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चूत को करार मिल ही गया भाग – 2

गतांग से आगे …

अगली सुबह समीम भी फ़िरोज़ और जायरा के साथ ही स्टेशन पर चला गया था। शबाना को समीम पे भी गुस्सा आ रहा था। उसने कभी सोचा नहीं था कि वो मासूम सा दिखाने वाला समीम इस हद तक गिर सकता है कि अपने से दुगुनी उम्र से भी ज्यादा उम्र की औरत के साथ ऐसी गिरी हुई हर्कत कर सकता है। उसका समीम से कोई ज़ाती या जिस्मानी रिश्ता भी नहीं था लेकिन शबाना को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि जायरा और समीम ने मिल कर उसके साथ धोखा किया है। हालांकि समीम से कोई जिस्मानी रिश्ता कायम करने का रुखासाना का कोई इरादा बिल्कुल था भी नहीं लेकिन उसे ऐसा क्यों लग रहा था जैसे जायरा ने समीम को उससे छीन लिया था।

जायरा तो थी ही बदकार-बेहया औरत लेकिन समीम ने उसके साथ धोखा क्यों किया। शबाना को बिल्कुल वैसा महसूस हो रहा था जैसा पहली दफ़ा अपने शौहर फ़िरोज़ के जायरा के साथ जिस्मानी रिश्तों के मालूम होने के वक़्त हुआ था बल्कि उससे भी ज्यादा बदहाली महसूस हो रही थी उसे।

शाम को जब समीम के आने का वक़्त हुआ तो शबाना ने पहले से ही मेन-डोर को खुला छोड़ दिया था ताकि उसे समीम की शक़्ल ना देखनी पड़े। वो अपने कमरे में आकर लेट गयी। थोड़ी देर बाद उसे बाहर के गेट के खुलने की आवाज़ आयी और फिर अंदर मेन-डोर बंद होने की। शबाना को अपने कमरे में लेटे हुए अंदाज़ा हो गया कि समीम घर पर आ चुका है और थोड़ी देर बाद समीम ने उसके कमरे के खुले दरवाजे पे दस्तक दी। जैसे ही दरवाजे पे दस्तक हुई तो शबाना उठ कर बैठ गयी और उसे अंदर आने को कहा। समीम पास आकर कुर्सी पर बैठ गया और बोला, “आपका दर्द अब कैसा है..?”

शबाना ने थोड़ा रूखेपन से जवाब दिया, “अब पहले से बेहतर है!”

समीम: “आप दवाई तो समय से ले रही हैं ना?”

शबाना: “हाँ ले रही हूँ!”
समीम: “अच्छा मैं अभी फ्रेश होकर बाहर से खाना ले आता हूँ… आप प्लीज़ खाना बनाने का तकल्लुफ़ मत कीजियेगा… क्या खायेंगी आप…?”

समीम के दिल में अपने लिये परवाह और फ़िक्र देख कर शबाना का गुस्सा कम हो गया और उसने थोड़ा नरमी से जवाब दिया, “कुछ भी ले आ समीम!”

समीम उठ कर बाहर जाने लगा तो न जाने शबाना के दिमाग में क्या आया और वो समीम से पूछ बैठी, “तूने ऐसी हर्कत क्यों की समीम?”

उसकी बात सुन कर समीम फिर से कुर्सी पर बैठ गया और सिर को झुकाते हुए शर्मसार लहज़े में बोला, “मुझे माफ़ कर दीजिये भाभी… मुझसे बहुत बड़ी गल्ती हो गयी… ये सब अंजाने में हो गया!” उसने एक बार शबाना की आँखों में देखा और फिर से नज़रें झुका ली।

“अंजाने में गल्ती हो गयी…? तू तो पढ़ा लिखा है… समझदार है अच्छे घराने से है… तू उस बेहया-बदज़ात जायरा की बातों में कैसे आ गया…?” समीम ने एक बार फिर से शबाना की आँखों में देखा। इस दफ़ा शबाना की आँखों में शिकायत नहीं बल्कि समीम के लिये फ़िक्रमंदी थी।

समीम नज़रें नीचे करके बोला, “भाभी सच कहूँ तो आप नहीं मानेंगी… पर सच ये है कि इसमें मेरी कोई गल्ती नहीं है… दर असल कल जायरा भाभी बार-बार ऊपर आकर मुझे उक्सा रही थी… मैं इन सब बातों से अपना दिमाग हटाने के लिये बाहर बज़ार चला गया… बज़ार में अपने काम निपटा कर मैं लौटते हुए व्हिस्की की बोतल भी साथ लाया था। दोपहर में मैंने सोचा आप दोनों खाने के बाद शायद सो गयी होंगी तो मैं अपने कमरे में ड्रिंक करने लगा। इतने में अचानक जायरा भाभी ऊपर मेरे कमरे में आ गयीं और बैठते हुए बोली कि अकेले-अकेले शौक फ़र्मा रहे हो समीम मियाँ हमें नहीं पूछोगे… पीने का मज़ा तो किसी के साथ पीने में आता है… उनकी बात सुनकर मैं सकपका गया और इससे पहले कि मैं कुछ कहता वो खुद ही एक गिलास में अपने लिये ड्रिंक बनाने लगी। फिर ड्रिंक करते -करते वो फिर मुझे अपनी हर्कतों से उक्साने लगीं। मुझे ये सब अटपटा लग रहा था लेकिन जायरा भाभी तेजी से ड्रिंक कर रही थीं और उन्हें नशा चढ़ने लगा तो उनकी हर्कतें और भी बोल्ड होने लगीं। उन्होंने अपनी कमीज़ के हुक खोल दिये और मेरी टाँगों के बीच में अपना हाथ रख कर दबाते हुए गंदी-गंदी बातें बोलने लगीं। मैंने उन्हें वहाँ से जाने को कहा और आपका वास्ता भी दिया कि शबाना भाभी आ जायेंगी लेकिन जायरा भाभी ने एक नहीं मानी और मुझे नामर्द बोली… मैं फिर भी चुप रहा तो उन्होंने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिये और मेरे सामने नंगी होते हुए मुझे गंदी-गंदी गालियाँ देकर उक्साने लगी कि तू हिजड़ा है क्या जो एक खूबसूरत हसीन औरत तेरे सामने नंगी होके खड़ी है और तू मना कर रहा है…

भाभी मैंने भी ड्रिंक की हुई थी और आप यकीन करें कि जायरा भाभी की उकसाने वाली गंदी-गंदी बातों से और उन्हें अपने सामने इस तरह बिल्कुल नंगी खड़ी देख कर खासतौर पे सिर्फ़ हाई हील के सैंडल पहने बिल्कुल नंगी… मैं कमज़ोर पड़ गया और मैं इतना उत्तेजित हो गया था कि मुझसे और रुका नहीं गया….!” ये कहते हुए समीम चुप हो गया।

शबाना अब उसकी हालत समझ सकती थी। आखिर एक जवान लड़के के सामने अगर एक औरत नंगी होकर उक्साये तो उसका नतीजा वही होना था जो उसने अपनी आँखों से देखा था। “भाभी मैं सच कह रहा हूँ… मेरा ये पहला मौका था… इससे पहले मैंने कभी ऐसा नहीं किया था… हो सके तो आप मुझे माफ़ कर दें भाभी..!” ये कह कर समीम ऊपर चला गया। समीम ने बिल्कुल सच बयान किया था और वाकय में ये उसका चुदाई करने का पहला मौका था।

फिर वो थोड़ी देर में फ्रेश होकर नीचे आया तो अभी भी शर्मसार नज़र आ रहा था। शबाना ने उसे ढाढस बंधाते हुए कहा कि उसे शर्मिंदा होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी कोई गल्ती नहीं है। फिर समीम खुश होकर ढाबे से खाना लेने चला गया। शबाना भी उठी और तैयार होकर थोड़ा मेक अप किया और फिर टेबल पर प्लेट और पानी वगैरह रखने लगी।

थोड़ी देर में समीम भी खाना लेकर आ गया। हालांकि सुबह का नाश्ता तो समीम ने कईं दफ़ा फ़िरोज़ के साथ नीचे किया था लेकिन आज पहली बार समीम रात का खाना शबाना के साथ नीचे खाना खा रहा था। शबाना ने नोटिस किया कि हमेशा खुशमिजाज़ रहने वाला समीम इस वक़्त काफ़ी संजीदा था और कुछ बोल नहीं रहा था। इसी बीच शबाना ने बड़े प्यार और नरमी से पूछा, “समीम एक और बात बता… वो जायरा भाभी उस दिन रात को दोबारा भी आयी थी क्या तेरे कमरे में… तेरे साथ…. हमबिस्तर…?”

“जी भाभी वो आयी थीं रात को करीब तीन-साढ़े तीन बजे… मैं गहरी नींद सोया हुआ था… गरमी की वजह से कमरा खुला रखा हुआ था मैंने… जब मेरी आँख खुली तो वो पहले से ही मेरे ऊपर सवार थीं… मैंने फिर एक बार उन्हें संतुष्ट किया और फिर वो नीचे चली गयीं… काफी नशे में लग रही थीं वो!” समीम ने काफ़ी संजीदगी से जवाब दिया।

खाना खतम करने के बाद जब शबाना बर्तन उठाने के लिये उठी तो समीम ने उसे रोक दिया और बोला, “रहने दें भाभी! मैं कर देता हूँ…!” शबाना ने कहा कि नहीं वो कर लेगी पर समीम ने उसकी एक ना सुनी और उसे बेड पर आराम करने को कह कर खुद बर्तन लेकर किचन में चला गया और बर्तन साफ़ करके सारा काम खतम कर दिया। समीम फिर से शबाना के बेडरूम में आया तो वो बेड पर पीछे कमर टिकाये हुई थी। समीम ने एक गिलास पानी शबाना को दिया और बोला “भाभी जी… बताइये कौन सी दवाई लेनी है आपको!” शबाना ने उसे बताया कि उसका दर्द अब काफ़ी ठीक है और अब किसी दवाई की जरूरत नहीं है।

तभी समीम के नज़र साइड-टेबल पे रखी हुई बाम पर गयी तो वो बोला, “चलिये आप लेट जाइये… मैं आपकी कमर पर बाम लगा कर मालिश कर देता हूँ… आपका जो थोड़ा बहुत दर्द है वो भी ठीक हो जायेगा!”

वो समीम को मना करते हुए बोली, “नहीं रहने दे समीम… मैं खुद कर लुँगी…!”
शबाना अब उसकी हालत समझ सकती थी। आखिर एक जवान लड़के के सामने अगर एक औरत नंगी होकर उक्साये तो उसका नतीजा वही होना था जो उसने अपनी आँखों से देखा था। “भाभी मैं सच कह रहा हूँ… मेरा ये पहला मौका था… इससे पहले मैंने कभी ऐसा नहीं किया था… हो सके तो आप मुझे माफ़ कर दें भाभी..!” ये कह कर समीम ऊपर चला गया। समीम ने बिल्कुल सच बयान किया था और वाकय में ये उसका चुदाई करने का पहला मौका था। फिर वो थोड़ी देर में फ्रेश होकर नीचे आया तो अभी भी शर्मसार नज़र आ रहा था।

शबाना ने उसे ढाढस बंधाते हुए कहा कि उसे शर्मिंदा होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी कोई गल्ती नहीं है। फिर समीम खुश होकर ढाबे से खाना लेने चला गया। शबाना भी उठी और तैयार होकर थोड़ा मेक अप किया और फिर टेबल पर प्लेट और पानी वगैरह रखने लगी। थोड़ी देर में समीम भी खाना लेकर आ गया। हालांकि सुबह का नाश्ता तो समीम ने कईं दफ़ा फ़िरोज़ के साथ नीचे किया था लेकिन आज पहली बार समीम रात का खाना शबाना के साथ नीचे खाना खा रहा था।

शबाना ने नोटिस किया कि हमेशा खुशमिजाज़ रहने वाला समीम इस वक़्त काफ़ी संजीदा था और कुछ बोल नहीं रहा था। इसी बीच शबाना ने बड़े प्यार और नरमी से पूछा, “समीम एक और बात बता… वो जायरा भाभी उस दिन रात को दोबारा भी आयी थी क्या तेरे कमरे में… तेरे साथ…. हमबिस्तर…?”

“जी भाभी वो आयी थीं रात को करीब तीन-साढ़े तीन बजे… मैं गहरी नींद सोया हुआ था… गरमी की वजह से कमरा खुला रखा हुआ था मैंने… जब मेरी आँख खुली तो वो पहले से ही मेरे ऊपर सवार थीं… मैंने फिर एक बार उन्हें संतुष्ट किया और फिर वो नीचे चली गयीं… काफी नशे में लग रही थीं वो!” समीम ने काफ़ी संजीदगी से जवाब दिया।

खाना खतम करने के बाद जब शबाना बर्तन उठाने के लिये उठी तो समीम ने उसे रोक दिया और बोला, “रहने दें भाभी! मैं कर देता हूँ…!” शबाना ने कहा कि नहीं वो कर लेगी पर समीम ने उसकी एक ना सुनी और उसे बेड पर आराम करने को कह कर खुद बर्तन लेकर किचन में चला गया और बर्तन साफ़ करके सारा काम खतम कर दिया। समीम फिर से शबाना के बेडरूम में आया तो वो बेड पर पीछे कमर टिकाये हुई थी। समीम ने एक गिलास पानी शबाना को दिया और बोला “भाभी जी… बताइये कौन सी दवाई लेनी है आपको!” शबाना ने उसे बताया कि उसका दर्द अब काफ़ी ठीक है और अब किसी दवाई की जरूरत नहीं है। तभी समीम के नज़र साइड-टेबल पे रखी हुई बाम पर गयी तो वो बोला, “चलिये आप लेट जाइये… मैं आपकी कमर पर बाम लगा कर मालिश कर देता हूँ… आपका जो थोड़ा बहुत दर्द है वो भी ठीक हो जायेगा!”

वो समीम को मना करते हुए बोली, “नहीं रहने दे समीम… मैं खुद कर लुँगी.
समीम: “आप लगा तो खुद लेंगी पर मालिश नहीं कर पायेंगी… मैं आपकी मालिश कर देता हूँ… आप का रहा सहा दर्द भी ठीक हो जायेगा!” ये कह कर समीम कुर्सी से उठ कर बेड पर आकर शबाना के करीब बैठ गया और उसे लेटने को बोला, “चलिये भाभी जी बताइये कहाँ लगाना है…!” अपने लिये समीम की इतनी हमदर्दी और फ़िक्र देख कर शबाना उसे और मना नहीं कर सकी और ये हकीकत भी बता नहीं पायी कि उसे दर्द तो कभी हुआ ही नहीं था और ये दर्द का तो सिर्फ़ बहाना था जायरा को परेशान करने का।

शबाना शर्माते हुए पेट के बल लेट गयी और अपनी कमीज़ को कमर से ज़रा ऊपर उठा लिया और बोली यहाँ कमर पर! समीम ने थोड़ा सा बाम अपनी उंगलियों पर लगाया और फिर शबाना की कमर पर मलने लगा। जैसे ही उसके हाथ का लम्स शबाना ने अपनी नंगी कमर पर महसूस किया तो उसका पूरा जिस्म काँप गया। उसकी सिस्करी निकलते-निकलते रह गयी।

समीम ने धीरे-धीरे दोनों हाथों से उसकी कमर की मालिश करनी शुरू कर दी। उसके हाथों का लम्स उसे बेहद अच्छा लग रहा था। कईं दफ़ा उसके हाथों की उंगलियाँ शबाना की सलवार के जबर से टकरा जाती तो उसका दिल जोरों से धड़कने लगता। वो मदहोश सी हो गयी थी।

“भाभी ज्यादा दर्द कहाँ पर है?” समीम ने पूछा तो बिना सोचे ही शबाना के मुँह से मदहोशी में खुद बखुद निकल गया कि थोड़ा सा नीचे है!

समीम ने फिर थोड़ा और नीचे बाम लगाना शुरू कर दिया। भले ही उस मालिश से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला था क्योंकि चोट तो कहीं लगी ही नहीं थी पर फिर भी शबाना को उसके हाथों के लम्स से जो सुकून मिल रहा था उसे वो बयान नहीं कर सकती थी। “भाभी जी थोड़ी सलवार नीचे सरका दो ताकि अच्छे से बाम लग सके…!” समीम की बात सुन कर शबाना के ज़हन में उसका वजूद काँप उठा पर उसे समीम के हाथों का लम्स अच्छा लग रहा था और उसे सुकून भी मिल रहा था। शबाना ने तुनकते हुए अपनी सलवार को थोड़ा नीचे के तरफ़ सरकाया। उसने नाड़ा बाँधा हुआ था इसलिये सलवार पूरी नीचे नहीं हो सकती थी पर फिर भी काफ़ी हद तक नीचे हो गयी।

“भाभी जी आप तो बहुत गोरी हो… मैंने इतना गोरा जिस्म आज तक नहीं देखा..!” समीम की बात सुनकर शबाना के गाल शर्म के मारे लाल हो गये। वो तो अच्छा था कि शबाना उल्टी लेटी हुई थी। शबाना को यकीन था कि अकेले कमरे में वो उसे इस तरह अपने पास पाकर पागल हो गया होगा। समीम ने थोड़ी देर और मालिश की और शबाना ने जब उसे कहा कि अब बस करे तो वो चुपचप उठ कर ऊपर चला गया। शबाना को आज बहुत सुकून मिल रहा था। आज कईं सालो बाद उसके जिस्म को ऐसे हाथों ने छुआ था जिसके लम्स में हमदर्दी और प्यार मिला हुआ था। समीम के बारे में सोचते हुए शबाना को कब नींद आ गयी उसे पता ही नहीं चला। अगली सुबह जब वो उठी तो बेहद तरो तज़ा महसूस कर रही थी।

नहाने के बाद शबाना बहुत अच्छे से तैयार हुई… आसमानी रंग का सफ़ेद कढ़ाई वाला जोड़ा पहना और सफ़ेद रंग के ऊँची हील के सैंडल भी पहने। फिर हल्का सा मेक-अप करने के बाद वो किचन में गयी और नाश्ता तैयार करने लगी। आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | नाश्ता तैयार करते हुए वो बार-बार किचन के दरवाजे पर आकर सीढ़ियों की तरफ़ देख रही थी। समीम के काम पर जाने का वक़्त भी हो गया था।

जैसे ही वो नाश्ता तैयार करके बाहर आयी तो समीम सीढ़ियों से नीचे उतरा। “आज तो आपकी तबियत काफ़ी बेहतर लग रही है भाभी जी… लगता है कल की मालिश ने काफ़ी असर किया!” उसने शबाना के लिबास और फिर उसके पैरों में हाई पेंसिल हील के सैंडलों की तरफ़ देखते हुए अपने होंठों पर दिलकश मुस्कान लाते हुए कहा।

बदले में शबाना ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “असर तो जरूर हुआ पर तुझे कैसे पता?” तो समीम थोड़ा झेंपते हुए बोला कि “भाभी जी वो आज आपने फिर हमेशा की तरह हाई हील के सैंडल जो पहने हैं… तो मुझे लगा कि कमर का दर्द अब बेहतर है!”
शबाना: “बिल्कुल ठीक पहचना तूने… अब डायनिंग टेबल पे बैठ… मैं नाश्ता लेकर आती हूँ!” फिर दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करने लगे।

इसी बीच में समीम ने शबाना से पूछा कि, “भाभी जी… आप कभी साड़ी नहीं पहनती क्या?”

शबाना: “पहनती हूँ लेकिन बहोत कम… साल में एक-आध दफ़ा अगर कोई खास मौका हो तो… क्यों!”

समीम: “नहीं बस वो इसलिये कि कभी देखा नहीं आपको साड़ी में… मेरा ख्याल है आप पे साड़ी भी काफ़ी सूट करेगी!”

फिर समीम जाते हुए शबाना से बोला, “भाभी जी, रात का खाना मैं बाहर से ही ले आऊँगा… आप बनाना नहीं..!”

शबाना ने मुस्कुराते हुए कहा कि ठीक है तो समीम ने फिर कहा, “अगर किसी और चीज़ के जरूरत हो तो बता दीजिये… मैं आते हुए लेता आऊँगा!”

शबाना ने कहा कि किसी और चीज़ के जरूरत नहीं है और फिर समीम के जाने के बाद वो घर के छोटे-मोटे कामों में लग गयी। फिर ऊपर आकर समीम के कमरे को भी ठीकठाक करने लगी। इसी दौरान शबाना को उसके बेड के नीचे कुछ पड़ा हुआ नज़र आया। उसने नीचे झुक कर उसे बाहर निकाला तो उसकी आँखें एक दम से फैल गयीं। वो एक लाल रंग की रेशमी पैंटी थी। अब इस डिज़ाइन की पैंटी ना तो शबाना के पास थी और ना ही समीरा के पास। तभी शबाना को दो दिन पहले का शाम वाला वाक़्या याद आ गया जब समीम ने जायरा को इसी कमरे में चोदा था। ये जरूर जायरा की ही पैंटी थी।

उस पैंटी पर जगह- जगह-जगह चूत से निकले पानी और शायद समीम के लंड से निकली मनी के धब्बे थे। पैंटी का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं था जिस पर उस दिन हुई घमासान चुदाई के निशान ना हों। शबाना ने पैंटी को अपने दोनों हाथों में लेकर नाक के पास ले जाकर सूँघा तो मदहोश कर देने वाली खुश्बू उसके जिस्म को झिनझोड़ गयी। वो पैंटी को लेकर बेड पर बैठ गयी और उसे देखते हुए उस दिन के मंज़रों को याद करने लगी। समीम का मूसल जैसा लंड जायरा की चूत में अंदर-बाहर हो रहा था।

शबाना एक बार फिर से अपना आपा खोने लगी पर तभी बाहर मेन-गेट पर दस्तक हुई तो उसने उस पैंटी को वहीं बेड के नीचे फेंक दिया और बाहर आकर छत से नीचे गेट की तरफ़ झाँका तो देखा कि पड़ोस में रहने वाली नज़ीला खड़ी थी। “अरे नज़ीला भाभी आप..! मैं अभी नीचे आती हूँ.!” शबाना ने जल्दी से समीम का कमरा बंद किया और नीचे आकर दरवाजा खोला। नज़ीला उसके पड़ोस में रहती थी।

उसकी उम्र चालीस साल थी और वो अपने घर में ही ब्यूटी पार्लर चलाती थी। वो दोपहर में कईं बार शबाना के घर आ जाया करती थी या उसे अपने यहाँ बुला लेती थी और दोनों इधर-उधर की बातें किया करती थी। उस दिन भी शबाना और नज़ीला ने गली मोहल्ले की ढेरों बातें की।
शबाना: “बिल्कुल ठीक पहचना तूने… अब डायनिंग टेबल पे बैठ… मैं नाश्ता लेकर आती हूँ!” फिर दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करने लगे।

इसी बीच में समीम ने शबाना से पूछा कि, “भाभी जी… आप कभी साड़ी नहीं पहनती क्या?”

शबाना: “पहनती हूँ लेकिन बहोत कम… साल में एक-आध दफ़ा अगर कोई खास मौका हो तो… क्यों!”

समीम: “नहीं बस वो इसलिये कि कभी देखा नहीं आपको साड़ी में… मेरा ख्याल है आप पे साड़ी भी काफ़ी सूट करेगी!”

फिर समीम जाते हुए शबाना से बोला, “भाभी जी, रात का खाना मैं बाहर से ही ले आऊँगा… आप बनाना नहीं..!”

शबाना ने मुस्कुराते हुए कहा कि ठीक है तो समीम ने फिर कहा, “अगर किसी और चीज़ के जरूरत हो तो बता दीजिये… मैं आते हुए लेता आऊँगा!”

शबाना ने कहा कि किसी और चीज़ के जरूरत नहीं है और फिर समीम के जाने के बाद वो घर के छोटे-मोटे कामों में लग गयी। फिर ऊपर आकर समीम के कमरे को भी ठीकठाक करने लगी। इसी दौरान शबाना को उसके बेड के नीचे कुछ पड़ा हुआ नज़र आया। उसने नीचे झुक कर उसे बाहर निकाला तो उसकी आँखें एक दम से फैल गयीं। वो एक लाल रंग की रेशमी पैंटी थी। अब इस डिज़ाइन की पैंटी ना तो शबाना के पास थी और ना ही समीरा के पास। तभी शबाना को दो दिन पहले का शाम वाला वाक़्या याद आ गया जब समीम ने जायरा को इसी कमरे में चोदा था। ये जरूर जायरा की ही पैंटी थी।

उस पैंटी पर जगह- जगह-जगह चूत से निकले पानी और शायद समीम के लंड से निकली मनी के धब्बे थे। पैंटी का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं था जिस पर उस दिन हुई घमासान चुदाई के निशान ना हों। शबाना ने पैंटी को अपने दोनों हाथों में लेकर नाक के पास ले जाकर सूँघा तो मदहोश कर देने वाली खुश्बू उसके जिस्म को झिनझोड़ गयी। वो पैंटी को लेकर बेड पर बैठ गयी और उसे देखते हुए उस दिन के मंज़रों को याद करने लगी। समीम का मूसल जैसा लंड जायरा की चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। शबाना एक बार फिर से अपना आपा खोने लगी पर तभी बाहर मेन-गेट पर दस्तक हुई तो उसने उस पैंटी को वहीं बेड के नीचे फेंक दिया और बाहर आकर छत से नीचे गेट की तरफ़ झाँका तो देखा कि पड़ोस में रहने वाली नज़ीला खड़ी थी। “अरे नज़ीला भाभी आप..! मैं अभी नीचे आती हूँ.!” शबाना ने जल्दी से समीम का कमरा बंद किया और नीचे आकर दरवाजा खोला। नज़ीला उसके पड़ोस में रहती थी। उसकी उम्र चालीस साल थी और वो अपने घर में ही ब्यूटी पार्लर चलाती थी। वो दोपहर में कईं बार शबाना के घर आ जाया करती थी या उसे अपने यहाँ बुला लेती थी और दोनों इधर-उधर की बातें किया करती थी। उस दिन भी शबाना और नज़ीला ने गली मोहल्ले की ढेरों बातें की।

शबाना समीम के बात टाल ना सकी और अपना खाली गिलास टेबल पे रखते हुए बोली, “अच्छा बाबा… तू मानेगा नहीं… लेटती हूँ… पहले सैंडल तो खोल के उतार दूँ!”

“सैंडल खोलने की जरूरत नहीं है भाभी… इतने खूबसूरत सैंडल आपके हसीन गोरे पैरों की खूबसूरती और ज्यादा बढ़ा रहे हैं… आप ऐसे ही लेट जाइये!” समीम किसी बच्चे की तरह मचलते हुए बोला तो रुखसान को हंसी आ गयी और वो उसकी बात मान कर बेड पर लेट गयी। क्योंकि आज उसने साड़ी पहनी हुई थी इसलिये उसकी कमर पीछे से समीम की आँखों के सामने थी। समीम ने बाम को पहले अपनी उंगलियों पर लगाया और शबाना की कमर को दोनों हाथों से मालिश करना शुरू कर दिया। “एक बात बता समीम! तुझे मेरा ऊँची हील वाले सैंडल काफ़ी पसंद है ना?” शबाना ने पूछा तो इस बार समीम का चेहरा शरम से लाल हो गया। वो झेंपते हुए बोला, “जी… जी भाभी आप सही कह रही हैं… आपको अजीब लगेगा लेकिन मुझे लेडिज़ के पैरों में हाई हील वाले सैडल बेहद अट्रैक्टिव लगते हैं… और संयोग से आप तो हमेशा हाई हील की सैंडल या चप्पल पहने रहती हैं!”

“अरे इसमें शर्माने वाली क्या बात है… और मुझे बिल्कुल अजीब नहीं लगा… मैं तेरे जज़्बात समझती हूँ… कुछ-कुछ होता है… है ना?” शबाना हंसते हुए हुए बोली। समीम के हाथों की मालिश से पिछले दिन की तरह ही बेहद मज़ा आ रहा था। समीम के हाथ अब धीरे-धीरे नीचे की तरफ़ बढ़ने लगे। शबाना को मज़ाक के मूड में देख कर समीम भी हिम्मत करते हुए बोला, “भाभी… आपकी स्किन कितनी सॉफ्ट है एक दम मुलायम… भाभी आप अपनी साड़ी थोड़ा नीचे सरका दो… पूरी कमर पे नीचे तक अच्छे से मालिश हो जायेगी और साड़ी भी गंदी नहीं होगी।“ शबाना ने थोड़ा शर्माते हुए अपनी साड़ी में हाथ डाला और पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया और पेटीकोट और साड़ी ढीली कर दी। शबाना को पिछली रात मालिश से बहुत सुकून मिला था और बहुत अच्छी नींद भी आयी थी इसलिये उसने ना-नुक्कर नहीं की। जैसे ही शबाना की साड़ी ढीली हुई तो समीम ने उसकी साड़ी और पेटीकोट के अंदर अपनी उंगलियों को डाल कर उसे नीचे सरका दिया पर शबाना को तभी एहसास हुआ कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है। शबाना ने नीचे पैंटी ही नहीं पहनी हुई थी… पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसके आधे से ज्यादा चूतड़ अब समीम की नज़रों के सामने थे।
समीम ने कोई रीऐक्शन नहीं दिखाया और धीरे-धीरे कमर से मालिश करते हुए अपने हाथों को शबाना के चूतड़ों की ओर बढ़ाना शुरू कर दिया। उसके हाथों का लम्स शबाना के जिस्म के हर हिस्से को ऐसा सुकून पहुँचा रहा था जैसे बरसों के प्यासे को पानी पीने के बाद सुकून मिलता है। वो चाहते हुए भी एतराज नहीं कर पा रही थी। वो बस लेटी हुई उसके छुने के एहसास का मज़ा ले रही थी। शबाना की तरफ़ से कोई ऐतराज़ ना देख कर समीम की हिम्मत बढ़ी और अब उसने शबाना के आधे से ज्यादा नंगे हो चुके गुदाज़ चूतड़ों को जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया। शबाना की साड़ी और पेटीकोट समीम के हाथ से टकराते हुए थोड़ा-थोड़ा और नीचे सरक जाते।

शबाना को एहसास हो रहा था कि अब समीम को उसके चूतड़ों के बीच की दरार भी दिखायी दे रही होगी। उसने शरम के मारे अपने चेहरे को तकिये में छुपा लिया और अपने होंठों को अपने दाँतों में भींच लिया ताकि कहीं वो मस्ती में आकर सिसक ना पड़े और उसकी बढ़ती हुई शहवत और मस्ती का एहसास समीम को हो। समीम उसके दोनों गोरे-गोरे गोल-गोल चूतड़ों को बाम लगाने के बहाने से सहला रहा था।

शबाना को भी एहसास हो रहा था कि समीम बाम कम लगा रहा था और सहला ज्यादा रहा था। जब शबाना ने फिर भी ऐतराज ना किया तो समीम और नीचे बढ़ा और चूतड़ों को जोर-जोर से मसलने लगा। थोड़ी देर बाद उसके हाथों की उंगलियाँ शबाना की गाँड की दरार में थी। फिर उसने अचानक से शबाना के दोनों चूतड़ों को हाथों से चौड़ा करते हुए फैला कर बीच की जगह देखी तो शबाना साँस लेना ही भूल गयी।

शबाना को एहसास हुआ की शायद समीम ने उसके चूतड़ों के फैला कर उसकी गाँड का छेद और चूत तक देख ली होगी लेकिन शबाना अब तक समीम हाथों के सहलाने और मसलने से बहुत ज्यादा मस्त हो गयी थी और उसकी चूत गीली और गीली होती चली जा रही थी। वो ये सोच कर और शरमा गयी कि समीम उसकी बिल्कुल मुलायम और चिकनी चूत को देख रहा होगा जिसे उसने आज सुबह ही शेव किया था।

उसकी चिकनी चूत को देखने वाला आज तक था ही कौन लेकिन उसके घर में रहने वाला किरायेदार आज उसके चूतड़… उसकी गाँड और उसकी चिकनी चूत को देख रहा था और वो भी पड़े-पड़े नुमाईश कर रही थी। ये सोच कर उसका दिल जोर-जोर से धक-धक करने लगा कि कहीं समीम को उसकी चूत के गीलेपन का एहसास ना हो जाये।

पर थोड़ी देर में जब समीम ने जानबूझकर या अंजाने में शबाना की गाँड के छेद को अपनी उंगली से छुआ तो वो एक दम से उचक पड़ी। उसके जिस्म में जैसे करंट लग गया हो… जैसे तन-बदन में आग लग गयी हो। शबाना ने एक दम से समीम का हाथ पकड़ कर झटक दिया और उसके मुँह से निकल पड़ा, “हाय आल्लाह ये क्या कर रहा है तू…?” शबाना उससे दूर होते हुए उठ कर बैठ गयी। शबाना एक दम से घबरा गये थी और समीम तो उससे भी ज्यादा घबरा गया था। शबाना को उसका इरादा ठीक नहीं लगा और घबराहट में वो एक दम से बेड से नीचे उतर कर खड़ी हो गयी। पर उसके खड़े होने का नतीजा ये हुआ कि गजब हो गया… उसकी साड़ी और पेटीकोट कमर से खुले हुए थे… जब वो खड़ी हुई तो साड़ी और पेटीकोट दोनों सरक कर उसके पैरों में जा गिरे। शबाना नीचे से एक दम नंगी हो गयी। इस तरह से अपने किरायेदार और बीस साल के जवान लड़के के सामने नंगी होने में उसकी शरम की कोई इंतेहा ना रही। उसे कुछ नहीं सूझा… दिमाग ने काम करना बंद कर दिया… साँस जैसे अटक गयी थी! वो घबराहट में वहीं जमीन पर बैठ गयी। इससे पहले कि शबाना को कुछ समझ आता… तब तक समीम ने उसे गोद में उठा कर बेड पर डाल दिया और अगले ही पल वो हुआ जिसका शबाना ने तसव्वुर तक नहीं किया था कि आज उसके साथ ये सब होगा।

शबाना को पलंग पर पटकते ही समीम खुद शबाना पर चढ़ गया। अगले ही पल शबाना उसके नीचे थी और वो शबाना के ऊपर था। उसके बाद अगले ही पल समीम ने शबाना की टाँगों को हवा में उठा दिया। शबाना को वो कुछ भी सोचने समझने का मौका नहीं दे रहा था।

अगले ही पल वो शबाना की टाँगों के बीच में जगह बना चुका था और पाँचवे सेकेंड में ही उसका शॉर्ट्स और अंडरवियर उसके जिस्म से अलग हो गये और उसके अगले ही पल उसने अपने लंड को हाथ में लेकर अपने लुंड का मोटा सुपाड़ा शबाना की चूत के छेद पर लगा दिया। एक मोटी सी गरम सी कड़क सी चीज़ शबाना को अपनी चूत के अंदर जाती हुई महसूस हुई।

बस फिर क्या था… शाम के वक़्त में शबाना के अपने कमरे में एक बीस-इक्कीस साल का किरायेदार और चौंतीस-पैंतीस साल की मकान माल्किन औरत और मर्द बन गये थे! शबाना की तो मस्ती में साँसें उखड़ने लगी थीं… जिस्म ऐंठ गया था… आँखें झपकना भूल गयी थी… और ज़ुबान सूखने लगी थी। उसे कुछ होश नहीं था कि क्या हो रहा है. समीम कर रहा था… और वो चुपचप उसे करने दे रही थी…

वो ना तो उसे रोक रही थी और ना ही उसे उक्सा रही थी। वो बिना कुछ बोले अपनी टाँगें उठाये और समीम की कमर में हाथ डाले लेटी रही और समीम का मोटा मूसल जैसा लंड उसकी चूत को रौंदता रहा रगड़ता रहा… पता नहीं कब तक शबाना को चोदता रहा। ऐसा नहीं था कि शबाना को मज़ा नहीं आ रहा था पर वो जैसे कि सक्ते की हालत में थी।

जिस्म तो चुदाई के मज़े ले रहा था लेकिन दिमाग सुन्न था। फिर उसकी चूत को समीम ने अपने गाढ़े वीर्य से भर दिया। शबाना अपने गैर-मज़हब वाले इक्कीस साल के किरायेदार के लंड के पानी से तरबर्तर हो चुकी थी।

जैसे ही समीम शबाना के ऊपर से उठा तो वो भी काँपती हुई बिस्तर से उठी और सिर्फ़ ब्लाउज़ और सैंडल पहने नंगी हालत में ही बाथरूम में चली गयी। उसके दिल में उलझने बढ़ने लगीं कि हाय ये मैंने क्या कर दिया… शादीशुदा होकर दूसरे मर्द से चुदवा लाया… वो भी समीरा की उम्र के लड़के से… खुद से पंद्रह साल छोटे लड़के से गैर मज़हब वाले लड़के से… नहीं ये गलत है… सरासर गलत है… जो हुआ नहीं होना चाहिये था… मैं कैसे बहक गयी… अब क्या होगा…! शबाना बाथरूम में कमोड पे बैठ कर मूतने लगी। उसे बहोत तेज पेशाब लगी थी। उसने झुक कर देखा तो उसकी रानें और चूत उसकी चूत के पानी और समीम के वीर्य से चिपचिपा रही थी। आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है |मूतने के बाद शबाना खड़ी हुई और टाँगें थोड़ी चौड़ी करके उसने अपनी चूत की फ़ाँकों को फैलाते हुए चूत की माँसपेशियों पर जोर लगाया तो समीम का वीर्य उसकी चूत से बाहर टपकने लगा। एक के बाद एक वीर्य की कईं बड़ी-बड़ी बूँदें उसकी चूत से बाहर नीचे गिरती रही। फिर उसने अपनी चूत और रानों को पानी से साफ़ किया। उसने सोचा कि कल सुबह -सुबह केमिस्ट की दुकान से बच्चा ना ठहरने की दवाई ले आयेगी।

फिर वो अपना ब्लाऊज़ और सैंडल निकाल कर नहाने लगी। फिर तौलिया लपेट कर वो बाथरूम से निकल कर बाहर आयी। समीम ऊपर जा चुका था। शबाना ने अलमारी में से सलवार सूट निकाल कर पहन लिया और बाल संवार कर आदतन थोड़ा मेक-अप किया और अपने बेड पर जाकर गिर पड़ी। शाम के छः बज रहे थे। खुमारी में उसे नींद आ गयी। वो आज कईं सालों बाद चुदी थी…

चुदाई अंजाने में अचानक हुई थी पर चुदाई तो चुदाई है! शबाना मुतमाईन होकर ऐसे मीठी नींद सोयी कि रात के नौ बजे बाहर डोर-बेल बजने की आवाज़ से ही उठी। उसने घड़ी में वक़्त देखा तो नौ बज रहे थे। उसके मुँह से निकला, “हाय अल्लाह ये क्या नौ बज गये…!” वो जल्दी से उठी और बाहर जाकर दरवाजा खोला तो बाहर नज़ीला खड़ी थी और उसके साथ में उसका छोटा बेटा सलील था जो महज आठ साल का था।

“नज़ीला भाभी आप इस वक़्त… खैरियत तो है ना?” शबाना ने पूछा तो नज़ीला बोली, “शबाना मेरे अब्बू की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गयी है… अभी फ़ोन आया है… मैं और अकरम साहब अभी वहाँ के लिये रवाना हो रहे है… तुम सलील को दो दिन के लिये अपने पास रख लो प्लीज़… हम दो दिन बाद वापस आ जायेंगे!”

शबाना ने कहा कि, “कोई बात नहीं भाभी जान ये भी तो आपका अपना ही घर है… आप इसे छोड़ कर बेफ़िक्र होकर जायें!”
उसके बाद नज़ीला सलील को शबाना के पास छोड़ कर चली गयी। शबाना ने दरवाजा बंद किया और सलील के साथ अंदर आ गयी। उसने एक बार फिर से घड़ी की तरफ़ नज़र डाली तो नौ बज के पाँच मिनट हो रहे थे।

उसने टीवी चालू किया और सलील से पूछा कि उसने खाना खाया है कि नहीं तो वो बोला, “नहीं आँटी अभी नहीं खाया!” शबाना ने उसे कहा कि, “तुम टीवी देखो… मैं खाना गरम कर के लाती हूँ..!” वो किचन में गयी और खाना गरम करने लगी। खाना काफ़ी था इसलिये किसी बात की परेशानी नहीं थी। उसने खाना गरम किया और फिर डायनिंग टेबल पर लगा दिया और सलील को खाना परोस कर उसके साथ कुर्सी पर बैठ गयी।

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