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चूत को करार मिल ही गया भाग – 3

गतांग से आगे …

समीम के दिमाग में कुछ विचार आया और उसने शबाना को ज़रा सा रुकने को कहा और फिर टेबल से काँच का एक छोटा सा गिलास ले कर उसे आधे तक व्हिस्की से भर दिया। फिर शबाना के चेहरे के सामने खड़े होकर अपना लौड़ा उस गिलास में डाल कर व्हिस्की में डुबो कर शबाना के होंठों पे रख दिया। शबाना फ़ौरन अपने लब खोल कर शराब में भीगा सुपाड़ा मुँह में ले कर फिर चुप्पे लगाने लगी। ऐसे ही समीम बार-बार अपना लौड़ा शराब में भिगो-भिगो कर शबाना से चुसवा रहा था और शबाना को भी इस तरह शराब में भीगा लंड चूसने में बेहद मज़ा आ रहा था। इतने में समीम का सब्र जवाब दे गया और उसकी टाँगें काँपने लगीं वो जोर से सिसकते हुए शबाना के मुँह में ही झड़ने लगा।

शबाना बेझिझक उसकी मनी का ज़ायका ले रही थी। इतने मोटा लंड मुँह में भरे होने की वजह से समीम का वीर्य शबाना के होंठों के किनारों से बाहर बहाने लगा तो समीम ने अपना झड़ता हुआ लंड उसके मुँह से बाहर निकाल लिया और वीर्य की बाकी पिचकारियाँ शराब के गिलास में निकाल दीं। रूकसाना तो मस्ती में अपने होंठों के किनारों से बाहर निकली हुई मनी भी उंगलियों से पोंछ कर चाट गयी और होंठों पे ज़ुबान फिराने लगी।

जैसे ही समीम ने शराब का गिलास जिसमें उसका वीर्य मलाई की तरह व्हिस्की में तैर रहा था… उसे टेबल पे रखने के इरादे से हाथ आगे बढ़ाया तो शबाना ने उसका हाथ पकड़ के रोक दिया और गिलास अपने हाथ में लेकर और उसे हिलाते हुए हिर्सना नज़रों से शराब में तैरती मनी देखने लगी। समीम तो झड़ने के बाद के लम्हों की मस्ती में था और इससे पहले वो कुछ समझ पाता शबाना ने अपने थरथराते होंठ गिलास पे लगा दिये और गिलास को बिना होंठों से हटाये हुए धीरे-धीरे व्हिस्की और उसमें तैरती हुई मनी बड़े मज़े से पी गयी। समीम आँखें फाड़े देखता रहा गया। वो सपने में भी सोच नहीं सकता था किशबाना जैसी शर्मिली औरत ऐसी अश्लील हर्कत भी कर सकती। आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | लेकिन हवस का तुफ़ान सारी शर्म और हया खतम कर देता है।
ये देखकर समीम में नया जोश आ गया और उसने शबाना को गोद में उठा कर बिस्तर पे लिटा दिया। शबाना ने जो मज़ा और खुशी उसे दी थी तो अब समीम की बारी थी बदला चुकाने की। समीम शबाना के ऊपर छा गया और उसके होंठों को अपने होंठों में ले कर चूसने लगा। फिर धीरे-धीरे शबाना के गालों और गर्दन को चूमते और अपनी जीभ फिराते हुए नीचे सरका। शबाना के दोनों मम्मों को मसलते हुए उसके निप्पलों को मुँह में ले कर चुभलाया तो रुखसाने की सिसकारियाँ शुरू हो गयीं। इसके बाद समीम अचानक बेड से उतरा और व्हिस्की की बोतल ले कर वापस आ गया। शबाना के पैरों के नज़दीक बैठ कर उसने शबाना का एक पैर उठा के सैंडल के स्ट्रैप के बीच में उसके पैर को चूम लिया। फिर शबाना को उस पैर पे कुछ ठंडा बहता हुआ महसूस हुआ तो उसने देखा समीम उसके पैर और सैंडल पे शराब डाल-डाल के चाट रहा था। समीम ने एक-एक करके दोनों पैरों और सुनहरी सैंडलों के हर हिस्से को शराब में भिगो-भिगो कर चाटा। सैंडलों के तलवे और हील तक उसने शराब में भिगो कर अपनी जीभ से चाट कर साफ़ किये। समीम की इस हरकत से शबाना के जिस्म में हवस की बिजलियाँ कड़कने लगीं। ऐसे ही धीरे-धीरे उसकी दोनों सुडौल चिकनी टाँगों और जाँघों पे थोड़ी-थोड़ी शराब डाल कर चाटते हुए ऊपर बढ़ा।

शबाना मस्ती में छटपटाने लगी थी और उसकी सिसकारियाँ लगातार निकल रही थीं, “ओहहह मेरी जान ऊँऊँहह सुनीईईल जानू…. आँआआहहह!” उसके सिर के नीचे तकिया था तो वो नशीली आँखों से समीम को ये सब करते देख भी रही थी। जब समीम का चेहरा उसकी चूत के करीब आया तो पहले ही मचल उठी लेकिन समीम उसकी चूत को नज़र-अंदाज़ करता हुआ ऊपर उसके पेट और नाभि की तरफ़ गया और उसके पेट पर शराब उड़ेल कर चाटने लगा।

शबाना को अपने जिस्म पे जहाँ-जहाँ समीम के चाटने का एहसास होता उन-उन हिस्सों में उसे हवस की चिंगरियाँ भड़कती महसूस होने लगती। जब उसकी नाफ़ में समीम ने जाम की तरह शराब भर के उसे अपने होंठों से सुड़का तो शबाना सिसकते हुए मस्ती में जोर से किलकारी मार उठी। इसके बाद समीम ने उसकी चूचियों और चूचियों के बीच की घाटी में भी शराब डाल कर फिर से उन्हें मसलते हुए चूमा-चाटा। फिर समीम ने शराब का एक घूँट अपने मुँह में भरा और झुक कर शबाना के होंठों पे होंठ रख दिये और अपने मुँह में भरी शराब शबाना के मुँह में उतार दी।

शबाना को समीम की इन हरकतों में बेहद मज़ा आ रहा था और उसकी हवस परवान चढ़ती जा रही थी। आखिर में जब समीम उसकी चूत को शराब में नहला कर चूत के ऊपर और अंदर अपनी जीभ डाल-डाल कर चाटने लगा तो शबाना मस्ती में छटपटाते हुए अपनी टाँगें बिस्तर पे पटकने लगी और जोर-जोर से मस्ती में कराहते हुए अपना सिर दांये-बांये पटकने लगी और कुछ ही देर में उसकी चूत ने समीम के मुँह में और चेहरे पे पानी छोड़ दिया।

ज़िंदगी में अपनी चूत चटवाने का शबाना का ये पहला मौका था और उसे बेपनाह मज़ा आया था। दो ही दिन में समीम ने शबाना की बरसों से बियाबान ज़िंदगी को ऐश-ओ-इशरत की बहारों से खिला दिया था। आज तक शबाना को इतना मज़ा कभी नहीं आया था। सैक्स सिर्फ़ लंड के चूत में अंदर-बाहर चोदने तक महदूद नहीं होता ये बात शबाना को अब पता चल रही थी।

अब तक समीम का लंड फिर से खड़ा होकर सख्त हो चुका था। वो एक बार फिर शबाना के ऊपर छाता चला गया और कुछ ही पलों में वो शबाना की टाँगों के बीच में था और शबाना की टाँगें समीम की जाँघों के ऊपर थी। समीम ने अपनी हथेली शबाना की हसास चूत पर रखी तो उसके मुँह से आह निकल गयी। उसकी हथेली का एहसास इतना भड़कीला था कि शबाना ने बिस्तर की चादर को दोनों हाथों में थाम लिया। नीचे से उसकी चूत फिर से मचलते हुए पानी-पानी हो रही थी। समीम का लंड उसकी चूत की फ़ाँकों पर रगड़ खा रहा था।

“शबाना भाभी आपकी चूत बहुत खूबसूरत है..!” समीम ने शबाना की चूत की फ़ाँकों को हाथों से फैलाया तो शबाना की मस्ती सातवें आसमान पर पहुँच गयी। हालाँकि शबाना ने ‘चूत-चुदाई’ जैसे अल्फ़ाज़ अकसर जायरा और फ़ारुख के मुँह से सुने थे और वो इस तरह के लफ़ज़ों और गालियों से अंजान नहीं थी लेकिन शबाना के साथ कभी किसी ने ऐसे अल्फ़ाज़ों में बात नहीं की थी और ना ही कभी रुख्सआना ने ऐसे अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल किया था।

शबाना को बिल्कुल भी बुरा या अजीब नहीं लगा बल्कि समीम के मुँह से अपनी चूत की इस तरह तारीफ़ सुनकर वो गुदगुदा गयी थी। “ऊँम्म… खुदा के लिये ऐसी बातें ना कर समीम!” शबाना मस्ती में बंद आँखें किये हुए लड़खड़ाती ज़ुबान में बोली।

क्यों ना करूँ भाभी… ऐसी बातें सुन कर ही तो चुदाई का मज़ा आता है..!” समीम ने अपने लंड के सुपाड़ा से शबाना की चूत की फ़ाँकों के बीच में रगड़ा तो शबाना को ऐसा लगा जैसे उसका दिल अभी धड़कना बंद कर देगा। आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | “उफ़्फ़्फ़…!” समीम के मुँह से निकला और उसने अपने लंड के सुपाड़े को ठीक शबाना की चूत के ऊपर रखा और उसके ऊपर झुकते हुए उसके गालों को चूमा। “सीईईई….” शबाना के तो रोम-रोम में मस्ती की लहर दौड़ गयी। फिर समीम उसके गालों को चूमते हुए शबाना के होंठों पर आ गया। समीम उसके होंठों को एक बार फिर से अपने होंठों में लेकर चूमने वाला था… ये सोचते ही शबाना की चूत फुदकने लगी… लंड को जैसे अंदर लेने के लिये मचल रही हो। फिर तो जैसे समीम उसके होंठों पर टूट पड़ा और उसके होंठों को चूसने लगा।

समीम से अपने होंठ चुसवाने में और उसकी ज़ुबान के अपनी ज़ुबान के साथ गुथमगुथा होने से शबाना को इस कदर लुत्फ़ मिल रहा था कि वो बेहाल होकर समीम से लिपटती चली गयी। इसी दौरान समीम का लंड भी धीरे-धीरे रुख़साना की चूत की गहराइयों में उतरता चला गया। जैसे ही समीम का लंड शबाना की चूत के गहराइयों में उतरा तो उसने शबाना के होंठों को छोड़ दिया और झुक कर उसके दांये मम्मे के निप्पल को मुँह में भर लिया और जोर-जोर से चूसने लगा। शबाना एक दम मस्त हो गयी और उसकी बाँहें समीम की पीठ पर थिरकने लगी। समीम पिछली रात की तरह जल्दबाज़ी में नहीं था। वो कभी शबाना के होंठों को चूसता तो कभी उसके मम्मों को! उसने शबाना के निप्पलों को निचोड़-निचोड़ कर लाल कर दिया।

शबाना के होंठों में भी सरसराहट होने लगी थी और जब समीम उसके होंठों को चूसना छोड़ता तो खून का दौरा उसके होंठों में तेज हो जाता और तेज सरसराहट होने लगती। शबाना का दिल करता कि समीम उसके होंठों को चूमता ही रहे… उसकी ज़ुबान को अपने मुँह में ले कर समीम चूसता ही रहे..! रुक़साना की दोनों चूचियों और निप्पलों का भी यही हाल था लेकिन समीम के लिये उसके होंठों और दोनों चूचियों और निप्पलों को एक वक़्त में एक साथ चूसना तो मुमकिन नहीं था। नीचे शबाना की फुद्दी भी फुदफुदा रही थी।

शबाना इतनी मस्त हो गयी थी कि उसकी फुद्दी समीम के लंड पे ऐंठने लगी जबकि अभी तक समीम ने एक भी बार अपने मूसल लंड से उसकी चूत में वार नहीं किया था। वो शबाना की चूत में लंड घुसाये हुए उसके मम्मों और होंठों को बारी-बारी चूस रहा था और शबाना मस्ती में आँखें बंद किये हुए सिसकती रही और फिर उसकी चूत के सब्र का बाँध टूट गया। शबाना काँपते हुए झड़ने लगी पर समीम तो अभी भी उसके मम्मों और होंठों का स्वाद लेने में ही मगन था। समीम को भी एहसास हो गया था कि शबाना फिर झड़ चुकी है।

फिर समीम उठा और घुटनों के बल बैठ गया और अपने लंड को सुपाड़े तक शबाना की चूत से बाहर निकाल-निकाल कर अंदर बाहर करने लगा। लंड चूत के पानी से चिकना होकर ऐसे अंदर जाने लगा जैसे मक्खन में गरम छुरी। “भाभी देखो ना आपकी चूत मेरे लंड को कैसे चूस रही है….. आहहह देखो ना..!” रुकसाना उसके मुँह से फिर ऐसे अल्फ़ाज़ सुनकर फिर मस्ती में भर गयी।

वो पूरी रोशनी में समीम के सामने अपनी टाँगें फैलाये हुए एक दम नंगी होकर उसका लंड अपनी चूत में ले रही थी और समीम उसकी चूत में अपने लंड को अंदर-बाहर कर रहा था। “आहहह देखो ना भाभी… आपकी चूत कैसे मेरे लंड को चूम रही है… देखो आहहह सच भाभी आपकी चूत बहुत गरम है!” समीम झटके मारते हुए बोले जा रहा था।
शबाना की पहाड़ की चोटियों की तरह तनी हुई गुदाज़ चूचियाँ समीम के धक्कों के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी। “ऊँऊँहह समीम… मेरे दिलबर ऐसी बातें ना कर… मुझे शर्म आती है!” शबाना की बात सुनकर समीम ने दो तीन जोरदार झटके मारे और अपना लंड चूत से बाहर निकाल लिया। “देखो ना भाभी… आपकी चूत की गरमी ने मेरे लंड के टोपे को लाल कर दिया है!” समीम की ये बात सुनकर शबाना मस्ती में और मचल गयी। शबाना ने अपनी मस्ती और नशे से भरी हुई आँखों से नीचे समीम की रानों की तरफ़ नज़र डाली तो उसे समीम के लंड का सुपाड़ा नज़र आया जो किसी टमाटर की तरह फूला हुआ एक दम लाल हो रखा था। शबाना मन ही मन सोचने लगी कि सच में चूत के गरमी से उसके लंड का टोपा लाल हो सकता है..!

“आप भी कुछ कहो ना भाभी प्लीज़ एक बार… आपको भी ज्यादा मज़ा आयेगा!” समीम ने ज़ोर दिया तो शबाना फुसफुसा कर बोली, “हाय अल्लाहा मुझे शरम आती है..!”

“ये शरम छोड़ कर करो ना चुदाई की बातें… भाभी आपको मेरी कसम!” समीम की बात ने तो जैसे शबाना के दिल पर ही छुरी चला दी हो। “मुझसे नहीं होगा समीम… अपनी कसम तो ना दे… प्लीज़ अब ऐसे तड़पा नहीं और जल्दी अंदर कर… मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा!”

शबाना की चूत की फ़ाँकों पर अपने लंड को रगड़ते समीम फिर बोला, “लेकिन ये तो बताओ कि क्या अंदर करूँ?” शबाना अपनी नशे और चुदास में बोझल आँखों से समीम के लंड के सुपाड़ा को देखते हुए बेकरार होके बड़ी मुश्किल से बोली, “ये… अपना ल…लंड… कर ना प्लीज़!” समीम अभी भी उसकी चूत के बाहर अपने लंड का सुपाड़ा रगड़ रहा था। समीम ने फिर शबाना को तड़पाते हुए पूछा, “कहाँ डालूँ अपना लंड भाभी… और क्या करूँ खुल के बताओ ना।” अब रुकसाना का सब्र जवाब दे गया और वो तमाम शर्म और हया छोड़ कर नशे में लरजती आवाज़ में गुस्से से कड़ाक्ते बोली, “अरे मादरचोद क्यों तड़पा रहा है मुझे… ले अब तो डाल अपना लंड… मेरी चूत में और चोद मुझे..!”

“ये हुई ना बात भाभी… अब आपको रंडी बना के चोदने में मज़ा आयेगा!” कहते हुए समीम ने अपने लंड को हाथ से पकड़ कर शबाना की आँखों में झाँका और फिर लंड को उसकी चूत के छेद पर टिकाते हुए ज़ोरदार झटका मारा। “हाआआआय अल्लाआहहह!” शबाना की फुद्दी की दीवारें जैसे मस्ती में झूम उठी हों.., मर्द क्या होता है… ये आज उसे एहसास हो रहा था। शबाना ने समीम को कसकर अपने आगोश में लेते हुए अपने ऊपर खींचा और उसके आँखों में आँखें डाल कर बोली, “समीम मेरी जान! चोद मुझे… इतना चोद मुझे कि मेरा जिस्म पिघल जाये… बना ले मुझे अपनी रंडी…!” ये कहते हुए उसके होंठ थरथराये और चूत ऐंठी… जैसे कि आज उसकी चूत ने अपने अंदर समाये लंड को अपना दिलबर मान लिया हो..!
शबाना की आरज़ू थी कि समीम उसके होंठों को फिर बुरी तरह से चूमे… उसकी ज़ुबान को अपने मुँह में लेकर चूसे… और ये सोच कर ही शबाना के होंठ काँप रहे थे…! शायद समीम भी उसके दिल के बात समझ गया था। वो शबाना के होंठों पर टूट पड़ा और अपने दाँतों से चबाने लगा… हल्के-हल्के धीरे से कभी उसके होंठ चूसता तो कभी होंठों को काटता… मीठा सा दर्द होंठों पर होता और मज़े के लहर उसकी चूत में दौड़ जाती। शबाना उससे चिपकी हुई उसके जिस्म में घुसती जा रही थी। शबाना का दिल कर रहा था कि दोनों जिस्म एक हो जायें… एक होकर फिर कभी दो ना हों….! समीम का लंड फिर उसकी चूत की गहराइयों को नापने लगा था और अनकटे मोटे लंड के घस्से चूत में कितने मज़ेदार होते हैं… ये शबाना ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसकी मस्ती भरी सिस्कारियाँ और बढ़ने लगीं और पूरे कमरे में गूँजने लगीं।

शबाना अब खुद अपनी टाँगों को उठाये हुए समीम से चुदवा रही थी। मस्ती के पल एक के बाद एक आते जा रहे थे। समीम के धक्कों से उसका पूरा जिस्म हिल रहा था और फिर से वही मुक़ाम… चूत ने लंड को चारों ओर से कस लिया… और अपना प्यार भरा रस समीम के लंड की नज़र करने लगी। समीम के वीर्य ने भी मानो उसकी प्यासी बियाबान चूत की जमीन पर बारिश कर दी हो । शबाना का पूरा जिस्म झटके खाने लगा। उसे समीम की मनी अपनी चूत की गहराइयों में बहती हुई महसूस होने लगी। बेइंतेहा लुत्फ़-अंदोज़ तजुर्बा था… शबाना सोचने लगी कि क्यों उसने अब तक अपनी जवानी ज़ाया की।

शबाना कमज़ कम तीन बार झड़ चुकी थी। समीम अब उसकी बगल में लेटा हुआ शबाना के जिस्म को सहला रहा था। शबाना अचानक बिस्तर से उठने लगी तो समीम ने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया। “कहाँ जा रही हो भाभी… एक बार और करने दो ना?” उसने शबाना को अपनी तरफ़ खींचते हुए कहा।

“उफ़्फ़्फ़ मुझे पेशाब लगी है… पेशाब तो करके आने दे ना… फिर कर लेना… वैसे खुल कर बोल कि क्या करना है!” शबाना हंसते हुए बोली तो समीम भी उसके साथ हंस पड़ा। शबाना पे अभी भी शराब का नशा हावी था। जब वो झूमती हुई बिस्तर से उठ के नंगी ही टॉयलेट जाने लगी तो हाई हील के सैंडल में चलते हुए उसके कदम नशे में लड़खड़ा रहे थे। नशे में लड़खड़ाती हुई मादरजात नंगी शबाना के बलखाते हुस्न को समीम ने पीछे से देखा तो उसके लंड में सनसनी लहर दौड़ गयी लेकिन फिर वो शबाना को सहारा देने के लिये उठा कि कहीं वो गिर ना पड़े… क्योंकि बाथरूम और टॉयलेट कमरे से थोड़ा हट के छत के दूसरी तरफ़ थे। जब समीम लड़खड़ाती शबाना को सहारा दे कर कमरे से बाहर निकल कर छत पर आया तो पास ही छत की परनाली देख कर रुख्सना से बोला, “भाभी इस नाली पे ही मूत लो ना!”

हाय अल्लाह… यहाँ तेरे सामने मैं… कैसे?” शबाना लरजती आवाज़ में नखरा करते हुए बोली तो समीम मुस्कुराते हुए बोला, “अब मुझसे शर्माने के लिये बचा ही क्या है… यहीं कर लो ना?” शबाना को बहुत तेज पेशाब आया था और नशे की हालत में उसने और ना-नुक्कर नहीं की। समीम ने सहारा दे कर शबाना को परनाली के पास मूतने के लिये बिठा दिया। जैसे ही उसकी चूत से मूत की धार निकली तो बहुत तेज आवाज़ हुई। नशे में भी शबाना के चेहरे पे शर्म की लाली आ गयी।

समीम बड़े गौर से शबाना को मूतते देख रहा था। चाँदनी रात में शबाना का नंगा जिस्म दमक रहा था। उसके बाल थोड़े बिखर गये थे लेकिन बालों में झुमर अभी भी मौजूद था। सोने के झूमर… गले का हार… कंगन और सुनहरी सैंडल भी चाँदनी में चमक रहे थे। करीब एक मिनट तक शबाना की चूत से मूत की धार बाहती रही और वो होंठों पे शर्मीली सी मुस्कान लिये समीम की नज़रों के सामने मूतती रही।

ये नज़ारा देख कर समीम का लंड फिर टनटनाने लगा। शबाना का मूतना बंद होने के बाद समीम उसका हाथ पकड़ के उसे खड़ा करते हुए बोला, “भाभी मुझे भी मूतना है… अब आप मेरी भी तो मदद कर दो ना!”

“तो मूत ले ना… मैं क्या मदद करूँगी इसमें!” शबाना बोली तो समीम उसे छत की मुंडेर के सहारे खड़ा करके उसकी आँखों में झाँकते हुए शरारत से बोला, “मेरा लंड पकड़ कर करवा दो ना भाभी!” फिर समीम के लंड को अपनी काँपती उंगलियों में पकड़ कर शबाना ने उसे मोरी की तरफ़ करते हुए झटका दिया और मुस्कुराते हुए बोली, “हाय अल्लाह बड़ा बेशर्म और शरारती है तू… ले कर अब….!” समीम के लंड से पेशाब की धार निकली तो शबाना का पूरा जिस्म काँप गया और उसकी नज़रें समीम के लंड और उसमें से निकलती पेशाब की धार पे जम गयीं और साँसें भी फिर से तेज हो गयी।

मूतने के बाद दोनों वापस कमरे में आये और बिस्तर पे लेटते ही समीम ने शबाना का हाथ पकड़ कर उसे अपने ऊपर खींच लिया। उस रात उसने शबाना को फिर से चोदा। इस बार शबाना के कहने पे समीम ने उसे घोड़ी बना कर पीछे से चोदा क्योंकि शबाना भी वैसे ही चुदना चाहती थी जैसे उसने जायरा को समीम से चुदते देखा था। करीब एक बजे दोनों थक कर एक दूसरे के आगोश में नंगे ही सो गये। सुबह सढ़े चार बजे शबाना की आँख खुली तो उसने समीम को जगा कर कहा कि वो उसे नीचे उसके बेडरूम तक छोड़ आये। समीम नंगी शबाना को ही सहारा दे कर नीचे ले गया क्योंकि इस वक़्त इस हालत में शरारा पहनने की तो शबाना की सलाहियत थी नहीं। अपने बेडरूम में आकर उसने एक नाइटी पहनी और सलील की बगल में लेट कर सो गयी। सुबह वो देर से उठी। उसके जिस्म में मीठा-मीठा सा दर्द हो रहा था। गनिमत थी कि सलील अभी भी सोया हुआ था।

समीम हर रोज़ आठ बजे तक नाश्ता करके स्टेशन चला जाता था। वो भी आज नौ बजे नीचे आया और तीनों नाश्ता करने लगे। आज शबाना बिल्कुल नहीं शर्मा रही थी बल्कि सलील की मौजूदगी में नाश्ता करते हुए उसने समीम के साथ आँखों-आँखों में इशारों से ही काफ़ी बातें की। नाश्ते के बाद किचन में बर्तन रखते वक़्त जब दोनों अकेले थे तो समीम ने शबाना को अपने आगोश में भर कर उसके होंठों को चूम लिया। रुक़साना भी उससे लिपटते हुए बोली, “समीम… आज छुट्टी ले ले ना प्लीज़… नज़ीला भाभी तो बारह बजे तक आकर सलील को ले जायेंगी… उसके बाद तू और मैं…!
हाय भाभी… चाहता तो मैं भी हूँ लेकिन आज छुट्टी नहीं ले सकुँगा… लेकिन इतना वादा करता हूँ कि शाम को जल्दी आ जाऊँगा और फिर तो पूरी शाम और पूरी रात जब तक आप कहोगी आपकी सेवा करुँगा!” समीम उसका गाल सहलाते हुए बोला। “ठीक है… मुझे अपने दिलबर का इंतज़ार रहेगा… इसका ख्याल रखना!” शबाना पैंट के ऊपर से ही समीम का लंड दबाते हुए बोली।

एक रात में वो बेशर्म होकर बिल्कुल खुल गयी थी। उसके बाद समीम ये कह कर चला गया कि वो आज शाम का खाना ना बनाये। उसके बाद नज़ीला भी आकर सलील को ले गयी। शबाना ने घर का काम निपटाया और ऊपर जा कर समीम का कमरा भी ठीकठाक किया और फिर बेसब्री से शाम का इंतज़ार करने लगी। शबाना को एक-एक पल बरसों जैसा लग रहा था। फ़िरोज़ पाँच दिन बाद आने वाला था और समीरा भी अपने मामा के घर से जल्दी ही वापिस आने वाली थी।

समीम ने जल्दी आने का वादा किया था लेकिन फिर भी उसे आते-आते पाँच बज गये। शबाना तब तक सज-संवर कर तैयार हो चुकी थी और थोड़ी-थोड़ी देर में बाहर गेट तक जा-जा कर देख रही थी। समीम के घर में दाखिल होते ही दोनों एक दूसरे से लिपट गये। फिर समीम फ्रेश होने के लिये ऊपर जाने लगा तो खाने के पैकेट टेबल से उठाते हुए शबाना ने ज़रा मायूस से लहज़े में पूछा, “समीम आज तू वो बोतल… मतलब व्हिस्की नहीं लाया?”

शबाना की बात सुनकर समीम को यकीन नहीं हुआ। आज शबाना का खुलापन और ये बदला हुआ अंदाज़ देख कर समीम को बेहद खुशी हुई। “क्या बात है भाभी जान…. कल तो आप नखरे कर रही थीं और आज खुद ही?” समीम उसे छेडते हुए बोला।

“कल से पहले कभी पी नहीं थी ना… मुझे अंदाज़ा नहीं था कि शराब के नशे की खुमारी इतनी मस्ती और सुकून अमेज़ होती है!” रुकसाना ने कहा तो समीम ने अपने बैग में से रॉयल- स्टैग व्हिस्की की बोतल निकाल कर शबाना के सामने टेबल पे रख दी।

फिर अगले तीन दिनों तक हर रोज़ शाम को समीम के घर आते ही दोनों शराब के नशे में चूर नंगे होकर रंगरलियों में डुब जाते। देर रात तक शबाना के बेडरूम में खूब चुदाई और ऐश करते। शबाना तो जैसे इतने सालों का चुदाई की कमी पूरा कर लेना चाहती थी और पुरजोश खुल-कर उसने समीम के जवान लंड से चुदाई का खूब मज़ा लिया।

फिर चार दिन बाद समीम के स्टेशान जाने के बाद डोर-बेल बजी। शबाना ने जाकर दरवाजा खोला तो बाहर समीरा और उसके मामा खड़े थे। शबाना ने सलाम किया और उनको अंदर आने को कहा। समीरा के मामा और उनके घर का हालचाल पूछने के बाद शबाना ने उनके लिये चाय नाश्ते के इंतज़ाम किया। चाय नाश्ते के बाद समीरा के मामा ने वापस जाने का कहा तो शबाना ने फ़ॉर्मैलिटी के तौर पे उन्हें थोड़ा और रुकने को कहा पर वो नहीं माने। उन्होंने कहा कि वो सिर्फ़ समीरा को छोड़ने की खातिर ही आये थे क्योंकि समीरा के कॉलेज की छुट्टीयाँ खतम हो रही थीं और कल से उसकी क्लासें भी शुरू होने वाली थी।

समीरा के आने से घर में रौनक जरूर आ गयी थी पर रुकसाना को एक गम ये था कि अब उसे और समीम को मौका आसानी से नहीं मिलेगा। पिछले पाँच दिनों में हर रोज़ शाम से देर रातों तक बार-बार चुदने के बाद शबाना को तो जैसे समीम के लंड की आदत सी लग गयी थी। उस दिन शाम को जब बाहर डोर-बेल बजी तो समीरा ने जाकर दरवाजा खोला। समीरा ने समीम को सलाम कहा और समीम अंदर आकर चुपचाप ऊपर चला गया। उस दिन कुछ खास नहीं हुआ।

समीरा का कॉलेज घर से काफ़ी दूर था और उसे बस से जाना पड़ता था। कईं बार उसे देर भी हो जाती थी। अगले दिन समीम सुबह जब नाश्ता करने नीचे आया तो शबाना ने गौर किया कि समीरा बार-बार चोर नज़रों से समीम को देख रही थी। समीरा उस वक़्त कॉलेज जाने के लिये तैयार हो चुकी थी। उसने सफ़ेद रंग की कुर्ती के साथ नीले रंग की बेहद टाइट स्किनी-जींस पहनी हुई थी जिसमें उसका सैक्सी फिगर साफ़ नुमाया हो रहा था। उसने सफ़ेद रंग के करीब तीन इंच ऊँची हील वाले सैंडल भी पहने हुए थे जिससे टाइट जींस में उसके चूतड़ और ज्यादा बाहर उभड़ रहे थे।

उस दिन समीरा कुछ ज्यादा ही समीम की तरफ़ देख रही थी। इस दौरान कभी जब समीम समीरा की तरफ़ देखता तो वो नज़रें झुका कर मुस्कुराने लग जाती। समीम ने पहले जायरा की चुदी चुदाई फुद्दी मारी थी और फिर बाद में शबाना की बरसों से बिना चुदी चूत। समीम ने उससे पहले कभी चुदाई नहीं करी थी लेकिन उसे जानकारी तो पूरी थी। इस बात का तो उसे पता चल गया था कि औरत जिसके बच्चे ना हो और जो कम चुदी हो उसकी चूत ज्यादा टाइट होती है। और फिर जब एक जवान लड़के को चुदाई की लत्त लग जाती है तो वो कहीं नहीं रुकती… खासतौर पर उन लड़कों के लिये जिन्होंने ऐसी औरतों से जिस्मानी रिश्ते बनाये हों… जो उम्र में उनसे बड़ी हों और जो उन्हें किसी तरह के बंधन में ना बाँध सकती हों… जैसे की शबाना। वो जानता था कि शबाना उसे किसी तरह अपने साथ बाँध कर नहीं रख सकती। अब वो उस आवारा साँड कि तरह हो गया था जिसे सिफ़ चूत चाहिये थी… हर बार नयी और बिना किसी बंधन की!

शबाना ने उस दिन समीरा के बर्ताव पे ज्यादा तवज्जो नहीं दी क्योंकि वो तो खुद समीरा की नज़र बचा कर समीम के साथ नज़रें मिला रही थी। समीम ने नाश्ता किया और बाइक बाहर निकालने लगा तो समीरा दौड़ी हुई किचन में आयी और शबाना से बोली, “अम्मी समीम से कहो ना कि वो मुझे कॉलेज छोड़ आये!” शबाना ने बाहर आकर समीम से पूछा कि क्या वो समीरा को कॉलेज छोड़ सकता है तो समीम ने भी हाँ कर दी। समीम ने बाइक स्टार्ट की और समीरा उसके पीछे बैठ गयी। समीम के पीछे बैठी समीरा बेहद खुश थी।

भले ही दोनों में अभी कुछ नहीं था पर समीरा समीम की पर्सनैलिटी से उसकी तरफ़ बेहद आकर्षित थी। दोनों में कोई भी बातचीत नहीं हो रही थी। समीरा का कॉलेज घर से काफ़ी दूर था और कॉलेज से घर तक के रास्ते में बहुत सी ऐसी जगह भी आती थी जहाँ पर एक दम विराना सा होता था। थोड़ी देर बाद कॉलेज पहुँचे तो समीरा बाइक से नीचे उतरी और अपने बैक-पैक को अपने कपड़े पर लटकाते हुए समीम को थैंक्स कहा।

समीम ने समीरा की तरफ़ नज़र डाली। उसकी सुडौल लम्बी टाँगें और माँसल जाँघें स्कीनी जींस में कसी हुई नज़र आ रही थी… उसके मम्मे उसकी कुर्ती के अंदर ब्रा में एक दम कसे हुए पहाड़ की चोटियों की तरह तने हुए थे। समीम की हम-उम्र समीरा अपनी ज़िंदगी के बेहद नज़ुक मोड़ पर थी।

जब उसने समीम को अपनी तरफ़ यूँ घूरते देखा तो वो सिर झुका कर मुस्कुराने लगी और फिर पलट कर कॉलेज की तरफ़ जाने लगी। समीम वहाँ खड़ा समीरा को अंदर जाते हुए देख रहा था… दर असल वो पीछे समीरा के चूतड़ों को घूर रहा था। समीरा ने अंदर जाते हुए तीन-चार बार पलट कर समीम को देखा और हर बार वो शर्मा कर मुस्कुरा देती।

तभी समीरा के सामने से दो लड़के गुजरे और कॉलेज से बाहर आये। दोनों आपस में बात कर रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि समीम समीरा के साथ आया है। वो दोनों समीम के करीब ही खड़े थे जब उनमें से एक लड़का बोला, “यार ये समीरा तो एक दम पटाखा होती जा रही है… साली के मम्मे देख कैसे गोल-गोल और बड़े हो गये हैं..!” तो दूसरा लड़का बोला, “हाँ यार साली की गाँड पर भी अब बहुत चर्बी चढ़ने लगी है… देखा नहीं साली जब हाई हील वाली सैंडल पहन के चलती है तो कैसे इसकी गाँड मटकती है… बस एक बार बात बन जाये तो इसकी गाँड ही सबसे पहले मारुँगा!”
समीम खड़ा उन दोनों की बातें सुन रहा था पर समीम कुछ बोला नहीं।

उसने बाइक स्टार्ट की और काम पर चला गया। समीम के दिमाग में उन लड़कों की बातें घूम रही थी और उनकी बातें याद करते हुए उसका लंड उसकी पैंट में अकड़ने लगा था। समीम ने करीब एक बजे तक काम किया और फिर लंच किया। सुबह से उसका लंड बैठने का नाम ही नहीं ले रहा था। समीम ने एक बार घड़ी की तरफ़ नज़र डाली और फिर जावेद से किसी जरूरी काम का बहाना बना कर दो घंटे की छुट्टी लेकर बाहर आ गया। उसने अपनी बाइक स्टार्ट की और घर के तरफ़ चल पढ़ा। उन लड़कों की बातों ने समीम का दिमाग सुबह से खराब कर रखा था… वो जानता था कि शबाना इस समय घर पे अकेली होगी। समीम की बाइक हवा से बातें कर रही थी और पंद्रह मिनट में वो घर के बाहर था। उसने घर के गेट के बाहर सड़क पे ही बाइक लगायी और अंदर जाकर डोर-बेल बजायी। समीम ने शबाना को निकलने से पहले ही फोन कर दिया था इसलिये वो भी तैयार होकर बेकरारी से समीम के आने का इंतज़ार कर रही थी। घंटी की आवाज सुनते ही उसने फ़ौरन दरवाजा खोल दिया।

अंदर दाखिल होते ही समीम ने शबाना को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया। “आहहह दरवाजा तो बंद कर लेने दे!” शबाना मचलते हुए बोली। फिर समीम ने शबाना को अपनी बाहों में उठा लिया और उसे उठा कर ड्राइंग रूम में ले आया। फिर उसे सोफ़े के सामने खड़ी करते हुए शबाना को पीछे से बाहों में भर लिया और मेरे उसकी गर्दन पर अपने होंठों को रगड़ने लगा। रुकसाना ने मस्ती में आकर अपनी आँखें बंद कर लीं। “हाय समीम मेरी जान… अच्छा है तू आ गया… मैं तो कल पूरी रात अपने इस दिलबर की याद में तड़पती रही!” शबाना उसके लंड को पैंट के ऊपर से दबाते हुए बोली। समीम कुछ नहीं बोला। वो शायद किसी और ही धुन में था। उसने शबाना की गर्दन पर अपने होंठों को रगड़ना ज़ारी रखा और फिर एक हाथ से शबाना की गाँड को पकड़ कर मसलने लगा।

जैसे ही समीम ने अपने हाथों से शबाना के चूतड़ों को दबोच कर मसला तो शबाना की तो साँसें ही उखड़ गयी। आज वो बड़ी बेदर्दी से शबाना के दोनों चूतड़ों को अलग करके फैला रहा था और मसल रहा था। उसके कड़क मर्दाना हाथों से अपनी गाँड को यूँ मसलवाते हुए शबाना एक दम हवस ज़दा हो गयी उसकी आँखें बंद होने लगी… दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। फिर अचानक ही समीम के दोनों हाथ शबाना की सलवार के आगे जबरदन तक पहुँच गये। रुकसाना ने आज इलास्टिक वाली सलवार पहनी हुई थी। जैसे ही समीम को एहसास हुआ कि शबाना ने इलास्टिक वाली सलवार पहनी हुई है तो उसने दोनों तरफ़ सलवार में अपनी उंगलियों को फंसा कर शबाना की सलवार नीचे सरका दी। शबाना ने नीचे पैंटी भी नहीं पहनी थी और जैसे ही सलवार नीचे हुई तो समीम ने उसे सोफ़े की ओर ढकेला। शबाना ने हमेशा की तरह ऊँची पेंसिल हील की सैंडल पहनी हुई थी तो समीम के धकेलने से उसका बैलेंस बिगड़ गया और सोफ़े की और लुढ़क गयी। शबाना ने सोफ़े की बैक पर अपने दोनों हाथ जमाते हुए दोनों घुटनों को सोफ़े पर रख लिया।
शबाना सोचने लगी कि, “हाय आज क्या समीम यहाँ ड्राइंग रूम में ही मुझे नंगी करके इस तरह मुझे चोदेगा!” ये सोच कर शबाना के चेहरे पर शर्म से सुर्खी छा गयी। “ओहहहह समीम यहाँ मत करो ना… बेडरूम में चलते हैं…!” रुकसाना ने सिसकते हुए मस्ती में लड़खड़ाती हुई ज़ुबान में समीम को कहा। पर समीम नहीं माना और उसने पीछे से शबाना की कमीज़ का पल्ला उठा कर उसकी कमर पर चढ़ा दिया। शबाना की सलवार पहले से ही उसकी रानों में अटकी हुई थी। फिर शबाना को कुछ सरसराहट की आवाज़ आयी तो उसने गर्दन घुमा कर पीछे देखा कि समीम अपनी पैंट की जेब में से कोई ट्यूब सी निकाल रहा है जिसपे “ड्यूरेक्स के-वॉय जैली” लिखा था।

समीम ने ये अभी घर आते हुए रास्ते में केमिस्ट की दुकान से खरीदी थी। फिर समीम ने अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे किया और धीरे से काफ़ी सारी के-वॉय जैली अपने लंड पर गिरा कर उसे मलने लगा। आप यह कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है | शबाना अपने चेहरे को पीछे घुमा कर अपनी नशीली आँखों से उसे ये सब करता हुआ देख रही थी। फिर समीम ने जैली की उस ट्यूब को वहीं सोफ़े पर एक तरफ़ उछाल दिया फिर वो शबाना के पीछे आकर खड़ा हुआ और अपने घुटनों को थोड़ा सा मोड़ कर झुका और अगले ही पल उसके लंड का मोटा गरम सुपाड़ा रुकसाना की चूत की फ़ाँकों को फ़ैलाता हुआ उसकी चूत के छेद पर आ लगा।

शबाना को ऐसा लगा मानो चूत पर किसी ने सुलगती हुई सलाख रख दी हो। उसने सोफ़े की बैक को कसके पकड़ लिया। समीम ने शबाना के दोनों चूतड़ों को पकड़ कर जोर से फैलाते हुए एक जोरदार धक्का मारा और समीम का लंड उसकी चूत को चीरता हुआ अंदर घुसता चला गया। शबाना एक दम से सिसक उठी, “हाआआआय अल्लाआआआहहह .. मैं मरीईईईई!” समीम ने अपना लंड जड़ तक उसकी चूत में घुसेड़ा हुआ था। समीम ने वैसे ही झुक कर फिर से सोफ़े पे पड़ी के-वॉय जैली की वो ट्यूब उठायी और शबाना की गाँड के ऊपर करते हुए के-वॉय जैली को गिराने लगा। जैसे ही जैली की पिचकारी शबाना की गाँड के छेद पर पड़ी तो वो बुरी तरह से मचल उठी। समीम ने ट्यूब को नीचे रखा और फिर अपना लंड धीरे-धीरे शबाना की चूत में अंदर-बाहर करने लगा।

गाँड से बहती हुई जैली नीचे समीम के लंड और शबाना की चूत पर आने लगी। तभी समीम ने वो किया जिससे शबाना एक दम से उचक सी गयी पर समीम ने उसे उसकी कमर से कसके पकड़ लिया। दर असल समीम ने अपनी उंगली को शबाना की गाँड के छेद पर रगड़ना शुरू कर दिया। शबाना की कमर को पकड़ते ही समीम ने तीन चार जबरदस्त वार उसकी चूत पर किये तो चूत बेहाल हो उठी और मस्ती आलम में शबाना में मुज़ाहिमत करने की ताकत नहीं बची थी।

समीम ने फिर से शबाना की गाँड को दोनों हाथों से दबोच कर फैलाया और फिर अपने दांये हाथ के अंगूठे से शबाना की गाँड के छेद को कुरेदने लगा।
शबाना की कमर उसके अंगूठे की हर्कत के साथ एक के बाद एक झटके खाने लगी। समीम का लंड एक रफ़्तार से शबाना की चूत के अंदर बाहर हो रहा था और उसका अंगूठा अब शबाना की गाँड के छेद को और जोर से कुरेदने लगा था। शबाना इतनी गरम हो चुकी थी कि अब वो समीम की मुखालिफ़त करने की हालत में नहीं थी। वो जो भी कर रहा था शबाना मज़े से सिसकते हुए उसका लंड अपनी चूत में लेते हुए करवा रही थी। समीम ने उसकी गाँड के छेद को अब उंगली से दबाना शुरू कर दिया।

के-वॉय जैली की वजह से और समीम की उंगली की रगड़ की वजह से शबाना की गाँड का कुंवारा छेद नरम होने लगा और उसे अपनी गाँड के छेद पर लज़्ज़त-अमेज़ गुदगुदी होने लगी थी जिसे महसूस करके उसकी चूत और ज्यादा पानी बहा रही थी। बेहद मस्ती के आलम में शबाना को इस वक़्त कहीं ना कहीं शराब की तलब हो रही थी क्योंकि चार-पाँच दिन उसने शराब के नशे की खुमारी में ही समीम के साथ चुदाई का खूब मज़ा लूटा था और चुदाई के लुत्फ़ और मस्ती में शराब के नशे की मस्ती की अमेज़िश से शबाना को जन्नत का मज़ा मिलता था।

फिर समीम ने अपनी उंगली को धीरे-धीरे से शबाना की गाँड के छेद पर दबाया और उंगली का अगला हिस्सा शबाना की गाँड के छेद में उतरता चला गया। पहले तो शबाना को कुछ खास महसूस नहीं हुआ पर जैसे ही समीम की आधे से थोड़ी कम उंगली उसकी गाँड के छेद में घुसी तो शबाना को तेज दर्द महसूस हुआ। “आआहहह सुनीईईल मत कर…. दर्द हो रहा है!” शबाना चींखी तो समीम शायद समझ गया कि शबाना की गाँड का छेद एक दम कोरा है। वो कुछ पलों के लिये रुका और फिर उतनी ही उंगली शबाना की गाँड के छेद के अंदर बाहर करने लगा।

समीम ने शबाना की चूत से अपने लंड को बाहर निकाला और फिर गाँड के छेद से उंगली को निकाल कर चूत में पेल दिया और चूत में अंदर-बाहर करते हुए घुमाने लगा। “हाआआय मेरे जानू ये क्या कर रहे हो तुम ओहहह… अपना लंड… मेरा प्यारा दिलबर… उसे मेरी चूत में वापस डाल ना…!” अपनी चूत में अचानक से मोटे लंड की जगह पतली सी उंगली महसूस हुई तो शबाना तड़पते हुए बोली। समीम ने फिर से उसकी चूत में से उंगली बाहर निकाली और चूत में अपना मूसल लंड घुसेड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिये।

उसकी उंगली शबाना की चूत के पानी से एक दम तरबतर हो चुकी थी। उसने फिर उसी उंगली को शबाना की गाँड के छेद पर लगाया और शबाना की चूत के पानी को गाँड के छेद पर लगाते हुए तर करने लगा। शबाना को ये सब थोड़ा अजीब सा तो लग रहा था लेकिन मस्ती में उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। समीम ने फिर से अपनी उंगली शबाना की गाँड के छेद में घुसेड़ दी लेकिन इस बार समीम ने कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी दिखायी और अगले ही पल उसकी पूरी उंगली शबाना की गाँड के छेद में थी।

शबाना दर्द से एक दम कराह उठी। भले ही दर्द बहोत ज्यादा नहीं था पर शबाना को अब तक समीम के इरादे का अंदाज़ा हो चुका था और वो समीम के इरादे से घबरा कर वो कराहते हुए बोली, “हाय समीम… ये… ये क्या कर रहा है जानू… वहाँ से उंगली निकाल ले… बहोत दर्द हो रहा है!” पर समीम ने उसकी कहाँ सुननी थी। समीम अब उस उंगली को शबाना की गाँड के छेद में अंदर बाहर करने लगा।

शबाना को थोड़ा दर्द हो रहा था पर कुछ ही पलों में उसकी गाँड का छेद नरम और फिर और ज्यादा नरम पड़ता गया। उसकी चूत के पानी और के-वॉय जैली ने गाँड के छेद के छाले की सख्ती बेहद कम कर दी थी। अब तो समीम बिना किसी दुश्वारी के शबाना की गाँड को अपनी उंगली से चोद रहा था। शबाना भी अब फिर से एक दम मस्त हो गयी। हवस और मस्ती के आलम में शबाना को ये भी एहसास नहीं हुआ कि कब समीम की दो उंगलियाँ उसकी गाँड के छेद के अंदर-बाहर होने लगी। कभी दर्द तो कभी मज़ा… कैसा अजीब था ये चुदाई का मज़ा। फिर समीम ने अपना लंड शबाना की चूत से बाहर निकला और उसकी गाँड के छेद पर टिका दिया। उसकी इस हर्कत से शबाना एक दम दहल गयी, “नहीं समीम…. खुदा के लिये… ऐसा ना कर… मैं दर्द बर्दाश्त नहीं कर सकुँगी..!”
लेकिन समीम तो जैसे शबाना की बात सुनने को तैयार ही नहीं था। उसने दो तीन बार अपने लंड का सुपाड़ा शबाना की गाँड के छेद पर रगड़ा और फिर धीरे-धीरे उसकी गाँड के छेद पर दबाता चला गया। जैसे ही उसके सुपाड़े का अगला हिस्सा उसकी गाँड के छेद में उतरा तो शबाना बिदक कर आगे हो गयी… दर्द बहद तेज था।“ नहीं समीम नहीं… मेरे जानू मुझसे नहीं होगा… प्लीज़ तुझे हो क्या गया है…?” रुख्साना अपने चूतड़ों को एक हाथ से सहलाते हुए रिरिया कर बोली। शबाना ने जायरा को कईं दफ़ा फ़िरोज़ से अपनी गाँड मरवाते हुए देखा था लेकिन शबाना को इस बात का डर था कि एक तो उसकी गाँड बिल्कुल कुंवारी थी और फिर फ़िरोज़ और समीम के लंड का कोई मुकाबला नहीं था। समीम का तगड़ा-मोटा आठ इंच लंबा मूसल जैसा लंड वो कैसे बर्दाश्त करेगी अपनी कोरी गाँड में!

“भाभी जान कुछ भी हो… मुझे आज आपकी गाँड मारनी ही है…!” ये कह कर उसने शबाना को सोफ़े से खड़ा किया और उसकी रानों में फंसी सलवार खींच कर उतार दी। फिर उसने शबाना को खींचते हुए सामने बेडरूम में ले जाकर बेड पर पटक दिया। फिर शबाना की टाँगों को पकड़ कर उसने उठाया और अपने कंधों पर रख लिया और एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर उसकी गाँड के छेद पर टिका दिया। शबाना समझ चुकी थी कि अब समीम उसकी एक नहीं सुनने वाला। “आहिस्ता से करना जानू!” शबाना ने अपने हाथों में बिस्तर की चादर को दबोचते हुए कहा और अगले ही पल गच्च की एक तेज आवाज़ के साथ समीम का लौड़ा शबाना की गाँड के छेद को चीरता हुआ आधे से ज्यादा अंदर घुस गया। दर्द के मारे शबाना का पूरा जिस्म ऐंठ गया… आँखें जैसे पत्थरा गयीं… मुँह खुल गया… और वो साँस लेने के लिये तड़पने लगी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि समीम उसके साथ इतनी वहशियत से पेश आयेगा।

“बस भाभी हो गया.. बसऽऽऽ हो गया..!” और समीम ने उतने ही आधे लंड को शबाना की गाँड के अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। उसके हर धक्के के साथ शबाना को अपनी गाँड के छेद का छल्ला भी अंदर-बाहर खिंचता हुआ महसूस हो रहा था पर समीम का लंड के-वॉय जैली और शबाना की चूत के पानी से एक दम भीगा हुआ था। इसलिये गाँड का छेद थोड़ा नरम हो गया था और फिर एक मिनट बीता… दो मिनट बीते… फिर तीन मिनट किसी तरह बीते और शबाना की गाँड में उठा दर्द अब ना के बराबर रह गया था। अब समीम के लंड के सुपाड़े की रगड़ से शबाना को अपनी गाँड के अंदर की दीवारों पर मज़ेदार एहसास होने लगा था। शबाना ज़ोर-ज़ोर से “आआहह ओहह” करती हुई दर्द और मस्ती में सिसकने लगी।

“अभी भी दर्द हो रहा है क्या भाभी!” समीम ने अपने लंड को और अंदर की ओर ढकेलते हुए पूछा। “आँआँहहह हाँ थोड़ा सा हो रहा है… ऊँऊँहहह लेकिन अब मज़ाआआ भी आआआँ रहा है आआआहहह…!” शबाना सिसकते हुए बोली। धीरे-धीरे अब समीम का पूरा का पूरा लंड शबाना की गाँड के अंदर-बाहर होने लगा और दर्द और मस्ती की तेज़-तेज़ लहरें अब शबाना के जिस्म में दौड़ रही थी।

काले रंग के ऊँची हील वाले सैंडल में शबाना के गोरे-गोरे पैर जो समीम के कंधों पर थे उन्हें रूकसाना ने मस्ती में समीम की गर्दन के पीछे कैंची बना कर कस लिया। शबाना का एक हाथ उसकी खुद की चूत के अंगूर को रगड़ रहा था।

धीरे-धीरे समीम के धक्कों की रफ़्तार बढ़ने लगी और फिर वो शबाना की गाँड के अंदर झड़ने लगा। उसके साथ ही शबाना की चूत ने भी धड़धड़ाते हुए पानी छोड़ दिया। समीम ने अपना लंड बाहर निकाला और शबाना की कमीज़ के पल्ले से उसे पोंछ कर उसने आगे झुक कर शबाना के होंठों पे चूमा और फिर ये बोल कर कमरे से बाहर चला गया कि उसे जल्दी से वापस स्टेशन पहुँचना है। शबाना थोड़ी देर लेटी रही और समीम भी वापस चला गया।

थोड़ी देर बाद शबाना उठी और बाथरूम में जाकर अपनी चूत और गाँड को अच्छे से साफ़ किया और बाहर आकर अपनी सलवार पहन कर फिर लेट गयी। उसकी गाँड में मीठी-मीठी सी कसक अभी भी उठ रही थी।

कहानी जारी रहेगी … अगले भाग में पढ़ते रहिये मस्ताराम डॉट नेट पर लाखो मस्त मस्त कहानियां है ..|

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