ससुर जी से चुत को करार मिल ही गया -3

अभी तक आपने पढ़ा स्नेहल ने सच कहा था की उनका हथियार मेरे हथियार से कही बड़ा और मजबूत है,उनकी छाती की चौड़ाई भी कमाल की थी ,इस उम्र में भी वो असली मर्द लग रहे थे ,स्नेहल का कोमल शरीर बिस्तर से नीचे घुटनो के बल बैठा हुआ था,बिस्तर की हालत देखकर वो लगता था की कुछ राउंड हो चुके है स्नेहल की पेंटी बिस्तर के एक ओर पड़ी थी

तो ब्रा बिस्तर से नीचे,यानी ये लोग फिर से कारनामा करने वाले थे और स्नेहल कुछ देर पहले ही अपने नंगे जिस्म में ये नाइटी डाली होगी,और दोनो में से किसी का फिर से मूड बन गया होगा मेरे लिए इससे ज्यादा देखना कठिन था आखिर मैं क्या देख रहा था अपनी ही बीवी को अपने ही पिता के साथ ये सब करते ,और मैं क्या कर सकता था मार डालू दोनो को ????? तलाक दे दु ???? क्या करू …… और अब आगे..

मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था और जो भी मुझे समझना था मैं समझ चुका था मैं चुप चाप उठा और सीढ़ी को उसके स्थान में रख जैसे आया था वैसे ही वँहा से निकल गया ,कार को जंगलो की ओर घुमा दिया और एक सुनसान सी जगह में रोक लिया ,नीचे उतरा और जोरो से चिल्लाय
आआआआ मेरे आंखों में आंसू फुट गए ये उस मजबूरी के आंसू थे |

जो मैं इतने दिनों से सह रहा था,मुझे बड़ी जोरो से शराब या सिगरेट की तलब लग रही थी ,ऐसे तो सालो से मैंने इन्हें हाथ भी नही लगाया था लेकिन कालेज के समय की थोड़ी लत अभी भी बाकी थी,मैं सोच में पड़ा हुआ था की क्या करू घने जंगल में यू अंधेरी रात को मैं अकेला कार के बाहर बैठा था ,

लेकिन मेरे दिल में थोड़ा भी डर नही था ,मैं यू ही ना जाने कितने देर यू ही बैठा हुआ था ,की मेरे मोबाइल की रिंग बजी मैं बहुत ही थका हुआ था ,शायद यू ही बैठे हुए मुझे नीद आ चुकी थी ,

स्क्रीन में देखा तो स्नेहल का फोन था अभी 4 बज रहे थे ,यानी पिताजी के उठाने का समय था,वो जरूर उठकर उसे भी अभी उठाये होंगे और रात भर चुदने के बाद अभी वो अपने ……….हमारे कमरे में गई होगी ..

हलो अपने काल किया था मैं सो गई थी

मादरचोद फोन रख

मैं एक स्वाभाविक से अंदाज में बोला

हैल्लो हैल्लो ..क्या क्या कहा अपने शायद स्नेहल को भी ये कभी यकीन नही होता की मैं ऐसा भी कुछ बोल सकता हु

‘मैंने कहा मादरचोद फोन रख

थोड़ी देर को एक शांति फैल गई

क्या हुआ आपको

वो धीरे से बोली

समझ नही आता क्या बोल रहा हु ,”

आप ठीक तो हो ना

तेरी मा की चुद साली रंडी तुझे क्या मतलब की मैं ठीक हु या नही हु फोन रख

और मैंने फोन रख दिया ,उसके बाद मेरे मोबाइल में लगभग 50 बार ही स्नेहल का फोन आया लेकिन मैंने नही उठाया ,मैं गाड़ी चलता जंगल के और भी अंदर चला गया जंहा पर मुझे आदिवासियों का निवास मिल गया ,

मैं उन जगहों से बहुत ही परिचित था ,लगभग 5 बज चुके थे और मेरे लिए यहां दारू मिलना बहुत ही सरल था ,वो लोग खुद ही दारू बनाया करते थे,लेकिन वो किसी भी अनजाने व्यक्ति को तो देंगे नही मैं सोचने लगा की आखिर क्या किया जाय,तभी एक लड़का मेरी ही उम्र का मेरे पास अपनी गाड़ी रोकता है,वो एक बुलेट में था ,

कुछ ढूंढ रहे हो वो एक नार्मल शहर का आदमी लग रहा था

हाँ दारू चाहिए थी

वो हँसने लगा

10 बजे देशी मिल जाएगी अंग्रेजी के लिए तो 30 किलोमीटर दूर के कस्बे में जाना होगा

ना ही देशी चाहिए ना विदेशी यहां आदिवासी का बनाया हुआ भी मिल सकता है

वो मुझे घूरने लगा

जंगल के इतने अंदर सिर्फ दारू पीने तो कोई नही आता यार और शक्ल से तो तुम बेवड़े भी नही लग रहे हो वो फिर से हँसने लगा और उसकी बात सुनकर मेरे होठो में भी एक फीकी मुस्कान आ गई मैं कुछ भी नही बोला लेकिन थोड़ी चुप्पी के बस वो बोल पड़ा

अच्छा चलो यहां का मुखिया मेरे पहचान का है ,उसके घर चलते है,कुछ पैसे है

मैंने हा में सर हिलाया

ऐसे 2-3 सौ की दारू भी बहुत हो जाएगी ,शुध्द देसी घर में बनाया हुआ मजा आ जाएगा ,”

मैं उसके साथ चला गया,मुखिया कहने का ही मुखिया था,गिनकर 10-15 घर का गांव होता है जंगलो में ,शहरी को देखकर या तो वो बहुत ही आवभगत करते है या दूर से ही नमस्कार कर देते है,पास भी नही फटकते ,वो मुखिया उसके पहचान का था वो उसने हमारी बहुत खातिरदारी की ,वो हमे एक दूसरे घर में ले गया जो की एक झोपडा ही था ,

महुए की भीनी भीनी गंध मेरे नाक में जाने लगी थी बिल्कुल ताजा अभी अभी बना हुआ महुआ की शराब ,मेरे दिल ने वाह कहा ,उसने 2-3 लीटर लेकर हमारे सामने रख दिया ,वो उससे ही कुछ एक अलग भाषा में बात करने लगा ,

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इसके साथ कुछ और लोगे

सिगरेट मिल जाय तो

यार तुम भी यहां कहा की सिगरेट ,मेरा मतलब था की देशी मुर्गा वगैरह मैंने हा में सर हिलाया वो उससे कुछ बात करके मेरे पास ही बैठ गया ,
मेरा नाम संजय है और तुम्हारा

मैं नरेश

कहा से ?”

वो अपनी जेब से मुस्कुराते हुए सिगरेट निकाला ,मैंने उसे घूरा तो वो मुस्करा दिया

इमरजेंसी के लिए बचा कर रखी थी ,लग रहा है यही इमरजेंसी है”वो मुस्कुराया

मैंने उसे अपने शहर का नाम बताया वो भी वही काम करता था और यहां पास के ही गांव का रहने वाला था,यंहा कुछ काम से जा रहा था की दारू पीने के चस्के में यहां चला आया था ,जाम बनते गए और उससे मेरी दोस्ती बढ़ती गई ,हमने मिलकर 1.5 लीटर खत्म कर दिया था और अब उठने की हालत भी नही थी ,

यार नरेश तू अगर यहां रुकना चाहे हो रुक जा ,मुखिया को मैं बोल दूंगा की तुझे जो चाहिए वो लेकर दे दे

जाम अब भी जारी था ,मैंने भी हामी भर दी ,मुझे यहां आये लगभग 1 घंटे हो चुके थे ,स्नेहल ने फोन करना बंद कर दिया था और मैं भी बहुत रिलेक्स फील कर रहा था ,मैं पूरी तरह से टाइट था,तभी मेरा फोन फिर से बजा स्क्रीन में देखने की कोशिस को तो पिताजी का फोन था ,मैंने उसे कान से लगाया ..

हैल्लो

नालायक कहा है तू बहु इतना फोन लगा रही है,”मुझे रात की सभी बात याद आ गई

चुप कर साले बुड्ढे ,मादर… मैं फोन रख दिया ,उसके बाद मेरे पास कोई भी फोन नही आया था ,ना जाने ये हिम्मत कहा से आ गई ये दारू का नशा था या स्नेहल की बेवफाई का

ये किसके ऊपर गुस्सा निकाल रहे हो ,”

मेरे कुछ देर पहले ही बने हुए दोस्त जो की अब मेरा अजीज हो चुका था की बात पर मेरा ध्यान गया ,

मेरा बाप था

मैंने थोड़े बुझे हुए स्वर में कहा,ऐसे तो नशा अपने सुरूर में था लेकिन फिर भी सालो से जिस आदमी के सामने दबते हुए आ रहा था उससे ऐसी बात करना ….थोड़ा तो मैं सम्हाल ही गया ..

बाप से कोई ऐसे बात करता है वो हैरान था

जब बाप ऐसा हो तो ऐसे ही बात करना चाहिए मेरी आवाज में एक गुस्सा था जिसे शायद संजय में भांप लिया था ..

ऐसा क्या हो गया उसने ऐसे जोर दिया जैसे की वो मेरे लिए कुछ कर सकता है ,ऐसे भी जो आदमी ऐसी जगह में मुझे दारू पिलाये उसके लिए तो दिल में एक भाईचारा उमड़ ही जाता है,मैंने शुरुवात की ,दारू खत्म हो चुकी थी,चिकन खत्म हो चुका था और मुखिया ने और शराब ला दी थी ,मेरी बात चलती रही वो ध्यान से सुनता रहा जैसे हम दोनो ही नशे में नही है हम गंभीरता से बात कर रहे थे ,मेरी जुबान तो लड़खड़ा रही थी लेकिन मैं गंदी गंदी गालिया बोलने में कोई भी हिचक नही दिखा रहा था,

ओह ऐसे बाप को तो मार ही देना चाहिए

संजय की बात से मैं थोड़ा दंग रह गया

और नही तो क्या मुझे नही लगता की लड़की की कोई गलती है,वो तो बेचारी …तुम अपने बाप को कुछ कहते नही और वो बेचारी ठहरी गांव की सीधी साधी लड़की ,तेरे बाप के आने से पहले तो वो कितनी शर्मीली थी फिर उसे क्या हो गया ,सब उसकी ही करामात है वो ही छेड़ता हो गया और उसके दबाव में आकर ही वो बेचारी ये सब कर रही है…”

संजय एक अनजान शख्स मेरे परिवार के बारे में कैसे फैसला कर सकता है ,लेकिन उसकी बात भी सही थी ,

लेकिन …”

लेकिन क्या देखो मैं तो अनजान हु और मुझे तुम्हारे परिवार से क्या लेकिन तुमने जितना बताया है उससे तो यही लगता है,”
संजय मुझे बहुत ही अपना सा लग रहा था ….

लेकिन अब मैं क्या करू मैं एक अनजान शख्स से पूछ रहा था की मुझे क्या करना चाहिए ..

यंहा रहो और अपने घर पर नजर रखो ,देखो समझो की आखिर कौन गलत है अगर तुम्हारी बीवी गलत है वो उसे तलाक दो ,तुम्हारा बाप गलत है तो उसे सजा दो की वो याद रखे,मर्द बनो यार ,”

‘और दोनो ही गलत हुए तो ,जैसा की मुझे लगता है

उसके चहरे में हँसी आ गई,वो अपना हाथ पीछे कर कुछ निकालता है,वो एक रिवाल्वर था ,जिसे देख कर मेरे होशं ही गुम हो गए ,

तो ये लो दोनो को ही ठोक दो ,तुम तो यहां हो ही नही ,और बाकी की फिक्र मत करो ,मार कर अपने काम में निकल जाना किसी को कुछ भी पता नही लगेगा,बाकी मेरा नंबर रख लो मैं सब सम्हाल लूंगा

तुम पागल हो गए हो

मेरी आंखे फट गई ,भले ही मैं नशे में था लेकिन इतना भी तो नही था की अपने बीवी और पिता को मार दु ..

हा हा तो और क्या कर सकते हो ,तुम्हारी बीवी की गुलाबी चुद में कोई अपना तगड़ा सा लौड़ा घुसा रहा है और तुम हाथ में हाथ धरे बैठे रहोगे
उसकी बातो में व्यंग था एक अजीब सा व्यंग ,उसकी मुस्कुराहट मेरे जेहन में बस गई जैसे वो मुझे चिढ़ा रहा हो

चुप रहो वरना तुम्हे ही मार दूंगा मैं जोरो से चिल्लाया और वो जोरो से हंसा

मर्द बन जाकर अपनी पत्नी को सम्हाल और अपने बाप से लड़ ,मुझे मार के क्या मिलेगा

मैं गुस्से को पी गया था ,वो उठा और जाने लगा

यही रुक जा ,जो चाहिए होगा वो मिल जाएगा ,शाम को निकल जाना जासूसी करने

वो ये कहता हुआ निकल गया और में आखिरी घुट पीता हुआ बस सोच में डूबा रहा ……….

शाररिक और मानसिक थकान ने मुझे गहरी नींद में धकेल दिया था ,जब उठा तो सर बहुत ही भारी था,शाम के 5 बज रहे थे ,मुखिया जी ने बहुत सेवा की मैं तैयार होकर संजय की बातो के बारे में सोचने लगा ,और अपनी कर उठाकर फिर से जासूसी करने निकल गया ,8 बज चुके थे और घना अंधेरा छाया हुआ था ,मैं फिर से उसी तरह कूदकर अंदर गया,आज मेरे कमरे की बत्ती भी जल रही थी ,

शायद वो दोनो अभी हाल में होंगे क्योकि सोने का समय तो हुआ नही था ,या मेरी बात को उन्होंने थोड़ा गंभीरता से लिया हैऔर सतर्क हो गए है,मैं धीरे से पिछले दरवाजे को खोलता हुआ अंदर गया ,वो अभी खाने की टेबल पर बैठे थे ,दोनो ही शांति से खाना खा रहे थे,

उनका खाना खत्म होते ही पिताजी ने स्नेहल को इशारा किया और वो सर झुकाए खड़ी रही ,

क्या हुआ रे रंडी चल आजा मेरे कमरे में इतना बोलकर वो चले गए ,मेरे खून में थोड़ा उबाल आया मैं उनके सामने जाकर स्नेहल को बचाना चाहता था लेकिन मैं रुक कर देखने लगा मैं देखना चाहता था स्नेहल का रिएक्शन ,वो हल्के से हा में गर्दन हिला कर बर्तनों को समेटने लगी ,पिताजी अपने कमरे में जा चुके थे ,

मुझे स्नेहल की सिसकिया सुनाई दे रही थी ,मेरे दिल में स्नेहल के लिए एक सहानुभूति का भाव जाग गया,.और मैं उसे जाकर जकड़ लेना चाहता था लेकिन मैं रुक गया ,आखिर कैसे मैं कहता की मैं तुम्हे छिपकर देख रहा था

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