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सरिता आंटी का कैसे बनी रंडवा

मेरा नाम राधे यादव है और मैं पिछले कई महीनो से मस्तराम की सेक्स कहानिया पढता आ रहा हूँ. अपना और ओरों का दिल भी बहलाता हुआ आ रहा हूँ | मैं आज अपनी एक रिश्तदार में लगने वाली सरिता आंटी की कहानी बताने जा रहा हूँ जिनपर मैं पहली बार में ही अपना दिल खो बैठा था |

उन आंटी का अक्सर मेरे घर आना जाना लगा रहता था क्यूंकि वो मेरी माँ की अच्छी ही दोस्त थी | आंटी कभी – कभार अपनी तिरछी नज़रों से मुझे देखकर घास भी डाल दिया करती थी | इसमें कोई हैरानी की बात नहीं क्यूंकि मुश्किल से आंटी मुझसे २ साल भी बड़ी होंगी |

आंटी का पति अक्सर घर के बहार ही किसी ना किसी काम से लगा रहता था जिससे मैं भी सरिता आंटी से कभी मौका पाकर हलकी – फुल्की बात कर लिया करता |

एक दिन मैंने सरिता आंटी को अपने घर के बहार झाड़ू लगते देखा उन्होंने उस वक्त मैक्सी पहनी हुई थी और अंदर ब्रा भी नहीं पहना हुआ था जिसके कारण जब वो झुकी ही हुई थी मुझे उनके तरबूज जैसे लटकते हुए चुचे साफ़ दिखाई दे रहे थे |

मैं वहीँ खड़े होकर बस आंटी के चुचों पर नज़र गडाये खड़ा था तभी आंटी एकदम से उप्पर उठी और उन्होंने मुझे देख लिया | मैं कुछ कहने लायक ना था बस अपना मुंह नीचे किये खड़ा था | तभी आंटी मेरे पास आई और बोली,

आंटी – क्यूँ रे छोरे . . बड़ी जवानी फुट रही है . . !!

अब मेरे लंड नीचे से खड़ा हो रहा था और उसका साफ़ उभरा हुआ उभार मेरी पैंट पर दिखाई दे रहा था | आंटी ने पहले घूर के मेरे लंड को देखा और तभी कहा,

आंटी – क्यूँ . .पानी नहीं पिएगा . ??

मैं कुछ ना कह सका और आंटी के साथ चुप – चाप उनके घर के अंदर चल पड़ा | आंटी ने तभी मुझे अपने अंदर वाले कमरे में ले जाते हुए बोली,

आंटी – उम्र कितनी है रे तेरी . .?

मैं – 24 साल . .(मुस्कुराते हुए)

तभी आंटी ने मेरे लंड को चड्डी के उप्पर से ही पकड़ते हुए कहा,

आंटी – इसीलिए सोचूं . . एक बार में ही मुझे क्यूँ भा गया ! !

मैं आंटी से हाथों से स्पर्श से अपने अंदर उठ रहीं जलन देने वाली आग को ना रोक सका और अपना एक हाथ को उनके चुचों पर रखते हुए उनसे लिपट कर हांफने लगा | मेरी लंबी सांसें कुछ अंदर चल रहे डर की वजह से हो रही थी तभी आंटी ने मुंह आगे बढ़ाते हुए मेरे होटों पर चूम उठीं | आप यह कहानी मस्तराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है l

अब बस वही पल काफी था मरे अंदर के अश्लील शेर को जगाने के लिए | मैंने सरिता आंटी को पीछे से अपने बाहों में भींच लिया मेरा लंड उनकी गांड के उभार को चूमने लगा | मैंने आंटी के पूरी साडी को एक बार में खोल दिया और किसी कुत्ते की तरह अपने लंड को उनके गांड के पीछे लिपटकर चोदने का भाव लेने लगा | आंटी ने मुझे अंदर लेजाकर अपने सोफा पर बिठा दिया और खुद भी वहीँ पर लेट गयी |

मैंने अब आंटी के उन मोटे गुदगुदे चुचों को भर – भर के दबा के चूसा और कुछ देर बाद मैंने अब अपना निशाना कहीं और साधना शुरू किया | आंटी केवल अब अपनी पैंटी में रह गयीं थी जिसे मैंने निकालते हुए उनके गुलाबी चुत में अपनी उँगलियों को अन्दर – बाहर करना शुरू कर दिया |

कहानी जारी है ….. आगे की कहानी पढने के लिए निचे लिखे पेज नंबर पर क्लिक करे …..

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