोज रात को दारू पिये बिना नहीं सोता… वैसे तुझे कोई तकलीफ़ नहीं होगी वहाँ पर… बहुत अच्छी फ़ैमिली है और तुझे घर का बना खाना भी मिल जायेगा!”

शाम को समीम अपने ऑफिस से निकल कर फ़िरोज़ के ऑफ़िस में गया जो प्लैटफ़ोर्म के दूसरी तरफ़ था और फ़िरोज़ को अपनी रज़ामंदी दे दी। फ़िरोज़ बोला,  “तो चलो  मेरे घर पर… रूम देख लेना और अगर तुम्हें पसंद आये तो आज से ही रह लेना वहाँ पर!”

समीम ने फ़िरोज़ की बात मान ली और उसके साथ उसके घर की तरफ़ चल पढ़ा।  वो दोनों फ़िरोज़ के स्कूटर पर बैठ के उसके घर पहुँचे तो फ़िरोज़ ने डोर-बेल बजायी। थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला तो फ़िरोज़ ने थोड़ा गुस्से से दरवाजा खोलने वाले को कहा, “क्या हुआ इतनी देर क्यों लगा दी!” समीम बाहर से घर का मुआयना कर रहा था। घर बहुत बड़ा नहीं था लेकिन बहोत अच्छी हालत में था। अच्छे रंग-रोगन के साथ गमलों में खूबसूरत फूल-पौधे लगे हुए थे। फ़िरोज़ की आवाज़ सुन कर समीम ने दरवाजे पर नज़र डाली।
सामने बीस-इक्कीस साल की बेहद ही खूबसूरत गोरे रंग की लड़की खड़ी थी… उसके बाल खुले हुए थे और उसके हाथ में बाल संवारने का ब्रश था… उसने सफ़ेद कलर का सलवार कमीज़ पहना हुआ था जिसमें उसका जिस्म कयामत ढा रहा था। समीम को अपनी तरफ़ यूँ घूरता देख वो लड़की मार्बल के फर्श पे अपनी हील वाली चप्पल खटखटाती हुई अंदर चली गयी। तभी फ़िरोज़ ने समीम से कहा, “समीम ये मेरी बेटी समीरा है… आओ अंदर चलते हैं…!”

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