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चूत को करार मिल ही गया भाग – 2

गतांग से आगे …

समीम अभी तक खाना खाने नहीं आया था। शबाना उसे ऊपर जाकर भी नहीं बुलाना चाहती थी क्योंकि उसकी तो समीम से आँखें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि जो कुछ भी हुआ उसके पीछे कसूर किसका है… उसका खुद का या समीम का। वो अभी यही सोच रही थी कि समीम के कदमों की आहट सुन कर सुनकर उसका ध्यान टूटा। शबाना उसकी तरफ़ देखे बिना बोली, “खाना खा ले समीम… गरम कर दिया है!” समीम उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ कर खाना खाने लगा। शबाना भी खाना खा रही थी। वो अपनी नज़रें भी नहीं उठा पा रही थी। बार-बार उसके जहन में यही ख्याल आ रहा था कि शादीशुदा होते हुए भी उसने ये कैसा गुनाह कर डाला। खाना खाते हुए समीम ने पूछा, “ये साहब कौन हैं भाभी?”

शबाना ने नज़रें झुकाये हुए ही जवाब दिया, “ये पड़ोस की नज़ीला भाभी का बेटा है… उनके वालिद की तबियत खराब हो गयी अचानक तो वो उनके यहाँ गये हैं!” फिर ना वो कुछ बोला और ना ही शबाना। समीम ने खाना खाया और उसे गुड नाइट बोल कर ऊपर चला गया। उसने बर्तन उठा कर किचन में रखे और अपने रूम में आकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। शबाना सलील के साथ जाकर बेड पर लेट गयी। सलील तो बेचारा मासूम सा बच्चा था… जल्द ही सो गया। शबाना अभी तक जाग रही थी।

शाम को तीन घंटे तक सोने की वजह से नींद भी नहीं आ रही थी और आज तो उसकी ज़िंदगी ही बदल गयी थी। वो दो हिस्सों में बट गयी थी… दिल और दिमाग! दिल कह रहा था कि जो हुआ ठीक हुआ और दिमाग गलत करार दे रहा था। दिल कह रहा था कि शादीशुदा होते हुए भी अपने शौहर के होते हुए भी वो एक बेवा जैसी ज़िंदगी जी रही थी… और अगर अल्लाह तआला ने उसकी सुन कर उसके लिये एक लंड का इंतज़ाम कर दिया है तो क्या बुराई है। शबाना यही सब सोच रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई। घर में उसके और सलील और समीम के अलावा कोई नहीं था तो ज़ाहिर है समीम ही होगा। शबाना ने सोचा कि अब वो क्यों आया है। उसका दिल फिर जोर से धड़कने लगा। वो चुपचाप लेटी रही पर फिर से दस्तक हुई।

सलील कहीं उठ ना जाये… भले ही वो मासूम था पर कहीं उसे किसी तरह का शक हो गया तो यही सोचकर शबाना उठी और धीरे से जाकर दरवाजा खोला। सामने समीम ही था। उसे देख कर शबाना झेंप गयी, “अब क्या है क्यों आये हो यहाँ पर…?”

“भाभी जी मैं अंदर आ जाऊँ?” समीम ने पूछा तो शबाना ने उसे मना करते हुए कहा कि, “नहीं तू जा अभी यहाँ से..!” ये कह कर शबाना ने दरवाजा बंद कर दिया। उसकी साँसें तेज हो गयी थी। वो सोचने लगी कि “ये तो अंदर आने को कह रहा है… क्या करेगा अंदर आकर… मुझे फिर से चोदेग…? हाय अल्लाह सलील भी तो कमरे में है… दोबारा चुदाई…

तौबा मेरी तौबा एक दफ़ा गल्ती कर दी अब नहीं..!” तभी उसके दिल के कोने से आवाज़ आयी, “तो क्या हो गया इसमें सब करते हैं… अब एक बार तो तू कर चुकी है… एक बार और कर लिया तो क्या है? अगर दोबारा भी करवा लिया तो क्या बिगड़ जायेगा… अल्लाहा तआला ने मौका दिया है इसे ज़ाया ना जाने दे… बार-बार ऐसे मौके नहीं आने वाले ज़िंदगी में… पिछले दस सालों से तरसी है इसके लिये..!”

शबाना बेड पर बैठी सोचती रही, “मौका मिला है तो शबाना इसका फ़ायदा उठा… आधी से ज्यादा जवानी तो यूँ ही निकल गयी… बाकी भी ऐसे ही निकल जायेगी… अच्छा भला आया था बेचारा… उसे तो कोई और मिल जायेंगी… वो तो अभी-अभी जवान हुआ है… शादी भी होगी… तेरा कौन है… वो फ़िरोज़ जिसने तुझे कभी प्यार से छुआ तक नहीं… ये सब गुनाह ये गलत है… वो गलत है… इन ही सब में ज़िंदगी निकल गयी… उधर जायरा को देख ज़िंदगी के मज़े ले रही है… तू तो उससे कहीं ज्यादा हसीन है तुझे हक नहीं है क्या ज़िंदगी के लुत्फ़ उठाने का!” यही सब सोचते-सोचते थोड़ी देर गुज़रने के बाद शबाना के दिल और दिमाग की जंग में आखिरकार दिमाग की शिकस्त हुई।

शबाना को अब समीम के साथ अपने रवैय्ये के लिये बुरा महसूस होने लगा। फिर वो कुछ सोचकर मुस्कुराते हुए उठी और अलमारी में से एक बेहद दिलकश सुर्ख रंग का जोड़ा निकाल कर बाथरूम में जा कर कपड़े बदले। फिर कमरे में आकर अच्छा सा मेक-अप किया और लाल रंग के ही ऊँची पेन्सिल हील वाले कातिलाना सैंडल पहने। ये सोच कर शबाना के होंठों पे मुस्कुराहट आ गयी कि अगर समीम उससे खफ़ा भी होगा तो और कुछ नहीं तो उसे ये कातिलाना सैंडल पहने देख कर तो जरूर घायल होकर उसके कदमों में गिर पड़ेगा।

फिर उसने पर्फ्यूम लगाया और एक दफ़ा तसल्ली करी कि सलील गहरी नींद सो रहा है और फिर लाइट बंद करके बेडरूम से बाहर निकल कर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। शबाना आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर जाने लगी। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। जब वो ऊपर पहुँची तो समीम के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और कमरे में नाईट लैम्प की हल्की सी रोशनी थी। जब वो उसके दरवाजे तक पहुँची तो उसे हैरानी हुई कि समीम तो अंदर था ही नहीं। तभी उसे अपने पीछे समीम के कदमों आहट आयी तो वो पलटी। उसने देखा समीम के हाथ में शराब का गिलास था। शायद वो इतनी देर से छत पर शराब पी रहा था। समीम उसके करीब आया तो शबाना झिझकते हुए बोली, “तू सोया नहीं अब तक…?”

समीम ने आगे बढ़ कर शबाना के एक हाथ को अपने हाथ में थाम लिया। उसके मर्दाना हाथ का एहसास पाते ही शबाना पे नशा सा होने लगा। “मुझे यकीन था आप जरूर आओगी..!” ये कह कर समीम ने उसे अपनी तरफ़ खींचा और वो उसकी तरफ़ खिंचती चली गयी…

बिना किसी मुज़ाहिमत किये। समीम ने उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसके चौड़े सीने से लग कर शबाना को जवानी का अनोखा सुकून मिलने लगा। शबाना ने उसके चौड़े सीने में अपना चेहरा छुपा लिया और बोल पड़ी, “समीम मुझे डर लगता है..!” समीम ने उसकी कमर को अपनी बाहों में और जकड़ लिया। “डर… कैसा डर भाभी?”

शबाना उसकी बाहों में कसमसायी। अपने जवान जिस्म को समीम की जवान बाहों की गिरफ़्त में उसे बहुत अच्छा लग रहा था। शबाना फुसफुसाते हुए बोली, “कोई देख लेगा!”
समीम बोला, “यहाँ और कौन है जो देख लेगा..!”

शबाना: “नीचे सलील है वो…”

समीम: “अरे वो तो अभी छोटा है… उसे क्या समझ..!”

शबाना: “और अगर कुछ ठहर गया तो..?”

समीम: “क्या…?” समीम को शायद समझ में नहीं आया था। शबाना एक दम से शरमा गयी। वो थोड़ी देर रुक कर बोली, “अगर मैं पेट से हो गयी तो?” समीम के ज़रिये प्रेग्नेन्ट होने की बात से शबाना के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गयी। समीम उसकी पीठ को सहलाते हुए बोला, “ऐसा कुछ नहीं होगा..!” शबाना ने उसकी आँखों में सवालिया नज़रों से देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोला, “मैं कल बज़ार से आपके लिये बच्चा ना ठहरने वाली दवाई ला दुँगा… वैसे मुझे लगता है कि अब आपको रोज़ाना ये गोलियाँ लेने की जरूरत पड़ने वाली है..!” शबाना उसकी बात सुन कर सिर झुका कर मुस्कुराने लगी। समीम ने उसे अपनी बाहों में और जोर से भींच लिया। शबाना की चूचियाँ उसके सीने में दब गयीं। समीम ने उसके चूतड़ों को जैसे ही हाथ लगाया तो शबाना एक दम से मचल उठी और बोली, “समीम यहाँ नहीं..!”

समीम उसका इशारा समझ गया और उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए अपने कमरे में ले गया। जैसे ही शबाना उसके कमरे में दाखिल हुई तो उसकी धड़कनें बढ़ गयी। शाम को तो सब इतनी जल्दी हुआ था कि उसे कुछ समझ में ही नहीं आया था।

कमरे में आते ही समीम ने लाइट जला दी और शबाना को पीछे से बाहों में भर लिया। शबाना ने धीरे से अपनी पीठ उसके सीने से सटा ली। समीम के हाथ में शराब का आधा भरा गिलास अभी भी मौजूद था। उसने अपने होंठों को शबाना की गर्दन पर रखा तो शबाना का तो रोम-रोम काँप गया। “शबाना भाभी आज तो आपका हुस्न कुछ ज्यादा ही कहर ढा रहा है.. !” समीम बुदबुदाते हुए बोला। समीम ने आज दूसरी बार उसे नाम से पुकारा था। समीम के होंठ शबाना की गर्दन पे और उसका एक हाथ शबाना के स्लिम पेट और नाभि के आसपास थिरक रहा था। समीम के हाथ के सहलाने और अपनी गर्दन पे समीम के होंठों और गर्म साँसों का एहसास शबाना को बहुत अच्छा लग रहा था… वो मदहोश हुई जा रही थी। दो दफ़ा शादीशुदा होने के बावजूद पहली बार उसे ऐसा मज़ा और इशरत नसीब हो रही थी।

घायल करके रख दिया भाभी आपके हुस्न ने मुझे!” रुख्साना की गर्दन को चूमते हुए समीम बोला और फिर अपना शराब का गिलास शबाना के होंठों से लगा दिया। रुख्सना उसकी गिरफ़्त में कसमसाते हुए शराब का गिलास अपने होंठों से ज़रा दूर करते हुए बोली, “नहीं समीम… मैं नहीं… पी नहीं कभी!”

“थोड़ी सी तो पी कर देखो भाभी आपके इन सुर्ख होंठों में जब ये शराब थिरकेगी तो शराब और आपके हुस्न का नशा मिलने से ऐसा नशा तैयार होगा कि कयामत आ जायेगी..!” समीम शबाना की गर्दन पे अपने होंठ फिराते हुए बोला।

शबाना तो पहले ही समीम के आगोश में मदहोश हुई जा रही थी और समीम की शायराना बातों से वो बिल्कुल बहक गयी और उसकी तमाम ज़हनी हिचकिचाहट काफ़ूर हो गयी। समीम ने जैसे ही गिलास फिर से उसके होंठों से लगाया तो शबाना फ़ौरन अपने सुर्ख होंठ खोलकर शराब पीने लगी। शुरू-शुरू में तो शबाना को ज़ायका ज़रा सा कड़वा जरूर लगा लेकिन फिर दो-तीन घूँट पीने के बाद उसे ज़ायका भाने लगा।

इसी तरह एक हाथ से शबाना के जिस्म को सहलाते हुए और उसकी गर्दन पे अपनी नाक रगड़ते और उसे चूमते हुए समीम ने गिलास में मौजूद सारी शराब शबाना को पिलाने के बाद ही उसके होंठों से गिलास हटाया।

उसके बाद समीम ने शबाना को अपनी तरफ़ घुमाया और उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए बोला, “शबाना भाभी इतनी हॉट लग रही हो आज कि बस ज्या कहूँ… और इन हाई हील सैंडलों में आपके ये खूबसूरत पैर तो मुझे पागल कर रहे हैं… दिल कर रहा है कि चूम लूँ इन्हें!” शबाना पे शराब की हल्की-हल्की खुमारी छाने लगी थी। अपनी तारीफें सुनकर पहले तो वो थोड़ी शर्मा गयी लेकिन फिर शरारत भरी नज़रों से उसे देखते हुए बोली, “तो कर ले ना अपनी हसरत पूरी… रोका किस ने है!”

इतना सुनते ही समीम फ़ौरन शबाना के कदमों पे झुक गया और उसके गोरे-गोरे नर्म पैरों और सैंडलों कि तनियों को कुत्ते की तरह चूमने-चाटने लगा। शबाना को यकीन ही नहीं हो रहा थी कि कोई उसे इस कदर भी चाहता है कि इस तरह उसके पैरों को उसके सैंडलों को चूम रहा है। उसके जिस्म में मस्ती भरी सनसनी सी दौड़ गयी। उसके दोनों पैर चूमने के बाद समीम ने उठ कर फिर शबाना को अपने आगोश में ले कर उसके जिस्म पे हाथ फिराता हुआ उसकी गर्दन पे चूमने लगा।

शबाना भी समीम के मर्दाना आगोश में मस्ती में कसमसा रही थी। शराब की खुमारी उसकी मस्ती को और ज्यादा बढ़ा रही थी। उसने भी अपनी बाँहें समीम की कमर में डाल राखी थी। जब उसे लगा कि समीम शायद अब उसके कपड़े उतारने शुरू करेगा तो शबाना ने धीरे से समीम को कमरे का दरावाजा बंद करने को कहा तो सुनिल बोला, “यहाँ कौन आ जायेगा इस वक़्त?”

लेकिन शबाना इसरार करते हुए बोली, “हुम्म्म तू दरवाजा लॉक कर दे ना प्लीज़?”

समीम ने उसे छोड़ा और दरवाजा लॉक कर दिया और फिर से शबाना को पीछे से जकड़ लिया तो वो उसकी बाहों में कसमसाते हुए फिर फुसफुसाते हुए बोली, “समीम लाइट भी..!”
समीम बोला, “रहने दो ना भाभी.. मैं आज आपके हुस्न का दीदार करना चाहता हूँ..!” और शबाना के पेट से होते हुए उसके हाथ शबाना की चूचियों के तरफ़ बढ़ने लगे।

“मुझे शरम आती है समीम… लाईट ऑफ कर दे ना… नाईट लैम्प की रोशनी काफ़ी होगी!” अपनी चूचियों पे समीम के हाथों का दबाव महसूस होने से शबाना सिसकते हुए बोली। समीम ने एक बार फिर से उसे छोड़ा और थोड़े बेमन से लाइट ऑफ़ कर दी। लेकिन समीम ने देखा कि वाकय में नाईट लैम्प की काफी रोशनी थी और खुली खिड़कियों से कमरे में चाँद की भी काफी रोशनी आ रही थी।आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | इतनी रोशनी शबाना के हुस्न का दीदार करने के लिये काफ़ी थी। अब उससे और सब्र नहीं हो रहा था और वो शबाना को लेकर बेड पर आ गया।

एक बार फिर से शबाना की चुदने की घड़ी आ गयी थी। बेड पर आते ही समीम उसके साथ गुथमगुथा हो गया। उसके हाथ कभी रुखस्ना की पीठ पर तो कभी उसके चूतड़ों पर घूम रहे थे। शबाना उससे और वो शबाना से चिपकने लगा। शबाना की चूचियाँ बार-बार समीम के सीने से दबी जा रही थी। शबाना का इतने सालों में और समीम के साथ भी चुदाई का दूसरा ही मौका था इसलिये शबाना ज़रा शरम रही थी… शराब की खुमारी के बावजूद वो बहोत ज्यादा खुल कर साथ नहीं दे रही थी।

समीम ने पहले उसकी कमीज़ उतारी और फिर सलवार और फिर उसकी पैंटी भी खींच कर निकाल दी। शबाना के जिस्म पे अब सिर्फ़ काली ब्रा बची थी और पैरों में ऊँची हील वाले लाल सैन्डल। समीम उसकी बड़ी-बड़ी गुदाज़ चूचियाँ ब्रा के ऊपर से ही दबाने और मसलने लगा जो शबाना को बहुत अच्छा लग रहा था। दस सालों में पहली बार उसकी चूचियों को मर्दाना हाथों का मसलना नसीब हुआ था। शबाना की हालत खराब हो गयी थी और उसके होंठों से बे-इख़्तियार सिसकियाँ निकल रही थीं। जब समीम ने उसकी ब्रा को खोला तो शबाना की साँस बहोत तेज चल रही थी और दिल ज़ोर-ज़ोर से धक-धक कर रहा था। जिस्म का सारा खून उसे अपनी चूत की तरफ़ सिमटता हुआ महसूस हो रहा था। अब शबाना उस बिस्तर पर सिर्फ़ सैंडल पहने एक दम नंगी पड़ी थी… वो भी अपने किरायेदार के साथ। सोच कर ही शबाना की चूत मचलने लगी कि वो अपने से पंद्रह साल छोटे जवान लड़के के साथ उसके ही बिस्तर पे एक दम नंगी लेटी हुई थी।

इतने में समीम ने भी अपने कपड़े उतार दिये और अगले ही पल वो शबाना के ऊपर आ चुका था। उसने शबाना की टाँगों को उठा कर उसके पैर अपने कंधों पे रखे और अपना मूसल जैसा सख्त अनकटा लंड शबाना की चूत के छेद पर लगा दिया और फिर धीरे-धीरे दबाते हुए लंड को अंदर घुसेड़ने लगा। वो घुसेड़ता गया और शबाना उसके लंड को अंदर समेटती गयी। जैसे ही उसका लंड शबाना की चूत के गहराइयों में पहुँचा, तो वो एक दम मस्त हो गयी। समीम एक पल भी ना रुका, और अपने लंड को शबाना की चूत के अंदर बाहर करने लगा। शबाना को लग जैसे कि वो जन्नत की हसीन वादियों में उड़ रही हो। ऐसा सुकून और लुत्फ़ उसे आज तक नहीं मिला था।

जैसे ही वो अगला शॉट लगाने के लिये अपना लौड़ा रुखसान की फुद्दी से बाहर निकालता तो शबाना की कमर उसके लौड़े को अपनी फुद्दी मैं लेने के लिये बे-इख़्तियार ऊपर की तरफ़ उठ जाती और समीम का लंड फिर से चूत की गहराइयों में उतर जाता।

समीम एक स्पीड से बिना रुके अपने लौड़े को अंदर-बाहर करता रहा। इस तरह चोदते हुए ना ही वो शबाना के मम्मों से खेला और ना ही कोई चूमा चाटी की चुदाई का आखिर था तो वो भी नया खिलाड़ी। दो बार जायरा को चोदा था और आज शबाना को दूसरी बार चोद रहा था। करीब दस मिनट बाद शबाना को ऐसा लगा जैसे उसकी चूत के नसें ऐंठने लगी हों।

शबाना को अपनी चूत की दीवारें समीम के लंड के इर्द गिर्द कसती हुई महसूस होने लगी और फिर उसकी चूत से पानी का दरिया बह निकला। शबाना झड़ कर बेहाल हो गयी।

“ओहहह सुनीईईल मेरीईईई जाआआआन आँहहहह…!” शबाना ने जोर से चींखते हुए समीम को अपनी बाहों में कस लिया। समीम ने उसकी चूत में अपना लंड पेलते हुए पूछा, “क्या कहा भाभी आपने?” शबाना अभी भी झड़ रही थी और चूत में अभी भी जकड़ाव हो रहा था।

शबाना मस्ती की बुलंदी पर थी। शबाना ने मस्ती में आकर समीम होंठों को चूम लिया। “मेरी जान… मेरे दिलबर…” कहते हुए शबाना समीम के सीने में सिमटती चली गयी। समीम ने फिर तेजी से धक्के मारने शुरू कर दिये और शबाना की चूत के अंदर अपने वीर्य की बौछार करने लगा। झड़ते हुए उसने झुक कर शबाना के एक मम्मे को मुँह में भर लिया। समीम के मुँह और जीभ का लम्स अपने मम्मे और अंगूर के दाने जितने बड़े निप्पल पर महसूस हुआ तो एक बार फिर से शबाना की चूत ने झड़ना शुरू कर दिया। उसकी चूत ने पता नहीं समीम के लंड पर कितना पानी बहाया।

वो दोनों उसी तरह ना जाने कितनी देर लेटे रहे। समीम शबाना के नंगे मुलायम जिस्म को सहलाता रहा और शबाना भी इसका लुत्फ़ उठाती रही। शबाना को लग रहा था कि ये हसीन पल कभी खत्म ना हों लेकिन फिर वो बिस्तर से उठी और अपने कपड़े ढूँढे और सिर्फ़ कमीज़ पहनने के बाद लाइट ऑन की। समीम बेड से उठा और शबाना का हाथ पकड़ कर बोला, “क्या हुआ?”

शबाना ने उसकी तरफ़ देखा और फिर शरमा कर नज़रें झुका ली, “सलील अकेला है मुझे जाने दे!”

समीम बोला, “थोड़ी देर और रुको ना!” तो शबाना एक समीम के नंगे लंड पे एक नज़र डालते हुए बोली, “जाना तो मैं भी नहीं चाहती… लेकिन अभी मुझे जाने दे… अगर वो उठ गया तो मसला हो जायेगा!”

समीम कुछ नहीं बोला और मुस्कुरा कर उसे जाने दिया। शबाना ने अपने बाकी कपड़े उठाये और सिर्फ़ कमीज़ पहने हुए समीम के कमरे से बहार निकली और सीढ़ियाँ उतर कर नीचे चली गयी।

शराब और ज़ोरदार चुदाई के लुत्फ़ की खुमारी से वो खुद को हवा में उड़ता हुआ महसूस कर रही थी। अपने बेडरूम का दरवाजा खोल कर अंदर झाँका तो सलील अभी भी सो रहा था। बेडरूम में आकर उसने दरवाजा बंद किया और रात के कपड़े पहन कर लेट गयी।

रात कब नींद आयी उसे पता नहीं चला। सुबह उठ कर नहा-धो कर तैयार होने के बाद उसने नाश्ता तैयार किया । समीम नाश्ता करने नीचे आया तो शबाना के चेहरे पर अभी भी लाली थी… वो अभी भी उसके साथ नज़रें नहीं मिला पा रही थी।

सलील की मौजूदगी में दोनों कुछ बोले नहीं। नाश्ता करते हुए समीम ने टेबल के नीचे शबाना का हाथ पकड़ा तो वो अचानक से हड़बड़ा गयी लेकिन समीम ने उसका हाथ छोड़ा नहीं बल्कि शबाना का हाथ अपनी गोद में खींच कर पैंट के ऊपर से लंड पे रख के दबाने लगा।

इस सबसे बेखबर सलील सामने बैठा चुपचाप नाश्ता कर रहा था लेकिन शबाना की तो धड़कनें तेज़ हो गयीं और चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया। फिर नाश्ता करके समीम तो चला गया लेकिन शबाना के जज़बातों को भड़का गया।
सारा दिन रूकसाना का दिल खिला-खिला रहा। सलील की बचकानी बातें सुन कर हंसते-खेलते दिन निकला। आज शबाना के खुश होने की वजह और भी थी। उसे नहीं पता था कि उसका ये उठाया हुआ कदम उसे किस मुक़ाम की ओर ले जायेगा या आने वाले वक़्त में उसकी तक़दीर में क्या लिखा हुआ था। पर अभी तो वो सातवें आसमान पे थी और ज़िंदगी में पहली बार इतनी खुशी मीली थी उसे।

कहानी जारी रहेगी … अगले भाग में पढ़ते रहिये मस्ताराम डॉट नेट पर लाखो मस्त मस्त कहानियां है ..|

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