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Mastram Ki Hindi Sex Stories | Mastaram Ki Antarvasna Stories | मस्ताराम की हिंदी सेक्स कहानियां

रात दिन एसा काम कौन नहीं कर सकता है !

गतांग से आगे ….

कमली के मनाते-मनाते रुचिका की बारीक फांक में मेरे लौड़े का मुंड फिर धंस चला. तेल से मुहाने में तो चिकनाई आ गई थी ,लेकिन आगे फिर घाटी इतनी संकरी थी कि लौड़ा फंस रहा था. मुन्डी की गांठ के धक्के से फिर रुचिका सिसकियां भर रही थी -” हाय.., अब कैसे होगा रे. मै डरती हूं कि कैसे संभलूंगी | इस कहानी का शीर्षक रात दिन एसा काम कौन नहीं कर सकता है और आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है |

मैने झुकी हुई कमली की छाती के एक स्तन को थामा और उसके पुट्ठे पर चिकोटी काटी. वह समझ गई थी.उसने मेरे लौड़े और रुचिका की चूत के ढक्कन यानी घुंघराली मुलायम झांटों के बीच के ओठों को अपनी उंगली से फैलाते तेल की पतली धार से चूत और लौड़े खूब नहला दिया. मैने अपनी उंगलियों में लौड़े की गांठ को थाम हौले-हौले रुचिका की चूत की सुरंग के मुहाने की सैर कराई और फिर अपने पुट्ठे ऊपर उठाते जोर की ठोकर मार घप्प से एक बार मे ही पूरी लम्बाई में लौड़े को ऐसा पेला कि रुचिका की चूत उसे -“आह मर गई रे मार डाला” कहती निगल गई |

इस बार रुचिका पर रिएक्शन यह हुआ कि मुझसे मुझे हटाने की जगह वह नाजुक लता की तरह और कसकर मुझसे लिपटकर जकझोरने लगी |

हमने कमली को इशारा किया कि वह अब चली जाए, लेकिन वह -“देखने दो प्लीज़” कहती खड़ी रही |

रुचिका को बाहों मे लिपटाये चूमते मैने उसकी चुदाई शुरू कर दी. शुरू-शुरू में लौड़ा इतनी नजाकत के साथ पूरे का पूरा इस तरह हौले-हौले बाहर आकर चूत को अंदर तक ठेलता रहा कि हर स्ट्रोक की गुदगुदी के साथ एक-दूसरे की आंखों में झांकते, होठों से होंठों को निगलते |

हम दोनों एक- दूसरे से- ” आह कितना अच्छा लग रहा है”,… | और ये लो”,.. | और दो”,… “आह प्यारे तुम कितने अच्छे हो”,. | .मेरी प्यारी स्वाती तुम्हरी चूत का जवाब नहीं,”… | आह तुम्हारी हिरनी जैसी आंखें ..इन्हें जी भर देखने दो रानी”.. | आह मेरे प्यारे आज चूस डालो मुझको”… | अब छोड़ो मत राजा..चोदते रहो..चोदते रहो”. कहते चुदाई के एक-एक पल के साथ स्वर्ग की सैर करते रहे |

कभी रुचिका मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में थामकर प्यार से चूमती जाती,.. कभी मेरी हथेलियों मे उंगलियों से उंगलियां फंसाये प्यार में पंजे लड़ाती,..कभी मेरी आंखों, माथे या कानों को होठों में लपक लेती और कभी कसकर मेरे चेहरे को अपने कपोलों से चिपटाकर जकड़ लेती |

मैने भी बीच-बीच में रुचिका की चूत के रस मे नहाए अपने लंड को बाहर निकालकर बड़े प्यार से एक-एक करके उसके तने हुए स्तनों की,उनपर सजे भूरे-भूरे अंगूरों की,खूबसूरत काली आंखों और पलकों की, माथे और उसपर खेलती जुल्फ़ों की,धारदार पतली नाक और रसीले ओठों की, कमर की संकरी घाटी और उसके बीच खुदी नन्ही बावली की, पतले-पतले हाथों, कलाइयों और बाहों की, च्किनी जांघों और लम्बी टांगों की सैर कराई. हर स्पाट पर कभी मुट्ठी में जकड़कर चाटते हुए और कभी प्यार से उंगलियों को फिराते हुए, और कभी होठों से चूम-चूम कर बड़ी दीवानगी के साथ सारे अंगों से वह अप्नने प्यारे दोस्त को इन्ट्रोड्यूस कराती रही.जब चूत रानी बौखलाकर आवाज देने लगती तो “राजा चलो अब अंदर ना प्लीज़.वो अकेली तरस रही है” कहती अपने प्यारे लंड यार को रुचिका फिर से उसकी चिकनी कलाई थामकर संकरी घाटी की सुरंग में ठेल देती थी |

एक किनारे लार टपकती नज़रों से बिस्तर को ताकती कमली ” हाय..हाय अब मैं कहां जाऊं.. इस अपनी प्यासी चूत का क्या कर डालूं. | कहती छातियों को मसलती भूरी झांटों में रिसती चूत को अपनी उंगलियों से कुरेद रही थी.मेरा दिल आवाज दे-दे कर मुझे पुकारती कमली की रिसी जा रही चूत पर पसीजा पड़ रहा था.जी करता था कि सुपरफ़ास्ट की स्पीड से रुचिका की सुरंग में पिस्टन की तरह धंसकर तेज रफ़्तार से भागते लौड़े पर ब्रेक दूं और कमली की भाफ छोड़ती तैयार इंजन पर चढ़ बैठूं पर वह मुमकिन नहीं था क्यों कि रुचिका जल्दी से जल्दी अपने मुकाम पर पहुंचने के मूड में आ गई थी. उसके नितंब नीचे से ऊपर उछल-उछल कर लम्बू मियां को टक्कर दे रहे थे |

नसों में खून तेजी से दौड़ने लगा था और लगातार आगे बढ़ते लंबूजी के हर स्ट्रोक के साथ दिल की धड़कनें बढ़ रही थीं.ऊपर से मैं और नीचे से रुचिका दोनों ही एक दूसरे को धक्का देते जोरदार टक्कर में भिड़ रहे थे. दोनों की सांसें तेज हो रही थीं.सांसों की रफ़्तार के साथ-साथ मेर तन्नाया लौड़ा और रुचिका की भाफ़ छोड़ती गरमाई हुई चूत जोश में आ-आकर दीवानगी मे खूब तेजी के साथ “घपाघप-…चपाचप-…भकाभक-…छपाछप” की आवाज में न समेटी जा रही खुशी को उजागर किये जा रहे थे |

रुचिका और मेरे होठों पर यह जोश ” आह मै कितनी खुश हूं मैं आज”….. | मारो,मेरे राजा ठोंक डालो जमकर इसे”…. | चोदो”…. | चोदे जाओ”…. | और जोर से”…. | वाह क्या जोरदार स्ट्रोक है”………. | शाब्बास…आह”…. | फाड़ डालो”….. | हाय-आ…आय, रे”.. | हाअ..य्य.ये. …..कितना प्यारा जोड़ा है हमारा”… | आह मेरे प्यारे. | …कितना जोरदार फ़िट है..एकदम टाइट”…. | उड़ा डालो अपनी इस लाड़ली चूत के चिथड़े आज राजा”… | लो मेरी प्यारी सम्भालो इसे”.. | लो और जोर से”… | वाह प्यारी चूतरानी…..कितनी कोमाल हो तुम” “रानी…..मेरे लौड़े को तुमने दीवाना बना डाला प्यारी“…. | लो प्यारी…लीलती जाओ आज”.. | शाब्बास, लो राजा,.. ये मेरी तरफ़ से लो अब.. | की लगातार तेज होती आवाज़ में बदहवाश हो रहा था |

आखिर वो पल आया जब मेरा लौड़ा ऐसी तेजी से रुचिका की चूत पर टूटा कि हाथ से मेरे गुस्साये लौड़े को थामकर रोकती वह चीखने लगी.. | बस करो….बस करो प्लीज़….रोको,..रोको ना, नहीं तो मै मर जाऊंगी…मर गई रे …फाड़ डला आज तो….बस करो प्लीज़. | मेरी प्यारी श्यामा की नाजुक छरहरी देह लौड़े की चोट से बदहवाश होती लहरा-लहराकर हिल रही थी और मुझे रोकने वह उठ-उठकर बैठी पड़ रही थी |

ठीक इसी वक्त अपनी साड़ी-चोली एक तरफ फेंककर कमली रानी भी झपटकर रुचिका और मुझपर सवार हो गई थी. कभी रुचिका और कभी मेरे बदन को चूमती जाती कमली बड़बड़ाती हुई न जाने क्या-क्या बातें किये जा रही थी |

कभी रुचिका के कपोलों को थपथपाती उसपर अपने गाल सटाये वह बुदबुदाती-” हाय मेरी नाजुक छड़ी…चुद गई रे आज.. | .. | हाय-हाय कैसा कसकर चोदा है रे निरदयी ने…बिलकुल फाड़ डाला रे मेरी सांवली सखी की कोमल चूत को. | … | हाय मेरी छ्बीली…तूने तो चूत में तो कभी उंगली भी घुसने ना दी मेरी कली, आज इत्ता बड़ा लौड़ा कैसे निगला होगा मेरी बन्नो”… | हाय री स्वाती कैसा लगा रह होगा री तुझको भला आज की इस भयंकर चोदवाई मे | … | हाय-हाय,.. काश मै तेरी जगह चुदवा लेती री..तेरी चूत तो छितरा-छितरा डली रे आज इस जबरदस्त लौड़े ने”.. | आह..आह मेरी सांवरी…काश चुदने से पहले मेरी चूत और तेरी चूत भी टकरा-टकरा कर गले मिल लेते मेरी सखी | … “हाय रानी,..अब तू उठ भर जा फिर मेरी चूत तेरी चूत को रगड़ेगी जरूर”.. “मै तो तरस कर रह गई रे. |
कमली वह सब कहती जाती और कभी अपनी शानदार छातियों को मेरी पीठ पर चिपका कर मसलती मुझसे कहती- ” छोड़ दो..अब मेरी स्वाती को.. छोड़ दो मेरे राजा. उसकी नाजुक देह को छोड़ दो प्यारे. खूब मसल डाला रे मेरी नाजुक कली को…छोड़ दो ना अब छोड़ भी दो…जरा तो सोचो कि छोटी सी सूराख का तुम्हारे लंड ने क्या बुरा हाल कर दिया होगा. |
मैने रुचिका का कंधा अपने हाथों से कसकर दबा रखा था ताकि चुदाई की आखिरी चोटों से घबराकर वह कोई गड़बड़ न कर बैठे. प्यारी रुचिका की नाज़ुक टांगें मेरे कन्धे पर चढ़ी थीं. उसकी चूत की फांक खुल चली थी और रस से भीग रही थी फिर भी संकरी और टाइट थी. इस वक्त लौड़ा अच्छी दूरी तक पीछे जाता और फिर बाहर से पक्का निशाना साधकर रुचिका की चूत पर टूट्ता पूरी गहराई को माप रहा था | इस कहानी का शीर्षक रात दिन एसा काम कौन नहीं कर सकता है और आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है |  टक्कर ऐसी तूफानी चाल से हो रही थी कि चूत और लौड़े के साथ जांघों के अन्दरूनी पठार भी “चटाचट” और “छ्पाक-छपाक” की आवाज करते टकरा रहे थे. चूत की संकरी सुराख मे लंड के घुसते-निकलते “फ़ुक्क-फुक्क” की आवाज़ बनती और उसके साथ ही पठार टकराकर “चटाक-छपाक” करके चीखते थे |

उधर कमली बड़बड़ा रही थी और अपनी “हाय-हाय” करती सखी को मुझसे अलग करने के चक्कर में थी और इधर उसकी ओर से बेखबार रुचिका और मै चुदवाते और चोदते हिमालय की चोटियों की तरफ बढ़ रहे थे.रुचिका और मेरी छातियों के बीच आड़ी होकर कमली चित्त पड़ी थी. रुचिका की चूत “मार डाला रे” की धुन में चीखती हुई भी अपने को सिकोड़ती और फैलाती खूब मजे ले रही थी. रुचिका आहें भरती ” चोदो राजा” .. | और जोर से आह”. | फाड़ डालो आज मेरी चूत” कहती लौड़े के हर वार को लपक-लपक कर झेलती जा रही थी, लेकिन कमली के चढ़ जाने से उसका चेहरा छिप गया था.मेरा झुका मुंह इसीलिये अब कमली के चेहरे से चिपका होठों से भिड़ने लगा था. एक तरफ़ रुचिका की कड़क चूत थी तो दूसरी तरफ कमली की गदराई छातियां और रसीले होठ थे. दोनों मिलकर मुझे दीवाना किये जा रहे थे.मेरे पांव का अंगूठा कमली की खुली चूत से खेलने लगा था. रुचिका बोल रही थी- “धीरे राजा…तुम्हारी चुदाई की जबरदस्त चोट से तो मेरी जान निकली जा रही है |

“सह लो मेरी प्यारी छ्बीली.ऐसी प्यारी चोट के लिये फिर तुम तरस जाओगी और मै भी ऐसी प्यारी चूत कहं पाऊंगा”… |

बस मेरी रानी,…मेरी प्यारी स्वाती…बस ये आखरी झटका” . | बस ये लो”… | लेती जाओ मेरी रानी | . | लो बस ये हो गया” कहता मेल ट्रेन की तेजी से”फकाफक…फकाफक” चोदता मैं उसे उस स्टेशन तक ले आया जहां बिजली की सनसनी से मेरा प्रचन्ड लौड़ा और रुचिका की रसीली चूत दोनों थरथराने लगे. दोनो के दोनो आपस में कसकर लिपटे हुए एक-एक कर बरसती फुहारों से नहा-नहा कर भीग गये. इन फुहारों के समय रुचिका और मैं आपस मे लिपटकर एक-देह और एक-प्राण हो गये थे. हम दोनों को पता नहीं चला कि हम उस वक्त कहां गुम हो गये थे.

बहुत देर तक हम तीनों आपस में चिपके हुए बेहोश पड़े रहे. जब अलग हुए तो कमली रुचिका पर मेरे समने ही चढ़ बैठी और चूम-चूमकर उसे उसकी चुदाई की हिम्मत और स्टेमिना के लिये बधाई देने लगी.

कमली ने मेरी तरफ नज़र फ़ेंकी और कहा कि “राजाजी, जाइयो मत अभी.अपना वादा याद करो. अब मेरी बारी है | रुचिका से वह बोली कि तुम बुरा मत मानन मेरी रानी. चुदवाने मे जितना मजा है उससे कम मजा इसके देखने में नहीं है.

रुचिका ने शर्त रखी कि प्यारे, इसका दिल मत तोड़ो, लेकिन आज दिन और रात अब आप को यहीं रहना है. मेरी चूत की प्यास आप ने भड़का दी है. चूत फट ही गई तो डर कैसा. देखूं कि दिन और रात चोदने और चुदवाने की टक्कर में बाजी कौन जीतता है |

रात दिन एसा काम कौन नहीं कर सकता है ?

इसी वक्त कमली उठी और वहां पहुंची जहां मै अपने ट्राउज़र को पहनता खड़ा था. इससे पहले कि मै कुछ समझ पाता वह मेरे पांव के पास घुटनों के बल बैठ गई. झपटकर ट्राउज़र को एक ओर फेंका और अपनी मुट्ठी को मुट्ठी में घेर कमली रानी ने मेरे लौड़े की मुन्डी को होठों के बीच निगल लिया.मेरा संकोच अब टूट गया.कमली का चुस्त बदन, उसके रसभरे होठ, और नुकीली चूचियों वाले कोमल पहाड़ो से गुजरता हुआ मैं जल्द से जल्द उसकी गुलाबी चूत से खेलना चाहता था, जो मेरी टक्कर की थी.
रुचिका ने देखा. अंदर जाती-जाती वह बोली कि अभी शुरू मत करना तुम लोग. मै भी आ रही हूं. अकेले-अकेले नहीं,..तीनों मिलकर खेलेंगे तो मजा आएगा.

दोस्तों आगे की कहानी जल्द ही प्रेषित करूँगा मेरी अगली कहानी का शीर्षक होगा ” बिना रुके दिन और रात दनादन, भकाभक ” दोस्तों मेरे इस भाग को पढ़ना ना भूले बहुत मज़ा आयेगा कुछ भाई बहनों के तो अपने आप बिना सहलाये ही गिर जायेगा |

दोस्तों कहानी कैसी लगी अपने विचार निचे कमेंट बॉक्स में जरुर लिखे …|

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