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Mastram Ki Hindi Sex Stories | Mastaram Ki Antarvasna Stories | मस्ताराम की हिंदी सेक्स कहानियां

दामाद के साथ सास की सेक्स अन्तर्वासना-2

दामाद के साथ सास की सेक्स अन्तर्वासना-1

फिर मैंने बेटी को मालिश करके नहाने के लिए बाथरूम भेजा। मुझे पता था मेरी बेटी को नहानेके लिए एक घंटा तो आरामसे लगेगा। इसीलिए मै स्वप्नीलके रूममें घुस गयी।
स्वप्नील बेडपे सोया था। मैंने उसे जगानेके लिए उसके बदनसे चद्दर खिंची। अन्दर साहब नंगेही सो रहे थे। मेरे चद्दर खींचने के बाद भी वो उठा नहीं था। उसका सांवला बदन चमक रहा था। वो पेट के बल सोया था। उसकी पीठ और नितम्ब खुले थे। मुझसे रहा नहीं गया। मै बेडपर बैठ गयी। मैंने धीरे से उसके चुताडोपे अपना हाथ घुमाया। वो नींद में कसमसाया। फिर मैंने उसके जान्घोपे अपने नाख़ूनसे डिजाईन बनाने की कोशिश की। वो नींद में बडबडाया- नेहा, अब सोने दे ना। नेहा मेरी बेटी का नाम था। और वो पेट से मोड़कर बाये बदनपे सो गया। मै भी बेड के दुसरे साइड उठके गयी। और मैंने देखा तो एक साइड होने से स्वप्नील लंड खड़ा होके दे रहा था।

मैंने बहोत शांति से हाथ लगाया। मुझे डर था कही स्वप्नील जाग न जाये। मैंने अब उसके लंड को हाथ में लिया। मेरे हाथ लगतेही लंड और फूलने लगा। मेरे हिसाब से स्वप्नील का लंड आठ-नौ इंच लम्बा आराम से था। निश्चिततौर से कह नहीं सकती मगर वो जादा भी हो सकता है। और जाड़ा इतना के मेरे एक हथेलीमें समां नहीं रहा था। उसकी टोपी अनोखी थी। किसी पाइप के ऊपर बड़ा टमाटर रखा हुआ लग रहा था। मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मैंने हाथ से उसे हिलाना शुरू किया। थोड़ी देर हिलाती रही। फिर मेरे मन से डर हटाते हुए मैंने स्वप्नील का लंड मुह में लिया। जवान लंड था। एकदम गरम था। मेरे मुह में समां नहीं रहा था। मैंने उसे गले तक अन्दर लिया। और अपना मुह आगे-पीछे करना शुरू किया। थोड़ी देर बाद बाहर निकाल के देखा तो उसपे दो बूंद पानी आया था। शायद वो प्री-कम था।

मुझे उसकी नमकीन टेस्ट अच्छी लगी। मैंने लंड को फिर मुहमे लिया और जोर जोर से चूसने लगी। मुझे लग रहा था के शायद स्वप्नील उठा हुआ है। क्योंकि कोई मर्द औरत अगर उसका लंड चुसे तो सो नहीं सकता। मगर मै स्वप्नील खुद क्या करता है ये देखना चाहती थी। मै जोर जोरसे लंड चूस रही थी। पुरे रूम में चुसनेकी आवाज गूंज रही थी। थोडीही देर में स्वप्नील का बदन अकडने लगा। उसका लंड और भी ज्यादा तनने लगा। लंड पे एक एक नस फूलने लगी। उसका बम फूटनेका समय आया ये मैंने पहचाना और मैंने उसका लंड मुह से अलग किया।

जैसेही मैंने मुह से लंड को निकलकर बेडसे उठने कोशिश की स्वप्नील ने मुझे पकड़ लिया और मुझे बाहोमे लेकर मेरेसे गिडगिडाया – सासुजी खेल आधा मत छोड़ो। सही कहो तो उसने जब मुझे पकड़ा तब मै घबरा गयी थी मगर जैसेही उसने खेल आधा ना छोदनेकी बिनती की तो मैंने पहचाना के खेल तो मेरे हाथमे में है। खेल और स्वप्नील दोनों मेरे मर्जीसे आगे चलनेवाले है। और ऐसा मौका मै मेरे हाथसे थोडेही जाने देती।

दुनिया जानती है, खेल के सूत्र जब औरत के हाथ होते है तब वो मर्दको कैसा नचाती है। मै भी मेरे दामादको मेरे तालपर नचाना चाहती थी। इसी लिए रवीने मुझसे खेल आधा न छोड़नेकी गुजारिश की तो मैंने उसे नेहा बाथरूमसे कभीभी बाहर आ सकती है ऐसा बताया। हालांकि मै जानती थी नेहा को बाहर आनेमें अभी और आधा घंटा लगेगा। मगर मै स्वप्नीलसे याचना चाहती थी। इसीलिए स्वप्नील बार बार जब जिद करने लगा तब मैंने उसे अपने हाथसे लंड हिलानेकी बात की। मरता क्या न करता। वो मान गया।

फिर मैंने स्वप्नील को प्यारसे अपनी बाहोमे लिया। उससे किस करते हुए मै उसके पीठ और चुतड पे हाथ फिराने लगी। मैंने जैसेही उसके गांडको स्पर्श किया उसका लौड़ा एकदम तैयार हुआ। अपना तना हुआ लौड़ा लेके वो मेरे सामने खड़ा हुआ। थोड़ी देर मैंने उसके लंडको अपने मुहमे लेकर चुसा। मुहसे लंडको चूसते हुए मै अपने हाथोसे उसकी गांड दबाने लगी। एक हाथसे मैंने उसकी दोनों आंडगोटी सहल रही थी। फिर बीचमेही मैंने उसकी दोनों गोटिया बारी बारिसे चुसी। स्वप्नील का उन्माद बढ़ानेके लिए मै एक उंगली उसके गांडमें थोड़ी थोड़ी घुसा रही थी। यह सब रवीको सहन करना मुश्किल हो रहा था। अखिरमे उसकी सहनशक्ति जबाब दे गयी।

उसने अपने दोनों हाथोसे मेरा सिर पकड़ा और जोर जोरसे मेरे मुह्को चोदने लगा। वो बहोत ताकतसे अपनी गांड हिला रहा था। उसकी तेजी मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। मगर उसकी ये क्रिया मुझे जता रही थी के मेरा दामाद कितने दिनोसे भूका है। इसका ये भी मतलब था के वो मेरी बेटी छोडके किसी और औरतसे चुदाई या बाकि मजे नहीं लेता था। ये बात मेरे समझमें आनेके बाद मुझे भी मेरे दामादपे नाज आया। मन ही मन मैंने उसे माना। उसके धीरजकी सराहना की। मेरे दामादके प्रति मेरा प्यार और भी ज्यादा हुआ।

वो मेरे मुहसे काफी जोरसे चुदाई कर रहा था। खड़े खड़े अपनी कमर हिलाते हुए अपने लौडेको मेरे मुह को चूत समझकर मेहनतसे चोद रहा था। उसके लंडके आकारसे मेरा मुह खुला हुआ था। उसका लंड मेरे गलेतक उतर रहा था। फिर भी मैंने कोशिश करके मेरे लिप्ससे स्वप्नीलका लौड़ा पकडा। स्वप्नील ज्यादाही खुश हुआ। उसकी गति और बढ़ी। जैसेही वो फुटनेकी कगारपे आया मैंने स्वप्नीलको इशारा करके उसका लंड मुहसे निकालकर हाथमे लिया। स्वप्नील थोडा निराश हुआ। मगर मैंने उसपे ज्यादा ध्यान न देते हुए अपने हाथोसे उसका लंड हिलाना शुरू किया। दो मिनटमेही स्वप्नील का लावारस उबल पड़ा। मै लंड को आगे पीछे कर रही थी और स्वप्नील के लंड्से वीर्य निकल रहा था। कितने दिनोका स्टॉक उसने सम्हालके रखा था ये स्वप्नीलकोही मालूम। मै अगले करीब पांच मिनट हिल रही थी और उसके लंड्से वीर्य निकलही रहा था। जब सब ख़तम हुआ तब मैंने फिर उसका लंड मुहमे लेकर साफ़ किया। पगला लौड़ा था।

मैंने सफाई के लिए मुह में लिया तो भी टाइट होने लगा। मैंने स्वप्नील के लंडका किस लेकर स्वप्नीलसे कहा- दामादजी, अब तो इसकी शांति हुई ना? इसे अब सम्हालके रखो। स्वप्नील बोल उठा- सासुजी, इसकी शांति कहा हुई है। अब तो यह और भी कुछ मांग रहा है। इसे हमारी सासुजी पसंद जो आई। मेरी तक़दीर अच्छी है इसीलिए इतनी अच्छी और सेक्सी सासुजी मिली। मैंने गंभीरतासे स्वप्नील से कहा-देखो दामादजी, आपकी पत्नी नेहा घरमे है। उसे शक हो जाये ऐसा कुछभी बोलो मत और उसको नजर आये ऐसा कुछभी करो मत।

आपको क्या चाहिए ये मै जानती हु। जैसेही समय मिलेगा मै आपको वो सब दूंगी जो आपने मेरे बारेमे सोचा है। और वो भी आपको मिलेगा जो आपने सोचाही नहीं है। मगर इसके लिए आपको सही समयका इंतजार करना पड़ेगा। स्वप्नील मेरे बाहोमे आकर कहने लगा- सासुजी ऐसा कुछ तो करो जिससे ये मुहूरत जल्दी आये। मेरी तो जान निकल रही है। मै तड़प रहा हु इसके लिए।

सही समय कब आएगा ये उस वक्त मुझे नहीं मालूम था। पर शायद समय मेरे लिए बलवान था। उसी दिन ऐसा मौका आया की मै मेरे दामाद की बाहोमे नंगी थी और वो मेरे दीवानगी का मीठा फल मुझे दे रहा था।

स्वप्नीलसे फ्री होकर मै बेडरूमसे बाहर भाग आई। मेरी बेटीका नहाना अभी पूरा नहीं हुआ था। मैंने भगवानका शुक्र माना और रसोइमे नाश्तेकी तय्यारीमें जुट गई। उतनेमे नेहा नहाके आई। वो भगवानकी पूजा करने लगी। मै उससे बात करके नहाने चली तो उसने डॉक्टरसे चेक-अपके बारेमें बात की। मैंने उसे डॉक्टरसे फोनपे समय लेनेको कहा और नहाने चली।

बाथरूममें मुझे एकांत मिला। नंगी होकर मैंने अपने बदनको सामनेवाले शिशेमे देखा। मेरा फिगर काबिले-तारीफ है ये मुझे पता था। मगर मुझसे दस-बारा साल छोटा मेरा दामादभी इसके लिए पागल हो जाये ऐसा क्या है ये मै देख रही थी। सामनेसे देखनेपर मेरे वक्ष बहोत आगे आये हुए लगते है। मेरे चुचिके अंगूर बहोत बड़े है। दोनों अंगूर करीब एक इंच बड़े और आगे आये हुए है।इससे मेरी चूची एकदम नुकीली लगती है। निशाकोभी यही काफी पसंद थे। वो हमेशा अपने दो उन्गलिसे उसे मरोड़ती थी। पाठकजीतो उसे इतना चूसते थे की पूछो मत। मैंने भी अपने दो उन्गलिमे उसे पकडके मरोड़ा। मेरे बदनमें अजीबसी हलचल हुई। फिर मैंने खुदको आइनेमें एक साइड से देखा। मेरा सही आकर्षण तो यही था।

मेरे चुतड आड़े फैलनेसे ज्यादा पिछेकी ओर बड़े थे। साइड से देखनेवाला ऊपर आगे आई हुई मेरे वक्ष और पीछे आये हुए मेरे नितंब , इन दोनों से खुद को कंट्रोल करना मुश्किल समझता।मेरा चेहरा इतना खास नहीं था पर मेरे वक्ष और नितंब मेरे चेहरेको बहोत आकर्षक बनाते थे। फिर मैंने अपनी नजर मेरे जान्घोके बीच डाली। मेरी चूत हमेशा साफ़ रहती है। चुतके बाल मै रेगुलर साफ़ करती हु। आज भी मैंने मेरे चूतपे ऊँगली फिराई। मुझे लगा के आज चूत साफ़ करनी जरुरी है। इसलिए मैंने क्रीम लगाके उसे बिलकुल चिकना बनाया। मेरे जेहनमें कही तो ये बात होगी की अबकी बार मै उसे अपने दामाद केलिए तैयार कर रही हु। इसीलिए मै बहोत दिलसे साफ़ कर रही थी। चूत के साफ़ होतेही सुबह का खेल याद आया। मेरी उंगलीसे मै चुतमे अन्दर-बाहर कर रही थी। थोडा समय मै स्वप्नीलको सपनेमें लेकर हस्त-मैथुन कर रही थी तो नेहा ने आवाज लगाई। मै तुरंत नहाके बाहर आई। नेहा पूजा निपटके डॉक्टरसे बात करके मेरी राह देख रही थी। नेहा ने कहा की डॉक्टरने ग्यारह बजे का समय दिया है। साडेनौ तो बज चुके थे। मैंने तुरंत नाश्ता तैयार किया। नेहाने स्वप्नील को उठाके सीधे नाश्तेके टेबलपे लाया।हम तीनोने नाश्ता किया।

रवीको हम अस्पताल पहुचे तो दो मिनटमें हमारा नंबर आया। नेहा डॉक्टर के केबिन गयी। मै बाहर टाइमपास कर रही थी। इतने में वहा गीता आई। गीता पाठकजी की बड़ी बेटी थी। गीता को वहा देखके मुझे बड़ा अचम्भा हुआ। गीता आतेही मेरे गले से लगी। उसे नर्सिंग होम में मै देखके हैरान थी। उसकी शादी कब हुई ये मुझे मालूमही न था। मैंने उसे सवालोकी झड़ी लगाई। उसने कहा।चाचीजी सब कुछ बताती हु थोडा धीरज तो रखो। उसके साथ उसका पती और सासुजी आई थी। उसने मेरा परिचय सबसे कराया। उसका नंबर आने में थोडा टाइम था इसीलिए वो मुझे उसकी शादीके बारेमे बताने लगी। गीता ने लव-म्यारेज किया था। पाठकजी इसके खिलाफ नहीं थे पर उनकी पत्नीने बड़ा विरोध जताया था। इसलिए मंदिरमें शादी हुई। इसीलिए मुझे न्योता नहीं था।

गीता ने जिससे शादी की वो इक अच्छा बिजनेसमैन था। वो लोग इसी शहर रहते थे। गीता को जब मैंने नेहाके गर्भवती होनेका बताया तो वो खुशीसे नाच उठी। उतनेमे नेहा बाहर आई। नेहा और गीता मिलतेही पागलो जैसी नाच रही थी। गीता के सासुमाने दोनों को संभाला। गीता के चेक-अप होने तक हम रुके। फिर हम सब ने जूस पिया।बादमे गीता हमें उसके साथ चलनेकी जिद कर रही थी।जब मैंने उसे बताया की स्वप्नील-नेहा का पति हमारा इंतजार कर रहा है तो उसने मुझे कहा-चाची, कितने दिनों बाद हम सहेलिया मिले है, आज शाम तक मै नेहा को अपने घर ले जाती हु। उसकी ससुमाने भी मुझे बताया की शादी के बाद गीता को मुंबई से कोई मिलने नहीं आता है।

बस पाठकजी दो बार मिलने आये थे। मैंने भी ठीक समझ के नेहा को उनके साथ भेजा। उनकी कार थी। शाम को उसी कार से गीता नेहा को छोड़नेवाली थी। मैंने नेहा को उनके साथ भेजके मै चलते चलते निकली। राह चलते लोगोकी निगाहे मुझे समझ आ रही थी। मुझे थोडासा डर लगा। मैंने ऑटो पकड़ी और बाजार गयी।

बाजार में स्वप्नील आके रुका था। आज उसने झब्बा-पायजामा पहना था। उसके गठीले बदन पे बहोत जच रहा था। मुझे अकेली को देखतेही उसके मुह्पे सवाल आया। मैंने उसे सब बताया। सब सुननेके बाद वो खुश हो गया। मेरी समझ में उसके ख़ुशी की वजह आ गयी। मुझे थोड़ी शर्म आ रही थी। मेरे गाल आरक्त हुए थे। धीरेसे मेरे हाथ छुते हुए स्वप्नील मुझसे बोला -अब चलो भी, जल्दी से मार्किट निपट लेते है और घर चलते है। धुप बढ़ रही है। हमने शौपिंग पूरी की।सब्जी मंडी जाके सब्जी ली। सब्जी लेते वक्त स्वप्नील बहोत उतावला हो रहा था। वो बार बार मेरे पीछे आके मेरे गांडपे अपना लंड रगड़ रहा था। मुझे लग रहा था की शायद उसने अन्दर से कच्छी पहनी नहीं थी।

सब्जी लेने के बाद जब हम घर निकले तो उसने स्कूटी की चाबी मेरे हाथ दी। मै स्कूटी चलाने लगी। वो पीछे बैठा था। जैसेही गाड़ी चल पड़ी वो आगे खिसका और मेरे कमर को पकडके मेरे दोनों चुतडोके बीच अपना लंड घुसाने लगा। मैंने गाड़ी रोकी और उसे गाड़ी चलाने को कहा। अब मै पीछे बैठी और मैंने धीरेसे उसके कुर्तेसे अन्दर हाथ लेके उसके लंड तक ले गयी। कुर्ते के अन्दर हाथ डालतेही मुझे शॉक लगा। उसने पायजामा के बटन खुले ही रखे थे। उसका लंड मेरे हाथ में आ गया।
उसके लंड को छेड़ते छेड़ते हम घर तक आ गए। मैंने आगे होकर ताला खोला। फेन फुल फ़ास्ट करके मै पानी पि रही थी उतने में स्वप्नील अन्दर आ गया।

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