जालिम जवानी बड़ी हरामी

गतांग से आगे …..

वह अपने पुत्र के भरपूर शरीर की छवि निहार कर प्रायःमन में उठने वाले वर्जित विचारो से संघर्षरत रहती थी और इस तरह के वर्जित विचार न उठे इसका भपूर प्रयास करती थी विशेषकर जब वह नहाकर आता था। तब उसका दमकता हुआ बदन उसे अपने पति की जवानी के छवि को आमूर्त कर देता था और तब उसके मन के मचलते अरमान उसे अन्दर तक झंकृत कर ही देते थे और तब उसको अपने मन के विचलित होने पर विषाद होता था और वह किसी तरह से अपनी इस मनःस्थिति से किसी तरह निकल पाती थी।

स्थिति तब और कठिन हो जाती थी जब नहाने तैरने या मछली मारते समय उसका अंग दिख जाता था तब उसकी चूत में चींटिया घूमती हुई मालूम पड़ती थी और इससे छुटकारा पाने के लिये उसे रात के अँधेरे का ही एकमात्र सहारा होता था और तब उसका मन उसे धिक्कारता था माँ होके भी वह इस तरह कैसे विचलित हो जाती है।

किन्तु अब यह वर्जित इच्छाए दिन पर दिन छुप कर चुपचाप अपना आकार बढ़ा रही थी। और उसके पुत्र का उसके प्रति आकर्षण सामने आ गया जब वह नहा रही थी और उसका वक्षस्थल सूरज की किरणों से दैदीप्यमान था ।

अब माँ तो छोड़ कर बेटा भी माँ के प्रति आसक्त होता जा रहा था और लाख कोशिश के बाद भी वर्षा के पास कोई चारा नहीं था की वो उसके बेटे का उसके प्रति नजरिये को बदल पाये
आखिर लगाम लगाती भी कब तक क्योकि कपडे गायब हो रहे थे पर माँ बेटे पर जवानी के कसाब बड रहे थे !

दोनों की नजर एक दुसरे के प्रति बदल रही थी पर दोनों ही रिश्ते को बचाने के प्रयास मैं अपनी इच्छाओ को लगातार मारे जा रहे थे पर आखिर कब तक कुछ तो होना था
इसे कुछ अच्छा कहे या समाज की नजरो मैं अनर्थ पर क्या हो सकता था की उन्हा उनको रोकने के लिए इन्सान तो इन्सान भगवान भी नहीं थे उस निर्जन टापू पर फिर क्या पता वर्षा की किस्मत मैं ऊपर वाले ने क्या लिखा थाl

वर्ना जो माँ आज पहली बार अपने बेटे से मिलकर घुमने निकली थी और जिस जहाज पर वो दोनों सवार थे वो जहाज डूब जाता है ! और बचते है तो केवल वर्षा और उसका बेटा अतुल क्या वो दोनों अब इस परिस्थिति से बचने का प्रयास नहीं करेंगे!

पर करंगे तो क्या और कब तक वर्षा अपनी जवानी जो ४० की होने पर भी सलमान की तरह जवान हो रही थी जबकि अतुल तो अभी पूर्ण कुवारा था जिसने अब तक बेरी के बेर तक नहीं छुए थे! पर ये कमीनी जवानी बड़ी हरामी है जो ललचाये तो तडपाये तो और तो और सारा ज्ञान भी शिखा देती है !

नियमित रूप से पर, मां या बेटा निकट स्थित एक निर्जन मीठे पानी के तालाब में स्नान के लिए जाते थे । एक छोटे से झरने से उस तालाब में निरंतर जल प्रवाह बना रहता था आस – पास चट्टानें थी जो पानी के भीतर तक फ़ैली थी और कई बार उनकी आड़ में दोनों ही एक साथ स्नान कर लेते थे। वास्तव में झरने में नहाने का लुत्फ़ ही कुछ और है और झरने से बहने वाले पानी ने सैकड़ो सालो में उस तालाब को यह रूप दिया था !

एक दिन वह अकेले ही स्नान का आनन्द लेने के लिए चल दी।

कमर तक पानी में जाने के बाद उसने झरने की ओर रूख किया उअर उसके नीचे पहुँच कर पानी में कई डुबकियाँ लगाई और और अपने चहरे पर आये हुए बालों को झटका तो झाड़ियों के बीच से उसके बेटे की झलक दिखी। वह स्तब्ध रह गयी। पर ,उसने सोचा कि प्रतिक्रया करना ठीक नहीं होगा और न ही यह जताना ठीक होगा की उसने उसे देखते हुए देख लिया है।

पर एक सनसनी सी उसके बदन को हिला गयी ,उसने महसूस किया की उसके भीतर से कुछ गरम सा उठ रहा है और पैरो की और जा रहा है। उसका मन इस स्थिति से अंतर्द्वद्व कर रहा था कि एक ओर उसे यह चिंता सता रही थी की उसका बेटा उसे देख रहा था और दूसरी ओर उसके देखने से वह उत्तेजित हो गयी थी।

इस अंतर द्वंद्व में आखिर विजय उसकी कामना की हुई और उसने कुछ निश्चित किया। दोस्तों आप ये कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है l

उसके मन में यह तथ्य है कि वह दोनों चिंतित और उत्साहित हैं कि रोबी उसे देख रहi है वह समय के साथ संघर्ष-रत । उसकी इच्छाओं की जीत के रूप में वह एक निर्णय करती है।
वह अपने पुत्र की तरफ आकर्षित तो हो रही थी पर उसे जताना नहीं चाहती थी ,इस लिए वह अपनी नजरे नीचे ही किये हुए थी जिससे उसे इसका आभास भी न हो सके।

वह अपने बालों से खेलने लगी ,फिर थोड़ी देर पानी टपक जाने के बाद वह उन्हें निचोड़ने का उपक्रम करने लगी जिससे उअसके उसके उरोज आंदोलित और आलोड़ित हो रहे थे। अब उसने अपने हाथ पीछे ले जा कर उनका जूडा बनाने लगी ,इससे उसका वक्षोरोज बाहर के ओर और अधिक फ़ैल गए ,इस सब में उसने समय लगाया जिससे उसका पुत्र और अधिक समय तक उसको देख सके।

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