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चूत को करार मिल ही गया भाग – 3

आज मै चूत को करार मिल ही गया का तीसरा भाग लिख रही हूँ आशा करती हूँ मेरी पिछली कहानियो का की तरह यह कहानी भी पढ़ कर मज़ा ले रहे होंगे अगर आप लोगो ने इस कहानी का पिछला भाग नहीं पढ़ा तो यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते है चूत को करार मिल ही गया भाग – 1 चूत को करार मिल ही गया भाग – 2  और अब आगे की कहानी पढ़िए

शाम को किसी ने गेट के सामने हॉर्न बजाया तो शबाना ने सोचा कि ये कौन है जो उनके घर गाड़ी ले कर आया। जब उसने बाहर जाकर गेट खोला तो देखा कि बाहर समीम बाइक पर बैठा था। वो शबाना की तरफ़ देख कर मुस्कुराया और उसने बाइक गेट के अंदर ला कर स्टैंड पर लगा दी। फिर दोनों घर के अंदर दाखिल हुए और शबाना अभी कुंडी लगा ही रही थी कि समीम ने उसे पीछे से बाहों में दबोच लिया। “आहहह हाय अल्लाह क्या करते हो कोई देख लेगा….!” शबाना कसमसाते हुए बोली।

“कौन देखेगा भाभी हमें यहाँ..?” समीम ने उससे अलग होते हुए कहा।

“सलील है ना घर पर…!” शबाना ने कहा तो समीम बोला, “उसे क्या समझ वो तो बच्चा है…!”

“नहीं मुझे डर लगता है… कुछ गड़बड़ ना हो जाये!” शबाना बोली।

“अच्छा रात को तो आओगी ना… ऊपर मेरे कमरे में..!” समीम ने पूछा तो शबाना ने मुस्कुराते हुए गर्दन हिला कर आँखों के इशारे से रज़ामंदी बता दी। फिर उसने समीम से पूछा कि “ये बाइक किसकी है?” तो समीम ने कहा, “मेरी है… आज ही खरीदी है… नयी है!”

“हाँ वो तो देख ही रही हूँ!” शबाना बोली। उसने देखा कि समीम ने हाथ में खाने का पैकेट पकड़ा हुआ था जो वो ढाब्बे से लेकर आया था। “अब मैं ठीक हूँ समीम… घर पर बना लेती… इसकी क्या जरूरत थी!” शबाना ने समीम के हाथों से खाने के पैकेट लेते हुए कहा तो समीम शरारत भरे अंदाज़ में बोला, “आप बना तो लेती… पर मैं आपको काम करके थकाना नहीं चाहता था… रात को आपको काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी..!” ये सुनते ही शबाना के गाल शरम से लाल होकर दहकने लगे। समीम ने दूसरे हाथ में एक और बैग पकड़ा हुआ था। उसने शबाना को दिखाया कि उसमें एक पैकेट में खूब सारी गुलाब के फूलों की पंखुड़ियाँ और चमेली के फूल थे।

उसी बैग में रॉयल स्टैग व्हिस्की की एक बोतल भी थी। शबाना ने सवालिया नज़रों से देखते हुए पूछा तो समीम बड़े प्यारे अंदाज़ में बोला, “भाभी ये सब तो आज की रात आपके लिये खास बनाने के लिये है… आओगी ना आप?” अब तो शबाना ऐसे शर्मा गयी जैसे नयी नवेली दुल्हन हो। वो अपने होंठ दाँतों मे दबा कर दौड़ती हुई किचन में चली गयी। सलील टीवी पर कॉर्टून देख रहा था।

समीम सीधा ऊपर अपने कमरे में चला गया। वो तीन-चार घंटे ऊपर ही रहा और रात के करीब नौ बजे वो नीचे आया तो शबाना ने खाना गरम करके टेबल पर लगाया। समीम सलील के साथ वाली कुर्सी पर बैठा था। “आज बड़ी देर कर दी नीचे आने में…!” शबाना समीम की ओर देखते हुए मुस्कुरायी तो समीम आँख मारते हुए बोला, “वो रात को जागना है तो सोचा कि कुछ देर सो लेता हूँ!”

फिर कुछ खास बात नहीं हुई। समीम खाना खा कर ऊपर चला गया। शबाना सलील के साथ अपने बेडरूम में आकर सलील के साथ लेट गयी। सलील थोड़ी देर मैं ही सो गहरी नींद सो गया। उसके बाद शबाना उठ कर बाथरूम में गयी और उस दिन वो ये तीसरी बार नहा रही थी। समीम ने रात के लिये काफ़ी तैयारी की थी तो शबाना भी अपनी तरफ़ से कोई कमी नहीं रखना चाहती थी।

वो भी आज रात को होने वाली चुदाई को लेकर काफ़ी इक्साइटिड थी। नहाने के बाद उसने पूरे जिस्म पे पर्फ्यूम छिड़का। उसकी चूत और जिस्म तो पहले ही बिल्कुल मुलायम और चिकने थे… एक रोंआँ तक भी मौजूद नहीं था। उसके बाद उसने अलमारी में सालों से रखा शरारा सूट निकाला जो उसने फ़ारूख़ के साथ निकाह के वक़्त पहना था। शबाना को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे आज उसकी समीम के साथ सुहागरात थी।

ज़री वाला हरे रंग का शरारा-सूट पहनने के बाद उसने अच्छे से मेक-अप किया। फिर अलमारी की सेफ़ में से ज़ेवर निकाल कर पहने जैसे कि गले का हार… कंगन कानों के बूंदे और बालों में झुमर भी पहना। फिर आखिर में उसने सुनहरी गोल्डन रंग के बेहद ऊँची पेंसिल हील के सैंडल पहने। उसने खड़े होकर सिर पे दुपट्टा ओढ़ कर जब आइने में देखा तो खुद का हुस्नो-शबाब देख कर शर्मा गयी…

बिल्कुल नयी नवेली दुल्हन की तरह बेहद खूबसूरत लग रही थी वो।

शबाना ने एक बार तस्ल्ली की कि सलील गहरी नींद सो रहा है और फिर लाइट बंद करके आहिस्ता से कमरे से निकली और दरवाजा बंद करके धड़कते दिल के साथ आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। जब वो ऊपर पहुँची तो समीम के कमरे में लाईट जल रही थी। तभी उसे एहसास हुआ की सीढ़ियों से समीम के कमरे तक रास्ते में फूलों की पंखुड़ियाँ बिछी हुई थीं।

समीम का ये अमल शबाना के दिल को छू गया। उसने कभी तसाव्वुर भी नहीं किया था कि कोई उसके कदमों में फूल तक बिछा सकता है। शबाना उन फूलों पे बड़ी नफ़ासत से ऊँची पेंसिल हील वाले सैडल पहने पैरों से आहिस्ता-आहिस्ता कदम रखती हुई समीम के कमरे में दाखिल हुई तो अचानक उसके ऊपर ढेर सारे फूलों की बारिश हो गयी। इतने में अचानक समीम ने शबाना को बाहों में भर लिया।

शबाना की तनी हुई चूचियाँ समीम के सीने में दबने लगीं।

“हाय भाभी आप तो मेरी जान निकाल कर ही रहोगी… कल तो इतनी बुरी तरह घायल किया था और आज तो लगता है मेरा कत्ल ही करोगी आप… वाओ!” शबाना को दुल्हन के लिबास में देख कर समीम उत्तेजित होते हुए बोला। शबाना ने देखा कि बिस्तर पे भी गुलाब और चमेली के फूलों की चादर मौजूद थी।

“वेलकम भाभी… मेरे कमरे में और मेरी ज़िंदगी में… मैं कितना खुशनसीब हूँ बता नहीं सकता!” समीम चहकते हुए बोला और उसने टेबल पे पहले से रखे हुए शराब के दो गिलास उठाये और एक गिलास रूकसाना को पक्ड़ाते हुए बोला, “ये लीजिये भाभी… आज का पहला जाम आपके बेमिसाल हुस्न के नाम!” शबाना के दिल में थोड़ी हिचकिचाहट तो हुई लेकिन उसने ज़ाहिर नहीं होने दी। जैसे ही वो अपना गिलास होंठों से लगाने लगी तो समीम ने उसके गिलास से अपन गिलास टकराते हुए ‘चियर्स’ कहा और फिर रुख्साना की बाँह में अपनी बाँह लपेट कर बोला, “अब पियो भाभी एक ही घूँट में!”
समीम की तरह शबाना ने भी एक ही घूँट में गिलास खाली कर दिया। आज उसे शराब पिछली रात से थोड़ी ज्यादा स्ट्रॉंग और तीखी लगी क्योंकि आज समीम ने दोनों गिलासों में नीट व्हिस्की डाल राखी थी। फिर समीम ने कामरे की लाइट ऑफ करके नाइट लैम्प ऑन कर दिया और अपने फोन पे कम वल्यूम पे पुराना गाना चला दिया, “आओ मानायें जश्न-ए-मोहब्बत… जाम उठायें जाम के बाद…!” और शबाना को बाहों में भर कर धीरे-धीरे थिरकने लगा। नाइट लैम्प की मद्दिम सी नीली रोशनी के साथ-साथ कमरे में खुली खिड़कियों से चाँद की चाँदनी भी बिखरी हुई थी । गर्मी का मौसम था लेकिन बाहर से हल्की-हल्की ठंडी पूर्वा हवा बह रही थी। शबाना को समीम का तैयार किया हुआ ये रंगीन और रुमानी समाँ बेहद दिलकश लग रहा था और वो भी समीम के सीने में चेहरा छुपाये और उसकी कमर में बांहें डाल कर उससे चिपक कर गाने की धुन पे धीरे-धीरे थिरकने लगी। समीम के हाथ में व्हिस्की की बोतल थी और दोनों एक दूसरे के आगोश में थिरकते-थिरकते बीच-बीच में उस बोतल से व्हिस्की के छोटे-छोटे घूँट पी रहे थे। वही गाना बार-बार लूप में चल रहा था।

थिरकते हुए समीम के हाथ शबाना की कमर से चूतड़ों तक हर हिस्से को सहला रहे थे। एक पराये मर्द… वो भी उम्र में उससे पंद्रह साल छोटा… उससे इतनी तवज्जो… इतनी मोहब्बत…. इतना सुकून उसे मिलेगा… शबाना ने ज़िंदगी में कभी सोचा नहीं था। जल्दी ही शबाना पे शराब का नशा भी सवार होने लगा था और इतने रोमांटिक माहौल में वो सुरूर में मस्त हो चुकी थी और उसे इस वक़्त दीन-दुनिया की कोई खबर नहीं थी। वो आज इस सुरूर-ओ-मस्ती के समंदर में डूब जाना चाहती थी। इसी बीच कब व्हिस्की की बोतल उसने समीम के हाथ से अपने हाथ में ले ली उसे पता हा नहीं चला। नशे की खुमारी में समीम के कंधे पे सिर टिकाये उससे लिपट कर थिरकती हुई वो बीच-बीच में व्हिस्की के छोटे-छोटे सिप ले रही थी।

समीम ने अब शबाना के कपड़े उतारने शुरू कर दिये… वहीं थिरकते-थिरकते खड़े-खड़े ही। मदहोशी में शबाना ने ज़रा भी मुखालिफ़त नहीं की बल्कि वो तो नंगी होने में समीम का साथ दे रही थी जब वो धीरे-धीरे उसके कपड़े खोल रहा था। थोड़ी ही देर में उसका शरारा सूट उसके जिस्म से अलग हो चुका था! नाइट लैंप और चाँदनी रात की मद्दिम सी रोशनी में अब वो बिल्कुल नंगी आँखें बंद किये समीम के कंधे पे सिर रख कर उससे लिपटी हुई नाच रही थी। फिर समीम उससे थोड़ा अलग हुआ और शबाना को कुछ सरसराहट सुनायी दी। उसका दिल ये सोच कर धोंकनी की तरह बजने लगा कि समीम भी अपने कपड़े उतर रहा है। फिर एक सख्त सी गरम चीज़ शबाना को अपनी रानों पर चुभती हुई महसूस हुई तो उसका जिस्म एक दम से थरथरा गया ये सोच कर कि समीम का तना हुआ लंड उसकी रानों से रगड़ खा रहा था।

फिर अचानक से पता नहीं क्या हुआ… समीम उससे बिल्कुल अलग हो गया। शबाना को नशे की खुमारी में समझ में नहीं आया कि आखिर हुआ क्या… लेकिन तभी अचानक कमरे की ट्यूब- लाइट ऑन हो गयी और कमरा पुरी तरह रोशन हो गया। अचानक तेज़ रोशनी से शबाना की आँखें चौंधिया गयीं। शबाना कमरे के ठीक बीचोबीच शराब की बोतल हाथ में पकड़े और सिर्फ़ ज़ेवर और सुनहरे रंग के हाई पेन्सिल हील के सैंडल पहने एक दम मादरजात नंगी खड़ी थी। समीम लाइट के स्विच के पास खड़ा शबाना के तराशे हुए संगमरमर जैसे गोरे नंगे जिस्म को निहारते हुए अपने मूसल जैसे लंड को हाथ में लेकर सहला रहा था।

नशे की हालत में भी शबाना शरमा गयी लेकिन उसने अपना नंगापन छुपाने की कोशिश नहीं की। “समीम! ये क्या… प्लीज़ बंद कर दे ना मुझे शर्म आती है… कितना शैतान है तू!” शबाना कुनमुनाते हुए नशे में लरज़ती आवाज़ में बोली। वो हाई हील के सैंडल पहने नशे में ठीक से एक जगह खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। “ऑफ़ कर दे और मेरे करीब आ ना… जानू!” वो कुनमुनाते हुए समीम के लौड़े की तरफ़ देखते हुए बोली और नशे में झूमती हुई अचानक धम्म से फ़र्श पे टाँगें फ़ैला कर बैठ गयी। उसने अपनी पीठ पीछे बेड से टिका रखी थी। समीम लाइट बंद किये बगैर शबाना की तरफ़ बढ़ा। समीम का तना हुआ लौड़ा हवा में लहरा रहा था जिसे देख कर शबाना की चूत फड़फड़ाने लगी। समीम उसके पास आया और उसके चेहरे के बिल्कुल सामने अपना लौड़ा लहराते हुए खड़ा हो गया।

“वॉव भाभी इस वक़्त आप जन्नत की हूरों से भी ज्यादा हसीन लग रही हो… आपको इस तरह देख कर तो मुर्दों के लंड भी खड़े हो जायें!” समीम अपना लौड़ा उसके चेहरे को छुआते हुए बोला तो शबाना ने मुस्कुराते हुए नज़रें झुका लीं। शबाना की तारीफ़ समीम ज़रा भी बढ़ा चढ़ा कर नहीं कर रहा था बल्कि हकीकत बयान कर रहा था। ट्यूब-लाइट की रोशनी में घुटने मोड़ कर टाँगें फैलाये बैठी रूखसाना का दमकता हुआ चिकना नंगा जिस्म… बालों में झूमर… गले में सोने का नेकलेस… कानों में लटकते हुए सोने के बूँदे… दोनों हाथों में एक-एक चौड़ा कंगन और पैरों में बेहद ऊँची और पतली हील वाले कातिलाना सुनहरी सैंडल… होंठों पे लाल लिपस्टिक…. गालों पे लाली… बेशक शबाना क़यामत ढा रही थी। उसकी नशीली आँखों में शरम भी थी और शरारत भी थी… थोड़ी घबराहट के साथ-साथ बेकरारी और प्यास भी मौजूद थी। समीम का लंड तो बिल्कुल लोहे के रॉड जैसा सख्त हो गया था। फिर अपने लौड़े का सुपाड़ा शबाना के लरज़ते लबों पे लगाते हुए समीम बोला, “लो भाभी इसे अपने नर्म होंठों से प्यार कर दो ना!” इससे पहले समीम को लंड चुसवाने का एक ही बार तजुर्बा था… जब जायरा ने उसका लंड चूस-चूस कर उसका पानी निकाल कर पिया था। समीम को बेहद मज़ा आया था। शबाना को भी खास तजुर्बा नहीं था लंड चूसने का। दस साल पहले शादी के बाद शुरू-शुरू में फ़ारूक़ उससे लंड चुसवाता था। उसके बाद तो उसने सिर्फ़ जायरा को ही फ़िरोज़ लंड चूसते और उसकी मनी पीते हुए देखा था।

समीम का जवान बिला-कटा लंबा-मोटा लंड शबाना को अपने चेहरे के सामने सख्त हो कर लहराता हुआ बेहद हसीन लग रहा था और उसने धीरे से अपने होंठ समीम के लंड के चिकने सुपाड़े पे रख दिये और चूमने लगी और फिर एक हाथ से उसे पकड़ कर एक बार उसे आगे से पीछे तक सहलाने के बाद अपने होंठ खोल कर सुपाड़ा अपने मुँह में ले लिया और अपनी ज़ुबान उसके इर्द-गिर्द फिराने लगी। समीम की मस्ती में आँखें मूँद गयी और होठों से सिसकरी निकल पड़ी, “ऊउहहह भाआआआभी…! आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | शबाना को भी अपनी मुट्ठी और होंठों और ज़ुबान पे समीम के सख्त गरम लौड़े का एहसास दीवाना बना रहा था। समीम के लंड की गर्मी शबाना की मुट्ठी और होंठों से उसके जिस्म में समाती हुई सीधी उसकी चूत तक जा रही थी। फिर शबाना ने मज़े से चुप्पे लगाने शुरू कर दिये।

जल्दी ही शबाना उसका आधे से ज्यादा लंड मूँह में अंदर-बाहर लेते हुए चूस रही थी। समीम इतना उत्तेजित हो गया कि उसने शबाना का सिर पकड़ के अचानक जोर से धक्का मारते हुए अपना पूरा लौड़ा शबाना के हलक तक ठेल दिया। शबाना की तो साँस ही घुट गयी और वो तड़प उठी। समीम ने अपना लौड़ा फ़ौरन बाहर खींच लिया तो शबाना खाँसते हुए जोर-जोर से साँसें लेने लगीं। “सॉरी भाभी…

मैं रोक नहीं पाया खुद को!” समीम बोला। शबाना की साँसें बहाल हुई तो उसने मुस्कुराते हुए समीम को तसल्ली दी कि कोई बात नहीं। शबाना ने फिर अपने थूक से सना हुआ लौड़ा मुट्ठी में ले लिया और सहलाते हुए दूसरे हाथ में अपनी बगल में फर्श पे ही रखी व्हिस्की की बोतल लेकर एक छोटा सा घूँट पी लिया। उसके बाद उसने फिर समीम के लंड के सुपाड़े को मुँह में ले कर चुप्पा लगाया तो समीम को अलग ही मज़ा आया।

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