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लेस्बियन सेक्स और डिल्डो का मजा

दिल्ली से वापिस आने के चार पाँच महीने बाद मैं एक घर में पेईंग गैस्ट रहने लगी थी तो वहाँ मेरी हमउम्र लड़की रचना मेरे साथ मेरे कमरे में मेरे साथ थी। रचना बनारस से था और वह भी एक दफ़्तर में काम करती थी, वो मेरी अच्छी सहेली बन गई थी।

एक दिन मैं अपने ऑफिस से जल्दी ही घर आ गई थी क्योंकि मुझे और रचना को कुछ खरीदारी करने बाज़ार जाना था। मैंने घर आ कर जल्दी से खाना बना लिया और रचना की प्रतीक्षा करने लगी। रचना ने कहा था कि वो चार बजे तक आ जायेगी।

कोई साढ़े तीन बजे अचानक ही घने काले बादल छाने लगे और जोरों की बारिश शुरू हो गई। मुझे लगा कि सारा प्रोग्राम खराब हो गया और समय बिताने के लिए मैं बेडरूम में टेलिविज़न देखने लगी। अचानक मेरी आंख लग गई और मैं बहुत देर तक सोती रही।

मेरी नींद साढ़े सात बजे खुली तो मैंने देखा कि बारिश बंद हो चुकी थी परंतु रचना अभी तक नहीं आई थी।

मैंने उसके मोबाइल पर फोन किया तो वो बंद था। मैंने उसके साथ काम करने वाली उसकी एक सहकर्मी को फोन किया तो उसने बताया कि आज ऑफिस की एक पार्टी थी इसलिए सब उसमें थे और ऑफिस चार बजे ही बंद हो गया था। अब मेरा पारा चढ़ने लगा कि रचना फोन करके बता देती कि आज का प्रोग्राम ना बनाऊँ तो आधा दिन बेकार नहीं होता।

खैर रात साढ़े आठ बजे रचना घर में घुसी। वो पूरी तरह से भीगी हुई थी और ठण्ड से कांप रही थी, आते ही बोली- सॉरी शालू ! मुझे माफ कर दे। दरअसल अचानक ही ऑफिस में पार्टी का प्रोग्राम बन गया था इसलिए मेरे दिमाग से ही निकल गया कि तुझको फोन करके बता दूँ कि आज का प्रोग्राम ना रखना। प्लीज़ मुझे माफ कर दे यार !

हालाँकि मेरा मूड बहुत खराब था परंतु फिर भी मैं चुप रही सिर्फ इतना कहा कि सारा कालीन गीला हो जायेगा इसलिए सीधे बाथरूम में जा कर कपड़े बदल ले। उसने अपने हाथ में पकड़े थैले सोफे पर रखे और जैसे ही वो मेरे पास से होकर अंदर आई मुझे कुछ महक आई तो

मैंने उसको पूछ ही लिया- तूने शराब पी है?                                                                                                 तो रचना ने कहा- हाँ, पार्टी में सब लड़कियाँ पी रहीं थीं तो मैंने भी वहीं एक गिलास पी ली।

मैंने देखा कि उसके पर्स के साथ तीन थैले और भी थे। तभी रचना ने बाथरूम के दरवाज़े पर खड़ी होकर कहा- शालिनी, प्लीज़ मेरा तौलिया पकड़ा दे ! मैंने उसका तौलिया लाकर दिया तो उसने वहीं अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। मैंने उसको कहा- ठण्ड लग जायेगी, दरवाज़ा बंद करके अंदर कपड़े बदल ले !

उसने मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और तौलिए से अपने शरीर को साफ़ करने लगी। हालाँकि पहले भी एक दो बार मैंने रचना को कपड़े बदलते हुए देखा है और मैं हमेशा इधर उधर हो जाती थी परंतु आज मैं पहली बार उसको बड़े ही ध्यान से देख रही थी।

रचना ने अपनी ब्रा उतार कर फेंकी और फिर अपनी पैंटी भी उतार दी। मैंने देखा उसके मोम्मे बहुत बड़े तो नहीं थे पर बहुत छोटे भी नहीं थे शायद 32 आकार के थे। पतली कमर और छोटी गांड बिल्कुल वैसी जैसी आमतौर पर लड़कों को पसंद होती है। दोस्तों आप ये कहानी मस्ताराम डॉट नेट पर पढ़ रहे है l

उसके नैन नक्श बड़े ही अच्छे थे कुल मिला कर इस समय रचना मुझे बहुत सैक्सी लग रही थी। ऊपर से ठण्ड की वजह से उसके चुचुक बिल्कुल कड़े हो गये थे। मैंने सोचा कि अगर मैं कर सकती तो अभी उसके मोम्मे दबा देती और उसके चुचुकों को चूस लेती।

तभी मेरी तंद्रा भंग हो गई जब रचना ने मुझको पूछा- इतने ध्यान से क्या देख रही है शालू?                                   “नहीं कुछ नहीं ! मैं बस वो देख रही थी कि आज तेरा मूड कुछ अलग सा ही लग रहा है !” कह कर मैं चुप हो गई।

मैंने रचना को गाउन लाकर दिया पर उसने कहा- नहीं आज मैं कुछ नया पहनने के लिए लाई हूँ।रचना नंगी ही एक थैला खोल कर एक पैकेट से कुछ कपड़े निकल कर लाई। मैंने देखा कि उसके हाथ में काले रंग की एक ब्रा और पैंटी थी। उसने मेरे सामने ही वो पहन ली और फिर मेरे सामने खड़ी होकर पूछने लगी- देख शालू, कैसी लग रही है?

मैंने कहा- अपने किसी चाहने वाले को पूछना, वो बताएगा कि तुम कैसी लग रही हो !

सच में कहूँ तो रचना कयामत लग रही थी। मैंने दिल में सोचा कि काश मैं लड़का होती तो अभी और यहीं उसको नीचे लिटा कर उस पर चढ़ाई कर देती और उसकी चूत और गांड का भुरता बना देती।

तभी उसने मुझको कहा- शालिनी, एक बात कहूँ बुरा तो नहीं मानोगी?

“नहीं बोल !” मेरे मुहँ से निकला।

“नहीं, पहले वायदा कर कि बुरा नहीं मानेगी !” उसने फिर से कहा।

“अच्छा मैं कसम खाती हूँ कि बुरा नहीं मानूँगी ! अब बोल?” मैंने कहा।

तब उसने दूसरे पैकेट में से एक ब्रा और पैंटी निकाल करके मेरे सामने रखी और कहा- यह मैं तेरे लिए लाई हूँ। प्लीज़ मना मत करना।

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