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चूत को करार मिल ही गया भाग – 1

गतांग से आगे …

समीम उसके साथ अंदर चला गया। अंदर जाकर उसने समीम को ड्राइंग रूम में सोफ़े पर बिठाया और अंदर जाकर आवाज़ दी, “शबाना… ओ शबाना! कहा चली गयी… जल्दी इधर आ!” और फिर फ़िरोज़ समीम के पास जाकर बैठ गया।

शबाना जैसे ही रूम मैं पहुँची तो फ़िरोज़ उसे देख कर बोला, “ये समीम है… हमारे स्टेशन पर नये क्लर्क हैं… इनको ऊपर वाला कमरा दिखाने लाया था… अगर इनको रूम पसंद आया तो कल से ये ऊपर वाले रूम में रहेंगे… जा कुछ चाय नाश्ते का इंतज़ाम कर!”

समीम: “अरे नहीं फ़िरोज़ भाई… इसकी कोई जरूरत नहीं है!”

फ़िरोज़: “चलो यार चाय ना सही… एक-एक पेग हो जाये!”

समीम: “नहीं फ़िरोज़ भाई… मैं पीता नहीं… मुझे बस रूम दिखा दो!” समीम ने फ़िरोज़ से झूठ बोला था कि वो ड्रिंक नहीं करता पर असल में वो भी कभी-कभी ड्रिंक कर लिया करता था।

शबाना ने बड़ी खुशमिजाज़ी से समीम को सलाम कहा तो उसने एक बार शबाना की तरफ़ देखा। वो सर झुकाये हुए उनकी बातें सुन रही थी। शबाना ने कढ़ाई वाला गहरे नीले रंग का सलवार- कमीज़ पहना हुआ था और बड़ी शालीनता से दुपट्टा अपने सीने पे लिया हुआ था। खुले लहराते लंबे बाल और चेहरे पे सौम्य मेक-अप था और पैरों में ऊँची हील की चप्पल पहनी हुई थी। शबाना की आकर्षक शख्सियत से समीम काफ़ी इंप्रेस हुआ। शबाना को भी समीम शरीफ़ और माकूल लड़का लगा। समीम भी अच्छी पर्सनैलिटी वाला लड़का था। हट्टा-कट्टा कसरती जिस्म था और उसके चिकने चेहरे पे कम्सिनी और मासूमियत की झलक थी। आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है |दिखने में वो बारहवीं क्लास या कॉलेज के स्टूडेंट जैसा लगता था।
फ़िरोज़ बोले, “चलो तुम्हें रूम दिखा देता हूँ!” फिर समीम फ़िरोज़ के साथ छत पर चला गया। समीम को घर और ऊपर वाला रूम बेहद पसंद आया। अंदर बेड, दो कुर्सियाँ और स्टडी टेबल मौजूद थी। बाथरूम और टॉयलेट छत के दूसरी तरफ़ थे लेकिन वो भी साफ़-सुथरे थे। रूम देखने के बाद समीम ने फ़िरोज़ से पूछा, “बताइये फ़िरोज़ भाई… कितना किराया लेंगे आप…?” फ़िरोज़ ने समीम की तरफ़ देखते हुए कहा, “अरे यार जो भी तुम्हारा बजट हो दे देना!”

रूम का और खाने-पीने का मिला कर साढ़े तीन हज़ार महीने का किराया तय करने के बाद फिर समीम ने फ़िरोज़ से शबाना और उसके रिश्ते के बारे में पूछा तो फ़िरोज़ ने बताया कि शबाना उसकी बीवी है। समीम को लगा था कि शबाना फ़िरोज़ की बड़ी बेटी है शायद।

फ़िरोज़: “वो दर असल समीम बात ये है कि, शबाना मेरे दूसरी बीवी है। जब मैं चौबीस साल का था तब मेरी पहली शादी हुई थी और पहली बीवी से समीरा हुई थी… शादी के तेरह साल बाद मेरी पहली बीवी की मौत हो गयी… फिर मैंने अपनी बीवी की मौत के बाद अढ़तीस साल की उम्र में शबाना से शादी की। शबाना की भी पहले शादी हुई थी… लेकिन उसके शौहर की भी मौत हो गयी और बाद में जब शबाना तेईस साल की थी तब मेरी और शबाना की शादी हुई!”

अब सारा मसला समीम के सामने था। थोड़ी देर बाद समीम वापस चला गया। अगले दिन शाम को समीम फ़िरोज़ के साथ ऑटो से अपना सामान ले कर आ गया और फिर अपना सामन ऊपर वाले रूम में सेट करने लगा।

फ़िरोज़: “अच्छा समीम… गरमी बहुत है… तुम नहा धो लो… फिर रात के खाने पर मिलते हैं!” उसके बाद नीचे आने के बाद फ़िरोज़ ने शबाना से बोला, “जल्दी से रात का खाना तैयार कर दो… मैं थोड़ी देर बाहर टहल कर आता हूँ!” ये कह कर फ़िरोज़ बाहर चला गया। शबाना जानती थी कि फ़िरोज़ अब कहीं जाकर दारू पीने बैठ जायेगा और पता नहीं कब नशे में धुत्त वापस आयेगा। इसलिये उसने खाना तैयार करना शुरू कर दिया। आधे घंटे में शबाना और समीरा ने मिल कर खाना तैयार कर लिया। अभी वो खाना डॉयनिंग टेबल पे लगा ही रही थी कि लाइट चली गयी। ऊपर से इतनी गरमी थी कि नीचे तो साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था।

शबाना ने सोचा कि क्यों ना समीम को ऊपर ही खाना दे आये। इसलिये उसने खाना थाली में डाला और ऊपर ले गयी। जैसे ही वो ऊपर पहुँची तो लाइट भी आ गयी। समीम के रूम की तरफ़ बढ़ते हुए उसके ज़हन में अजीब सा डर उमड़ रहा था। रूम का दरवाजा खुला हुआ था। शबाना सिर को झुकाये हुए रूम में दाखिल हुई तो उसके सैंडलों की आहट सुन कर समीम ने पीछे पलट कर उसकी तरफ़ देखा।

“हाय तौबा…”  शबाना ने मन में ही आह भरी क्योंकि समीम सिर्फ़ ट्रैक सूट का लोअर पहने खड़ा था उसने ऊपर बनियान वगैरह कुछ नहीं पहना हुआ था। शबाना की नज़रें उसकी चौड़ी छाती पर ही जम गयीं… एक दम चौड़ा सीना माँसल बाहें… एक दम कसरती जिस्म! शबाना ने अपनी नज़रों को बहुत हटाने की कोशिश की… पर पता नहीं क्यों बार-बार उसकी नज़रें समीम की चौड़ी छाती पर जाकर टिक जाती।
शबाना: “जी वो मैं आपके लिये खाना लायी थी!”

अभी समीम कुछ बोलने ही वाला था कि एक बार फिर से लाइट चली गयी और रूम में एक दम से घुप्प अंधेरा छा गया। एक जवान लड़के के साथ अपने आप को अंधेरे रूम में पा कर शबाना एक दम से घबरा गयी। उसने हड़बड़ाते हुए कहा, “मैं नीचे से एमर्जेंसी लाइट ला देती हूँ!” पर समीम ने उसे रोक दिया, “अरे नहीं आप वहीं खड़ी रहिये… आप मुझे बता दो एमर्जेंसी लाइट कहाँ रखी है… मैं ले कर आता हूँ!” शबाना ने उसे बता दिया कि एमर्जेंसी लाइट नीचे डॉयनिंग टेबल पे ही रखी है तो समीम अंधेरे में नीचे चला गया और फिर थोड़ी देर बाद समीम एमर्जेंसी लाइट ले कर आ गया और उसे टेबल पर रख दिया।

जैसे ही एमर्जेंसी लाइट की रोशनी रूम में फैली तो शबाना की नज़र एक बार फिर उसके गठीले जिस्म पर जा ठहरी। पसीने से भीगा हुआ उसका कसरती जिस्म एमर्जेंसी लाइट की रोशनी में ऐसे चमक रहा था मानो जैसे सोना हो। शबाना को सबसे अच्छी बात ये लगी कि समीम के सीने या पेट पर एक भी बाल नहीं था। बिल्कुल चीकना सीना था उसका। शबाना को खुद आपने जिस्म पे भी बाल पसंद नहीं थे और वो बाकायदा वेक्सिंग करती थी। यहाँ तक कि अपनी चूत भी एक दम साफ़ रखती थी जबकि उसे चोदने वाला या उसकी चूत की कद्र करने वाला कोई नहीं था। तभी समीम उसकी तरफ़ बढ़ा और शबाना की आँखों में झाँकते हुए उसके हाथ से खाने की थाली पकड़ ली। शबाना ने शरमा कर नज़रें झुका ली और हड़बड़ाते हुए बोली, “मैं बाहर चारपाई बिछा देती हूँ… आप बाहर बैठ कर आराम से खाना खा लीजिये…!”

रूखसाना बाहर आयी और बाहर चारपाई बिछा दी। समीम भी खाने की थाली लेकर चारपाई पर बैठ गया।

“फ़िरोज़ भाई कहाँ हैं…?” समीम ने खाने की थाली अपने सामने रखते हुए पूछा पर शबाना ने समीम की आवाज़ नही सुनी… वो तो अभी भी उसके बाइसेप्स देख रही थी। जब शबाना ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया तो वो उसकी और देखते हुए दोबारा फ़िरोज़ के बारे में पूछने लगा। समीम की आवाज़ सुन कर शबाना होश में आयी और एक दम से झेंप गयी और सिर झुका कर बोली “पता नहीं कहीं पी रहे होंगे… रात को देर से ही घर आते हैं!”

समीम: “अच्छा कोई बात नहीं… उफ़्फ़ ये गरमी… इतनी गरमी में खाना खाना भी मुश्किल हो जाता है!”
शबाना समीम की बात सुन कर रूम में चली गयी और हाथ से हिलाने वाला पंखा लेकर बाहर आ गयी और समीम के पास जाकर बोली, “आप खाना खा लीजिये… मैं हवा कर देती हूँ…!”

समीम: “अरे नहीं-नहीं… मैं खा लुँगा आप क्यों तकलीफ़ कर रही हैं!”

शबाना: “इसमें तकलीफ़ की क्या बात है… आप खाना खा लीजिये!”

समीम चारपाई पर बैठ कर खाना खाने लगा और शबाना समीम के करीब चारपाई के बगल में दीवार के सहारे खड़ी होकर खुद को और समीम को पंखे से हवा करने लगी। “अरे आप खड़ी क्यों हैं… बैठिये ना!” समीम ने उसे यूँ खड़ा हुआ देख कर कहा।

“नहीं कोई बात नहीं… मैं ठीक हूँ…!” शबाना ने अपने सर को झुकाये हुए कहा।

समीम: “नहीं शबाना जी! ऐसे अच्छा नहीं लगता मुझे कि मैं आराम से खाना खाऊँ और आप खड़ी होकर मुझे पंखे से हवा दें… मुझे अच्छा नहीं लगता… आप बैठिये ना!” अंजाने में ही उसने शबाना का नाम बोल दिया था पर उसे जल्दी ही एहसास हो गया। “सॉरी मैंने आप का नाम लेकर बुलाया… वो जल्दबाजी में बोल गया!”

शबाना: “कोई बात नहीं…!”

समीम: “अच्छा ठीक है… अगर आपको ऐतराज़ ना हो तो आज से मैं आपको भाभी कहुँगा क्योंकि मैं फ़िरोज़ साहब को भाई बुलाता हूँ… अगर आपको बुरा ना लगे।“

शबाना: “जी मुझे क्यों बुरा लगेगा!”

समीम: “अच्छा भाभी जी… अब ज़रा आप बैठने की तकलीफ़ करेंगी!”

समीम की बात सुन कर शबाना को हंसी आ गयी और फिर सामने चारपाई पे पैर नीचे लटका कर बैठ गयी और पंखा हिलाने लगी। समीम फिर बोला, “भाभी जी एक और गुज़ारिश है आपसे… प्लीज़ आप भी मुझे ‘आप-आप’ कह कर ना बुलायें… उम्र में मैं बहुत छोटा हूँ आपसे… मुझे नाम से बुलायें प्लीज़!”

“ठीक है समीम अब चुपचाप खाना खाओ तुम!” शबाना हंसते हुए बोली। उसे समीम का हंसमुख मिजाज़ बहोत अच्छा लगा।
समीम खाना खाते हुए बार-बार शबाना को चोर नज़रों से देख रहा था। एमर्जेंसी लाइट की रोशनी में शबाना का हुस्न भी दमक रहा था।

बड़ी- बड़ी भूरे रंग की आँखें… तीखे नयन नक्श… गुलाब जैसे रसीले होंठ… लंबे खुले हुए बाल… सुराही दार गर्दन… शबाना का हुस्न किसी हूर से कम नहीं था।

शबाना ने गौर किया कि समीम की नज़र बार-बार या तो ऊँची हील वाली चप्पल में उसके गोरे-गोरे पैरों पर या फिर उसकी चूचियों पर रुक जाती। गहरे नीले रंग की कमीज़ में शबाना की गोरे रंग की चूचियाँ गजब ढा रही थी… बड़ी-बड़ी और गोल-गोल गुदाज चूचियाँ। इसका एहसास शबाना को तब हुआ जब उसने समीम की पतली ट्रैक पैंट में तने हुए लंड की हल चल को देखा। खैर समीम ने जैसे तैसे खाना खाया और हाथ धोने के लिये बाथरूम में चला गया। इतने में लाइट भी आ गयी थी। जब वो बाथरूम में गया तो शबाना ने बर्तन उठाये और नीचे आ गयी। नीचे आकर उसने बर्तन किचन में रखे और अपने बेड पर आकर लेट गयी, “ओहहहह आज ना जाने मुझे क्या हो रहा है….?” अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी उसे। बेड पर लेटे हुए उसने जैसे ही अपनी आँखें बंद की तो समीम का चिकना चेहरा और उसकी चौड़ी छाती और मजबूत बाइसेप्स उसकी आँखों के सामने आ गये। पेट के निचले हिस्से में कुछ अजीब सा महसूस होने लगा था… रह-रह कर इक्कीस साल के नौजवान समीम की तस्वीर आँखों के सामने से घूम जाती।

शबाना पेट के बल लेटी हुई अपनी टाँगों के बीच में अपना हाथ चूत पर दबा कर अपने से पंद्रह साल छोटे लड़के का तसव्वुर कर कर रही थी… किस तरह समीम उसकी चूचियों को निहार रहा था… कैसे उसकी ऊँची हील की चप्पल में उसके गोरे-गोरे पैरों को देखते हुए समीम का लंड ट्रैक पैंट में उछल रहा था। शबाना का हाथ अब उसकी सलवार में दाखिल हुआ ही था कि तभी वो ख्वाबों की दुनिया से बाहर आयी जब समीरा रूम में अंदर दाखिल होते हुए बोली… “अम्मी क्या हुआ खाना नहीं खाना क्या?”  आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

शबाना एक दम से बेड पर उठ कर बैठ गयी और अपनी साँसें संभालते हुए अपने बिखरे हुए बालों को ठीक करने लगी। समीरा उसके पास आकर बेड पर बैठ गयी और उसके माथे पर हाथ लगा कर देखते हुए बोली, “अम्मी आप ठीक तो हो ना?”

शबाना: “हाँ… हाँ ठीक हूँ… मुझे क्या हुआ है?”

समीरा: “आपका जिस्म बहोत गरम है… और ऊपर से आपका चेहरा भी एक दम लाल है!”

शबाना: “नहीं कुछ नहीं हुआ… वो शायद गरमी के वजह से है… तू चल मैं खाना लगाती हूँ!”
फिर शबाना और समीरा ने मिल कर खाना खाया और किचन संभालने लगी। तभी फ़िरोज़ भी आ गया। जब शबाना ने उससे खाने का पूछा तो उसने कहा कि वो बाहर से ही खाना खा कर आया है। फ़िरोज़ शराब के नशे में एक दम धुत्त बेड पर जाकर लेट गया और बेड पर लेटते ही सो गया। शबाना ने भी अपना काम खतम किया और वो लेट गयी। करवटें बदलते हुए कब उसे नींद आयी उसे पता ही नहीं चला। सुबह- सुबह फ़िरोज़ ने ऊपर जाकर समीम के रूम का दरवाजा खटकटाया। समीम ने दरवाजा खोला तो फ़िरोज़ समीम को देखते हुए बोला “अरे यार समीम… मुझे माफ़ कर दो… कल तुम्हारा यहाँ पहला दिन था… और मेरी वजह से…”

समीम: “अरे फ़िरोज़ भाई कोई बात नहीं… अब जबकि मैं आपके घर में रह रहा हूँ तो मुझे बेगाना ना समझें..!”

फ़िरोज़: “अच्छा तुम तैयार होकर आ जाओ… आज नाश्ता नीचे मेरे साथ करना!”

समीम: “अच्छा ठीक है मैं तैयार होकर आता हूँ!”

फ़िरोज़ नीचे आ गया और शबाना को जल्दी नाश्ता तैयार करने को कहा। थोड़ी देर बाद समीम तैयार होकर नीचे आ गया। शबाना ने नाश्ता टेबल पर रखते हुए समीम के जानिब देखा तो उसने शबाना को सलाम कहा। शबाना ने भी मुस्कुरा कर उसे जवाब दिया और नाश्ता रख कर फिर से किचन में आ गयी। नाश्ते के बाद समीम और फ़िरोज़ स्टेशन पर चले गये।

इसी तरह दो हफ़्ते गुज़र गये। फ़िरोज़ और समीम हर रोज़ नाश्ता करने के बाद साथ-साथ स्टेशन जाते। फिर शाम को छः-सात बजे के करीब कभी दोनों साथ में वापस आते और कभी समीम अकेला ही वापस आता। फ़िरोज़ जब समीम के साथ वापस आता तो भी थोड़ी देर बाद फिर शराब पीने कहीं चला जाता और देर रात नशे की हालत में लौटता। समीम ज्यादातर शाम को ऊपर अपने कमरे में या छत पे ही गुज़ारता था। शबाना उसे ऊपर ही खाना दे आती थी। समीम की खुशमिजाज़ी और अच्छे रवैये से शबाना के दिल में उसके लिये उल्फ़त पैदा होने लगी थी। उसे समीम से बात करना अच्छा लगता था लेकिन उसे थोड़ा-बहोत मौका तब ही मिलता था जब वो उसे खाना देने ऊपर जाती थी। समीम खाने की या उसकी तारीफ़ करता तो उसे बहोत अच्छा लगता था। शबाना ने नोट किया था कि समीम भी कईं दफ़ा उसे चोर नज़रों से निहारता था लेकिन शबाना को बुरा नहीं लगता था क्योंकि समीम ने कभी कोई ओछी हर्कत या बात नहीं की थी। उसे तो बल्कि खुशी होती थी कि कोई उसे तारीफ़-अमेज़ नज़रों से देखता है।

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