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दामाद के साथ सास की सेक्स अन्तर्वासना-2

गतांग से आगे …..

अन्दर आतेही उसने मुझे बाहोमे लेकर उठाया। मुझे उठाके वो नाच रहा था। धीरे धीरे मुझे थोडा निचे करके मेरे नितम्ब पे अपना हाथ लाया। मेरी चूत कपड़ोके उपरसे उसके लंडपे घिस रही थी। बेचैन होते हुए फटाफट अपने कपडे उतारे। उसी जोश में वो मेरे कपडे उतारने लगा। उसके जोश में कही कपडे फट न जाये इसीलिए मैंने उसे शांत होने को कहा और कपडे उतारने लगी मेरे बदन से एक एक कपड़ा दूर हो रहा था, वैसे वैसे स्वप्नील की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। उसके हाथ में अब उसका लंड था। वो लंड सहला रहा था। मेरे बदन पे अब बस ब्रा और निकर बची थी। स्वप्नीलसे रहा नहीं गया। वो आगे आया और उसने मेरी ब्रा मेरे छाती से दूर की। मेरे गोरे गोरे वक्ष उसके सामने खुले थे।

जैसेही मैंने मेरे दोनों हाथ से वक्ष छुपानेकी कोशिश की उसने तुरंत मेरी निकर मेरेसे अलग करनेकेलिएमेरी कमर से उसे निचा किया। मेरे समझ में नहीं आ रहा था के मै अपने वक्ष छिपाऊ या अपनि चूत। मै दोनों कोशिशोमें नाकामयाब रही। स्वप्नील मुझे उठाके मेरे बेड रूम में ले गया। मुझे मेरे बेडपे लिटाकर उसने मेरी निकर मेरे पैरोसे अलग की। अब मै बिलकुल नंगी मेरे दामाद के सामने थी। वो भी नंगा था। उसका लंड तावमें आके ऊपर निचे -ऊपर निचे हो रहा था। मुझे घूरते हुए स्वप्नीलने अपना मुह मेरे जान्घोके बीच लाया और मेरे चूतपे अपना नाक लगाके सूंघने लगा। थोड़ी ही देरमें वो मेरी चूतको चूसने लगा। अपने हाथसे कभी मेरे चुचे तो कभी मेरी गांड दबातेहुए वो सचमच बच्चे आइसक्रीम जैसे चाटते-कुरेदते है वैसे चटाने लगा। मै हवामें उड़ने लगी। मेरी चूत गीली होके लंडके लिए छुट छुट करने लगी।

मेरी गांड अपने आप उचकने लगी। स्वप्नील नासमझ था। उसके दिमागमें ये बात घुस नहीं रही थी। अंतमें मैंने ही उसे अपना लंड चूतमें डालनेका इशारा किया। स्वप्नील झटसे अपने घुतनोपे बैठा। मेरे पैर पसारकर उसने अपने लंडकी टोपी मेरे चूतमें दबाई। मुझे नानी याद आ गयी। मैंनेही जल्दी में उसे लंड चूतमें डालनेको कहा था। उसने भी बिना लंड गिला किये मेरी चूतमें लंड का प्रवेश किया। अब रोके कोई फायदा नहीं था। स्वप्नील को तो बस मेरे चुतमे अपना लंड जल्दी से जल्दी डालने की पड़ी थी। अन्दर पूरा लंड डालनेकी फिराकमे उसे मेरी कहा सुध थी। जैसेही पूरा लंड अन्दर प्रवेश कर चूका उसने किसी विजयी वीर जैसे मेरी तरफ देखा। उसका इतना बड़ा लंड चुतके अन्दर लेते लेते मेरी आंखोमे आसू आये थे। ये देखके स्वप्नील घबराके बोला -सासुजी,इतनी तकलीफ होती होगी तो निकालता हु।

मैंने उसे हाथसेही मना करते हुए धीरे धीरे चोदने को कहा। स्वप्नील मुझे चोदने लगा। मेरी बेरी उसका पूरा लंड अन्दर नहीं लेती होगी। तभी वो पूरा लंड अन्दर जानेसे बहोत खुश था। अपनेसे दस साल जवान लड़केका लंड बहोत टाइट था। उसका हार्डनेस मेरी चूत के अन्दर बहोत अच्छा फील कर रहा था। चूतके अन्दरकी स्किन एक साथ सब तरफ से रगड़ जा रही थी। धीरे धीरे मेरी चूत आराम महसूस करने लगी। मैंने स्वप्नील को इशारा करके जोर जोर से चोदनेको कहा। उसकी ट्रेन फुल स्पीडसे चलने लगी। वो जवान होने की वजहसे बहोत जोरसे और तेजीसे धक्के दे रहा था। उसका बड़ा और लम्बा लंड मेरे चुतमे घिसते हुए मेरे बच्चेदानीतक जा रहा था। दुनियामें कोई भी औरत किसी भी कीमतपर ये सुख हासिल करना चाहेगी। मै नसिबवाली थी जो मुझे ये सुख मिल रहा था। स्वप्नील जोरसे चोद रहा था। दोस्तों आप ये कहानी मस्ताराम डॉट नेट पे पढ़ रहे है।

उसका हौसला बढ़ानेकेलिए मैभी निचेसे गांड उठाने लगी। शाबास मेरे दामाद, और जोरसे-और जोरसे, तुम्हारे लंडका जवाब नहीं, जिंदगीमें पहली बार इतना सुख मिल रहा है , क्या ताकत पाई है तुमने।

मै चिल्लाते जा रही थी और स्वप्नील उससे मोटीवेट होके अपनी पूरी ताकत लगाके चोद रहा था। मै बार बार निहाल हो रही थी। आखिर स्वप्नीलने पूछा-सासुजी अन्दर करू या बाहर। मैंने उसे अन्दरही करनेको कहा। उससे खुश होकर उसने रफ़्तार बढाई। आखिर वो क्षण आया। रवीने जोर जोरसे चोदतेहुए मेरी चूतको अपने वीर्यसे नहलाना शुरू किया। और बीस-पच्चीस धक्के लगातेहुए वो मेरे बदनपर गिर गया। पूरी रूम शांत हो गयी। इतना समय पूरी रूम में चुदाईकी आवाज गूंज रही थी वहा अब स्वप्नीलके सांस की बस आवाज आ रही थी। मै पूरी तरह शक्तिहिन् फील कर रही थी। थोड़ी देर बाद स्वप्नील मेरे उपरसे उतरा। मै नंगीही दोनों पैर फैलायेहुई पड़ी थी।

थोड़ी देर आराम करने के बाद स्वप्नील के हाथ फिर एक बार मेरे शरीरसे खेलने लगे।मुझमे अब इतनी शक्ति नहीं थी के मै दोबारा उसका साथ दे सकू। मैंने स्वप्नील को थोडा आराम करनेको कहा और मै बाथरूम जानेकेलिए उठी। मेरी कमर दर्द कर रही थी। मैंने पैरोकी तरफ देखा। मेरी चूत लाल हुई थी। मुझे नहीं लगता था की मै अभी तुरंत या थोड़ी देर बाद स्वप्नील का पुनः साथ दे पाऊँगी। मगर वो तो अभीसे अपना लंड तानके अपने हाथमे लेके अगली बारी की तय्यारी में बैठा था।मैंने सोचा देखेंगे थोड़ी देर बाद। पहले कुछ खा तो लेते है।

फ्रेश होनेकेलिये जब मै बाथरुमकी ओर चली तब मेरे तरफ घूरतीहुई स्वप्नीलकी निगाहे मुझे मेरे नितंबोपे महसूस हुई। मैंने मुडके देखा तो स्वप्नील ललचाई नजरोसे मेरी गांडको देखता हुआ पाया। मैंने उसके नजरोकी भाषा तुरंत भांप ली। उसे खुदको फ्रेश होनेकेलिये इतनासा समय काफी था। पच्चीस सालका बांका जवान था वो। मगर मेरी हालत पस्त थी। मैंने पहले खुदको बाथरूमके अन्दर लाया फिर दरवाजा आधा बंद करके उससे पूछा- स्वप्नील, मेरे पीछे की तरफ इतना घुर के क्या देख रहा था?कभी किसी को ऐसा देखा नहीं है क्या?

स्वप्नील ने कहा- आपकी बेटी को ही ऐसा नंगा देखा है। मगर आपकी ये कसक अलगही है। ये कहते कहते वो बाथरूम की तरफ आया इसका मुझे पताही नहीं लगा। मेरा पूरा ध्यान वो अपने हाथसे लंडको मसल रहा था उसपेही था। जब मुझे पता लगा तब तक वो दरवाजेका हैंडल अपने हाथ में पकड़के दूसरा हाथ मेरे चुचिके अनारदानेको मसलनेमे लगा था। उसका इरादा मेरे समझ आ रहा था। मेरा मन दुसरे राउंडके लिए तैयार हो रहा था। मगर मुझे शक था की मेरा बदन उसे साथ देने कही कम न पड़ जाये।मेरी चूत अभीभी लाल -लाल नजर आ रही थी। स्वप्नील जोर लगाके बाथरूमके अन्दर आया। मैंने पलभर सोचके उसे अन्दर आने दिया।दोनोही नंगे थे।मैंने शावर शुरू किया। स्वप्नील के तपे बदन पे जैसेही ठन्डे पानीकी बौछारे गिरी उसे सुकून मिलने लगा। उसने वहीपर मूत्र-विसर्जन किया। उसके तुरंत बाद उसका लंड सिकुड़ने लगा। दो मिनट के अन्दर उसका लंड नार्मल हुआ। मैंने भी खुदको शावर के निचे लाया। दोनों पानी से थे। दोनों एक-दुसरे के बदन से छेड़-छाड़ करने लगे।

रवीने हाथ में साबुन लिया और मेरे बदनपे साबुन लगाने लगा। मेरे बदन को वो मल-मलके साबुन लगा रहा था। साबुन से उसने मेरे चुचिको बहोत देर तक दबाया।फिर वो साबुन लेके मेरे गान्डको रगड़ने लगा। मेरे चुतको साबुन लगाके वो अगड़ने लगा। पहले उसने एक उंगली अन्दर डाली फिर दो उंगली से वो मेरे चुतमे अन्दर-बाहर करने लगा।मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मैंने भी साबुन लेके उसके लंड और गोटियोको मालिश शुरू की। मेरे हाथ का स्पर्श होतेही स्वप्नील के लंड्मे फिर से जान आने लगी। वो फिरसे बढ़ने लगा। देखते-देखतेही लंड मेरे हाथ से बड़ा हो गया।मेरे एक हाथकी मुठीमें नहीं समां रहा था। मैंने फिर दोनों हाथसे उसे आगे-पीछे करना शुरू किया। पानी की बौछारे मुझे भी सुकून दे रही थी।

मेरी थकावट दूर हो रही थी। स्वप्नील मेरे पीछे आया। अपने लंडको मेरे दोनों चुतडका जो गैप था उसमे दबाके मुझसे पिछेसे चिपक गया। उसने अपने हाथ आगे लिए और मेरे चूची को दोनों हाथसे दबाने लगा। कभी मेरे दाई चूची की घुंडी मरोड़ता , मै आह करती तो फिर वो छोडके मेरे बायीं चूची की घुंडी को मरोड़ने लगता। अपने जीभसे वो मेरे दोनों कानको चूमने लगा। बीच-बीचमे वो मेरे कानको हलकेसे कांटने लगा। कभी कान छोडके मेरे गलेको/मानको अपने दातोसे हलकेसे कांटने लगा।उसकी ये सब प्रयास मुझे चुदाईके लिए फिर से तैयार करने के लिए थी और वो इसमें सफलभी हो रहा था। मेरे गांड के बीच रगड़ता हुआ उसका फौलादी लंड मुझे अब गरम कर रहा था। मेरे चुतमे धीरे-धीरे आग लग रही थी। ऊपर से गिरता हुआ पानी मेरे चूत के अन्दर से आ रहे गिलेपनको रोकनेमें काफी नहीं था। मै धीरे धीरे आगे की ओर झुकने लगी। स्वप्नील के समझमे बात आ रही थी उसने मुझे बाथरूममेंही आगे झुकाया।

मेरे एक पैरको नहानेके स्टूलपर रखके मेरे पैर अलग किये। नीचे झुकके एक बार मेरे चूत का रास्ता देखा और अपने लंडको हाथमें लेके उसने सही निशानेपर अपना लंड रखा और मुझसे पूछा-सही ? मैंने अपनी मुंडी हिलाकर अपनी रजामंदी जाहिर की। उसे जैसे ग्रीन सिग्नल मिला हो। उसके अपना घोडा मेरे चुतके अन्दर ऐसे डाला जैसे उसे एक मिनट के अन्दर खेल ख़तम करना हो। मैंने अपने जान्घोको थोडा दबाकर उसके लंड को अन्दर ही अन्दर थोडा दबाया। अब उसे अन्दर बाहर करने में थोड़ी कठनाई होने लगी। उसका स्पीड अपने आप कम हुआ।

फिर उसने धीरे धीरे मुझे चोदना शुरू किया। उसका लंड मस्त चोद रहा था। ऊपर से शावर से पानी गिर रहा था और नीचे स्वप्नील का लंड मुझे प्यार की बारिश कर रहा था। मै पूरी तरह आनंद-विभोर हो रही थी। जैसे ही वो लंड आगे घुसाता मै भी अपने गांड को पीछे धकलती। इससे उसका स्ट्रोक डबल हो जाता था। उसकी गोटिया मेरे चुतके उपरवाले हिस्से पे आती थी। उससे भी मुझे खूब मजा आने लगा। एक तो स्वप्नील का लंड फौलादी था ऊपर से उसमे जवानीकी गर्मी थी।अजीब तेजी उसके धक्कोमे थी। उसका लंड अन्दरतक जातेही मुझे मेरा पेट भरा हुआ है ऐसा एहसास होता था। दोस्तों आप ये कहानी मस्ताराम डॉट नेट पे पढ़ रहे है।

शावर से गिरती हुई पानी की आवाज अब हमारे चुदाई की आवाज से सुनाई नहीं दे रही थी। फचक-फचाक बहोत मस्तीभरी और मादक आवाज अब बाथरूम में गूंज रही थी। ऐसा लगा रह था सालोंसे मै मेरे दामाद के साथ चुदाई का खेल खेल रही हु और आगे सालोंतक ये खेल ख़तम नहीं होगा। मै मस्त होकर चुदवा रही थी। थोड़ी देर पहलेही वीर्यपतन होनेसे स्वप्नील भी जल्दी झडनेका नाम नहीं ले रहा था। अचानक मैंने सामने देखा, सामने वाले शीशेमें स्वप्नील मुझे चोदते हुए दिख रहा था। मैंने खुदको थोडा तीरछा किया। स्वप्नील मस्त लंड मेरे गांड को घिसते हुए पिछेसे मेरे चुतमे आ-जा रहा था। मेरे दोनों वक्ष किसी नारियल की तरह हिल रहे थे। मेरे गांडपे उसकी जंघे दब जाती थी तब मेरी गांड भी दबी जा रही थी। स्वप्नील अपने हाथ मेरे गांडपे रखकर गांड ऊपर उठानेकी कोशिश कर रहा था।

मैंने अपने पैर उठाके उसको थोड़ी मदद की। मेरी गांड थोड़ी ऊपर होतेही स्वप्नील का लंड और तेजीसे मेरे चुतमे जाने लगा। स्वप्नील को अब आसन थोडा आसान हो रहा था। वो जोर जोरसे चोदने लगा।थोडीही देर में मुझे लगा की अब स्वप्नील ज्यादा टिकनेवाला नहीं है। मैंने दिवारपे अपने हाथ मजबूत किये और स्वप्नील को फाइनल अटैक करने कहा। स्वप्नील अब बहोत स्पीड से धक्के लगाने लगा। उसके स्पीडसे मुझे लगा कही मेरे हाथ दिवार से फिसल न जाये। मै उसके वीर्य को अपने चुतमे अन्दर लेनेको तैयार थी। स्वप्नीलने अपना बम फोड़ा।

उसके लंडसे जोर से वीर्य की धार निकली। किसी स्प्रे से जैसा तेज बहाव उसके वीर्यपतन का था। वीर्यस निकलनेके बाद भी करीब वो पांच मिनट मेरी चूत को चोद रहा था। आखिर जब उसका लंड मुरझाया तब उसने लंड को मेरे चूत से अलग किया।पचाक ऐसी आवाज आई। लंड बाहर आतेही मेरे चुतसे वीर्य का प्रवाह बाहर आना शुरू हुआ। शावर की पानी से सब कुछ धो गया। मै बिलकुल ख़तम हुई थी। मुझे खड़े रहने की ताकत मुझमे नहीं थी। मैंने बाथरूम में टेंगा हुआ टॉवल बदन पे लिया। मेरी हालत देख के स्वप्नील ने मुझे अपने बाहोमे उठाया और मुझे बेडपर लेके आया। मै बेडपर जैसे ही गिरी मै तुरंत सो गयी। थकनेसे मेरी आँख कब लगी मुझे पता ही नहीं लगा।

करीब चार बजे मेरी आँख खुली तो मैंने अपने आपको स्वप्नीलके आगोशमें पाया। स्वप्नील मेरे चुतडोमे अपना लंड दबाके सोया था। पिछेसे वो मुझे आलिंगनमें लेकर सोया था। उसके दाए हाथमे मेरा दाया वक्ष था। मै उसके बाये बाजुओपर सर रखके सोयी थी। वो अभीभी बेसुध सोया था। न जाने कितने दिनों बाद उसने औरतको भोगा था। सुबहसे अबतक वो तीन बार वीर्य-पतन कर चूका था। मेरे हिलनेसे मेरे दोनों चुतडोमे फसा हुआ उसका लंड पक्काक करते हुए चुतडोसे अलग हुआ। मैंने मुडके देखा,सुबह्से तिन बार होनेके बावजूद वो अभीभी काफी बड़ा था। वो फुल्ली इरेक्ट नहीं था। अभी लंड सेमी-इरेक्ट था। फिर भी और मर्दोसे काफी बड़ा दिखता था। कई बार राह चलते मर्द लोग पेशाब करते हुए उनके लंड दिखाते है। कई लोग तो जैसेही कोई औरत वहासे गुजरती है तो खुदको तिरछा करके अपना लंड औरतके नजरमें लानेकी कोशिश करते है।

ऐसे ढेर सारे लंडोके मुकाबले स्वप्नील-मेरे दामादका लंड बहोत बड़ा है। मेरी बेटी अपने पहले डिलीवरीके बाद शायद अपने पती का पूरा लंड अपने चुतमे लेकर उसे संतुष्ट जरुर रखेगी। लेकिन तब तक मुझे मेरे दामाद को यहाँ-वहा भटकानेसे रोकना पड़ेगा। मन में सोचते सोचते मै अपने हाथ में स्वप्नील का लौडा लेकर उसे ध्यानसे देख रही थी। सुबह जब स्वप्नील का लंड मैंने पहले मुहमे लिया था तब उसपर छोटे छोटे बालथे ।मगर अब उसके लंड-गोतिया पूरा प्रदेश बाल विरहित था। शायद स्वप्नील ने नहाते वक्त बाल-दिन मनाया था। उसका लंड और गोटिया पुरे बहोत नरम और चिकने लग रहे थे। मैंने स्वप्नील की गोटिया एक-एक करके मुहसे चूसने लगी। बहोत नरम स्किन थी।

थोड़ी देरमें स्वप्नील जाग उठा। नींद खुलतेहि कोई औरत अपना लंड और गोटिया चूसते हुए पाना किसीभी मर्द के लिए सपना पूरा होने जैसा होता है। स्वप्नील अपने नसीबमें ये सुख पाकर बाग-बाग हुआ। वो अत्यंत आनंदी एवम भाव-विभोर हो उठा था। उसने अपने हाथसे मेरा सर अपने लंडपर जोरसे दबाया। वो अपने जगहसे उठकर मेरे बदनपे आया। वो उल्टा हुआ। मेरे मुहमे उसका लंड और वो उपरसे मेरे चूतमें अपनी जीभ डालकर चूसने लगा। मेरे भगनासाको जैसेही उसने अपने जीभसे चाटना शुरू किया मै अपने आप को रोकना मुश्किल समझ गयी। मेरे चूतके दोनों ओंठ फड़कने लगे। स्वप्नील अपनी जीभ और अन्दर डालने लगा। साथही वो अपने उन्गलिसे मेरे चूतमें उंगली चुदाई करने लगा। मुझे यह सब मेरे नियंत्रणके बाहर जाते हुए लग रहा था।मैंने स्वप्नील को इशारा किया। वो भी यही चाहता था। वो सेकोन्दोमे बेडसे नीचे आया। मेरे पैरोकी तरफ खड़ा होके उसने मुझे अपनी तरफ खिंचा। दोस्तों आप ये कहानी मस्ताराम डॉट नेट पे पढ़ रहे है।

मेरे दोनों पैर अपने कंधेपर लेते हुए उसने खड़े खड़े मेरे चूत को खुला दिया। मेरे नितम्बोसे ऊपरवाला हिस्सा बेडपर था।और जांघोसे नीचेवाला हिस्सा हवामे होते हुए स्वप्नील के कंधे पर था। उसने खुदको पोझीशन में लाते हुए मेरे चूत में अपना तगडा लंड इतनी जोरसे पेला की मुझे उसका लंड एकदम जड़ तक जाता हुआ महसूस हुआ। स्वप्नील ने मेरी जांघे पकड़ी थी।इसीलिए मै हिल भी न सकी। खड़े खड़े चोदना स्वप्नील को आसान हो रहा था इसी लिए वो खूब जोर जोरसे चोद रहा था। मेरा पसीना निकला जा रहा था। हरेक बार अन्दर पहुचा हुआ उसका लंड मेरे गर्भाशय के द्वार पर ठोकर मार रहा था। अन्दर जाते समय उसका फुला हुआ लंड का टोप मेरे भगनासा एवम चूत के अंदरूनी हिस्से को घर्षण कर रहा था। मेरी जीवन की सबसे उम्दा और बढ़िया चुदाई का मुझे आनंद रहा था।

अपने दामाद को मन ही मन मै धन्यवाद् दे रही थी। करीब बीस मिनट अपनी पूरी ताकत लगाईं हुई चुदाई करने के बाद ही स्वप्नील ने मेरे चूत के अन्दर अपना पानी छोड़ा। पानी निकलातेही उसका लौड़ा बाहर निकला। मैंने उसे अपने मुह में लेके साफ़ किया। चूत के घर्षण से स्वप्नील का लंड लाल लाल हुआ था। मेरी चूत भी सुजन के कारन पाव रोटी लग रही थी। इश्वर मुझे कितना सुख दे रहा है यही सोचते सोचते मै खुदको बाथरूम की तरफ ले गयी।

दोस्तों, दामादके साथ लतिकाका यह संबध लतिकाकी बेटी बच्चा होनेके बाद अपने ससुराल वापस जानेतक रहा। उसके बाद लतिकाकी जिन्दगीमे अचानक मोड आया। लतिकाके पति को पहलेसेही शुगर की बीमारी थी। ऑफिस के ज्यादा काम की वजहसे उसे बीपी का भी प्रॉब्लम शुरू हुआ। फिर दोनों औरंगाबाद आये। पति के अनुभवि होने के कारन उन्हें नौकरी तुरंत मिली। वो एक फैक्ट्रीमें अकाउंटेंटका काम करने लगे। इस गावमें उन्हें मैनेही मेरे बाजुवाले फ्लैट किराएसे दिलवाया। औरंगाबाद आई तब लतिका करीब चालीस साल की थी। मगर वो किसीभी तरहसे तीससे ज्यादा नहीं लगती थी। उसमे गजबका सेक्स भरा था। साथ साथ रहनेसे हम दोनों काफी करीब आये। मै एल आय सी एजंट था। मेरे असिस्टेंट का काम लतिका करने लगी। दोनों साथ काम करते थे। एक दुसरे के प्रति आकर्षित होना नेचुरल था।

मेरी बीवी के कुछ प्रोब्लेम्स थे।जिसकी वजहसे हम दोनों मिया-बीवी में शारीरिक संबध बिलकुल नहीं थे। ऐसेमें लतिका जैसा सेक्स बम मेरे साथ रहता था। उसके बदन का दीवाना मै कब बना इसका मुझे पताही नहीं चला। मैंने और लतिकाने एक दुसरे को हर तरहसे भोगा था। मेरे पत्नी को भी इस सम्बधोकी जानकारी थी।पर वो मुझे सेक्स का सुख नहीं दे सकती थी और लतिका का पति उसे सेक्स देने को काबिल नहीं था।

कुछ साल बाद लतिका के पति हार्ट अटैक से गए। लतिकाने अपने बेटे के साथ अभी न जाने का फैसला किया। मेरे परिवार में मेरे पत्नी के प्रॉब्लम की वजह से बच्चे नहीं थे। हमने लतिकाको हमारे घरमें रखवा लिया था। एक दिन लतिका ने अपने लडके के घर जाने का फैसला किया। उसे रोकनेवाले हम कौन थे। मगर जाने से पहले लतिका ने अपने जीवन की कहानी मेरे सामने रखी। सब सुननेपर मै दंग रह गया।
मेरे पत्नी ने इसे शब्दबद्ध करके किसी कथा के रूपमें आप सब लोगोतक पहुँचाने में मेरी बहोत मदद की। इसी लिए लतिका की जीवनी अगर आपको पसंद आई तो इसका श्रेय मेरी पत्नी का भी है।

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