शायरी की डायरी -2 मैं और मेरी तन्हाई

शायरी की डायरी -2 मैं और मेरी तन्हाई

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाजते-रफू क्या है?
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है?

– मिर्जा गालिब
1.पैराहन-वस्त्र, लिबास 2. हाजत-(i) जरूरत, आवश्यकता (ii) ख्वाहिश, अभिलाषा 3. जुस्तजू- तलाश, खोज

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छोड़ दीजे मुझको मेरे हाल पर,
जो गुजरती है गुजर ही जायेगी।
-‘असर’ लखनवी

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जंगलों में जो मुसाफिर सर पटक के मर गया,
अब उसे आवाज देता कारवाँ, आया तो क्या?
-‘जोश’ मलीहाबादी

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जब तवक्को ही उठ गई ‘गालिब’,
क्यों किसी का गिला करे कोई।
मुनहसिर मरने पै हो जिसकी उम्मीद,
नाउम्मेदी उसकी देखा चाहिए।

-मिर्जा गालिब

1.तवक्को – आशा, उम्मीद, भरोसा

2. फना-(i) नष्ट, बरबाद (ii) मृत्यु, मौत (iii) लुप्त, गाइब


दिल तू मुहब्बत करता क्यूँ है

ए दिल तू मुहब्बत करता क्यूँ है?
जो करता है तो फिर तड़पता क्यूँ है ?
जो बैठ गया है दिल में प्यार का दर्द
बनकेवोह आँखों के रस्ते निकलता क्यूँ है?……….. ..

आग लगती है तो पत्ते भी हवा ही देते है

दोस्त क्या खूब वफाओं का सिला देते है!
हर नए मोड़ पे एक दर्द नया देते है
तुम से तो खैर घडी भर का ताल्लुक रहा,
लोग सदियों की रफ़क़त भुला देते है!!


न आंखों को चैन न जिगर को करार आया
मेरे हिस्से मोहब्बत में बस इंतजार आया

वो मिल न सकी फिर भी उससे मिलते रहे
खयालों में उसपे मैं सबकुछ निसार आया

बरसता रहा गम आंखों से सावन की तरह
हर मौसम मेरे लिए दर्द की फुहार लाया

अब न रहा कुछ भी इस जमाने से वास्ता
तुझे खोकर दुनिया के रिश्ते बिसार आया


आवारा हैं गलियों में मैं और मेरी तनहाई
जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुसवाई

ये फूल से चहरे हैं हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते
राहें हैं तमाशाई रही भी तमाशाई

मैं और मेरी तन्हाई

अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे
रोटी है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई

मैं और मेरी तन्हाई

आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे जख्मों का गुलिस्तां
है आंखों से लहू टपका दामन में बहार आई

मैं और मेरी तन्हाई

हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है हंस कर कभी गाती है
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई