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जालिम जवानी बड़ी हरामी

गतांग से आगे …..

ये तीन साल द्वीप पर अच्छे ही बीते थे ,माँ -बेटे के संबंधो में जो एक दूरी थी उसे यहाँ के एकाकीपन ने दूर कर दिया था ,उनके अलावा था भी कौन ?उनके रिश्तो में प्रगाढ़ता आ गयी थी और द्वीप के वातावरण तथा खाने -पीने की वस्तुओ के प्रचुरता के चलते तथा वातावरण की शुद्धता के कारण उनका स्वास्थ्य भी अच्छा थाl

चालीस की वय में वह थोड़ी बेडौल तथा भारी हो चुकी थी। किन्तु पिछले तीन वर्षो में उसकी काया में अद्भुत निखार आ चुका था और वह खूबसूरत से कम कहलाने से काफी आगे निकल चुकी थी। वास्तव में ,इन तीन वर्षो की आयु बढ ने के स्थान पर शायद कम हुई थी।

सतत फलों और मछलियों के आहार से तथा दिन भर के कई मील के आवागमन से उसके बदन का छरहरापन वापस लौट आया था और अंग -अंग में कसाव झलकता था। शरीर पर विद्यमान वस्त्रों का क्षरण कब का हो चुका था अब तो टापू पर उगने वाली रेशेदार वनस्पति लज्जा ढकने के उपाय मात्र थे।

पुत्र यद्यपि वयस्क हो चुका था। प्रायः वे तरह तरह के खेल खेला करते थे। तीसरे वर्ष उसने महसूस किया की अब वह उसके शरीर को दूसरी नजर से से देखा करता था और उसके शरीर के अंगो की तारीफ भी करता था । उसकी परखी नजरो ने उसकी नजरो के बदलाव को ताड़ लिया था। उसकी नजरे उसके वक्षस्थल और कदली साम्भ सी जंघाओ का प्रायः अनुसरण करता पाती थी और बात बदल कर उसका ध्यान हटाने का प्रयास करती थी।

अपने ही पुत्र के इस तरह के देखने से उसके भी बदन में झुनझुनी उठने लगती थी ,पर वह स्वयं को भी सयंत करने का भरसक प्रयास करती थी। साथ में पुरुष के होने का अहसास उसके तन बदन में रोमांच और सनसनाहट से अभिसिक्त कर देता थायद्यपि वह उसका ही जाया था।

वह अपने पुत्र के भरपूर शरीर की छवि निहार कर प्रायःमन में उठने वाले वर्जित विचारो से संघर्षरत रहती थी और इस तरह के वर्जित विचार न उठे इसका भपूर प्रयास करती थी विशेषकर जब वह नहाकर आता था। तब उसका दमकता हुआ बदन उसे अपने पति की जवानी के छवि को आमूर्त कर देता था और तब उसके मन के मचलते अरमान उसे अन्दर तक झंकृत कर ही देते थे और तब उसको अपने मन के विचलित होने पर विषाद होता था और वह किसी तरह से अपनी इस मनःस्थिति से किसी तरह निकल पाती थी।
स्थिति तब और कठिन हो जाती थी जब नहाने तैरने या मछली मारते समय उसका अंग दिख जाता था तब उसकी चूत में चींटिया घूमती हुई मालूम पड़ती थी और इससे छुटकारा पाने के लिये उसे रात के अँधेरे का ही एकमात्र सहारा होता था और तब उसका मन उसे धिक्कारता था माँ होके भी वह इस तरह कैसे विचलित हो जाती है।
किन्तु अब यह वर्जित इच्छाए दिन पर दिन छुप कर चुपचाप अपना आकार बढ़ा रही थी। और उसके पुत्र का उसके प्रति आकर्षण सामने आ गया जब वह नहा रही थी और उसका वक्षस्थल सूरज की किरणों से दैदीप्यमान था ।
चालीस की वय में वह थोड़ी बेडौल तथा भारी हो चुकी थी। किन्तु पिछले तीन वर्षो में उसकी काया में अद्भुत निखार आ चुका था और वह खूबसूरत से कम कहलाने से काफी आगे निकल चुकी थी। वास्तव में ,इन तीन वर्षो की आयु बढ ने के स्थान पर शायद कम हुई थी। दोस्तों आप ये कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है l

सतत फलों और मछलियों के आहार से तथा दिन भर के कई मील के आवागमन से उसके बदन का छरहरापन वापस लौट आया था और अंग -अंग में कसाव झलकता था। शरीर पर विद्यमान वस्त्रों का क्षरण कब का हो चुका था अब तो टापू पर उगने वाली रेशेदार वनस्पति लज्जा ढकने के उपाय मात्र थे।

पुत्र यद्यपि वयस्क हो चुका था। प्रायः वे तरह तरह के खेल खेला करते थे। तीसरे वर्ष उसने महसूस किया की अब वह उसके शरीर को दूसरी नजर से से देखा करता था और उसके शरीर के अंगो की तारीफ भी करता था । उसकी परखी नजरो ने उसकी नजरो के बदलाव को ताड़ लिया था। उसकी नजरे उसके वक्षस्थल और कदली साम्भ सी जंघाओ का प्रायः अनुसरण करता पाती थी और बात बदल कर उसका ध्यान हटाने का प्रयास करती थी।

अपने ही पुत्र के इस तरह के देखने से उसके भी बदन में झुनझुनी उठने लगती थी ,पर वह स्वयं को भी सयंत करने का भरसक प्रयास करती थी। साथ में पुरुष के होने का अहसास उसके तन बदन में रोमांच और सनसनाहट से अभिसिक्त कर देता थायद्यपि वह उसका ही जाया था।

 

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